Wednesday, June 24, 2009

लद्दाख की बंद डिबिया है जांसकर -चार

सावन के महीने में नीलेकंठ की यात्रा पर ढेरों लोग निकलते हैं। ऋषिकेश के नजदीक ही एक पहाड़ी चोटी पर नीलकंठ मंदिर है। खड़ी चढ़ाई के इस रास्ते पर उस वक्त मोटर रोड़ नहीं बनी थी और यात्रा पैदल ही की जाती थी। सावन के पहले सोमवार को जल चढ़ाने के लिए वहां श्रद्धालुओं की वहां अथाह भीड़ होती है। 1989-1990 के आस पास की घटना है। मैं भी अपने कुछ ऐसे मित्रों के साथ, जिनमें ज्यादातर के लिए नीलकंठ की यात्रा, धार्मिक यात्रा से ज्यादा, एक रोमंचकारी अनुभव ही थी, शनिवार की शाम नीलकंठ के लिए निकल गया। सावन का महीना शुरू हो चुका था लेकिन पहला सोमवार अभी नहीं आया था। ऐसे ही मौंको पर पहले गए हुए साथियों का अनुभव था कि सोमवार के बाद नीलकंठ के पैदल रास्ते पर गंदगी ही गंदगी हो जाती है। जगह-जगह से पहुंचने वाले श्रद्धालु जहां तहां अपनी टांगे फैलाकर जमाने भर की गंदगी कर देते हैं। बारिस का पानी जिसको दलदल बना देता है। इसलिए सोमवार से पहले ही निकलना ठीक रहेगा। फिर जिसे मन्दिर में जल चढ़ाना है वह भी आसानी से चढ़ा लेगा। जल चढ़ाने के सवाल पर दो एक मित्रों ने अपनी राय भी रखी कि जल चढ़ाने का महात्मय तो सोमवार का ही है। लिहाजा रविवार के दिन निकलना ठीक रहेगा। खैर, इसका हल निकाल लिया गया कि शनिवार की रात को चलकर इतवार की सुबह तक आराम-आराम से मन्दिर तक पहुंच जाएंगे। रात बारह बजे तक इंतजार कर, क्योंकि रात बारह बजे के बाद तो सोमवार लग ही जाएगा, जिसे जल चढ़ाना है जल चढ़ा लेगा और जल चढ़ाते ही वापिस हो जाएंगे। हालांकि इस बात पर कुछ न-नुकूर और तकरार भी हुई कि रात बारह बजे से दिन नहीं माना जाता सुबह चार बजे से दिन माना जाता है। जीत अंतत: चार बजे वालों की ही हुई-संख्या में वे ज्यादा निकल आए। फिर हारने वालों के लिए अपनी जिद पर अड़े रहना कोई सवाल न था। तय हो गया कि सुबह चार बजे ही सही, पर शनिवार को ही निकल लो ताकि सुबह चार बजे आसानी से मन्दिर में घुसने को मिल जाये, वरना लम्बी लाईन में तो शाम तक भी नम्बर न आएगा।
तेज बारिस पड़ रही थी तो भी हम सभी मस्ती में सवार, रात का खाना घर से ही खाकर दोपहिया वाहनों पर सवार होकर निकल पड़े। भीगने से बचने के लिए बरसातियां सभी ने ओढ़ी हुई थे। ऋषिकेश पहुंचने के बाद वाहन किसी परिचित के घर पर रख उसी वक्त नीलकंठ के रास्ते पर बढ़ लिए। बारिस की झड़ी के बीच टार्च की रोशनी में ही रात भर रुकते और चलते हुए सुबह नीलकंठ पहुंच गए। रविवार का पूरा दिन मन्दिर के आस पास घूम कर बिता दिया। शाम तक पहले सोमवार के महात्मय को महत्वपूर्ण मानने वाले श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ हो गई थी। मन्दिर में जल चढ़ा लेने वालों की लाईन रात नौ बजे से ही लगनी शुरु हो गई। हम सभी पहली रात के थके हुए थे। बारिस में भीगते रहने के कारण बदन टूट रहे थे। चार बजने में कई घंटे बाकी थे। सोचा, तब तक कहीं बदन टिका कर आराम कर लेते हैं। मन्दिर के पास ही धर्मशालानुमा उस छत के नीचे जहां पहले से ही बहुत भीड़ थी, एक कोना पकड़, गीली बरसातियों को फर्श पर बिछा लेटने और बैठने की मुद्रा में पांवों को आराम देने लगे। जिन्हें जल चढ़ाना था वे लाईन में लग गए लेकिन बार-बार दौड़कर चले आते और थोड़ा सा आराम करने के बाद फिर लाईन की ओर दौड़ जाते- उस दूसरे साथी को यह मौका देने के लिए कि अ बवह आरम कर ले। इस तरह से वे लाईन में अपनी जगह को सुनिश्चित करते रहते। इस बीच हमारी तो आंख ही लग गयी। वे साथी जिन्हें जल चढ़ाना था, थके होने की वजह से नींद उनकी आंखों में भरी हुई थी। बस लाईन में आगे पीछे लगे अपने सह-श्रद्धालुओं को यह कहकर कि थोड़ी देर में आते हैं तब तक वे उनकी जगह को सुनिश्चित रखें, निकल आए और आकर हमारी बगल में लेटे तो नींद ने उन्हें भी घेर लिया। लेकिन मन्दिर में जल चढ़ाने और लाईन में अपनी जगह को सुरक्षित रखने की चिन्ता ने उन्हें सोते हुए भी चैन न लेने दिया। शायद रात दो बजे के आस पास उनमें से एक की नींद खुली तो उसे लाईन का ध्यान आया। तब तक लाईन अच्छी खासी लम्बी हो चुकी थी। जब वह लाईन में अपनी उस जगह पर पहुंचा, जहां उसका अनुमान था कि होनी चाहिए, तो लोगों ने लाईन में घुसने न दिया। वे लड़ने मरने का उतारू हो गए। लाईन में खड़े सज्जन को उसने कहा कि मैं आपको बता कर गया था तो वह कुटिल मुस्कान में हंसने लगा। लाईन में लगे दूसरे लोग भी इस हंसी में शामिल थे। थक हार कर वह वापिस आकर बैठ गया। किसी दूसरे को उठाने की भी कोई कोशिश उसने नहीं की। सभी गहरी नींद में थे। भीड़ भरी हलचल के बीच भी नींद की गहरी जकड़ में। जब उस दूसरे साथी की नींद खुली जो खुद भी मंदिर में जल चढ़ाने के लिए उसके साथ ही था तो उसने उसे पूरा वाकया बता दिया। दूसरा साथी तो कुछ ज्यादा ही परेशान हो गया। जब नीलकंठ के लिए निकले थे तो कुछ ऐसे परिचित श्रद्धालुओं ने जो नीलकंठ नहीं जा पा रहे थे लेकिन जाने की तमन्ना रखते थे, उसके पास अपनी ओर से धूप-दीप और नैवेध्य का अर्घ्य उसके ही हाथ नीलकंठ पहुंचा दिया था। एक नैतिक किस्म के दबाव में वह बेचैन हो गया। उसने खुद उस ओर जाकर देखा जहां लोग लाईन लगाये खड़े थे। जब उसे कोई रास्ता दिखाई न दिया तो लाईन में सबसे पीछे जाकर लग गया। लाईन लगाए लोगों के लिए खड़े होने की बहुत ही सीमित जगह होने की वजह से एक लम्बी दूरी के बाद लाईन घूम कर सर्पीला आकार ले चुकी थी। उस साथी को वहां पर जगह मिली जहां एक दो आदमियों के और खड़े हो जाने के बाद लाइन को फिर से घूमना था। रात के चार बज रहे होगें उस वक्त। वह छ बजे तक लाईन में लगा रहा लेकिन लाईन कुछ इंच भर ही खिसकी थी। उसके भीतर एक खास तरह की उक्ताहट और बेचैनी होने लगी। अब उसके भीतर तो श्रद्धा क्या ही बची थी पर बेचैन था तो इसलिए कि दूसरे लोगों द्वारा दिये गये नैवेध्य को कैसे मंदिर में चढाए। लाईन में खड़ा रहना भी उसे राहत न दे रहा था। बारिस की रिमझिम लगी हुई थी। वह भीग चुका था। बरसाती ओढ़े होने पर भी लगातार पड़ती बारिस का पानी गले से सरकता हुआ उसके पीठ और छाती तक पहुंचता रहा। उसके वस्त्र भीग चुके थे। भीगे हुए कपड़ों में वह ठिठुर रहा था। तब तक हम लोग भी उठ चुके थे। एक लम्बी नींद ने हमें तरोताजा कर दिया था। हमें तो कुछ भी मालूम नहीं था कि क्या माजरा है। हम तो बस निकल भागने को तैयार थे। पर उसके चेहरे पर मायूसी थी। एक तरह के नैतिकता बोध से वह बेचैन था।
"साली लाइन खिसक ही नहीं रही है।" उसका बेचैनी भरा दोहराव जारी था।
लाइन में पीछे लगा हर कोई ऐसी ही शिकायत से भरा था। लाइन में धा मुक्की भी हो रही थी। पुलिस के सिपाही, होमगार्ड के जवान और कुछ स्वंय सेवक लाइन को व्यवस्थित करने में जुटे थे। कुछ लोग थे जो रह-रहकर बीच में घुसने की फिराक में थे। कितने ही सफल हो चुके थे और जो सफल नहीं हो पाए थे, उनकी कोशिशें जारी थी। हम घर वापिस लौट जाना चाहते थे लेकिन उस साथी की बेचैनी हमें लौटने नहीं दे रही थी। इस बीच लाइन भी कुछ आगे खिसकी थी और अब वह लाइन के उस मोड़ पर पहुंच चुका था जहां से लाइन की गतिविधि को वह सीधे देख पा रहा था। लाइन में किसी को भी बीच में घुसते देख वह वहीं से चिल्ला उठता। हम भी चाहते थे कि लाइन जल्दी से जल्दी आगे खिसके और हमारा साथी मन्दिर में जल्द से जल्द प्रसाद चढ़ा आए। ताकि हम लोग वापिस निकल सकें। लिहाजा हम लोग भी हाथों में लिए हुए डंडों को फटकारते हुए स्वंय सेवक बन गये। बारिश से बचने के लिए मैंने खाकी बरसाती ओढ़ी हुई थी और सिर पर उसी की टोपी को ऐसे लगाया हुआ था कि पी-केप सी दिखायी देती थी। लाइन में लगे लोग मुझे पुलिस का सिपाही या होमगार्ड का सिपाही समझ रहे थे। कोई लाइन के भीतर घुसता तो वे मेरी ओर को इस उम्मीद से देखते हुए कि मैं लाइन में घुसते हुए आदमी से सख्ती से पेश आऊं। मेरी ओर उम्मीद से देखते हुए वे चिल्लाते,
"अबे कहां घुसा जा रहा है ?"
उनके इस अनबोली अपेक्षा पर मैं जोर से दहाड़ते हुए डंडा फटकारता और लाइन में घुसने वाला सहम कर वहां से खिसक लेता। कुल मिलाकर एक अच्छा सा प्रभाव मेरी उपस्थिति का पड़ता रहा जिसका मुझे उस वक्त भान हुआ जब स्वंय सेवक बना एक युवक मेरे पास आकर बोला, "दीवान जी अपनी चाची जी हैं, बीमार हैं बेचारी ---।" आगे कहते हुए उसकी धिग्गी बंध गयी। लाइन में लगे लोगों की अपेक्षा पर अभी तक मैं एक सही सिपाही साबित हुआ था, इसका प्रभाव उस स्वंय सेवक पर भी पड़ा था। लिहाजा मुझे पुलिस वाला जान, वह आदर भरे शब्दों मे पेश आते हुए, मुझे दीवान जी कह कर संबोधित करने लगा। वह स्त्री जो उसके साथ थी, बहुत ही बूढ़ी थी। यदि वह स्वंय भी मेरे पास आती तो मैं तो उसे मन्दिर में प्रवेश कराने की सोचता ही। पर स्त्री को मन्दिर के भीतर प्रवेश करवाना मेरे लिए तत्काल संभव न हुआ। क्योंकि स्वंय सेवक बना वह युवक इससे पहले भी अपने कई परिचितों को बिना लाईन के अन्दर प्रवेश करा चुका था। लिहाजा मैंने उस युवक को वहां से हट जाने के लिए कहा और उस स्त्री को वहीं रोक लिया। अन्य स्वंय सेवकों को भी मैंने हिदायत दी की वे भी पीछे जाकर लाईन में हो रही धा मुककी को रोके, इधर मैं अकेले ही देख लूंगा। वे सब पीछे चले गये। बोले कुछ नहीं।
अब मैं पूरी तरह स्वतंत्र था। अपनी समझ और अपने आदर्शों के हिसाब से लाईन को व्यवस्थित करने में सक्षम। लाईन में लगे दूसरे लोगों से बात कर मैंने उस बूढ़ी स्त्री को मन्दिर में प्रवेश करा दिया। लोगों का मुझ पर यकीन बढ़ रहा था कि सिर्फ किसी जैनुइन व्यक्ति को ही मैं भीतर प्रवेश करा रहा हूं। मेरा प्रतिरोध करने की बजाय वे मेरी कार्रवाई को सराह रहे थे। बूढ़ी-बूढ़ी स्त्रियां या कोई शारीरिक रूप से लाचार व्यक्ति, जिनके लिए लाईन में खड़े रहना असंभव-सा ही होता, मैं उसे खुद ही लाईन के लोगों से प्रार्थना कर भीतर प्रवेश करा देता।
बस लाइन में लगे लोगों पर विश्वास कायम कर लेने के बाद मुझे एकाएक विचार आया कि क्यों न मंदिर के अन्दर मैं खुद ही हो आंऊ, क्यों मेरे भीतर जाने का विरोध तो कोई शायद ही करे। मेरा अनुमान ठीक निकला। अपने साथी सारा नैवेध्य औरप्रसाद लेकर मैं मन्दिर के भीतर चला गया और उस साथी के नैतिकता बोध को मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर उतारने के बाद हम लोग वापिस लौट गए।



जांसकर में धर्म-दर्शन का ऐसा कोई मामला न तो मेरे लिए है और न ही मेरे उन साथियों के लिए जो वैसे तो धर्म पर आस्थावान हैं पर बौद्ध मट्ठ जिनके लिए सैलानी स्थल ही हैं बस। हां किसी भी जगह को देखने और जानने की इच्छा, हमेशा मेरे अंदर रही है। धार्मिक साहित्य को पढ़ते हुए भी एक तरह की जिज्ञासा ही मुझे घेरे रहती है। कुरान शरीफ, बाईबिल, गीता या त्रिपटक जैसी कोई भी साहित्यिक पुस्तक पढ़ने को मैं लालायित ही रहता हूं। उसके कथासार और उस दौर विशेष के समाज, जिसमें वे लिखी गई, को जानने की ललक हमेशा ऐसा कुछ भी पढ़ने को उकसाती है।


-जारी
पहली किश्त के लिए यहां क्लिक करें।
दूसरी किश्त के लिए यहां क्लिक करें।
तीसरी किश्त के लिए यहां क्लिक करें।

2 comments:

विनीता यशस्वी said...

Apki lekhan shaili aise hai ki parne mai yatra ka pura drashya najro ke samne ubhar aata hai...

sanjay vyas said...

बौद्ध स्थलों खासकर हिमाचल और लद्दाख के ऐसे स्थानों के नाम ही राहुल जी की याद दिलाते है. बहुत बाँधने वाला विवरण. नील कंठ के बारे में खूब सुना है, अगर इसके इतिहास की थोडी जानकारी भी देते तो और अच्छा रहता. उत्तर भारत के कई तीर्थों पर मंदिरों की प्राचीनता के अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किये जाते है. यहाँ हो सकता है ऐसा न हो.