Monday, November 30, 2009

टिप्पणी जो प्रकाशित न हो पा रही थी

सबद मे प्रकाशित इस आलेख पर यह टिप्पणी पोस्ट करना चाह्ता था  पर तकनीकी खामियो के चलते बार बार यही संदेश मिलता रहा -

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लिहाजा इसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

बेहद शर्मनाक खबर है यह तो, इसमें कोई दो राय नहीं। विष्णु जी ने निश्चित ही यह पहल की है, कल जनसत्ता में भी पढ लिया था। पर तब से ही सोच रहा हूं कि जिस मामले क प्रतिरोध बिना सामूहिकता के नहीं उसके लिए वरिष्ट आलोचक चंद कुछ नामों को लेकर ताल ठोकते से क्यों दिख रहे हैं ? क्या किसी सामूहिक कार्रवाई से अलग लिए गए नाम कोई इतने बड़े रसूखदार इंसान है कि जिनके कहने भर से साहित्य अकादमी अपना फ़ैसला बदल देगी या ये कोई गुंडे बदमाश है कि जिन्हें ललकारा जा रहा है कि अब दिखाओ अपनी गुंडई जब साहित्य अकादमी खुले तौर पर तुम्हारे आगे आ खड़ी हुई है। विष्णु जी के आलेख का यह हिस्सा तो मुझे ऎसा ही कुछ कहता हुआ लग रहा है-
" देखना दिलचस्प होगा कि प्रगतिशील, जनवादी तथा जन संस्कृति मोर्चा लेखक संगठनों के हमारे मित्र जिनमें सर्वश्री ज्ञानेंद्रपति, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, अरुण कमल, विरेन डंगवाल तथा मंगलेश डबराल जैसे मनसा-वाचा-कर्मणा नई आर्थिक व्यवस्था और नव-साम्राज्यवाद के सक्रिय विरोधी हैं, जो उनके काव्य और गद्य तथा सक्रियता में स्पष्ट दीखता है, उस साहित्य अकादेमी के इस प्रयोज्य 'सामसुंग रवीन्द्रनाथ साहित्य पुरस्कार' के बारे में क्या सोचेंगे जिसने उन्हें अपने नियमित पुरस्कार से कभी सम्मानित किया था।"
विष्णु जी के इस हिस्से को भी देखिए-
"गुरुदेव को जोतकर अकादेमी ने बांग्ला साहित्यकारों का तो मुंह शायद बंद कर दिया, ज़ाहिर है कि इसमें अकादेमी के उपाध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय ने भी अपना कहावती 'पाउंड -भर मांस' वसूला होगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या अन्य भारतीय भाषाओँ में महान साहित्यकार हैं ही नहीं कि सिर्फ़ नोबेल पुरस्कार के कारण भारतीय साहित्यों को चिरकाल तक मात्र रवीन्द्र-संगीत गाना पड़े?"
यहां विष्णु जी का विरोध पुरस्कार से है या, क्या है(?) समझ नहीं पा रहा हूं।
अच्छा हो कि प्रस्तुत कर्ता भी अपनी बात रखें, ताकि इस आलेख को पुन: प्रस्तुत करते हुए वह द्रष्टिकोण भी नजर आए जो इसी आलेख को प्रस्तुत करने के उद्देश्य के रूप में रहा होगा।

4 comments:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

रविन्द्रनाथ टैगोर से पूरे आदर के बावज़ूद यह तो है विजय भाई की सामसुंग या उसके भाई बंधु सिर्फ़ उसी को महत्व देते हैं जिसे नोबल मिला… क्या उसके पहले या बाद उससे बेहतर रचनाकार नही मिले?

हां इससे मुझे लगता है कि बाज़ार विरोध और समर्थन के बीच स्पष्ट रेखा ज़रूर खिंचेगी…और हम साफ़ पूछ सकेंगे… तय करो किस ओर हो तुम?

शिरीष कुमार मौर्य said...

विजय भाई सबद पर यह लेख देखा और वहीँ एक छोटी सी त्वरित टिप्पणी भी दी. यहाँ आपने अपने ढंग से कुछ सोचा और लिखा - इस पर भी बार बार ध्यान जा रहा है! रवींद्र वाली बात पर तो मैं भी वैसे ही सोचता हूँ, जैसा खरे जी. भारतीय क्या बांगला साहित्य में भी रवींद्र के नाम के आगे कई दूसरे महत्त्वपूर्ण नामों की अनदेखी हुई है. ये अलग बात है कि उनके सरीखा पी आर किसी का नहीं रहा. आखिर रवींद्र ही क्यों? प्रेमचंद या निराला या मुक्तिबोध क्यों नहीं? बाक़ी लेख जिस मूल मुद्दे पर है उससे तो सभी बावस्ता है. खरे जी ने कुछ नाम गिनाए या कहो कि उन नामों को शायद चुनौती है कि हिम्मत है तो वे कुछ कह कर दिखाएं - इसकी भी अलग अलग व्याख्याएं हो सकती हैं. आपकी बात को और अच्छे से पढने -समझने की कोशिश कर रहा हूँ. रहा विरोध तो वह सामूहिक तभी हो पायेगा जब हम सब उसमें शामिल होंगे. आप साहित्य अकादमी के इस क़दम पर एक पोस्ट सिर्फ़ अपनी राय देते हुए लगायें तो और अच्छा रहेगा. और उसे लिखते हुए क्यों न उन से भी प्रतिक्रिया ले ली जाये, जिनके नाम खरे जी ने लिए हैं. हालांकि साफ़ है कि ये सिर्फ़ उन नामों की नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं है- हर छोटे बड़े को अपनी बात साफ़ साफ़ बतानी चाहिए- क्योंकि बात वही पुरानी है - जो तटस्थ हैं समय कहेगा उनका भी अपराध!

Dheeresh said...

विजय भाई, अगर कुछ सामूहिक हो तो अच्छा है और अगर जो नाम खरे जी ने गिनाये हैं, वे भी कोई ईमानदार साहस दिखाते हैं तो अच्छा होगा. अब खरे जी ने क्या कहा, उस से अलग भी यह मसला तो है ही कि कोई भी लेखक इस बारे में क्या सोचता है और वो अपना पक्ष चुनने के लिए आज़ाद है.

अर्शिया said...

कभी कभी सर्वर की समस्या के कारण ऐसा हो जाता है।

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सांसद/विधायक की बात की तनख्वाह लेते हैं?
अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा ?