Thursday, February 4, 2010

शोषण के अभयारण्य

वैश्वीकरण की इस बीच जितनी चर्चा हुई है उस लिहाज से हिंदी में उस पर अर्थशास्त्रीय अनुशासन के तहत लगभग नहीं के बराबर काम हुआ है। विशेष कर ऐसा काम जो सामान्य पाठक को उसकी सैद्धांतिकी के साथ व्यवहारिक पक्षों से भी परिचित करवा सके।

अशोक कुमार पाण्डेय, कवि होने के बावजूद, उन बिरले लेखकों में से हैं, जिन्होंनें साहित्य की चपेट में सिमटी हिंदी में ऐसे विषयों पर भी लेखन किया है जो समकालीन समय, उसकी चुनौतियों और संकटों को समझने-समझाने में मददगार साबित होता है। अर्थशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषय पर लगातार हिंदी में किया गया उनका लेखन कई दृष्टियों से प्रशंसनीय है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह लेखन पाठ्यक्रमीय लेखन नहीं है जैसा कि अक्सर होता है। वैश्वीकरण के विभिन्न पक्षों पर विगत कुछ वर्षों में लिखे गए इस संग्रह के लेखों में दृष्टि संपन्नता, मानवीय सरोकार और विषय की गहरी पकड़ साफ देखी जा सकती है।

एक युवा अर्थशास्त्री के ये लेख आम पाठक के लिए भी उतने ही ज्ञानवर्द्धक और पठनीय हैं जितने कि विषय के अध्येताओं और विशेषज्ञों के लिए हो सकते हैं। यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि अगर किसी भी दौर को समझना हो तो यह काम उसकी आर्थिक प्रवृत्तियों को बिना जाने नहीं हो सकता। आज के दौर के लिए तो यह और भी महत्वपूर्ण है।

एक संपादक के रूप में ही नहीं बल्कि एक आम पाठक के तौर पर भी मैंने इन लेखों को पढ़ा है और मैं चाहूंगा कि इसे वे सब लोग अवश्य पढ़ें जो अपने दौर को सही परिप्रेक्ष्य में समझना चाहते हैं।

ये लेख हिंदी में साहित्येत्तर लेखन की चुनौती को तो स्वीकारते ही हैं साथ में सभी भारतीय भाषाओं के पक्ष को ऐसे दौर में मजबूत करते हैं जब कि अंग्रेजी ने शायद ही ज्ञान का कोई पक्ष छोड़ा हो जिस पर एकाधिकार न जमा लिया हो।
- पंकज बिष्ट  

पुस्तक : शोषण के अभयारण्य
लेखक : अशोक कुमार पाण्डेय
प्रकाशक: शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली (मो.  09810101036)
कीमत : 200 रु
              

26 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

पुस्‍तक की समीक्षा पुस्‍तक की खूबियों को उकेरती है। पुस्‍तक लेखक का चित्र परिचय वाला पेज भी स्‍कैन करके लगाया जाना चाहिये। इससे लेखक से भी पाठकों का परिचय होगा और उनके ब्‍लॉग और ई मेल का लिंक व जानकारी दी जानी चाहिये।
अच्‍छी पुस्‍तकों के प्रचार प्रसार के लिए आपका यह कदम दमदार है।

बोधिसत्व said...

अशोक को पोथी के लिए बधाई....पंकज जी ने अच्छा लिखा है

varsha said...

achcha laga jankar ki aap kalam ke zariye dil aur dimag donon ki baat kar lete hain.

शिरीष कुमार मौर्य said...

ashok ko is zaroori kitab ke liye bahut bahut badhai. wo hamari pidhi mein sabse vicharwaan hone ke sath sath dharaatal par kaam karne mein yaqeen rakhne walon mein hai. punah badhai.

रावेंद्रकुमार रवि said...

बहुत प्रसन्नता की बात पर
बहुत-बहुत बधाई!

--
मुझको बता दो -
"नवसुर में कोयल गाता है - मीठा-मीठा-मीठा! "
--
संपादक : सरस पायस

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पुस्तक के लिए बधाई!

डॉ .अनुराग said...

अच्छा लगा जानकर.....बधाई ....हिंदी पुस्तक मेले में उपलब्ध है या नहीं ....

अशोक कुमार पाण्डेय said...

बिल्कुल डा साहब…हाल नं 12 ए, स्टाल नं 178 ( शिल्पायन) पर उपल्ब्ध है।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

Bahadur Patel said...

bahut achchhi baat hai.
ashok bhai ko bahut-bahut badhai.

neera said...

बधाई अशोक जी!आपकी कितनी किताबें लांच हो रही हैं इस बार पुस्तक मेले में ?
कवि को पहले पढ़ें या अर्थशास्त्री को?

pallav said...

बधाई!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

धन्यवाद मित्रों।
नीरा जी इस बार तो बस गद्य ही … संवाद से 'मार्क्स-जीवन और विचार' व 'प्रेम' और शिल्पायन से यह किताब। कविता संकलन शायद अगले साल तक आ पाये!

Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak " said...

नमस्कार बन्धु!
क्या आपकी पुइस्तक ओन लाईन पढी जा सकती है?
जिज्ञासा है... बतायें... साधक

अविनाश वाचस्पति said...

आज 5 फरवरी 2010 को विश्‍व पुस्‍तक मेले में शिल्‍पायन और संवाद पर विजय गौड़ जी से मिलना हुआ। खूब आनंद आया। उनके चित्र शीघ्र ही नुक्‍कड़ पर देखिएगा।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

आनलाईन तो अभी उपलब्ध नहीं है साधक जी…

अजेय said...

vijay, v ashok bhaai, is kitab ko pdhoonggaa.

शरद कोकास said...

अशोक को इस किताब की हार्दिक बधाई । पंकज जी का यह ब्लर्ब पसन्द आया ।

Anonymous said...

vijay pandey : tumhari kavitaon ka intazar rahega ....isliye bhi shayad ki unme se bahut k janm ka sakshi raha hu......tumhari kavitaye hamesha mere bahut karib

Anonymous said...

मैं नफ़रत करता हूं इस आदमी से…पर ये इतना काम कर कैसे लेता है?

Pawan Meraj said...

Anonymous ji aap ki tippadi padh kar mai muskura utha, Umeed hai ashok bhai bhi khush hue honge. Ye sach hai unko pyar karne vale bhi yahi sochte hain itni urja kahan se late hain ve :-).Din bhar noukari me khatna fir likhne ki jid me rtjga... isme jod dijiye jab tab muddon ko le ke sadak par utar aane lagatar koshishen.... Par jiddi hain vo. UNKI IS JID KO SALAAM OR BAHUT BAHUT BADHAI

Rahul said...

Ashok se meri akhiri mulaqat koi 18baras pehle hui thi. Prambhik shiksha se lekar +2 tak hum saath hi padhe badhe. Itne lambe antaraal ke baad jab ye hamare ek abhinna mitra ke zariye orkut pe mila, isse pehchanane me mujhe koi samasya nahi hui. Vahi vidrohi swar ab aur bhi prakhar ho gaya hai. Tumhari pustak avashya padhoonga. Bahot badhai. Gauranvit bhi mehsoos kar raha hoon. Eishwar sada sahay.

असीम said...

अशोक तुम्हारी इस महत्वपूर्ण पुस्तक पर मेरी औपचारिक बधाई..ऐसे ही लिखते रहो

Dr. Purushottam Lal Meena Editor PRESSPALIKA said...

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

प्रदीप कांत said...

अशोक जी को बधाई

SRI PRAKASH said...

bada achha laga padhkar