Friday, November 19, 2010

टंटा प्रसंग उर्फ टिप-टाप(अवधेश और हरजीत -४)

देहरादून का कोई भी साहित्यिक - सांस्कृतिक उल्लेख डिलाइट और टिप-टाप के जिक्र से बचकर संभव नहीं.डिलाइट का इतिहास बहुत पुराना है और आज भी वह अपनी उसी त्वरा के साथ गतिशील है- एक साथ कई पीढियों के बीच जीवन्त बहसों , अफवाहों , सूचनाओं और निखालिस गप्पबाजी का ठेठ अनौपचारिक ठिया!आज की बढ़ती समृद्धि और और घटती संवेदनशीलता के इस बेहद तेज समय में शहर के बीचो-बीच अपनी सादगी भरी धज में डटा डिलाइट प्रतिरोध का सौन्दर्यशास्त्र रचता दिखायी पडता है.डिलाइट के इतिहास और प्रतिष्ठा पर इस ब्लाग में पहले भी लिखा जा चुका है-खास तौर पर सुरेश उनियाल और विजय गौड़ द्वारा.यहां मैं टिप-टाप का जिक्र कर रहा हूं जो अस्सी के उत्तरार्ध और नब्बे के पूरे दशक भर अपने उफान पर रहा और अब बस नाम भर बचा हुआ है-चकराता रोड की भीड़ भरी भागम - भाग के बीचो-बीच एक साइन बोर्ड!इस शहर में भीड़ का ये आलम है
घर से गेंद भी निकले तो गली के पार न हो
हरजीत ने शायद कुछ ऐसा टिप-टाप मे बैठकर ही कहा था.उन दिनों टिप-टाप पूर्णतः साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र बन चुका था.टिप-टाप का इतिहास कुछ यूं रहा कि डिलाइट के किंचित अगंभीर से दिखलायी पडते माहौल से हटने के लिये एक वैकल्पिक स्थल के रूप में पहले यहां पत्रकारों ने अड्डा जमाया -फिर रंगकर्मी काबिज हुए और अन्ततः साहित्यिकों की विशिष्ट मुफलिसी को टिप-टाप मालिक प्रदीप गुप्ता के दिल की रईसी और काव्य-प्रेम इस कदर रास आये कि टिप-टाप, २० चकराता रोड शहर के साहित्यिकों का पता ही बन गया.जब कथाकार योगेंद्र आहुजा नौकरी के सिलसिले में स्थानान्तरित होकर देहरादून आये तो उन्हें दिल्ली में बताया गया कि देहरादून में किसी साहित्यकार का पता पूछने की जरूरत नहीं -सीधे टिप-टाप चले जाइये! तो टिप-टाप में ही मेरी योगेन्द्र आहूजा से पहली मुलाकात हुई-वह शायद शाम का वक्त था-लगभग साढे सात बज चुके थे. वे अपनी पत्नी के साथ आये थे-टिप- टाप के माहौल में किसी का सपरिवार आगमन आश्चर्य ही हुआ करता था.
"अच्छा! सिनेमा-सिनेमा वाले योगेन्द्र आहूजा!"लगभग यही प्रतिक्रिया थी. बाद में योगेन्द्र ने गलत ,अंधेरे में हंसी और मर्सिया जैसी कहानियां दीं.
खैर, यह एक अलग और विस्तृत कथा है, फिलहाल बात टंटा शब्द पर की जाये जो एक तरह से टिप-टापियों का सामूहिक नामकरण हो गया.इस शब्द के साथ थोडा सा विरोध, हलका सा प्रतिरोध और दुनिया के प्रति किंचित उपहास को मिलाकर एक खिलन्दडाना बिम्ब कालान्तर में जुड गया जिससे संबद्ध हर शख्स को टंटा कहा जाने लगा. बहुवचन टंटे और सामुहिकता के लिये टंटा समिति का संबोधन चल निकला.यहां बेहद गंभीर मुद्दों को गैर जिम्मेदारी की हद तक पहुंचने की दुस्साहसिक चेष्टाओं के सामुहिक आयोजन में कई गैर-टंटों ने निहायत अगंभीर (non-serious) वार्तालाप की शक्ल में बदलते देखने के बाद टंटा समिति को वक्त-बर्बादी का जरिया माना और घोषणा की कि यह दो चार दिनों का शगूफा है.मज्रे की बात यह कि टंटों ने इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं-गम्भीरता का उपहास वैसे भी टंटेपन का मूल भाव है!लेकिन टंटा समिति चल निकली और खूब चली.
इस टंटा शब्द की भी एक कहानी है.एक शाम शहर में घूमते हुए कवि वीरेन डंगवाल टिप टाप में आ पहुंचे .शायद राजेश सकलानी के साथ.चूंकि अवधेश और हरजीत के लिये शाम होने के बाद सूरज ढलने का इन्तजार वक्त-बर्बादी के सिवा और कुछ नहीं था, सो वे चाहते थे कि वीरेनजी जरा जल्द ही टिप-टाप से निकल कर कहीं और चलें जहां हरजीत अपना ताजा शे’र पढ़ सके
ये शामे-मैकशी भी शामों में शाम है इक
नासेह, शेख ,वाहिद, जाहिद हैं हमप्याला
लेकिन वीरेनजी को शायद ६.३० की ट्रेन पकडनी थी.तो शाम कुछ फीकी से हुई जा रही थी-तो हरजीत ने कहा
"चलो ! टंटा खत्म!"फिर अगला ही जुमला कस दिया,"स्वागत एवं टंटा समिति का काम खत्म"
अगले दिन इस बात का इतनी बार मजाक बनाया गया कि टंटा शब्द सबकी जुबान में चढ गया.कालान्तर में इसमे साथ कुछ अर्थ जोडने की कोशिशें हुईं . एक प्रसिद्ध नामकरण यूं रहा
Total Awareness of Neo Toxic Adventures
इस पर अगली पोस्ट में

4 comments:

kainthola said...

Mera Tip Top se nata 1991-october 1994 tak raha. Rasta Avdesh ne dekhaya tha, meri ki ketaab key illustration banane key chakkar main. Yaad hai July 1991 ki puri salary Bharat lodge main khap gayi thi. Jo bhe ho tabhi Avdesh se Tanta Samiti key bare main suna aur phir baad main bakayada shamil bhe ho gaya tha. Tab dehradun ki raftaar dil ko maafik aati thi.

शरद कोकास said...

अच्छा लिखा है भाई ।

विनीता यशस्वी said...

ye wali post aur isse pahli wali dono post aaj hi pari hai...bahut achhe sansmaran likhe hai apne...

डॉ .अनुराग said...

जाने क्यों पढ़कर ये शेर याद आया .....

दिल खुश हुआ मस्जिदे वीरान को देखकर
मेरी तरह खुदा का भी खाना खराब है

दिलचस्प किस्सागोई !!!!