Thursday, February 20, 2014

नीलकण्ठ यहाँ कहाँ से?-यादवेन्द्र

(नीलकण्ठ जैसे पक्षी जमारे जीवन से दूर होते जा रहे हैं,प्रस्तुत है   सह्रदय वैज्ञानिक और इस ब्लाग के सहलेखक यादवेन्द्र का संवेदनशील आलेख)


आज दोपहर धूप में कुर्सी डाल कर पीछे के आँगन में बैठा खाना खा रहा था तो अचानक सामने खूबसूरत सा नीलकंठ दिखाई दिया -- कौवों,तोतों और गिलहरियों से तो रोज़ रोज़ की मुलाक़ात यहाँ होती है। करीब महीने भर पहले एक गिलहरी तो अक्सर मेरी खाट पर बिलकुल सिर को छू कर निकल जाती थी जब मैं खाने के बाद पंद्रह बीस मिनट के लिए खाट बिछा कर लेट  जाया करता था -- उनींदी में गिलहरी के आस पास बिचरने पर उसकी चपलता से पैदा होने वाले कम्पन से मेरी नींद एक झटके के साथ जब जब खुली मैंने उसको दौड़ कर छत से पानी की निकासी के लिए लगाई हुई सीमेंट की मोटी पाइप में घुस कर अदृश्य होते हुए देखा --- लगता मुझ जैसे अधेड़ और सुस्त इन्सान को अपनी फुर्तीली अदा से चिढ़ा रही है। 
तो बात मैं आज के नीलकण्ठ की कर रहा था -- शायद पैंतालीस पचास सालों बाद नीलकण्ठ जैसी बला की चटक रंग बिरंगी चिड़िया को इतने पास से देख रहा था। यूँ देखने को तो पिछले महीने जब चित्तौड़ गया था तब रानी पद्मिनी के महल पर  एक नहीं कई नीलकण्ठ दिखाई दिए थे और पानी के बीचों बीच हमारी पहुँच से दूर महल के कँगूरे पर बड़े आराम से कबूतरों और तोतों के झुण्ड के बीच बैठे इकलौते नीलकण्ठ की अनेक तस्वीरें मैंने अपने नए कैमरे से उतारी थीं -- इन को देख कर देखने वाले को ऐसा लगेगा जैसे मैं उससे हाथ भर की दूरी तक पहुँच गया था पर वास्तविकता यह है कि कैमरे के लेंस को खिसका खिसका कर मैं लक्ष्य से  तीस पैंतीस मीटर दूर रहकर तकनीकी साधनों से नीलकण्ठ के पास होने का एहसास भर पैदा कर रहा था।   

बचपन में पिताजी की तबादलों वाली नौकरी में  हम जहाँ भी रहे  दशहरे में बनारस ज़रूर जाते -- और ख़ास दशहरे के दिन का एक अनिवार्य काम था नीलकण्ठ के दर्शन करना। पूरे बनारस शहर की बात नहीं जानता पर नगवा में हमारा घर गंगाजी के बिलकुल किनारे पर था और वहाँ घर की रेलिंग पर खड़े खड़े हम नीलकण्ठ की प्रतीक्षा करते। सुनते थे कि शहर में कुछ लोग नीलकण्ठ को पिंजरे में डाल कर गली मुहल्लों में घुमाते हैं और घर घर घूम कर उस दिन के लिए निर्धारित लोगों का काम आसान कर देते हैं और  अच्छी खासी कमाई भी कर लेते हैं। पर हम नदी के किनारे रहने वालों को न तो पैसा माँगने वाले कैदी नीलकण्ठ बाबा के दर्शन हुए और न ही उनकी झलक पाने को घर से बाहर जाकर एक कदम का फ़ासला तय करना पड़ा। हमारे घर को लगभग छूते हुए बिजली का तार गुज़रता था और हमें दिनभर में थोड़े थोड़े अन्तराल पर एक नहीं चार पाँच  नीलकण्ठ ऐसे दिख जाया करते थे जैसे उनको मालूम हो कि उस घर की रेलिंग में कुछ बच्चे बड़ी बेसब्री के साथ उनका इन्तजार कर रहे हैं। 

आज का नए ज़माने का नीलकण्ठ नाशपाती की  पत्रविहीन शाखों पर देरतक ठहरा रहा  पर थोड़ी थोड़ी देर बाद निरन्तर नीचे उतरता और फिर ऊपर उड़ कर अपनी जगह पर  बैठता --- लगता जैसे जीवन में एकरसता उसको बिलकुल स्वीकार नहीं। नीचे मेरा माली सब्जियों की क्यारियों में नलके से लम्बी पाइप लगा कर पानी दे रहा था और नीलकण्ठ पेड़ से उतर कर उसी पाइप के मुँह के पास आता  और पानी की धार के बीचों बीच अपनी चोंच लहरा कर ऊपर उड़ जाता। .... मेरी समझ में यही आया कि उसको प्यास लगी थी और पानी की धार देख कर वह वहीँ बैठ गया। कई बार रोशनी की गति से नीचे उतरे नीलकण्ठ की चोंच में लौट ते वक्त कोई और भी चीज दिखाई देती ,पर इन दिनों कीड़े मकोड़ों के धरती से बाहर विचरण करने का समय तो है नहीं। बार बार की कोशिशों से भी मैं यह पता नहीं कर पाया कि लौटते हुए आखिर नीलकण्ठ अपनी चोंच में क्या लेकर जाता है --- बेहद फुर्तीले परिंदे के सामने सत्तावन साल का मेरे जैसा अधेड़ इंसान आखिर कहाँ ठहर पाता। मैं उसके और नज़ दीक जा कर इस दुर्लभ और दिलचस्प खेल को बिगाड़ने की ज़ुर्रत भला कैसे कर सकता था। 

आज का दिन मेरे लिए दशहरे के उसी उत्सव जैसा बीता जब नए कपड़े और मिठाइयों की सौगात की साल भर की प्रतीक्षा सम्पूर्ण और फलीभूत होती थी --- चमत्कार कभी कभी हो ही जाते हैं। सोचता हूँ कल नीलकण्ठ के बारे में ढूँढ कर कुछ और जानकारी इकठ्ठा करूँगा।  

एक बात और : जिस समय नीलकण्ठ के साक्षात सम्मोहन की गिरफ्त में बँधा हुआ था ,मैंने चार लोगों को अपनी तात्कालिक भावनाओं से एस एम एस की मार्फ़त जोड़ने की कोशिश की। … फिर एक और को भी। पाँच लोगों तक पहुँच पाने की मेरी कोशिश इस मायने में पूरी तरह असफल साबित हुई कि इनमें से किसी एक ने भी पलट कर मुझे एक शब्द नहीं लिखा।रात होते होते मुझे लगने लगा कि नीलकण्ठ प्रकरण शायद बुढ़ापे का प्रलाप  हो जिसमें रोजमर्रा की कोई बेहद मामूली चीज़ मुझे अकारण ख़ास लगने लगी हो। … और मैं लोगों की आँखों में उँगली डाल के उनके इत्मीनान और विवेक में खा म खा की ख़लल डाल रहा हूँ --- फिर भी नीलकण्ठ का आज इतनी देर मेरे पास ठहर जाना क्या सचमुच इतना मामूली वाक़या है कि मैं यह सोच कर इसकी चर्चा भी अपनी तरह सोचने वाले मित्रों और परिजनों से करना बंद कर दूँ कि लोग इसको बुढ़ापे की  सनक का नाम देने लग जायेंगे ?
 यादवेन्द्र

8 comments:

विजय गौड़ said...

Bahut hi dilchasp he yadvendra ji. Lambe antral ke baad aapko padhne ka yahdurlbh awsar he.aabhar.

विजय गौड़ said...

Bahut hi dilchasp he yadvendra ji. Lambe antral ke baad aapko padhne ka yahdurlbh awsar he.aabhar.

ब्लॉग बुलेटिन said...


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सांसद बनना हो तो पहले पहलवानी करो - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (21-02-2014) को जाहिलों की बस्ती में, औकात बतला जायेंगे { चर्चा - 1530 } में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बहुत ही संजीदगी से लिखी गई पोस्ट. नीलकण्ठ का सम्बन्ध लगभग हम सब के बचपन से है. और जिस तरह गौरैया विलुप हो गई, वैसे ही नीलकण्ठ भी. किंतु आपकी सम्वेदनशील अभिव्यक्ति ने इन परिन्दों के खो जाने के असर को दिल से जोड़ दिया है! बहुत अच्छी पोस्ट!!

Mukesh Kumar Sinha said...

बेहतरीन... संजीदा पोस्ट !!

Onkar said...

वाह, बहुत खूबसूरत लेखन

Dinesh chandra Joshi said...

Neelkanth ke bahane apne aaspas ghat rahi khoobsuroot chejoun ko dakhne parakhne ki gajab samvedna hai is aalekh mein.Yadvendra ji ka abhar!