Monday, March 9, 2026

संकट का हिमालय और हिमालय का संकट : अतुल सती

 

 



 पर्वतीय भू-संकट पर अतुल सती

 (परंपरागत रूप से संवेदना को साहित्य का मूल आधार माना गया है।लेकिन संवेदना के गुण-धर्म भी बाह्य जीवन पर आश्रित होते है।प्रेमचंद ने साहित्य के विकास क्रम में यथार्थ के महत्व को प्रतिष्ठित किया। आत्मचेतस रचनाकार के लिए हर दौर में  जटिल यथार्थ की पड़ताल करनी ज़रूरी है। लेखक एक स्वतन्त्र कार्यकर्ता की तरह संचालित होता है लेकिन अदृश्य रूप से सामाजिक घटनाओं और ब्यवहारों से संवाद जारी रखता है। आधुनिक साहित्य अंतर्विषयक अध्ययन की मांग करता है। यह लोकतांत्रिक लक्ष्यों के लिए ज़रूरी कार्यभार है। विभिन्न कार्यक्षेत्रों की पृष्ठभूमि से आए रचनाकारों से साहित्य समृद्ध हुआ है।
 उत्तरी भारत के पर्वतीय जनपद में, जो भूगर्भीय अस्थिरता का केन्द्र रहा है,  दशकों से सामाजिक, वैज्ञानिक और राजनैतिक रूप से गहरी अंतर्दृष्टि अध्ययन करने वाले जानेमाने कार्यकर्ता अतुल सती से वार्ता करने की पहल  "विदुज बैटन" के मंच पर संभव हुई है  - राजेश सकलानी की इस टिप्पणी के साथ हम 29 अक्टूबर 2025 को  विदुज बेटन के मंच से ऑनलाइन दिये गये व्याख्यान को जस का तस प्रस्तुत कर रहे हैं। वे कोई लिखित वक्तव्य नहीं पढ रहे थे - स्वतः स्फूर्त बोल रहे थे । )

 

धन्यवाद मुझे यह अवसर देने के लिए और इस व्याख्यान माला  में जिस तरह के लोगों को आपने आमंत्रित किया है मुझसे पूर्व तो वो सब काफी अनुभवी लोग रहे हैं। उनके काफी उपलब्धियां हैं। राष्ट्रीय स्तर पर नाम है। उनका लेखन है। मैं उस स्तर पर उस तरह से कितना अपनी बात कह पाऊंगा नहीं मालूम। लेकिन ये मौका देने के लिए, अवसर देने के लिए, आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद

और वैसे तो मैंने पूर्व के  वक्ताओं को भी सुना- मेवाड़ी जी को भी इस मंच पर बोलते सुना। तो जिस अंदाज में उन्होंने अपनी बात रखी थी - किस्सागोई के अंदाज में, तो मैं भी कोशिश करूंगा कि  इस तरह से ही बात आए और बहुत फॉर्मल ना हो ।इनफॉर्मली ही बात हो ,औपचारिक ना रहे और क्योंकि ये ऐसा विषय हम लोगों ने चुना कि जिस पर कि पिछले दो-तीन साल में बहुत सारी चर्चा, बहुत सारी बातें हुई हैं और स्वयं मैं ही जो हूं  तो बहुत सारे मंचों पर इस देश के अंदर मुझे बुलाया गया और वहां ये बात दोहराई गई। इस पर बोला गया।

 लेकिन आज हमने विषय को थोड़ा  अलग तरह से समझने जानने के लिए इस  तरह का विषय चुना था।  क्योंकि हम जानते हैं कि हिमालय केवल एक भौतिक इकाई नहीं है बल्कि हिमालय  हमारे साहित्य में, हमारे संस्कृति में एक प्रतीक के बतौर भी इस्तेमाल होता रहा है। वो एक सिंबल भी रहा है। एक है। तो जैसे कि आप भी अपने परिचय में कह रही थी तो हिमालय क्योंकि वो विशालता का भी सिंबल है। बड़े होने का ।उसका विस्तार उसकी विशालता उसकी अडिगता - इस तरह का भी वह एक प्रतीक है।

 इसलिए उस संकट को देखने के लिए कि वो संकट कितना बड़ा है- तो उस संकट को चिन्हित करने के लिए , उसकी गहराई,  उसका जो विस्तार है उसको  समझने समझाने के लिए हमने विषय चुना कि संकट छोटा नहीं है, ये बड़ा है और ये इसलिए संकट का हिमालय है। और हिमालय का संकट तो है ही है। तो इसलिए इस विषय  पर आए और क्योंकि ये सिर्फ हिमालय का संकट नहीं है। एक बात तो ये है।

  अगर हम थोड़ा सा इसको दूर से देखें या जिसको आजकल कहते हैं कि एरियल व्यू  इसका लेकर  ऊपर से देखें तो ये पूरी धरती का संकट है। पूरी पृथ्वी का - हमारी धरती का संकट है और  जैसा कि होता है आमतौर पर कि कोई भी जो संकट है या कोई भी जो बीमारी है वो सबसे पहले वहां प्रकट होती है जो सबसे संवेदनशील जगह होती है । जो सबसे कमजोर जगह होती है। तो इस धरती पर भी क्योंकि हिमालय बहुत संवेदनशील जगह है सबसे  कमजोर जगह है ।हमारी धरती के बनने के क्रम में और हिमालय के बनने के क्रम में तो भूगर्भ विज्ञानियों  जो आकलन है- जो कहते हैं- तो उसके हिसाब से  हिमालय तो अभी बन ही रहे हैं। तो हिमालय कमजोर हैं। फ्रेजाइल है ,संवेदनशील हैं। तो इसलिए जो

धरती का एतिहासिक संकट भी है जिसको कि हम कह रहे हैं संकट का हिमालय। इसीलिए इसके जो लक्षण हैं, जो पहले लक्षण हैं वे हिमालय में प्रकट हो रहे हैं। हिमालय में दिखाई दे रहे हैं और वो क्योंकि कमजोर है तो जल्दी उसमें  वो प्रकट हो गए। लेकिन ये सिर्फ हिमालय का संकट नहीं है।

यह हम जरूर इसमें कहना चाहते हैं। इस विषय के माध्यम से ।तो यह विषय की चुनने की- उसको

रखने की एक बात है। और  बात उसमें क्योंकि मानव सभ्यता जहां से चली है और जहां हम लोग बढ़ रहे हैं उसमें- निरंतर विकास के क्रम में- तो विकास के और जो उसके साथ-साथ विनाश हो रहा है उसके भी अपने आप से द्वंद है । और साथ में, क्योंकि हमको ये भी हम लोग जानते समझते हैं कि इसको अपने विद्यार्थी जीवन से अपने बाकी जीवन से हमने जाना बल्कि मैं अभी याद कर रहा था तो हम लोगों ने बचपन में एक निबंध पढ़ा  तो वो ध र्मवीर भारती जी का निबन्ध है- शायद उन्हीं का था- ठेले पर हिमालय। तो जिसमें हम देखते हैं कि वो एक शहर में ठेली पर हिमालय यानी कि बर्फ की  सिल्ली को जाता हुआ देखते हैं और उससे उनको हिमालय की याद आती है और उसमें  याद करते हुए वह अपने संस्मरण में एक जगह कहते कि जब मैं वहां पहुंचा कौसानी में और कौसानी को उन्होंने देखा उसके प्राकृतिक सौंदर्य को तो उनको लगा कि मैं जो हूं यह जो सौंदर्य मेरे सामने है इसको छुऊं भी कैसे। बल्कि मुझे लगा कि मैं अपने चप्पल जो मैंने पहने हैं, या जूते जो पहने हैं, इनको उतार करके ही इसमें बढ़ा जा सकता है। यानी कि इसको अगर मैं थोड़ा सा भी अगर हम करेंगे तो खराब हो जाएगा। यानी कि ये  हम इसकी पवित्रता को या इसके  सौंदर्य को कोई क्षति पहुंचा देंगे। अगर हम चप्पल

पहने हुए भी जाते हैं। तो वो जो बात वो कहते हैं वो हमारे यहां ये है कि पहले यह बात रही है कि हिमालय के - हिमालयी बुग्याल जिसको हम कहते हैं जो  क्षेत्र है। तो वहां ये परंपरा रही है कि लोग पहले ऐसी मान्यताएं थी कि वहां चप्पल पहन के मत जाइए या ऐसे नहीं जाइए। वो उसका जो  सौंदर्य है या उसका जो वहां की जो अपनी तरह की एक इकोलॉजी है उसकी अपनी एक तरह का जो बना हुआ तारतम्य है उसको हम तोड़ देते हैं। तो ये तो वो संरक्षण वाला जो वो है  वो भी हम अपने बचपन से समझते हुए आए हैं।  पूरा द्वंद है इसका हमारे विकसित  होने का, हिमालय की नाजुकता का और विकास का ।इसको एक ही जगह कैसे हम तो हम इस तरह से इस विषय पर पहुंचते हैं।

और वो संकट है क्या? वो एक तो पूरे धरती का संकट है। तो धरती का संकट यह है कि भाई हम सभी लोग जो यहां मौजूद है विज्ञ लोग हैं और ये जानते हैं कि लगातार धरती के गर्म होते जाने में लगातार वो वो पर्यावरण हमारा या धरती वो गर्म हो रही है। कार्बन का उत्सर्जन होने से उसकी  जो गैसेज हैं उसकी वजह से धरती गर्म हो रही है और उसका असर हमारे मौसम पर भी पड़ रहा है। अभी हम लगातार इसको देख रहे हैं।।बल्कि इस बार तो यह मौसम विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि जैसे इस बार बहुत गर्मी पड़ी है और इस बार सर्दी भी बहुत ज्यादा होने वाली है और हिमालय में बहुत ज्यादा बर्फबारी होने वाली है। और यह सिर्फ इस समय का मामला नहीं है। लगातार पिछले 20- 25 सालों से हम यह देख रहे हैं कि हिमालय में और बाकी भी दुनिया में भी। वर्षा के जो हमारे क्रम थे । हिमपात के जो क्रम थे उनमें व्यतिक्रम आ गया है। यानी कि वह कभी बहुत ज्यादा बारिश हो जा रही है। कभी बिल्कुल नहीं हो रही है और कभी वो बर्फबारी भी। हमारे जहां मैं रहता हूं जोशीमठ में यहीं कभी हम आज से चार साल पहले 20 20 में हमने देखा कि बहुत बर्फ गिर गई और उसके बाद हम देखते हैं कि अगले साल नहीं गिर रही है। तो  है एक लगातार ये वाला व्यतिक्रम मौसम का जो हम लोगों का पहले से ही था कि भाई जून जुलाई में ऐसा होगा। अगस्त में ऐसा होगा बरसात के मौसम में यह स्थिति होगी।  उसी के हिसाब से हमारा फसल चक्र था। हमारे जीवन के तमाम काम उससे जुड़े हुए थे ।मौसम स॥ वो सब भी हो रहे। बल्कि अभी मैं बार-बार स्क्रीन पर नवीन भाई को देख रहा हूं। तो नवीन भाई को याद होगा। की बहुत पहले मतलब आज से

लगभग 20 साल पहले मैंने आपको एक कविता सुनाई थी। और वो कविता मैंने तब लिखी कि

जब हमारे यहां जोशीमठ के पास कहीं बादल फट गया और उसमें बहुत सारी बारिश हो

जाने से एक पूरा गांव उसमें तबाह हो गया। उनके गाय उनके वो और तब मैंने वो कविता लिखी और उस कविता में लिखा कि इस बार फलां गांव में एक गांव में बादल फटने से और ऐसी-ऐसी घटना हो गई। उसको मैं खैर थोड़ा दूसरे अंदाज में लाया और उसमें यह सारी बात हुई थी। यानी कि वो तब आज से 20 साल या 25 साल पहले जब मैंने वो कविता नवीन भाई को सुनाई होगी तब वो कभी कभार होने वाली घटना थी। वो एक आश्चर्यजनक बात थी कि कहीं बादल फट जाए और वहां ऐसी घटना हो जाए। और पिछले 20 सालों में हम देख रहे हैं कि उसका जो फ्रीक्वेंसी है बादल फटने की जो घटना है वो बढ़ती चली गई है। वो लगातार वो बहुत ज्यादा इस बार अगर हम देखें 2025 का जो जून जुलाई अगस्त का महीना है तो उसमें न सिर्फ हमारे उत्तराखंड में उसका पूरा जो दायरा है वो बढ़ गया है। हिमाचल में हमने देखा जम्मू कश्मीर में और वह जो हिमाचल का प्रभाव है वह बाढ़ पंजाब तक उसने प्रभावित किया। तो वो जो मौसम बदलने की परिघटना है- उसकी कारण- यह बादल फटने की घटनाएं हैं। उनकी फ्रीक्वेंसी में उनकी यानी कि उनका जो आवृत्ति है वो आवृत्ति में बढ़ोतरी हो रही है और साथ ही आपदा उससे जो पैदा हो रही है उसका भी विस्तार हो रहा है। और ये लगातार है ।इस बार तो वो बहुत ऐतिहासिक तौर पर बढ़ा है। हिमाचल में जितने लोगों की मृत्यु हुई है या उत्तराखंड में या जम्मू कश्मीर में बहुत सारे। तो हमारे पास आंकड़े भी नहीं पहुंचते। मतलब क्योंकि हम लोग तो इसलिए उन आंकड़ों से थोड़ा सा वो हो जा रहे हैं क्योंकि हमारे साथ हम लोगों ने जब यह जोशीमठ वाला हमारा वो हुआ  और वो आंदोलन क्योंकि बढ़ गया राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चला गया और हमने क्योंकि उसको जोशीमठ का संकट माना भी नहीं। यह भी उसकी एक बात थी कि हमने उस संकट को कि जो जोशीमठ में पैदा हुआ हमने उसको माना नहीं कि सिर्फ जोशीमठ का संकट है बल्कि शुरू में ही जब हमने उसको चिन्हित किया २०२१-२२  में तब पहली बार जब हम अपने हां उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन के सचिव डॉक्टर सिन्हा से मिले तो उस समय भी हमने उनसे कहा कि सिर्फ जोशीमठ की बात नहीं है। ये पूरे उत्तराखंड में बहुत सारी जगहों पर ऐसी चीजें होने वाली है। इसलिए हमको इसको थोड़ा विस्तार से व्यापकता में देखने की जरूरत है। और जोशीमठ में भी जब हम लोग लड़ रहे थे, तो तब भी हम इसको केवल यहां का संकट नहीं मान रहे थे। तो इसीलिए उसमें बहुत सारे हिमालयी राज्यों के लोग जुड़ गए। और फिर उसी क्रम में यह हुआ कि जो हमारे हिमालय राज्यों के प्रतिनिधि हैं हम लोगों ने एक फोरम भी एक मंच भी गठित किया जिसको हम पीपल फॉर हिमालय  उसका नाम है और उसकी वजह से हम तक ये सूचनाएं पहुंचती है कि सिक्किम में क्या हो रहा है? अरुणाचल में क्या हो रहा है? जम्मू कश्मीर में क्या हो रहा है? या हिमाचल में कितना नुकसान हो गया? लेकिन आमतौर पर हमारा जो मुख्यधारा का मीडिया है उस तक ये बात नहीं जाती। जम्मू कश्मीर के ही साथियों का कहना है कि वहां जितने लोग मरे हैं वो मुख्यधारा के मीडिया तक उसकी संख्या भी नहीं पहुंची या हिमाचल में जितने लोगों की हताहत हुई या जितना बड़ा नुकसान हुआ वो हम तक या मुख्यधारा तक नहीं पहुंच रहा है। या सिक्किम में जितनी बड़ी घटना हुई कि वहां पूरा वह तीस्ता नदी का जब बांध टूटा तो उसकी सूचना हम तक नहीं पहुंची। मतलब कितना वहां नुकसान हुआ, क्या हुआ? तो कहने का तात्पर्य यह है कि यह जो संकट है ये लगातार विस्तृत हो रहा है। लगातार विस्तार इसका हो रहा है और उसकी गंभीरता भी बढ़ती चली जा रही है। तो इसलिए हिमालय को समझते हुए हिमालय के संकट को समझते हुए और क्योंकि ये संवेदनशील क्षेत्र है तो यहां इस संकट के लक्षण जल्दी प्रकट हो रहे हैं।  है हिमालय के अध्ययन से या हिमालय के संकट को जानते समझते हुए हम अंदाजा लगा सकते हैं। हम अनुमान लगा सकते हैं कि धरती पर ये संकट कितना बड़ा है और बाकी भी अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देख रहे हैं तो हम तक ये सूचनाएं आ रही है। है ना? कि अमेजन के जंगलों में क्या हो रहा है। या बाकी जगह कितनी ठंड या जहां कभी बर्फ नहीं पड़ती थी। अभी हमने देखा कि वहां आई आइसलैंड में वहां मच्छर पाए गए। है ना? तो यहां इतनी गर्मी बढ़ गई या बाकी अंटार्कटिका की बर्फ से लेकर के उसके पिघलने से लेकर के और हिमालय की बर्फ के

पिघलने तक। है ना? तो लगातार वो सूचनाएं भी हम तक है। तो इसलिए हम केवल हिमालय पर बात करने से हमको दुनिया के संकट का भी पता चले इसलिए इस विषय में हम लोग आए। अच्छा।

अब यह जो संकट है इसकी पहले जो बहुत बड़े स्तर पर जब हम इसको देखते हैं तो वह 2013 की आपदा के तौर पर हमारे सामने यह आता है जो केदारनाथ की आपदा है और केदारनाथ की आपदा का जो वॉल्यूम है उसका जो मतलब दायरा है एक तो वो इस वजह से बड़ी है आपदा क्योंकि उसमें बहुत सारे लोग हताहत हुए है।स्वयं सरकार ने ही इसको माना कि  5400 से ज्यादा लोग यानी 5000 से ज्यादा लोगों की उसमें मृत्यु हुई और यह बड़ी संख्या है। लेकिन क्या यह संख्या हमको डराती है? क्या यह संख्या सरकार को चेतावनी देती है? जबकि यह सरकार के अपने आंकड़े और अगर हम सरकार के आंकड़ों से उतर जाएं तो हम तक जो सूचना पहुंचती है हम तक जो लोग स्थानीय स्तर पर कहते हैं तो वो संख्या तो उससे दुगनी तिगुनी संख्या ज्यादा है। 10 हजार 12000 से ज्यादा लोग उसमें हताहत हो जाते हैं। लेकिन फिर भी हम उससे कोई सबक नहीं लेते। कुछ उससे सीखते नहीं और इसके पीछे की कहानी पर जाएं ।अगर हम केदारनाथ का संकट या केदारनाथ की जो आपदा है वो 2013 में है। 15 16 17 जून लेकिन उस आपदा के आने की जो सूचना है वो सूचना हमको पहले मिल जाती है। यानी कि वहां जो झील फटी और वो मतलब केवल केदारनाथ में नहीं है। वह पूरा एक जो फिनोमिना है यह जो पूरा वो है वह पूरे हिमालय में हो रहा है कि जैसे-जैसे ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं। पीछे की तरफ खिसक रहे हैं- वो अपने पीछे वो ऐसी झील ग्लेशियर की जो झील है बन छोड़ते हुए जा रहे हैं और वो झील जो हैं वो अचानक कभी भी जब बहुत तेज बारिश हो रही है- जिसको कि हम बादल का फटना अतिवृत्ति जो हो रही है जो कि पहले हिमालय में रेयर था यानी कि उच्च हिमालय में 2000 3000 मीटर  से ढाई हजार मीटर से ज्यादा के जो ऊंचाई है वहां ऐसी बारिश कभी नहीं होती थी। वहां अगर होगी तो बर्फबारी होगी। है ना? और अगर कभी बारिश हुई तो बौछार के रूप में वो होती थी। लेकिन अब हम देख रहे हैं क्योंकि धरती के गर्म हो जाने का जो फिनोमिना है यह उसको प्रभावित कर रहा है। और वहां ये बादल फटने की घटना हो जा रही है और वो झील उससे फट रही है और जिसको हम ग्लोफ एक मतलब जो ग्लेशियर लेट आउट बर्स्ट जिसको कह रहे हैं तो उसकी वजह से तो वो चोराबाड़ी वो ताल वहां फट गया और वो लेकिन वो चोराबाड़ी ताल की वहां झील बन रही है। विस्तार पा रही है। यह बात  पहले ही वैज्ञानिक वाडिया के वैज्ञानिक। पहले इस बात को कह देते हैं कि 2004 में एक अखबार बल्कि उसको छापता भी है  कि वहां ऐसा-ऐसा अध्ययन चल रहा है और वहां ये हो रहा है। लेकिन हम उससे कोई चेतावनी को नहीं लेते। और 2013 में ये घटना घट जाती है। लेकिन 2013 में भी जिस दिन 15 16 17 की ये बात है उससे पहले ही एक हमारे यहां जो मौसम विभाग के जो निदेशक थे यहां शर्मा जी तो वो उसकी चेतावनी जारी कर देते हैं- हफ्ता भर पहले कि वहां इतनी बारिश होने वाली है और वहां पर्यटकों को तीर्थ यात्रियों को जाने से रोका जाए। उनको वहां नहीं जाने दिया जाए और अगर उनकी चेतावनी पर ध्यान दे देते वहां अगर सरकार  उसको सीरियसली ले लेती तो इतने लोगों की मृत्यु नहीं हुई होती। इतने लोग हताहत नहीं होते। तो इससे हम ये भी सबक लेते हैं कि हमारी सरकारें वे- वैज्ञानिक जो अध्ययन है या वैज्ञानिक जो चेतावनी देते है उनको भी गंभीरता से नहीं ले रही है।