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Monday, February 2, 2026

केरल लिटरेचर फेस्टिवल:साहित्य का अंतहीन विस्तार - अरुण कुमार असफल

  

 (हाल ही में  चर्चित कथाकार अरूण कुमार असफल कोझीकोड में होने वाले केरल लिटरेचर फेस्टिवल देख कर आये  हैं. ‘लिखो यहाँ वहाँ ’ के लिये उन्होंने विशेष रुप से यह रिपोर्ट लिखी है)


 

 
 कोझिकोड ( कालीकट) के समुद्र तट पर दिनांक 21 जनवरी 25 जनवरी तक केरल लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन हुआ। के एल एफ की यह नवीं आवृत्ति थी। आयोजक ( मुख्य आयोजक : डी सी बुक्स) इसे एशिया का सबसे बड़ा साहित्योत्सव बताते हैं। केरल में दो अन्य स्थानों पर भी साहित्योत्सव होते हैं। कोच्चि में जो साहित्योत्सव होता है उसकी प्रायोजक मातृभूमि पत्रिका तथा त्रिवेंद्रम में होने वाले साहित्योत्सव की प्रायोजक मलयालम मनोरमा पत्रिका है। पर कोझिकोड में होने वाला साहित्योत्सव इन दोनों से बहुत बड़ा है।इस बार जब मैं इस साहित्योत्सव में शामिल हुआ तो आयोजकों का यह दावा कहीं से भी असत्य नहीं लगा। कोझिकोड के रमणीक समुद्र तट पर दूर दूर तक विशाल पंडालों को देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया था। सात पंडाल तो कार्यक्रमों के थे। हर पंडाल में तीन साढ़े तीन सौ कुर्सियां थीं। एक पंडाल EZHUTHOLA तो इतना बड़ा था कि उसमें छ: सात सौ कुर्सियां हो सकतीं थीं। इसके अतिरिक्त किताबों के दो तीन पंडाल थे। एक और विशाल पंडाल था जो बहुत ख़ास था। यह विश्व प्रसिद्ध रेस्तरां ‘ पैरागान’ का पंडाल था। ' पैरागान' मूलतः कालीकट का ही ब्रांड है।जहां पर सी- फूड और अन्य स्वादिष्ट सामिष व्यंजनों का जायका लिया जा सकता था। ये व्यंजन इतने उचित दर पर उपलब्ध थे कि लगता ही नहीं था कि हम ऐसे रेस्तरां में खाना खा रहे हैं जिसे विश्व के पांच सर्वश्रेष्ठ रेस्तरां में गिना जाता है।
चार दिनों के इस साहित्योत्सव में तीन सौ से अधिक सत्र थे। शेष तीस फीसदी सत्र मलयालम भाषा में थे। किसी और भाषा में कोई सत्र न था। देश विदेश के  अन्य भाषा के साहित्यकारों के सत्र अंग्रेजी में ही थे। जैसे के. सच्चिदानंद, प्रतिभा राय आदि के सत्र अंग्रेजी में ही थे। बानू मुश्ताक का भी सत्र होना था पर किसी कारण से वह नहीं आ पातीं । अगर आतीं तो उनका भी सत्र अंग्रेजी में ही होता । के. सच्चिदानंद और गीता हरिहरन द्वारा संपादित पुस्तक The View From Here: Stories and Poems of Many Indias पर जब चर्चा चल रही थी और पुस्तक में संकलित कुछ रचनाओं का पाठ किया जा रहा था तो उस समय मुझे बहुत‌ अच्छा लगा जब उदय प्रकाश की चर्चित कविता ‘ मरना’ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा गया।



क‌ई सत्र हाउसफुल थे। हाउसफुल मतलब कम से कम तीन सौ लोग। कोई सत्र ऐसा नहीं था जिसमें आधे से कम लोग हों। मतलब कम से कम डेढ़ दो सौ लोग तो हर सत्र रहते ही थे। साहित्योत्सव का आरंभ सुबह ग्यारह बजे होता था और रात आठ बजे तक चलता था। रात आठ बजे से नौ बजे का समय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का रहता था। इस तरह से सुबह ग्यारह बजे से रात नौ दस बजे तक कालीकट के समुद्र तट पर उत्सवपूर्ण वातावरण रहता था। इन पंडालों की सजावट में अनावश्यक पैसा खर्च नहीं किया गया था। फिर भी इतनी कलात्मकता तो थी ही कि हमारे सौंदर्यबोध को तुष्ट कर रहा था। इतने बड़े आयोजन के लिए निश्चित ही डी सी बुक्स के अलावा और भी व्यापारिक प्रतिष्ठान प्रायोजक होंगे पर मंच पर और पंडाल में डी सी बुक्स के अतिरिक्त अन्य व्यापारिक प्रतिष्ठान के होर्डिंग्स और बैनर लगभग नगण्य थे। तम्बाकू खैनी जैसे उत्पादों के बैनर तो पूरे आयोजन स्थल पर ही नहीं थे। सत्र में जो चर्चाएं हो रहीं थीं उसे श्रोतागण तल्लीनता से सुन रहे थे। चर्चाओं में प्रतिरोध का स्वर मुखर था। दुनिया भर में हो रही हिंसा पर लिखे जा रहे साहित्य पर एक महत्वपूर्ण सत्र था When Stories Refuse to Stay Silent : From Bloodiness to Storylines जिसमें आस्ट्रेलिया के लेखक उमर मूसा, भारत‌ की लेखिका पोन्नू एलिजाबेथ मैथ्यू और स्पेन की लेखिका ग्रैबियल यबरा ने हिंसा और दुनिया भर फैलती फासीवादी प्रवृत्ति पर बेबाकी से बोला। अगर सत्र साहित्यिक था तो विशुद्ध साहित्य के लोग ही मंच पर थे, विज्ञान और तकनीक का सत्र था तो इन्हीं विषयों के विशेषज्ञ लोग चर्चा में भाग ले रहे थे। ऐसा नहीं था कि सेठ, हाकिम, नेता, लेखक आदि सब एक ही पंगत में बैठ कर जीम रहे हों। हां, नेता लोग भी मंच पर थे। मैंने देखा कि मलयालम में एक सत्र चल रहा था जिसमें मंच पर सब नेताओं की वेशभूषा में बैठे थे। पता चला कि वह राजनीतिक विमर्श का सत्र था जिसमें विभिन्न दलों के प्रतिनिधि मर्यादित ढंग से विमर्श कर रहे थे।
हिंदी क्षेत्र में होने वाले किसी भी साहित्योत्सव या लिट-फेस्ट की तुलना के एल एफ से नहीं की जा सकती। हिंदी क्षेत्र के लिट-फेस्ट में भीड़ जुटाने के लिए ‘ सेलिब्रिटीज़’ को बुलाने का चलन है। जब तक ये सेलीब्रिटीज़ उत्सव में मौजूद रहते हैं तब तक खूब भीड़ रहती है। उनके जाते ही आयोजन स्थल पर सन्नाटा छा जाता है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को मैंने शुरुआत से ही देखा है। वहां जब किसी फिल्मी हस्ती जावेद अख़्तर,गिरीश कर्नाड आदि का सत्र चलता था तो उसके समानांतर चलने वाले साहित्यिक सत्रों के पंडाल लगभग खाली रहते थे। जबकि के एल एफ में लेखक की भी हैसियत सेलीब्रिटी जैसी थी। यहां भी सिनेमा पर बहुत सारे सत्र थे जिनमें सिनेमा की क‌ई नामचीन हस्तियां भाग ले रहीं थीं पर उसके समानांतर चल रहे अन्य साहित्यिक सत्रों में भी अच्छी खासी भीड़ रहती थी। 
आयोजन स्थल पर मेरी मुलाकात क‌ई  स्थानीय लेखक कलाकारों से हुई । मैंने एक से पूछा कि क्या उनका भी‌‌ कोई सत्र है तो उन्होंने तत्काल उत्तर दिया कि उनका तो दो साल पहले हुआ था। उनके बोलने का लहजा ऐसा था जिसका यही मतलब निकलता था कि न तो के एल फ में लोगों को बार बार बुलाने की पंरपरा है और न ही लोग ही ऐसी कोई लालसा रखते हों।
कोझिकोड में मेरे एक मित्र हैं - अजीत एम एस। पेशे से सिविल इंजीनियर रहे और अब सेवानिवृत्त होकर विज्ञान एवं तकनीक पर रचनात्मक कार्य कर रहे हैं। उन्होंने केरल की प्राचीन जल प्रणाली पर मलयालम में किताब लिखी है - जल मुद्रा। इसी विषय पर इसी नाम से उन्होंने ने एक डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनायी है। के एल एफ में इसी विषय पर मलयालम भाषा में इनका एक सत्र था। मैंने सोचा कि चर्चा तकनीक विषयक है तो लोग कम होंगे। अतः दोस्ती का फ़र्ज़ निभाने के लिए मैंने उनके सत्र में मौजूद रहने को कह दिया था। भाषा समझ में न आती हो, पर दोस्त के सत्र में खाली कुर्सियां कम दिखें, यह नेक ख्याल मन में था। क्योंकि हिंदी में कभी कभी ऐसा शिष्टाचार निभाया जाता है। पर जब मैं वहां पहुंचा तो दंग रह गया। लगभग तीन सौ कुर्सियों वाला वह पंडाल पूरा भरा था और कुछ लोग खड़े भी थे। 
के एल एफ में साहित्य, संस्कृति, सिनेमा, विज्ञान , खेल आदि के बहुत सारे सत्र थे। पर आयोजकों ने साहित्योत्सव का औपचारिक उद्घाटन अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स से ही करवाकर मानों यह स्पष्ट कर दिया था कि उत्सव की मूल चेतना वैज्ञानिकता ही है। विज्ञान एवं तकनीक के आधुनिकतम आविष्कारों को प्रदर्शित करने वाले स्टाल भी वहां पर थे। एक स्टाल पर एक रोबोट बच्चों जैसी शैतानियां कर रहा था। बच्चे जब हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ा रहे थे तो वह भी अपना हाथ बढ़ा दे रहा था।


 जैसा कि मैंने ऊपर उल्लेख किया है कि के एल एफ में सिनेमा पर भी बहुत सारे सत्र थे और उनमें सिने जगत की क‌ई चर्चित हस्तियों ने हिस्सा लिया था। लेकिन अगर उस सत्र की बात करें जिसमें सबसे अधिक भीड़ उमड़ी थी तो वह सुनीता विलियम्स का सत्र था। के एल एफ में सुनीता विलियम्स के क‌ई सत्र थे। कुछ सत्र स्कूली बच्चों के लिए थे। एक को छोड़ कर बाकी सत्रों के लिए अग्रिम रूप से पंजीकरण करवाना अनिवार्य था। एकमात्र सत्र Dream Reach Orbit: Meet The Astronaut Who Touched The Sky सबके लिए खुला था और इसे 22 जनवरी की शाम को EZHUTHOLA पंडाल में होना था। मेरे स्थानीय मित्र ने मुझे वहां समय से पहले पहुंचने की सलाह दी थी। हम कालीकट कास्मोपोलिटन क्लब में टिके थे जो कि समुद्र तट पर स्थित था और आयोजन स्थल से बहुत दूर नहीं था। फिर भी उस दिन हम समय से पहले निकले। पर आयोजन स्थल पर इतनी भीड़ हो गयी थी कि तेज चलना असंभव हो गया था। जब तक हम पंडाल तक पहुंचे तब तक सत्र आरंभ हो चुका था। पंडाल पूरा भर चुका था। जितने लोग अंदर बैठे थे उससे दुगने तिगुने लोग बाहर खड़े थे और पंडाल के बाहर लगे एल ई डी स्क्रीन में ही सुनीता विलियम्स को देख सुनकर संतोष कर लें रहे थे।
वास्तव में के एल फ  साहित्य की परिभाषा को और व्यापक बनाता है जिसमें कविता,कथा , विज्ञान , तकनीक आदि भी सम्मिलित होती हैं और प्रेमचंद के कथन ‘ साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल’ की पुष्टि होती है।