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Friday, February 27, 2026

मार्खेज़ और जॉनी बेल्च की कविता : कठपुतली

 

 


जॉनी बेल्च


 

 

1982 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दक्षिण अमेरिकी कथाकार गेब्रिएल गार्सिया मार्खेज को लंबी बीमारी के बाद 1999 में डॉक्टरों ने कैंसर से पीड़ित घोषित कर दिया था और 'जादुई यथार्थवाद' के इस अद्भुत चितेरे के स्वास्थ्य को लेकर पूरी दुनिया में फैले प्रशंसकों में चिंता उभरने लगी। अचानक एक दिन- 29 मई, 2000 को पेरू के लोकप्रिय दैनिक 'लॉ रिपब्लिक' में एक कविता छपी जिसका शीर्षक था 'कठपुतली (द पपेट)' और इसके रचयिता के तौर पर मार्खेज का नाम छपा। देखते ही देखते, पूरे दक्षिण अमेरिकी समाज में यह खबर जंगल के आग की तरह फैल गई- बहुत सारे अखबारों ने इसे उद्धृत किया, रेडियो और टेलीविजन पर इसका पाठ किया गया और यह कहा गया कि जीवन की आखिरी बेला में मार्खेज ने इस कविता के माध्यम से अपने मित्रों और प्रशंसकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।  जब इस बाबत मार्खेज से पूछा गया तो मुस्करा भर दिए, पर धीरे-धीरे यह राज खुल ही गया कि मार्खेज ने ऐसी कोई कविता नहीं लिखी। बाद में यह खबर भी सामने आई कि मैक्सिको में स्टेज पर मूकाभिनय करने वाले जॉनी बेल्च ने अपने एक कठपुतली शो के लिए यह कविता लिखी थी जो छपी तो पर इसमें रचयिता के तौर पर किसी गलती से मार्खेज का नाम छप गया। अपने एक इंटरव्यू में वेल्च ने कहा कि वे कोई बड़े कवि नहीं हैं, पर दुनियाभर में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी एक रचना को लिखने का श्रेय उन्हें नहीं मिला इसका उन्हें गहरा दुख है। आज इस कविता को दुनिया के बड़े 'होक्स' के रूप में यहां-वहां उद्धृत किया जाता है।- यादवेन्द्र




 
 जॉनी बेल्च की कविता 

कठपुतली

(अनुवाद: यादवेन्द्र)  

यदि पलभर को ईश्वर भूल जाए कि 
मैं रद्दी और कबाड़ से बना एक गुड्डा हूं 
और जीवन का एक कतरा और मुझे बख्श दे 
तो बहुत संभव है 
मैं वे सब बातें न कह पाऊंगा
जो सोचता रहा हूं 
पर इतना तय है कि 
उन तमाम बातों को सोचूंगा जरूर 
जो मुझे कहनी हैं।

मैं सभी चीजों को खूब सम्मान दूंगा 
पर उनकी चमक-दमक देखकर नहीं 
बल्कि इसलिए कि 
उनके मायने जीवन में क्या हैं।

अब से सोऊंगा कम
और स्वप्न ज्यादा देखूंगा 
मैं जानता हूं कि जब हम 
एक मिनट के लिए अपनी आंखें मूंदते हैं
तो रोशनी साठ सैकंड तक 
हमसे दूर चली जाती है।

लोगबाग चाहें तो यूं ही 
सड़कों की लंबाई मापते रहें 
मैं तो खूब सोच-समझकर 
एक-एक कदम आगे बढ़ाऊंगा।
दूसरे लोग चाहे सोते रहें, 
मुझे जागते रहना है 
खूब गौर से वह सब सुनते रहना है
जो दूसरे बोलेंगे 
और यह सीखने की कोशिश भी करूंगा कि अच्छी चॉकलेट आइसक्रीम खाते हुए इसका भरपूर आनंद कैसे लिया जाए।

यदि ईश्वर जीवन का 
एक कतरा और मुझे बख्श दे तो
मैं सादगी भरे मामूली लिबास पहन लूंगा और सूरज के सामने सीना तान कर खड़ा हो जाऊंगा 
जाहिर है मेरे शरीर को तो धूप मिलेगी ही अंदर तक आत्मा भी प्रकाशमान हो जाएगी।

हे ईश्वर, यदि मेरे हदय की धड़कन शेष है
 तो मैं अपनी तमाम घृणा उतारकर 
बरफ की सिल्लियों पर रख दूंगा 
और सूरज के चमकने का इंतजार करूंगा वॉनगाग का स्वांग धारण करूंगा
और 
फिर सितारों के बदन पर 
बेनेदेत्ती की कविता चित्रित कर दूंगा 
और तोहफे में चंद्रमा को
मेरेट का एक गीत प्रस्तुत करूंगा।

गुलाब की क्यारियां 
मैं अपने आंसुओं से सींचूंगा 
जिससे उनके कांटों की चुभन और
पंखुड़ियों के दैवी चुंबन महसूस कर सकूं...
यदि ईश्वर जीवन का एक कतरा और 
 मुझे बख्श दे।

मैं ऐसा एक दिन भी नहीं गंवाऊंगा जब सचमुच जिन सबसे प्रेम करता हूं
 उनसे यह न कह पाऊ 
कि में उन्हें कितना प्रेम करता हूं।

मैं हर किसी को यह भरोसा दिलाना चाहता हूं कि 
वे मेरे सबसे अजीज़ हैं 
दरअसल ऐसे में प्रेम के साथ 
मैं खूब प्रेम से रहूंगा।

मैं लोगों को साबित करके दिखाऊंगा कि उन्हें इस बात की गलतफहमी है 
कि बुढ़ापे में प्रेम के सागर में नहीं डूबा जा सकता 
उन्हें इल्म ही नहीं कि 
प्रेम के जीवन से तिरोहित होते ही 
बुढ़ापा अपने भारी पांव पसारने लगता है।

मैं' बच्चों के हाथ उड़ने वाले 
खूबसूरत तोहफे पकड़ा तो दूंगा 
पर कहूंगा कि अपने आप उड़ान भरना सीखो।

और बूढ़े हो चुके लोगों को बताऊंगा 
कि बुढ़ापे की वजह से नहीं 
बल्कि स्मृतियों के लोप से आती है मृत्यु।

साथियों, मैंने आपके साथ क्या कुछ नहीं सीखा
मैंने सीखा कि जिसे देखो वह 
पहाड़ के शिखर पर चढ़कर टिक जाना चाहता है 
पर यह सच्चाई उससे छूट जाती है कि वास्तविक आनंद पहाड़ के शिखर 
में नहीं 
पहाड़ पर चढ़ने के 
हमारे ढंग में निहित होता है।

मैंने यहीं सीखा कि जब एक नवजात शिशु अपने नन्हें हाथ में पिता की अंगुलियां भींचता है 
तो यह स्पर्श जीवन भर के लिए 
वहीं ठहर जाता है।

मैंने यह भी सीखा कि किसी को 
दूसरे आदमी को ओर आंखें उठाकर देखने का हक तभी मिलता है 
जब उसके हाथ साथी को सहारा देकर खड़े करने के लिए आगे बढ़े हुए हों।

मैंने लोगों से बहुत सारी बातें सीखीं समझीं पर अब जब जीवन के अंतिम छोर तक आ पहुंचा हूं
तो इनमें से अधिकांश चातों के अर्थ खो जाएंगे 
अब तो बस मुझे ताबूत में बंद किया जाना शेष है
जहां मृत्यु मेरी प्रतीक्षा कर रही है। 

 

(प्रस्तुति: यादवेन्द्र) 

Saturday, February 7, 2026

राजेश सकलानी की कविताएं

 (बहुत समय से हम  यहाँ नियमित उपस्थिति  दर्ज़  नहीं  कर पा रहे थे। अब उम्मीद यह सिलसिला नियमित होने की राह पकड़ रहा है। आज प्र्स्तुत हैं  हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि राजेश सकलानी की कुछ ताजा कविताएं ) 

 

 


 कपास से बनी नरम रातें.

 

हमारे लिए नहीं है कपास से बनी हुई नरम रातें

उन पर हमारा कोई बस नहीं है ,

 हमारे शत्रु रोज़ उन्हे अपनी ओर खींच लेते हैं

बेईमानी से,

 उनकी कई तहें बना कर

अपने काबू में कर लेते हैं

अश्लील शान्ति के साथ  मुस्कराते हैं ,

और अश्लील स्वप्न देखते हैं

 

 

  अपनी शर्मिन्दगी को छुटा  कर

 हम औरतें और आदमी अपने बच्चों से आंखें मिलाना चाहते हैं इन रेशमी रातों में ,

  जिनका निर्दोष स्पर्श  छत की तरह तन जाना चाहता  हैं,

 और कुटिल हवाओं से त्वचा की सुरक्षा करना चाहता  हैं,

 

सारी रात  अंधड़ की तरह बुरी आवाज़ें

 उन्मत्त होतीं हैं,

वे आज़ादी के ख़याल को तहस-नहस करना चाहतीं हैं,

और कच्ची दीवारों में बने सुराखों से घुस कर

हमारी नींदों को बिछौनों सहित उड़ा देतीं हैं,

 

इन्ही रातों के नीचे  तानाशाह अपनी फ़ौज़ों के साथ

रक्तपात के मंसूबे बनाते हैं ,

लूटे हुए माल असबाब को तहखानों में  छिपा कर  चांदी की चादरों से ढ़क देते हैं

 

हमारी हड्डियां बर्फ़बारी से

 मुक़ाबला करतीं थक जातीं हैं

पर  डटी रहतीं हैं,

हमारी मज्जा में हरक़त मचती है.

 

 

 

 हमारी नौली चांद पर है.

(गांव में पानी का स्रोत )

 

हमारी नौली चांद पर है

वह जितनी सुन्दर है

उतना ही दुख देती है

छेनी से काट काट कर

उसे सजाया मैने

झर झर  झर झर

उससे पानी गिरता है

चांदी की तरह

 

 

क्या मेरे बच्चे नौली तक जा सकते हैं 

क्या मेरी बीवी  ठंडे पानी से अपनी ऊंगलियां भिगो सकती है

क्या मेरे बंठे मे पानी गिरने का संगीत

बज सकता है,

सदियों से हमारी त्वचाएं चमकने का इंतजार कर रहीं हैं,

जिस्म  का तेल रेत की तरह भुरभुरा हो चुका हैं,

पसीने का नमक पपडियों की तरह

टूटता है,

 

 

तुम्हारे गाँव का नाम हमने त्याग दिया है  ,

पक्षी की तरह आत्मा एक पहाड़ से दूसरे तक हवा में पंख फड़फड़ाती है,

मुझे मेरे पानी की धार  लौटा दो

बीती सदियों की रोशनी समेत,

मेरे बच्चों के सारे के सारे गीत

छलक कर बहने दो,

उनकी आंखों की चमक वापस आने को

व्यग्र है,

 

तोड़ो तोड़ो इस नौली को तोड़ो

बादल फटे इस इस गांव पर ,

शापित है इसकी मिट्टी

और धूप यहां जो पड़ती है,

बहा ले जाए बारिश

यहां के ढ़ुगों को ,

रीख खा जाए उस भाषा को

जिसमें हमारे पुरखों की चीखें

चीड़ के लीसे की तरह चिपकी हैं।

 

 

 

साइकिल स्टैंड.

 

साइकिल स्टैंड पर बातूनी लड़के ने

टोकन की पर्ची पकड़ाई और

दस रुपया वसूल किया

उसने मुझे अंकल कहा,

लगा कि यह मेरी पुरानी आवाज़ है।

ये अपनी मुश्किलों को बेहतर तरीके से संभालता है और

इत्मीनान के साथ नीति और ब्यवहार की बातें बयान करता है

सयानों की तरह,

अभी उसकी मसें ठीक से भीगी भी नहीं हैं

  

भरे बाजार के इस अहाते में मैं लड़खड़ाया

और सिलसिलेवार खड़ी साइकिलें क्रम से गिरतीं चली गईं

मेरी कल्पना के पर्दे पर यह मंजर फिर दुबारा गुज़रा

मोन्ताज की तरह

पृष्ठ ध्वनि के साथ,

दो तीन दोस्त हरक़त में आए तत्काल

दिल्लगी करते हुए, साइकिलों को सीधे खड़े कर गए

 

वो लड़का अब सयाना होगा,

एक तंग कमरे में घर-बार संभाला होगा

बची होगी उसकी सलाहियत

बेवक्त सफ़ेद होंगी उसकी जुल्फ़ें

बुरे सुलूक ने उसकी जवान उम्र को बर्बाद किया होगा

उसकी जुबान में कुछ गालियां जरुर होंगी

 

 

कोई उसके लफ़्ज़ों के मायने न बदले

कोई उसके ऐतराज को न छिपाए

कोई उसके कद पर रोक न लगाए

कोई यह न पूछे कि तुम कौन हो

और तुम्हारी ज़मीन कहां है।

 

 

तपे हुए बरते हुए.

 

 

तपे हुए और बरते हुए सभी शब्द

अपनी तरफ़ हैं

कठिन दिनों से इनमें उम्मीद भरी क॔पन है,

निराशा के दौर में ये हौसला देते  हैं

और आत्मसम्मान को सही जगह बिठा देते हैं

 

हम किसानों ,बढ़इयों ,लुहारों,ठठेरों,

धुनारों,कारीगरों और मजूरों ने इन्हे

लहजा दिया

और फेरी वालों ने अपनी आवाज़ में

इन्हे चमकाया है.

 

हम इन्हे  बरबाद नहीं होने  देंगें

और फासीवादियों की जुबान से वापिस ले आएंगे

भद्दे बलाघातों और इशारों को रोक दिया जाएगा

 

इनके मायने खुद-ब-खुद  बहाल होते  जाएगें ।

 

 

 

Monday, May 23, 2016

ज़िद और बर्बादी


कविताएं पंखुरी सिन्हा

पंखुरी सिन्‍हा को मैं एक कहानीकार के रूप में जानता रहा। ज्ञानपीठ से उनका एक कहानी संग्रह आया था एवं पत्रिकाओं में भी उनकी कहानियों को पढ़ना होता रहा। लेकिन यह जानना बिल्‍कुल आरम्भिक जानना था। अपनी कहानियों से पंखुरी ने उन्‍हें और जानने की उत्‍सुकता पैदा की है। उनके लिखे को पढ़ना हुआ। इस तरह उनका कवि रूप, उनके आलेख ओर सोसल साईटस एवं सचल भौतिक स्थितियों वाली गतिविधियों में उनकी उपस्थिति की सक्रियता से परिचय होता रहा। इस ब्‍लाग पर पहले भी उनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं। वर्तमान राजनैतिक, आर्थिक स्थितियों से निर्मित हो रहे सामाजिक परिदृश्यों को अपना विषय बनाती उनकी कुछ और कविताएं हाल ही में प्राप्‍त हुई। पंखुरी जी का आभार एवं स्‍वागत । कुछ कविताएं यहां प्रस्‍तुत हैं।  
वि.गौ.




सड़क ही घोटाला है


साल दर साल
बद से बदतर
होता रहा
इस प्रान्त, इस शहर का हाल
धांधलियां होती रहीं
यहाँ के बिजली घरों
ईटों की भट्टियों में
बल्कि बात ये की
धांधलियां होती रहीं
इतनी आधारभूत जगहों में
जैसे कि आटे, चावल, दाल की मिलों में
चूड़े को कूटने और बेचने वाली दुकान के ठीक सामने
जबकि और जगह धांधलियों की बातें
इन क्षेत्रों से निकलकर
बड़ी कंपनियों
विदेशी निवेशों
लागतों, साझों की बातों में उछाली जा रही थीं
पर यहाँ तो सड़क ही घोटाला है
जाने कब से
है ही नहीं
जापानी सहयोग से बन जाने के बाद भी नहीं
खँगाल जाती है
उसे हर साल बाढ़
नदी नहीं बाढ़
नदियाँ तो यहाँ शांत हैं
मैदानों में सम्भली, संभाली
समतल पर सड़क भी आसान है
रखना, बचाना
पर है ही नहीं
कहीं नज़र में
दूर दूर तक जापानी निर्देशन में बनी सड़क भी......................
  

इस बार की भारत पाक वार्ता

 
औरों के आस पास भी होते होंगे
ऐसे पहरे
तुम सोचो, समझो
और मत करो बयान
उस पहरे का हाल
इन दिनों जब कभी
पहरे की बात होती है
बात चीन के वाच टावर्स की होने लगती है
इन दिनों जब कभी बात
पड़ोसी के हस्तक्षेप की होती है
बात पाकिस्तान की होने लगती है
पाकिस्तान जैसे प्रतीक है
हस्तक्षेप का
वैसे पाकिस्तान के समर्थक
जाने किन बातों का
प्रतीक हैं
जाने किन मनसूबों के लोग हैं वो
किन मांगो के भी
कौन मित्र हैं उनके
और क्या है आज़ादी के माने
इस बार जब सरकार ने धरा
फिर छोड़ा
फिर धरा अलगाववादियों को
क्या लगा कि वह भी कोई
समाधान नहीं निकालना चाहती
बस वो कश्मीर जो
अधिकृत है
वैसे रह जाएगा
इतिहास के पन्नो में क्या?

 ज़िद और बर्बादी


जो बात राज़ी ख़ुशी
अपने आप
मुस्कुराहटों के साथ हो रही हो
उसे लगभग रद्द कर
तय की हुई दूरी से
बातों को वापस लौटाकर
जिन रास्तों पर हँसते हुए
चलते आये
लगभग उनपर आँसू समेत चलवाकर
उसी मंज़िल पर पहुँचना, पहुँचाना
कितनी और कैसी बर्बादी है
शक्ति, समय, सामर्थ्य और भावनाओं की भी...........