Monday, March 11, 2024

ओबरे में खटोली

 मनोरमा नौटियाल 



राजा शाह जी का जमाना था। टिहरी रियासत वाले राजा शाह जी का जमाना। आज की राणी जी वाली टिहरी रियासत के राजा शाह जी का जमाना।

 

किस्सा रियासत के किसी गाँव का सुना गया है। मने हमारे ही पूर्वजों का। मने हमारा ही समझिए।

गाँव से प्रत्येक माह दरबार को टैक्स जाता था एक रुपया।  टका और आना वाले युग में एक रुपया बहुत बड़ी रकम थी। कई-कई रोज़ ध्याड़ी करने, ढेंके तोड़ने के बाद एक-दो आना मजूरी मिलती थी।

 

इस टैक्स कोमामलु (माबला)’ कहा जाता था।  माबला राजशाह जी द्वारा प्रजा पर लगाए जाने वाले डेढ़ दर्जन प्रकार के करों में एक था। यह भूमिकर था जो भूमि के स्वामी ‘भूपति’ यानी राजा शाह जी को नकद दिया जाता था।

भूमिकर का ही एक दूसरा प्रकार ‘बरु(बरा)’ अनाज के रूप मे भूपति के कारिंदों द्वारा किसानों से वसूला जाता था। मोटे अनाज को तब आज जैसा ‘सुपर फूड’ वाला सम्मान नसीब न था। गेहूं और धान फसलों में वही रसूख रखते थे जो आम प्रजा के बीच शाह राजा जी के माफ़ीदारों का हुआ करता था। इसलिए बरा के रूप में गेहूं चावल यदि एक टोफरी जाता तो इन अनाजों की जगह पर कोदा-झँगोरा देने पर मात्रा दोगुनी हो जाती- दो टोफरी।

 

राजा शाह जी की महानता की अनेक कथाओं में एक यह भी है कि यदि कोई सम्पन्न पुरुष बेऔलाद मृत्यु को प्राप्त हो जाता तो उसकी जोरू-जमीन की जिम्मेदारी राजा शाह जी अपने कंधों पर ले लेते और वह जोरू-जमीन राजा शाह जी की हो जाती। इसे ‘औताली’ कर कहा जाता था। गाँव-घरों में आज भी जब किसी के पशु आवारा चरते दिखाई दे जाते हैं तो यही कहकर आवाज लगाई जाती है- हे लो ! कैकी औताली होईं या?

इसी से मिलते-जुलते ‘गयाली’ और ‘मुयाली’ भी थे। अर्थात सबका मालिक एक था- राजा  शाह जी। कुछ उसी तरह जैसे झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद आततायी अंग्रेजों ने झाँसी पर अपने आधिपत्य का ऐलान कर दिया था। हालांकि राजा शाह जी कोई आततायी नहीं बल्कि हमारे प्रभु थे।

 

बहरहाल, गाँव से पाँच लोग  माबला  लेकर  टिहरी  दरबार को चले बाई फुट। गाड़ी-मोटर  तब थे नहीं। पालकी  में  इधर  अंग्रेज  चलते थे, उधर राजा शाह। पालकी ढोने वाले हम- ‘प्रभु सेवा’ में सदैव उपस्थित।

न केवल प्रभु सेवा बल्कि प्रभु के दरबारी, अधिकारी, कर्मचारी, दलाल, मेहमान, मेहमानों की मेमों, उनके बच्चों, कुत्तों, मुर्गों की सेवा भी हम पूरी वफादारी से करते थे। उन्हें पालकियों में बैठाकर मैदान, पहाड़, नदी, घाट, एक राज्य से दूसरे राज्य में अपने कंधों पर ढोया करते थे। हमारी इन वफ़ादारियों को रसूखदार लोग ‘छोटी बरदाईश’-’बड़ी बरदाईश’ कहा करते थे। जहाँ  तक मेरी अक्ल के खच्चर दौड़ पा रहे हैं, ये ‘बरदाईश’ शब्द ‘बर्दाश्त’ की पालकी से निकला होगा। यूँ तो प्रभु सेवा हम टीर्यालों का जन्मसिद्ध कर्तव्य था और इसमें बर्दाश्त जैसा शब्द नहीं जोड़ा जाना चाहिए। खैर...!

 

माबला पहुंचाने वाले के लिए दरबार की तरफ़ से रात टिहरी रुकने की व्यवस्था थी। इस व्यवस्था के

अन्तर्गत एक ओबरे में खटोली(चारपाई) उपलब्ध होती।

हम टाट-बोरों के गुदड़ों में सोने  वालों के लिए वह खटोली किसी  कमल विभूषण से कम थी कौन जाने एक रात उस  खटोली में सोने का अरमान दिल में पाले ही हम माबला लेकर जाने को राजी होते हों।

 

किंतु, समस्या तब खड़ी हुई जब देखा खटोली एक और सोने वाले पाँच। गहन विमर्श हुआ। सीनियरता-जूनियरता पर भी विचार किया गया। इतिहास का भी सिंहावलोकन किया गया कि पाँचों में से किसी को क्या पहले यह स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ है!

आधी रात बीत गई लेकिन फैसला हो सका। सुबह सिर नवाए हुए दरबार में माबला भेंट करने भी जाना था और उसके बाद वापस गाँव भी।

 

अंत में तय हुआ कि सोएँगे सब जमीन पर ही, पैर खटोली के ऊपर रखेंगे। इस निर्णय में सबका हित था। आख़िर दूर जौनपुर से गाड-धार पार करके आए थे। किसी एक के साथ भी अन्याय बोलांदा बदरी की अवहेलना होती।

 

अब सब के सिर, धड़, हाथ, और रीढ़ खटाई के नीचे थे; पैर ऊपर खटाई में। आराम की नींद आई। इतनी गहरी कि अब तक भी उसका असर नहीं जाता।

 

तो साहिबान!  उपरोक्त कथा का सारतत्व यह है कि हम उस देस के वासी बाद में हैं जिस में गङ्गा बहती है। उससे भी पीढ़ियों पहले से हम उस टिहरी रियासत की फ़रमाँ-बरदार, होशियार प्रजा हैं जिस में भागीरथी-भिलंगना का संगम है। वही संगम जिसकी तलहटी में श्रीदेव सुमन की कंबल में लिपटी सड़ी-गली हुई देह के अवशेष शायद आज भी क्रांति की अग्नि की प्रतीक्षा करते होंगे।

Friday, February 23, 2024

संगीनों की नोंक से शहंशाह की अभ्यर्थना में लिखी पंक्तियां नहीं होती हैं राष्ट्रगान

 शहर कलकत्ता: सलाम कलकत्ता


गीता दूबे 









कोलकाता मेरे लिए अपना शहर रहा है। आँखें भले ही  इस शहर में नहीं खुलीं लेकिन सही मायने में आँखें खुलने का मतलब यहीं जाना। जन्म हुआ उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक गाँव में। माँ बताती हैं कि मैं जब छ दिनों की थी तब माँ मुझे लेकर कलकत्ता आ गई थीं। हमारी जड़ें उत्तर प्रदेश में थीं, जहाँ जाने की हुड़क मन में बनी रहती थी जो गर्मी की छुट्टियों में पूरी होती थी। वहाँ फैला हुआ बड़ा सा घर था, छत थी, खेत थे, सखियाँ थीं और ढेरों रिश्तेदार थे।

मेरे बचपन का कोलकाता यानी कालीघाट और उसके आस -पास का परिवेश। मेरे परदादा गाँव से कोलकाता आ गये थे, रोजी -रोटी की तलाश में। उस जमाने में जिनके पास ज्यादा खेत नहीं हुआ करते थे, रोजी रोजगार का कोई खास इंतजाम नहीं हुआ करता था, वे रोजगार की तलाश में कलकत्ते की गलियों में समा जाते थे। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार से आए ढेरों लोग यहाँ अपनी छोटी सी दुनिया बसा लेते थे। उत्तर भारत में तो यह पंक्ति बड़ी प्रचलित थी- 

"लागा झुलनिया का झटका बलम कलकत्ता पहुँच गये।"

ये 'बलम' अपना घर- दुआर छोड़कर, कभी नयी -नवेली पत्नी तो कभी बच्चो को छोड़कर यहाँ किसी तरह गुजर- बसर करते थे ताकि ज्यादा से ज्यादा पैसा अपने परिवार वालों को भेज सकें। इनकी जरूरत इस शहर को भी खूब थी। जूट मिलें हों या दुकानें, चौकादारी का काम हो या मजदूरी का, ये बड़ी आसानी से यहाँ खप जाते थे। यह बात और है कि यहाँ के मूल निवासियों या फिर संभ्रांत बंगालियों को इनकी संगत कुछ खास रास नहीं आती थी। ये उन्हें कहीं न कहीं घुसपैठियों की तरह जरूर महसूस होते थे जिन्होंने यहाँ के परिवेश को दूषित कर दिया है लेकिन धीरे- धीरे पूरे प्रांत में उन्होंने अपनी उपस्थिति को आवश्यक बना दिया। इसके बावजूद इन्हें कुछ ऐसे विशेषणों से संबोधित किया जाता रहा है, जो अपमानजनक लगते थे। बचपन में ऐसे शब्दों से मेरा सामना भी खूब हुआ है जैसे "मेड़ो"।  बाद में सोचने पर समझ में आया कि यह शब्द मारवाड़ से आए मारवाड़ी समाज के लोगों के लिए या फिर मड़ुआ की रोटी खाने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए व्यवहृत होता होगा। आज के समय में यह तिरस्कार या क्षोभ का भाव भले ही सतह पर दिखाई नहीं देता लेकिन शायद दिल की गहराई में कहीं न कहीं अब भी मौजूद जरूर है।

बचपन में मेरे लिए कलकत्ता का मतलब था घर, दुकान और स्कूल। घर था कालीघाट के महिम हलदार स्ट्रीट में। आस- पास बांगाल लोग काफी संख्या में रहते थे इसलिए बांग्ला भाषा का संग -साथ बचपन से रहा। दुकान का मतलब कालीघाट मंदिर के पास अवस्थित दादाजी और बाद में पिताजी की पेड़े की दुकान से है। हमारी कलकत्ते में यह चौथी पीढ़ी थी। पहला स्कूल भवानीपुर इलाके में था। बाद में कलकत्ता के प्रतिष्ठित स्कूल श्री शिक्षायतन में पढ़ने लगी। यह तो बहुत बाद में जाना कि सीताराम सेकसरिया जी ने राजस्थानी लड़कियों की पढ़ाई -लिखाई के लिए यह स्कूल खोला था जिसमें मुझ जैसी उत्तर प्रदेश या बिहार की लड़कियाँ भी मजे से शिक्षा प्राप्त करती थीं। स्कूल में आकर पता लगा कि कलकत्ते में कितने राज्यों और प्रांतों के लोग रहते हैं जो स्कूल में भले ही खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग करते हैं लेकिन इनकी अपनी एक माँ बोली भी है जिसका हल्का- फुल्का असर इनकी हिंदी पर दिखाई देता है। खान पान की आदतों में भी थोड़ी बहुत भिन्नता तो है ही। राजस्थानियों के अचार और सब्जी का स्वाद हमारे उत्तर प्रदेशीय स्वाद से हल्का सा ही सही भिन्न जरूर हुआ करता था। हमारी सभी शिक्षिकाएं हिंदीभाषी नहीं थीं लेकिन उनकी हिंदी कतिपय अपवादों को छोड़कर इतनी साफ हुआ करती थी कि कोई बता भी नहीं सकता था कि वे हिंदीभाषी नहीं हें। यह गजब का सांस्कृतिक सम्मिलन था। 

अपने स्कूली जीवन से ही मैंने कविता लिखना आरंभ कर दिया था। कॉलेज में पढ़ते हुए महाविद्यालय की पत्रिका और दीवार पत्रिका में कविताएँ लेख आदि छपे और एक आध जगह कविता सुनाने का अवसर भी मिला। हमारी एक प्राध्यापिका थीं, डॉ. माया गरानी जो भारतीय भाषा परिषद के तत्वावधान में विभिन्न विषयों पर साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन किया करती थीं। ऐसे ही एक आयोजन में पहली बार मैंने अपनी कविता पढ़ी। उस काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे, सुप्रसिद्ध गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र। उनका गीत "एक बार और जाल फेंक रे मछेरे", उन्हीं के मुख से सुना था। माया मैडम जो बाद में माया दी बन गईं क्योंकि इनके साथ थोड़े ही समय के लिए सही श्री शिक्षायतन कॉलेज में पढ़ाने का अवसर मुझे मिला, एक जिंदादिल महिला थीं। जिंदगी की परेशानियां कभी उनके माथे पर शिकन बनकर नहीं उभरीं। विभिन्न महाविद्यालय के विद्यार्थियों को युवा गोष्ठियों के माध्यम से उन्होंने मंच प्रदान किया। उनकी प्रतिभा को मांज -घिसकर साहित्य की दुनिया में पाँव धरने के लायक बनाया। बाद में पता चला कि माया दी कहानियां भी लिखती थीं और सिंधी से हिंदी में काफी अनुवाद भी किया था। उनका एक कहानी संग्रह "ठहराव" नाम से 2004 में प्रकाशित हुआ था। माया दी का एक निजी योगदान मेरे जीवन में है जिसे स्वीकार किए बिना आगे बढ़ने का मन नहीं कर रहा। 1994 के दिसंबर महीने में मेरी स्नातकोत्तर की परीक्षाएं समाप्त हुई ही थीं कि माया दी कि संदेश मिला कि बालीगंज शिक्षा सदन स्कूल में एक लीव वेकैंसी है। उन्हें फोन किया तो उन्होंने कहा- पढ़ाएगी ?..अंधा क्या चाहे दो आँखें.. मेरे अध्यापकीय जीवन की वह पहली सीढ़ी थी। आज माया दी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका स्नेहिल व्यक्तित्व हृदय में बसा हुआ है। शिक्षायतन की याद आते ही बरबस याद आती हैं, कवि कथाकार डॉ. सुकीर्ति गुप्ता जो मेरी प्रिय अध्यापिकाओं में से एक थीं। जयशंकर प्रसाद की कविताएं इतना डूबकर पढ़ाती थीं कि प्रसाद जाने कब मेरे प्रिय कवि बन गये। "आषाढ़ का एक दिन" पढ़ाते हुए वह कक्षा में ही नाट्य मंचन का मनोरम वातावरण सृजित कर देती थीं। उन्होंने 1998 में "साहित्यिकी" नामक अनूठी संस्था की स्थापना की और शहर की हिंदी अध्यापिकाओं के साथ पढ़ी- लिखी गृहणियों को मंच प्रदान किया। उन्हें सोचने समझने के साथ लिखने पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया। उनकी प्रेरणा से लंबे समय तक साहित्यिकी नामक हस्तलिखित पत्रिका का प्रकाशन होता रहा। स्मृतिशेष सुकीर्ति गुप्ता के खाते में एक उपन्यास (चक्रव्यूह) , दो कहानी संग्रह ( दायरे, अकेलियां) और एक कविता संग्रह ( शब्दों से घुलते-मिलते ‌हुए) दर्ज हैं। उनका आत्मकथात्मक उपन्यास कोलाज उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ जिसका संपादन डॉ. किरण सिपानी ने किया। किरण दी से मेरी पहचान 'साहित्यिकी' में हुई। अदम्य ऊर्जा से भरी किरण दी ने अपना पूरा जीवन अध्यापन और साहित्य को समर्पित कर दिया है। पिछले वर्ष ही उनका यात्रा संस्मरण 'मेरी जापान यात्रा' छपकर आई है। अत्यंत रोचक पुस्तक है, रवानी और कथारस से भरपूर। किरण दी ने अपना अभिन्न सखी डॉ. विजयलक्ष्मी मिश्रा के साथ मिलकर वर्षों तक हनुमान मंदिर अनुसंधान संस्थानमें पूरे समर्पण के साथ काम किया।

विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान कोलकाता के साहित्यक और सांस्कृतिक जगत से परिचय लगातार बढ़ता गया। प्रख्यात नाटककार उषा गांगुली अतिथि प्रवक्ता के रूप में सप्ताह में एक दिन हमारी क्लास लेने आती थीं। संयोग से एक दिन जब वे बिना किसी पूर्व सूचना के प्रथम वर्ष की कक्षा लेने आई तो कक्षा में कुल पाँच विद्यार्थी मौजूद थे। उन्होंने संख्या पर ध्यान न देते हुए पूरे मन से वह क्लास ली और नाटकों के बारे में न केवल बताया बल्कि अपना नाटक देखने के लिए प्रेरित भी किया। मैंने सखी और सहपाठी अल्पना नायक जीवन का पहला नाटक "कोर्ट मार्शल" देखा और जाना कि हमारी गँवई नौटंकियों और रामलीलाओं से इतर भी ऐसे नाटक होते हैं जो प्रेक्षागृह में मंचित होते हैं और दर्शक टिकट खरीदकर इसे देखने जाते हैं। स्त्रियों के लिए यह वर्जित क्षेत्र नहीं है बल्कि वे न केवल इनमें अभिनय करती हैं बल्कि निर्देशन का दायित्व भी निभाती हैं। बाद में ऊषा जी के कई नाटक देखे। वह अभिनेत्री, निर्देशिका, सूत्रधार आदि सभी भूमिकाओं का निर्वाह कुशलतापूर्वक करती थीं। 'कोर्ट मार्शल', रूदाली, हिम्मत माई, चंडालिका,'काशीनामा' आदि नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन उषा जी ने किया है।‌ इनके दल के कई कलाकारों ने फिल्मों में भी शोहरत कमाई है जिसमें राजेश शर्मा का नाम उल्लेखनीय हैं। 

पढ़ाई के दौरान विभिन्न प्रतियोगिताओं में जाकर प्रतिभागिता का सुख तो पाया ही, परिचय के दायरे को भी विस्तार मिला। उस समय मौलाली युवा केंद्र में सरकार द्वारा विभिन्न प्रतियोगिताओं कार्यक्रमों आदि का आयोजन हुआ करता था जिसमें विभिन्न साहित्यक हस्तियों से मिलने का अवसर मिला। साहित्य पढ़ते पढ़ते साहित्य लिखने और गोष्ठियों से जुड़ने का सिलसिला जो एक बार शुरु हुआ, वह दोबारा थमा नहीं। 

यह बताते हुए सुख का अनुभव हो रहा है कि आज की मशहूर नाट्य शख्सियत उमा झुनझुनवाला मेरी सीनियर थीं। उनके अभिनय जीवन के शुरुआती चरण को प्रत्यक्ष देखने का अवसर मिला। आज कोलकाता के नाट्य जगत में अगर किसी की निरंतरता बनी हुई है तो इसका श्रेय निस्संदेह दिवंगत अजहर आलम और उनकी जीवन संगिनी तथा नाट्य संगिनी उमा झुनझुनवाला को जाता है। यह कह सकती हूँ कि जो कलकत्ता एक समय में श्यामानंद जालान के पदातिक, ऊष प्रतिभा अग्रवाल के नाट्य शोध संस्थान और उषा गांगुली के रंगकर्मी के कारण जाना जाता था, उसकी विरासत को आज बड़े सलीके से 'लिटिल थेस्पियन' ने सँभाल रखा है। पहले "जश्ने रंग" और अब "जश्ने अज़हर" के आयोजन ने राष्ट्रीय स्तर कर कोलकाता की नाट्य क्षमता को रेखांकित किया है।

एम. ए. में पढ़ते समय ही मनमोहन ठाकौर का उपन्यास 'गगन घटा घहरानी' पढ़ा, उसकी समीक्षा लिखी जो 'पश्चिम बंग पत्रिका' में प्रकाशित हुई। कलकत्ते में साहित्य के कई गढ़ थे और अब भी हैं। एक ओर तो सेठाश्रित संस्थानों ने साहित्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन उनका रूप समन्यवादी रहा। व्यवस्था विरोध से वे करीब -करीब दूर रहें। दूसरी ओर आरंभ, प्रतिध्वनि, प्रगतिशील लेखक संघ, आरंभ, पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज जैसी संस्थाओं ने साहित्य का मोरचा बखूबी सँभाला। इनसे जुड़े साहित्यकारों की रचनाओं में यथार्थ की अनुगूँज भी थी, व्यवस्था विरोध का माद्दा भी और थी प्रबल वैचारिक प्रतिबद्धता। वामपंथ की वैचारिकी से जुड़े साहित्यकारों की रचनाओं में आम आदमी के दुख और छोटे- छोटे सुखों के जिक्र के साथ इंकलाबी तेवर भी दिखाई देता था। 



इन साहित्यकारों के बहुत से अड्डे या ठेक रहे। हर जगह तो अपनी पहुँच नहीं रही लेकिन भारतीय भाषा परिषद के अलावा लेखक- पत्रकार के रूप में प्रसिद्ध और अपनी पुस्तक "धर्म के नाम पर" के लिए चर्चित दिवंगत गीतेश शर्मा के मशहूर अड्डे जनसंसार में जरूर आना -जाना होता था। वहाँ होने वाली विचारोत्तेजक बहसों, विभिन्न संगोष्ठियों  आदि ने बंगभूमि पर पनपने और पल्लवित होनेवाले हिंदी साहित्य से परिचित जरूर कराया। इन गोष्ठियों में छविनाथ मिश्र, अनय जी, छेदीलाल गुप्त, नगेंद्र चौरसिया आदि को बोलते, अपनी रचनाओं का पाठ करते सुना। ऐसी ही एक गोष्ठी में कवि ध्रुवदेव मिश्र 'पाषाण' ने अपनी चर्चित रचना 'चौराहे पर कृष्ण' का प्रभावशाली पाठ किया था। पाषाण जी की एक कविता मुझे बेहद प्रिय है-

"जिनसे छीन लिया जाता है उनका देश 

और जिनके खिलाफ बसा दिया जाता है

एक दूसरा देश

उनकी पीठ पर

संगीनों की नोंक से

शहंशाह की अभ्यर्थना में लिखी पंक्तियां

नहीं होती हैं राष्ट्रगान।"

कालांतर में पश्चिम बंग हिंदीभाषी समाज ने "पाषाण" जी पर केंद्रित एक गोष्ठी का आयोजन जनसंसार में ही किया था जिसमें डॉ. रूपा गुप्ता ने बहुत अच्छा पर्चा पढ़ा था। रूपा दी को पहली बार मैंने जनसंसार में ही मुक्तिबोध पर बोलते सुना था और उनसे बहुत प्रभावित हुई थी। आज तो उन्होंने दर्जनों किताबें लिखकर एकेडमिक जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है।

कुछ महत्वपूर्ण आयोजन जनवादी लेखक संघ द्वारा भी हुए। राहुल सांकृत्यायन की 125 वीं जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित गोष्ठी की याद अब भी ताजा है। प्रेमचंद जयंती के अवसर पर भी महत्वपूर्ण आयोजन होते थे। एक बार राजेन्द्र यादव भी जनवादी लेखक संघ के किसी आयोजन में आये थे। इसराइल जैसे कथाकार की कहानियों से इन्हीं आयोजनों में परिचय हुआ। इनकी वैचारिक और साहित्यिक प्रतिबद्धता का अक्स इनकी कहानियों में दिखाई देता है। आयोजन अब भी होते हैं लेकिन उनकी सूचना कम ही लोगों तक पहुंच पाती है। 

इन सभा -गोष्ठियों से अलग एक और किस्म की गोष्ठियों में शामिल होने का अवसर मिला जिनकी रवायत अब रही नहीं। वे थी सीढ़ी गोष्ठियाँ। नंदन या अलीपुर पुस्तकालय की सीढ़ियों पर आयोजित इन गोष्ठियों में जमीनी साहित्यकारों को खुल कर आपनी रचनाओं का पाठ करते, उस पर बहस करते सुना था। अशोक सिंह साहित्यकार भले नहीं हैं लेकिन साहित्यकारों को एक मंच पर लाने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। उनकी संगठन शक्ति का कमाल था कि 'प्रक्रिया' नामक एक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ जिसमें श्री हर्ष, छेदीलाल गुप्त, दुर्गा डागा, चंद्रकला पांडेय, संगीता गुप्ता आदि की रचनाओं को जगह मिली। अफसोस कि एक ही अंक के बाद यह पत्रिका बंद हो गई। 

1995 में डॉ शंभुनाथ ने हिंदी मेला की शुरुआत कर विद्यार्थियों को एक मंच प्रदान किया। मेला अब भी पूरे उल्लास और ऊर्जा के साथ कायम है। 

वर्तमान समय में बंगीय हिंदी परिषद, कुमार सभा, जालान पुस्तकालय, साहित्यिकी, अपनी भाषा, नीलांबर, मुक्तांचल आदि संस्थानों ने बंगभूमि में साहित्यिक -सांस्कृतिक आयोजनों का जिम्मा बखूबी संभाल रखा है।

कोलकाता के साहित्यक जगत की कहानी के न जाने कितने अध्याय और किरदार हैं। कुछ बरबस याद आए  और कुछ छूट गये हैं। मौका मिला तो उनपर भी बात करूंगी। बस एक प्रसंग के साथ बात खत्म करना चाहूँगी। 1985 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने कोलकाता को डाइंग सिटी (dying city) कहा था तो कोलकाता के साहित्यकारों का आक्रोश फूट पड़ा था। जनवादी कवि श्री हर्ष ने अपनी कविता के माध्यम इस आक्रोश को अभिव्यक्ति दी थी-

"कौन कहता है 

यह मरता हुआ शहर है 

यह तो जीवन गीत गाता हुआ शहर है

सलाम कलकत्ता..

लाल सलाम कलकत्ता.."

यह कविता बेहद लोकप्रिय हुई और विभिन्न अवसरों पर इसकी आवृत्ति करके विद्यार्थियों, साहित्य प्रेमियों ने इसे जन - जन तक पहुंचा दिया। कलकत्ता के साहित्यकारों की कलम की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।

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Tuesday, January 30, 2024

हिंदी कविता की स्थापना का खूबसूरत खयाल है अलीक


 “अ ली क” कोलकाता से निकलने वाली एक अनियतकालीन पत्रिका है, जिसका संपादन कवि नील कमल करते हैं। हाल ही में इस पत्रिका का चौथा अंक जनवरी 2024 प्रकाशित हुआ है। अभी तक के अंकों को देखने पर यह कविता केंद्रित दिखायी देती है। अलीक का अंक 3 और सद्य प्रकाशित अंक 4 के साथ‌-साथ जीवन के एक छोटे से अंतराल में कवि नील कमल से रहे साक्षात सम्पर्क के हवाले से यह कह सकता हूं कि एक अच्छी कविता की तलाश नील कमल क शगल है। वे हमेशा ऐसी कविताओं के पास जाते हुए होते हैं जहां उन्हें एक खास तरह की निश्छलता दिखाई दे। और उस निश्छलता के दायरे में सिर्फ कविता ही नहीं, कवि का निजी जीवन भी हो। उस निश्छलता की परख वे नैतिकता और आदर्शों के स्तर पर करते हैं, विचाराधारा की बारीकी में नहीं। बल्कि थोड़ा और खुलासा हो तो कहा जा सकता है कि सृजन के उद्देश्यों में दुनिया की खुशहाली की वह संगति जिसको वस्तुनिष्ठता के साथ जांचा परखा जा सके। हालांकि आज के इस समय में जब नैतिकता और आदर्श ज्यादा वाचालता के साथ सिर्फ थोड़ा विश्वसनीय दिखने भर की कार्रवाई हुए जा रहे हैं, नील कमल की कोशिशों के परिणाम किस रूप में दिखेंगे, उन्हें वक्त के साथ ही देखना सम्भव हो सकेगा। फिर भी एक अच्छी कविता को तलाशने की उनकी कोशिश पर भरोसा किया जा सकता है। क्योंकि वे कविता को ही नहीं एक कवि को भी खरेपन के अपने पैमानों से तैयार बक्से में संजो लेते हैं। अलीक वह बक्सा ही नील कमल के भीतर एक अच्छी कविता को सामने लाने का एक जूनून है। यह जूनून ही उन्हें न सिर्फ अलीक निकालने को मजबूर करता है बल्कि कविताओं की आलोचना के रूप में प्रकाशित उनकी पुस्तक गद्य वद्य कुछ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

हिंदी साहित्य की दुनिया से प्रेम करते हुए भी यदा कदा घटने वाली और दिख जाने वाली अंतर्विरोधी घटनाएं नील कमल को क्षुब्ध किये रहती हैं। उन स्थितियों से पार पाने वे लिए वे एक अच्छी कविता तक पहुंच जाने में सुकून महसूस करते हैं। इस जमाने में जब सम्पत्ति को जहां तहां से समेट लेने का पागलपन हावी हो रहा हो, अपने सुकून के लिए नील अपनी  मासिक आमद के एक हिस्से से कभी किताबे छपते हैं तो कभी पत्रिका। निजी स्रोतों से गैरव्यवसायिक ढंग का काम करने वाले लोगों को यदि तलाशा जाये तो हिंदी का नील कमल वहां ज्यादा मजबूती से खड़ा नजर आएगा। अलीक क यह अंक उन्हें अपनी जमीन को और सख्त बनाए रखने की राह दिखा रहा है। इसमें प्रकाशित कविताएं और आलोचनात्मक आलेख उल्लेखनीय है।  

अलीक के इस अंक में चार युवा कवियों की कविताएं हैं- प्रियदर्शी मातृशरण, उमा भगत, ललन चतुर्वेदी और पल्लवी मुखर्जी। प्रियदर्शी मातृशरण और उमा भगत की कविताओं से मुझे पहली बार अलीक-4 से ही परिचित होने का अवसर मिल रहा है। यह अच्छी बात है कि कवि प्रियदर्शी मातृशरण की कविता खुशामदी होने से ऐतराज करते हुए अपने होने के साथ रहना चाहती है लेकिन एक लोचा है कि खुशामद कराती सत्ता का बिम्ब वहां किसी “पुराने” कवि की आकृति पर अटका हुआ है। एक बार प्रियदर्शी मातृशरण की इस बात को मान ही लिया जाए कि “पुराने” कवि की स्वाद- कलिकाएं किसी उससे भी “पुराने” कवि के पद-तल में वास करती हों और यह भी कि जितना पीछे जाएं वह बेशक उतना ही पुराने कवि की इच्छाओं वाले तैल-चित्र नजर आएं तो भी नवाचार और मौलिकता का तकाजा तब ही माकूल है जब सत्ता की ट्रू पिक्चर बनती हो। निश्चित ही कवि प्रियदर्शी मातृशरण उस ट्रू पिक्चर को आकार देना जानते हैं वरना लोभियों के गांव से गुजरना गंवारा ना करते।

अपने समय को परिभाषित करना कला साहित्य का मुख्य विषय रहा है। लेकिन इस तरह परिभाषित करते रहने में एक बात यह भी दिखायी देती रही कि हर रचना में एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने से पूर्व का यथावत आ गया और इसीलिए नये एवम मौलिक होने की कोशिश में वह उसी तर्ज के साथ आगे बढने लगा। यानि समय को परिभाषित करने की एक नयी पहल से आगे नहीं चला। इस तरह देखें तो कला साहित्य ने अपने को कुछ ऐसी सीमाओं में कैद करा लिया जिसको नैतिक और आदर्श से सम्पृक्त सामजिकी के सौंदर्य में जांचने परखना भी एक संकाय हो गया। प्रफुल्ल कोलख्यान का आलेख एक संकाय से आगे बढकर सिविल सोसाइटी को नहीं देख पा रहा है।    

 

“अ ली क” को सिर्फ एक पत्रिका भर नहीं कहा जा सकता है। दरअसल यह लीक से हट कर की जाने वाली एक ऐसी कार्रवाई है जिसके केंद्र में हिंदी कविता की स्थापना का खूबसूरत खयाल हमेशा मुख्य रहता है। विचार के स्तर पर एक प्रतिबद्ध नागरिक चेतना इस पत्रिका की सामाग्री का मुख्य लक्षण है।         

Monday, January 1, 2024

स्त्री के भय

  

वर्ष 2024 की शुरुआत कथाकार विद्या सिंह की कहानी "स्त्री मन के आवर्त" के साथ करते हुए यह सांझा करना अच्छा लग रहा है कि यदि रचनाकारों का समुचित सहयोग मिलता रहा तो इस पूरे वर्ष स्त्री मन के आवर्त को हर दृष्टिकोण से रखने की कोशिश की जाएगी। यानी वर्ष 2024 को हम "स्त्री मन" शीर्षक के साथ देखना चाहते हैं।


प्रस्तुत कहानी पर अलग से कोई टिप्पणी करने की बजाय कहानी आए कुछ सूत्रात्मक संदेशों, सवालों को यहां रखना ही पर्याप्त लग रहा है। 

"पुरुष आकृति में न जाने कौन सा रसायन मिला होता है कि सामने पड़ते ही आँखें अपने आप झुक जाती हैं।"


"स्त्री को हर समय कितने भय से गुज़रना पड़ता है इस पर भी एक पुस्तक लिखी जा सकती है। हर उम्र की स्त्री के अलग-अलग प्रकार के भय।"


स्त्री मन के आवर्त्त 

डॉ. विद्या सिंह 


डॉ. डिमरी के कमरे में जाने का इरादा बाँध कर निकले मेरे कदम दरवाजे पर ही ठिठक गए। अभी-अभी मैंने अपने कमरे को ताला लगा कर चाभी पर्स के हवाले की थी। अब मैं उस खिड़की पर हूं जो कोरिडोर में खुलती है। खिड़की का परदा खिसक गया है, अतः गरदन ज़रा सी टेढ़ी कर झांकने पर भीतर का दृश्य साफ़ दिखाई दे रहा है। कुर्सी पर बैठे-बैठे वह लगातार आगे-पीछे पेंडुलम की तरह हिल रहे हैं। लगता है नहाने धोने के बाद किसी देवी-देवता का पाठ कर रहे हैं। कल इतना ध्यान नहीं गया था किन्तु आज देख रही हूँ उनका सिर पीछे से काफ़ी गंजा है। उनका बायाँ गाल मेरी नज़रों के घेरे में है। वह इतना मोटा दिख रहा है जैसे गाल में कुछ दबा रखा हो, या कुछ चुभला रहे हों। हो सकता है उनके गालों की बनावट ही ऐसी हो, दूसरा गाल भी ऐसा ही हो। कल तो ऐसा कुछ भी नहीं लगा था लेकिन भरपूर नज़रों से देखा भी तो नहीं था। पुरुष आकृति में न जाने कौन सा रसायन मिला होता है कि सामने पड़ते ही आँखें अपने आप झुक जाती हैं। 

सुबह के आठ बजे हैं। अगल-बगल के सभी कमरे शान्त पड़े हैं, लगता नहीं है इनमें कोई है। डॉ. डिमरी ने बताया था होटल में कमरे तो कई लोगों ने लिए हैं लेकिन इस अवसर का उपयोग वे शहर के अपने मित्रों-रिश्तेदारों से मिलने में कर रहे हैं ।

मैं योगाभ्यास और प्राणायाम के बाद नहा धो कर नाश्ते पर जाने के लिए तैयार हो गई थी। सोचा डॉ. डिमरी से पूछ लूँ वह भी चलें, लेकिन उनकी कल की बातें याद कर उनके साथ जाने को दिल नहीं किया। अकेली चली जाती तो भी न मालूम वह क्या सोचते! इसीलिए रिसेप्शन पर पूछना बेहतर विकल्प लगा कि नाश्ता कमरे में आ सकता है क्या ? मैनेज़र ने असमर्थता ज़ाहिर कर दी फ़िर तो नीचे जाने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा। डॉ. डिमरी के फोन के बाद कोई औचित्य नहीं बनता कि अकेली जाऊँ। साथ जाना ही ठीक रहेगा। इसीलिए उनके आने तक यहीं गैलरी में इन्तज़ार कर लूंगी।

इस बार फ़िर ‘हिन्दी-उर्दू अवार्ड कमिटी का अधिवेशन लखनऊ में है। पिछले कई सालों से डॉ. जोशी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आग्रह कर रहे थे लेकिन मेरी गृहस्थी मेरे पैरों में बेड़ियों की तरह पड़ी हुई है। मेरी रसोई मेरे जीवन का कितना बड़ा हिस्सा हज़म कर जाती है, कभी सोचती हूँ तो कोफ़्त होती है। दो बच्चों की परवरिश, नौकरी, रिश्ते-नाते हर समय चुनौती बन कर सामने खड़े होते हैं। बड़ी मुश्किल से पति को मना पाई थी। यह पहला मौका है जब मैं अकेली, पति और बच्चों के बिना, घर से निकली हूँ। पति और बच्चे स्टेशन पर छोड़ने आए थे। सोचा था बच्चियाँ रोएँगी लेकिन पति ने न जाने कौन सी पट्टी पढ़ाई कि दोनों खुशी खुशी ‘बाय मम्मी‘ करने लगीं। मेरा मन उमड़ने लगा था लेकिन मैंने अपने मन को थाम लिया। आँखें छलछला आईं पर जबरन होठों पर हँसी लाने की कोशिश की और जवाब में मैंने भी हाथ हिला दिया।

कल नियत समय से काफ़ी देर से ट्रेन लखनऊ पहुँची थी। होटल पहुँचते-पहुँचते नौ बज गए थे। मैं हड़बड़ाई सी रिसेप्शन पर पहुँची और अधिवेशन में शामिल होने की बात बताई।

‘‘आपका नाम मैडम?‘‘

‘‘डॉ. सुनीता‘‘ मैंने डाॅक्टर पर थोड़ा ज़ोर डालते हुए कहा ताकि मेरे व्यक्तित्व का उस पर कुछ रौब पड़े।

रिसेप्शनिस्ट ने मेज़ के दराज से सूचीपत्र निकाला और एक नाम के आगे रुक गया। मैं उसके चेहरे के बदलते भावों को बड़े गौर से देख रही थी। उसके माथे का तनाव समाप्त हो चुका था और ‘रूम नंबर 106‘ बोलते हुए उसने एक कार्डनुमा चाभी पकड़ा दी। मेरे चेहरे पर उभरे असमंजस को भाँप कर उसने मेरे साथ एक लड़का भेज दिया। ‘मैडम को कमरे तक छोड़ आओ।‘ लड़का मेरा सामान ले कर आगे-आगे और मैं उसके पीछे-पीछे। उसके बिना माँगे ही मैंने चाभी उसे दे दी। उसने कार्ड एक स्लाॅट में डाला और एक आवाज़ हुई, लड़के ने तभी हैंडिल घुमा दिया। मैं ध्यान से उसे दरवाजा खोलते देखती रही। मुझे उस समय अपने पति पर झुंझलाहट हुई थी। ‘हटो तुम्हारे वश का कुछ नहीं है‘ कह कर कुछ भी नया काम सीखने ही नहीं देते। आज कल ताले भी कैसे-कैसे आने लगे हैं?

 डॉ. डिमरी ने ‘ऊँ‘ का उच्चारण करते हुए अंगड़ाई ली हैै। लगता है उनका अनुष्ठान संपन्न हो गया है। मैं फिर उसी हिस्से से देख रही हूँ। वह अलमारी की ओर बढ़ रहे हैं शायद शर्ट पहनने जा रहे हैं, अभी तक तो बनियान में ही थे। मैं रेलिंग की ओर चली जाती हूँ। डॉ. डिमरी मुझे इस तरह अपने कमरे में झाँकते हुए देख लें तो मेरे बारे में न जाने क्या सोचेंगे!

कल के सेमीनार में डॉ. जोशी के अलावा मेरे लिए सभी चेहरे अपरिचित थे। मेरे पहुँचने तक पहला सत्र प्रारंभ हो चुका था। मैं चुपचाप एक खाली सीट पर बैठ गई थी। ग्यारह बजे बिस्कुट के साथ चाय मेज पर ही आ गई थी। एक बजे लंच के अवकाश में मैं डॉ. जोशी से मिली। उन्होंने मेरा परिचय अपने साथ के सज्जन से कराया,‘‘इनसे मिलिए, डॉ. डिमरी आपके प्रदेश से ही आए हैं।‘‘ सौजन्य में हम दोनों के हाथ जुड़े और मैं भोजन की मेज़ की ओर बढ़ गई। मेरी नज़रें किसी महिला प्रतिभागी को ढूँढ़ रही थीं, जिसके साथ सहज़ता से बातें कर सकूं। सेमीनार में महिलाएँ बहुत कम थीं मालूम हुआ जो हैं, वे भी लोकल हैं।

होटल वापस आने वालों में हम सिर्फ़ दो थे, मैं और डॉ. डिमरी।

 ‘‘नवम्बर की शाम कितनी छोटी होती है। देखिए अभी छह बजे हैं और चारों ओर अँधेरा पसर गया।‘‘ मेरे दिमाग में पहले से ही उधेड़ बुन चल रही थी, डॉ. डिमरी का वाक्य बहुत दूर से आता हुआ प्रतीत हुआ। होटल के लाउंज में घुसते ही मेरा दिल बैठने लगा। आस-पास कोई बसावट भी नहीं है। होटल शहर के एक छोर पर हाइवे के किनारे बना हुआ है। मेरा मन आशंकाओं से घिर गया।

अब देख रही हूँ इस समय सड़क पर गाड़ियाँ खूब चल रही हैं किन्तु कल तो लगा था कैसी भुतहा जगह पर रुकवा दिया डॉ. जोशी ने। 

हम रिसेप्शन पर पहुँचे तो देखा लड़का अपनी सीट पर बैठा-बैठा ऊँघ रहा था। ‘यह मैंने अपने आप को कहाँ फँसा दिया‘, मेरे भीतर से आवाज़ उठी थी। सीढ़ियाँ चढ़ते समय मुझे अपने दिल की धड़कन साफ़ सुनाई दे रही थी। मेरे पीछे डॉ. डिमरी थे। सीढ़ी पर चढ़ने से पहले हमारी अच्छी खासी बहस हो गई थी। मैं चाहती वह आगे चलें मैं निश्चिन्त भाव से उनके पीछे हो लूँ किन्तु उनकी ज़िद ‘आप महिला हैं पहले आप।‘ कहना चाहती थी महिला हूँ तभी तो आपको आगे चलने को कह रही हूँ। असल में वह मेरे भीतर की उस आशंका से अनभिज्ञ थे जो एक पुरुष के सान्निध्य में स्वयं उपजी थी। स्त्री होने के नाते हर समय चैकन्नी रहना पड़ता है। भीतर से बेतरह परेशान, बाहर से शान्त और संयत दिखने की हरचंद कोशिश में लगी, मुझे डर पत्ते की भाँति हिला रहा था। सीढ़ियाँ खत्म हुईं। लगभग पन्द्रह कदम दाहिने चलने पर कमरा नंबर एक सौ छह आ गया। यहाँ से गैलरी थोड़ी मुड़ गई है। अगला कमरा एक सौ आठ है जो डॉ. डिमरी को मिला है।

मैं दरवाजे पर रुक गई, वह आगे बढ़ गए थे। इस बीच मौसम के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार की बातचीत हमारे बीच नहीं हुई थी।

कमरे के भीतर आते ही मैंने दरवाजे की कुंडी चढ़ा दी। बाथरूम की खिड़की, दरवाजे की चटकनी, लाइट सब जाँचने-परखने के बाद मैं आश्वस्त हुई। पति ने आगाह किया था बाथरूम विशेष रूप से जाँच लेना। स्नान करती स्त्री बड़ी आकर्षक दिखती है, कहीं से कोई तुम्हारी फोटो न ले रहा हो। मैंने हँस कर उनकी बात को हलके में लेने का भ्रम पैदा किया था किन्तु एक डर तो छिप ही गया था। स्त्री को हर समय कितने भय से गुज़रना पड़ता है इस पर भी एक पुस्तक लिखी जा सकती है। हर उम्र की स्त्री के अलग-अलग प्रकार के भय।

साड़ी बदल कर सूट पहनने और गुनगुने पानी से पैर धोने के बाद बड़ी राहत मिली। बाथरूम में झक सफेद तौलिया फर्श पर बिछी देख एकबारगी पैर पोंछने का दिल न हुआ किन्तु मन ने टोका। ‘यह तुम्हारे घर की तौलिया थोड़े ही है कि तुम्हें धोनी पड़ेगी। यहाँ तो बिन्दास हो कर इस्तेमाल करो।‘

मैंने टी.वी. स्टार्ट कर दिया रिमोट हाथ में ले कर चैनेल बदलने के लिए बटन ढूँढ़ने लगी थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई। मेरे पेट में बगूला सा उठा, शरीर में थरथराहट हुई किन्तु सारी हिम्मत गले में जुटा कर मैंने दृढ़ता से पूछा ‘कौन है?‘

‘‘मैं हूँ डिमरी खाने के लिए नीचे नहीं चलेंगी?‘‘ मेरी उछलती साँसों को मानो एक आधार मिल गया। ‘‘ चलूँगी मैंने मन और बेमन के बीच सन्तुलन बनाते हुए कहा। जेहन में सन्नाटे में सीढ़ियाँ दुबारा कौंध गईं।

इस बार फ़िर वही ‘पहले आप‘ ‘पहले आप‘ की लखनवी नफ़ासत वाला खेल खेला गया और अन्ततः मुझे ही आगे बढ़ना पड़ा। दो एक बार मैंने उन्हें सर कह कर संबोधित किया तो उन्होंने टोक दिया, ‘‘सर मत कहिए, डिमरी कहिए।‘‘ मुझे ‘डाॅक्टर साहब‘ कहना बेहतर विकल्प लगा। इस पर उन्हें भी कोई आपत्ति नहीं हुई।

खाना खा कर जब हम लौटे तो मुझे आश्चर्य में डालते हुए वह स्वयं आगे चलने लगे। मैं उन्हें पीछे से सीढ़ियाँ चढ़ते देख रही थी। उनका कमर का हिस्सा काफ़ी भारी लग रहा था।

मेरे कमरे के दरवाजे पर पहुँच कर वह ठिठक गए,‘‘अब आप क्या करेंगी?‘‘

‘‘अब थोड़ा पढ़ कर सोऊँगी।‘‘

‘‘क्या पढ़ेंगी?‘‘

‘‘कुछ विशेष नहीं, कल जो आलेख पढ़ना है, वही थोड़ा देखूँगी। ट्रेन में ढंग से नींद भी नहीं आई थी तो थोड़ी थकान भी है।‘‘

‘‘इसी उम्र में थकान?‘‘ डॉ. डिमरी हँसे। ‘‘अभी तो आप पैंतीस की भी नहीं होंगी।‘‘

‘‘हूँ क्यों नहीं, मैं चालीस की होने वाली हूँ।‘‘

‘‘अभी आप मुझसे बहुत छोटी हैं।‘‘ मेरे कन्धे पर उन्होंने एक धौल मारा जिससे मैं एकदम अचकचा गई। इतनी छूट लेने की इज़ाज़त इन्हें किसने दी?

इस बीच मैं कमरे का ताला खोल चुकी थी लेकिन असमंजस में दरवाजे पर ही खड़ी थी।

‘‘भीतर आने को नहीं कहेंगी?‘‘

‘‘हाँ हाँ आइए‘‘ सौजन्य वश मेरे मँुह से निकल गया।

मैं अभी सोफे से पत्रिका, तौलिया हटा कर उनके बैठने के लिए जगह बनाने ही लगी थी कि वह पैर लटका कर पलँग पर बैठ गए थे और अब अपने जूते उतार रहे थे। देखते-देखते वह लिहाफ़ पैरों पर डाल कर, पलँग के सिरहाने रखे तकिए का टेक लगा कर अधलेटे से हो गए और टी.वी. का रिमोट हाथ में ले कर चैनल बदलने लगे।

‘‘आप पहली बार यहाँ आई हैं इसीलिए सेमीनार को इतनी गंभीरता से ले रही हैं। बिल्कुल फ़िक्र मत कीजिए, पूरा पत्र पढ़ने के लिए समय नहीं मिलेगा। हाँ डॉ. जोशी से कह कर अपना आलेख सुबह के सत्र में पढ़ लीजिएगा दोपहर बाद शहर घूमने निकलेंगे।‘‘

मेरे भीतर गुस्से का ज्वार उमड़ रहा था, कैसा आदमी है? ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान।‘ इस बीच दरवाजा अपने आप भिड़ गया था। बन्द कमरे में पराए पुरुष के होने का एहसास मुझे चैन नहीं लेने दे रहा था। मां की नसीहत ‘‘सगे भाई के साथ भी एकान्त में चैकन्नी रहा करो। किसी का कोई भरोसा नहीं है कब उसके भीतर का जानवर बाहर आ जाए।‘‘ कानों में बज रही थी। भीतर से मैं अपने आप को हर परिस्थिति से लड़ने के लिए तैयार कर रही थी। मैंने शाॅल उठाई और पैरों पर डाल कर सोफे पर बैठ गई। ‘‘आप भी आ जाइए, डबल बेड का लिहाफ़ है काफ़ी लंबा-चैड़ा है।‘‘

डॉ. डिमरी की बात का मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

मैं दोपहर से ले कर अब तक उनके साथ हुई बातचीत का एक-एक संवाद दोहराने लगी। मुझे अपने मुँह से निकला एक भी ऐसा वाक्य याद नहीं आ रहा था जिससे मेरे ऐसी-वैसी स्त्री होने की गुंजाइश बनी हो। अब मेरा ध्यान कमरे में फैली गंध पर गया। हो सकता है उन्होंने भोजन से पहले पी हो और अब उसी का सुरूर उन पर तारी हो। सुना था शराब पिए हुए आदमी की ताकत क्षीण हो जाती है अतः थोड़ी निश्चिंत हुई।

‘‘किस तरह की चीज़ें पढ़ना पसन्द करती हैं आप?‘‘ टी.वी. की आवाज धीमी कर वह मुझसे मुखातिब थे।

‘‘जी...कुछ भी , वैसे कहानियाँ पढ़ना ज्यादा पसन्द है।‘‘

‘‘मंटो की ‘खोल दो‘ कहानी के बारे में आप की क्या राय है?‘‘

‘‘काफी़ पहले पढ़ी थी। अब कुछ याद नहीं है।‘‘

‘‘याद नहीं है या आप भी उसे अश्लील समझती हैं। कमलेश्वर की ‘ठंडा गोश्त‘ क्या उम्दा कहानी है! साहित्य में श्लील-अश्लील का विभाजन मुझे बहुत गलत लगता है।‘‘

‘‘दर असल मुझे बहुत खुला चित्रण पसन्द नहीं है। वही बात शालीन तरीके से भी कही जा सकती है।‘‘

‘‘क्यों? सेक्स के प्रति आप इतनी आग्रहशील क्यों हैं? वह भी एक सामान्य भाव है। हम सेक्स को हव्वा क्यों बना देते हैं? यह बात मेरे समझ में नहीं आती।‘‘

अपने भीतर उग आए डर को नकारती हुई किसी भी स्थिति से दो चार होने के लिए मैं अपने भीतर नाखून उगाने लगी थी। कहीं पढ़ा था महिलाओं को पर्स में पिसी मिर्च रखनी चाहिए। काश मैंने भी रखा होता! क्या जाने उसकी नौबत आ ही जाए।

‘‘यह क्या है? कभी जल गई थीं क्या डॉ. सुनीता?‘‘डॉ. डिमरी ने मेरी कलाई में उस जगह उंगली गड़ा दी जहाँ जन्म से ही काला लक्षण है।

‘‘नहीं यह तो जन्मजात है।‘‘.....क्यों इस आदमी को झेले जा रही हो? क्यों नहीं सीधे-साीधे कह पातीं आप अपने कमरे में जाएँ प्लीज़। मेरे भीतर से सुन्नी बोल रही थी लेकिन डॉ. सुनीता ऐसा कैसे कह सकती थी? डॉ. डिमरी क्या सोचते ‘रह गई घरेलू की घरेलू। ऐसी पढ़ाई का क्या लाभ?‘

मेरा घर का नाम सुन्नी है। मैं बचपन से बहुत साफ़ बोलने वाली हूं। किन्तु नौकरी करके जाना कि सुन्नी किसी को कुछ भी बोल सकती है, डॉ. सुनीता नहीं। अपना बहुत कुछ छिपाना भी पड़ता है।

‘‘काॅफ़ी पिएँगी डॉ. सुनीता? नीचे से काॅफी मंगाई जाए।‘‘ और बिना मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए वह साइड टेबुल पर रखे फोन से रिसेप्शन का नंबर डायल करने लगे थे।

‘‘आप की लव मैरेज़ है या अरेंज्ड?‘‘रिसीवर सेट पर रख कर वह फिर अपनी पुरानी मुद्रा में आ गए थे।

‘‘अरेंज़्ड है।‘‘

‘‘मेरी भी अरेंज़्ड है।‘‘ उन्होंने लंबी साँस खींची,‘‘वैसे आप लोगों में ट्यूनिंग तो है न?‘‘

‘‘मतलब?‘‘ प्रश्न का आशय मैं समझ गई थी फ़िर भी अनजान बनते हुए पूछा।

‘‘मतलब आपके पति आपकी भावनाओं को समझते हैं न?‘‘

‘‘जी हाँ कोई परेशानी नहीं है।‘‘

‘‘आपको अकेले सेमीनार के लिए भेज दिया इसी से मालूम पड़ता है बड़े प्रोग्रेसिव हैं।‘‘

अब मैं निरुत्तर थी। अपने पति के बारे में बन आई उनकी धारणा मैं ध्वस्त नहीं करना चाहती थी। कितनी मुश्किल से मैं उनको राजी कर सकी थी, यह क्या जानें!

‘‘एक मेरी श्रीमती जी हैं किताबें उन्हें कूड़ा नज़र आती हैं।‘‘

‘‘वह क्यों?‘‘

‘‘पढ़ी लिखी जो नहीं हैं। छोटी उम्र की शादी का खामियाज़ा भुगत रहा हूँ। समझने वाला पार्टनर मिल जाए तो ज़िंदगी सँवर जाती है वरना.....‘‘.आगे बोलने की बजाय उन्होंने हाथ नकारात्मक मुद्रा में हिलाए।

‘जी हाँ वह तो है‘ मैंने उनकी बात का समर्थन किया।

लड़का काॅफी दे कर जा चुका था। ‘काॅफी पी कर नींद नहीं आएगी‘ मैं कहना चाहती थी, किन्तु चुपचाप मग हाथ में पकड़ लिया।

डॉ. जोशी काॅफी मग हाथ में पकड़े अपने भीतर डूबे हुए थे। शब्द किसी दूसरे लोक से आते लग रहे थे। ‘‘विश्वास बहुत बड़ी चीज होती है डॉ. सुनीता। कहने को हम स्त्री-पुरुष हैं लेकिन हमारा वैचारिक स्तर समान है। हम एक साथ एक बिस्तर पर रात बिता दें तो भी कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। पत्नी के सामने मैं किसी महिला मित्र से बात भी नहीं कर सकता। इतनी शंकालु है वह! आप का आत्मविश्वास मुझे पसन्द आया थैंक यू डॉ. सुनीता।‘‘

काॅफ़ी मग साइड टेबुल पर रख कर वह पैर लटका कर बैठ गए थे और जूता पहनने लगे थे। उनके जाते ही दरवाजे की कुंडी चढ़ा कर मैं धम्म से बिस्तर पर लेट गई। उनकी उपस्थिति की असहजता से मैं अभी तक आक्रान्त थी। लाइट बुझाए बिना मैं सोने का उपक्रम करने लगी।

सोचा था खूब देर तक सोऊँगी किन्तु पाँच बजे फ़ोन की घंटी बजी तो उठना ही पड़ा। फ़ोन डॅा़ डिमरी का था। मैंने अत्यन्त अप्रसन्नता में ‘हॅलो‘ कहा। ‘‘मुझे माफ़ करना डॉ. सुनीता मुझे कल तुम्हारे कमरे में पी कर नहीं आना चाहिए था। मैंने तुमसे क्या बकवास की मुझे कुछ याद नहीं है। साथ नाश्ते पर चलोगी तो समझूँगा तुमने मुझे क्षमादान दे दिया।‘‘

‘‘गुड माॅर्निंग कैसी हैं आप?‘‘ 

ख्यालों में खोई मैं डॉ. डिमरी की आवाज़ से चैंक गई हूं। वह कब मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए जान ही नहीं पाई।

‘‘मैं अच्छी हूँ सर।‘‘

‘‘फिर सर।‘‘

‘‘कहने दीजिए सर इसमें सहूलियत है।‘‘ मेरे भीतर की सुन्नी खुश हो रही थी। चल ‘सर‘ ‘अंकल‘ एक ही बात है।  



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