Monday, November 23, 2009

विलुप्त होती भाषा बोलियां


 विलुप्त होती भाषा बोलियों की चिन्ता जिस तरह से अनुवादक यादवेन्द्र जी को दुनिया भर के रचनात्मक साहित्य तक जाने को मजबूर करती है, पत्रकार अरविंदशेखर  की वैसी ही चिंताएं तथ्यात्मक आंकड़ों के रुप में दर्ज होते हुए हैं। प्रस्तुत है विलुप्त होती भाषा बोलियों पर अरविंद शेखर  की रिपोर्ट । 


वक्त की अंधी सुरंग में गुम हो जाएगी राजी बोली 

अरविंद शेखर, देहरादून
किसी भी भाषा बोली के बचे रहने की गारंटी क्या होती है, यह कि उसकी भावी पीढ़ी उसको बोले। मगर उत्तराखंड की सबसे अल्पसंख्यक राजी जनजाति की राजी बोली वक्त की अंधी सुरंग में गुम हो जान वाली है। वजह साफ है उसके 20 प्रतिशत बच्चे अपनी बोली में बातचीत करना ही पसंद नहीं करते क्योंकि वे समझते हैं कि अपने पूर्वजों की बोली की बजाय कुमाऊंनी बोलना ज्याद फायदेमंद है। 60 प्रतिशत लोग अपनी बोली के प्रति बेपरवाह हैं, जबकि केवल 20 प्रतिशत को अपनी बोली में बात करना भाता है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में राजी या वनरावतों की आबादी महज 517 है। यह छोटी-सी खानाबदोश जनजाति नेपाल की सीमा से सटे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों में रहती है। इसके महज पांच फीसदी लोग ही साक्षर हैं। ऐसे में राजी बोली का केवल मौखिक रूप जीवित है। हाल में ही दून आईं लखनऊ विश्वविद्यालय की रीडर डा. कविता रस्तोगी का सर्वेक्षण इस बोली के अंधेरे भविष्य की ओर संकेत करता है। डा.रस्तोगी के सर्वे के अनुसार 90 प्रतिशत राजियों का मानना था कि राजी बोलने से कोई फायदा नहीं, जबकि 60 फीसदी को अपनी जबान से कोई मतलब ही नहीं था। 26 से 35 साल के 65 फीसदी तो 16 से 25 साल के 60 फीसदी युवाओं को अपनी भाषा में बोलना पसंद नहीं। 26 से 35 साल के 40 प्रतिशत लोगों को अपनी भाषा संस्कृति पर कोई गर्व नहीं तो, 16 से 35 साल के 80 फीसदी तो 36 से 45 साल के 70 फीसदी राजी नहींमानते कि राजी बोलना अच्छा है। डा. रस्तोगी के मुताबिक दरअसल राजी लोगों में धीरे-धीरे अपनी भाषा-संस्कृति के प्रति हीनताबोध घर कर रहा है। इसलिए वे धीरे-धीरे कुमाउंनी या हिंदी पर निर्भर होते जा रहे हैं। राजी लोग अपनी बोली का 84 फीसदी इस्तेमाल धार्मिक कर्मकांड के दौरान ही करते हैं। बोली का घरों में 75 फीसदी तो दूसरे स्थानों पर केवल 30 फीसदी ही इस्तेमाल होता है। राजी बोली पर देश में पहली पीएचडी करने वाले भाषा विज्ञानी डा. शोभाराम शर्मा का कहना है कि किसी भी भाषा बोली के जिंदा रहने के लिए उसके बोलने वाले समाज का उसके प्रति झुकाव और उसकी भौतिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। उन्होंने बताया के पिछली कांग्रेस सरकार ने राजी जनजाति पर संकट भांपते हुए जनजाति के लोगों को ज्यादा संतान पैदा करने पर पुरस्कृत करने और सुविधाएं मुहैया कराने की घोषणा की थी लेकिन उसका क्या हुआ पता नहीं। जिन भाषाओं में जीविका का जुगाड़ नहीं होता वे मर जाती हैं। राजी बोली का खत्म होना देश ही नहीं दुनिया की अपूरणीय क्षति होगा। सरकार को चाहिए कि वह भाषाई विविधता की रक्षा के लिए राजी जनजाति और उनकी बोली के संरक्षण के लिए प्रयास करें।


7 comments:

Pradeep Jilwane said...

बोलियों को बचाकर ही भाषा को बचाया जा सकता है. कुछ इसी तरह की फिक्र इधर भी निमाड़ी-मालवी को लेकर है. इस दिशा में कुछ सार्थक प्रयास भी हो रहे हैं. लगातार बोलियों में समर्थ साहित्‍य की रचनाएं सामने आ रही है. इस दिशा में किसी बड़ी पहल की जरूरत है.

अजेय said...

बहुत कठिन होगा इन बोलियों को बचा पाना. मुझे मेरी अपनी बोली की चिंता करते करते दशकों बीत गए. कुछ नही किया जा सकता. सिवा डॉक्युमेंटेशन के. ज़िन्दा तो नहीं बच पाएगीं ये बोलियाँ. मामला इमोशनल ज़रूर है, लेकिन इस का क्या हो कि हम अपनी बोलियों को ले कर उत्सुक ही नहीं हैं. ठीक भी है प्रयोजन क्या है?

sanjay vyas said...

तेज़ी से मेल्टिंग pot में बदलती दुनिया में सब कुछ एकमेक हो रहा है. ऐसे में बचेगा वही जो किसी न किसी आर्थिक हित से जुड़ा हो.
संभव है किन्हीं अलग थलग कोनों में बचा रह जाय कुछ.

Himachal Mittra said...

यह तो कुछ ऐसी बात है कि कोई गाड़ी किसी जीव को कुचल गई हो और वह सड़क पर मरणासन्‍न पड़ा हो. और हम दूसरी गाड़ी पर सवार, उस घायल प्राणी पर अपनी जजमेंट देते हुए आगे निकल जा रहे हैं. पत्‍ते हर पेड़ से झड़ते हैं, पेड़ ठूंठ हो जाते हैं, यह कुदरती तौर पर हो तो दिल पर चोट हल्‍की लगती है. अकाल मृत्‍यु का सदमा भारी होता है. सोचा जाए कि बोलियां और भाषाएं अकाल मृत्‍यु की शिकार हैं, उनका गला घोंटा जा रहा है या स्‍वाभाविक मौत मर रही हैं.
पहाड़ी में बोलते हैं अग्‍गैं दौड़ पिच्‍छें चौड़. सभ्‍य नागरिक के तौर पे कहीं हम अपने अतीत से हाथ झाड़ने की जल्‍दबाजी तो नहीं कर रहे. -अनूप सेठी

अजेय said...

सही कह रहे हैं अनूप भाई.ham sab emotional hain is baat ko le kar. लेकिन सॉल्युशन क्या है?
# साहित्य रचें ? कितनी भाषाओं में?
# संविधान मे मान्यता दिलवाएं?कितनी बोलिओं को?
और उस से क्या होगा? हम जैसे लोग तमगे लटकाए फिरॆंगे.बोलियँ तब भी न बचेंगी.
# मराठी भाषियों की तरह आन्दोलन(?) करें?

और बड़े भाई, मृत्यु अकाल कैसे हो सकती है? वह जब आ ही गयी तो सीधा सा मतलब है कि काल आ गया था.
आप के बलॉग पे लिखा था मैं ने - गलियो,बज़ारों मे जो भाषाएं विकसित हो रही है, कितनी ज़िन्दा हैं! मैं तो उन्हे देख् कर विस्मित, हर्षित हूँ. अपनी प्यारी पटनी बोली का रोना रोता फिरूं ,इस से कहीं बह्तर ये होगा इन नई भाषाओं का इस्तेमाल करना सीखूँ.

विजय भाई, अपनी मातृ भाषा पटनी बोली के बारे बता दूँ कि आज की तरीख मे मेरी और मुझ से पिछली पीढ़ी में लग भग 10-12 हज़ार लोग आदिम भाषा को समझने वाले हैं. लेकिन इसे नियमित व्यवहार मे लाने वाले दो अढ़ाई हज़ार भी नहीं रह गए हैं.अगली पीढ़ी के बारे मेरा अनुमान है कि इस की हैसियत् कूट भाषा जैसी हो जाएगी. मतल्ब यह तभी बोली जाएगी, जब आप थर्ड पर्सन से बात शेयर नही करना चाहेंगे.
तो डॉकुमेंटेशन ही न ? कि भईया हमारे टाईम मे ये चीज़ें हुआ करती थीं.और वह भाषाविदों का काम है , लगे हैं विद्वान लोग.(सरकारी मदद से!)
बाकी संजय पते की बात कह रहे हैं. बड़ा महँगा काम है भाईयो , बोलियाँ ही क्यों, लोक मे बिखरी ऐसी बे शुमार नैमतों क खज़ाना बचा पाना.हम् से अफोर्ड न होगा.
अपनी कविता मे भी कितना बचा लेंगे हम ? यहाँ स्वयम कविता को बचा पाना एक चुनौती है.

Svetlana said...

considering that hindi in itself is almost dying in some ways and looking at the quality of english we speak, english won't really come alive as a language. we'll probably hang mid-air with a half-baked language. now, if that is the scenario of the languages we use daily, who will think about some dialect in some corner of the country.
at the same time, if we take the death of a language/dialect as a parameter reflecting the socio-politcal-economic negligence meted out to that given region; yes, perhaps then, we indeed should be worried.

Sunitamohan said...

bhasha ko bachaye rakhne ki ye chinta Anuj Johsi G ki lagbhag sabhi filmon me bhi apni upasthiti darshati hai, aur uska samadhan yahi hai ki boli bhasha ko bachaye rakhne ke liye uske documentation se jyada zaruri, use bolne valon ki hai, hum srinagar cross karte hi garhwali bhool jate hain, Tyuni vikasnagar Cross karte hi, Bangani- Jaunsari bhool jate hain, yahan tak ki gaon me pale badhe bachche bhi shahar me aane par apni mool bhasha ko bolne me asahaj mahsoos karte hain, maamla puri tarah se bhavnatmak hi hai, isliye ilaz bhi bhavnaon me hi chhipa hai, boli ke prati prem aur samman ka bhav! apne bachchon ko gaon zarur le jayen, unme gaon k prati prem aur samman jagayen aur unse apni boli me baat karen, varna aane vale samay me......Aaj jivit prateet hoti boliyan bhi kal vilupt hone se nahi bachengi.