Monday, January 18, 2010

और बुक हो गये उसके घोड़े-5

पिछले से जारी

यह फिरचेन ला का बेस है। हम संभवत: तेरह साढ़े- तेरह हजार फुट की उंचाई पर होंगे इस वक्त। सेरिचेन ला का बेस भी यही है। यही से दक्षिण पश्चिम दिशा की ओर फिरचेन ला और दक्षिण पूर्व दिशा की ओर दरिया के पार डोक्सा के नजदीक से जा सकते हैं सेरिचेन ला। सेरिचेन को पार कर कारगियाक नाम्बगिल के गांव पहुंच सकते हैं ओर फिरचे को पार कर गोम्पेल के गांव तांग्जे जा सकते हैं। धूप चारों ओर बिखरी हुई है चौरू ओर याक घास चरने में मस्त हैं। हवा का बहाव इतना ज्यादा है कि टैन्ट खड़ा करना मुश्किल हो रहा है। छोटी छोटी घास के साथ साथ पीले, बैंगनी और कहीं कहीं लाल सफेद फूल भी दिखायी पड़ रहे हैं। हरे पत्तों के झुण्ड वाले चौलाई की तरह के दानों वाले पौधे हैं। जिनके दानों वाले हिस्से का रंग लाल है। यह औषधीय पौधा है, नाम्बगिल बताता है, जोड़ों के दर्द में इसका अर्क पीने से आराम मिलता है। स्थानीय नाम आसी है। तीन महीने अपने जानवरों के साथ यहां रहने के बाद घास काटने में लग जाएंगे जांसकर वाले--- जो बाकी के छह महीने जानवरों को खिलायी जा सकेगी।
फिरचे के बेस में शाम सात बजे के आस पास मौसम अचानक खराब होना शुरू हो गया। उससे पहले तक चमकती धूप को देखकर मौसम के इस तरह खराब हो जाने की कल्पना नहीं की जा सकती थी। बादल घिर गये। बिजली चमकने लगी। आश्चर्य जनक घटना देखने मे आयी, बिजली लगभग 15 से 20 सेकेण्ड तक चमकती थी लेकिन बिजली के चमकने के बाद जो सड़क सुनायी देती है, सुनायी नहीं दी। लगभग दो घन्टे तक मौसम ऐसे ही रहा थोड़ी थोड़ी देर बाद बिजली चमक जाती थी। इसी दौरान एक मजेदार दृश्य और लगा। यू तो हम जानते ही हैं कि सिंथेटिक कपड़ों में विद्युत आवे्श होता है। पर यहां जो विद्युत आवे्श पैदा हो रहा था उसकी बात ही और थी। हमारी उंगलियों के पोर जिस भी कपड़े पर या कैरिमेट पर जो कि सिंथेटिक ही थे हल्की सी रगड़ खाते वहां तेज रोच्चनी दिखायी देती। थोड़ी देर तक हम रो्शनी की नदी बहाते रहे।
अगले रोज जब फिरचे की ओर चलना शूरू हुए मौसम यू तो साफ ही लग रहा था पर धूप नहीं थी। विदेशी टीम के कुछ साथियों की तबियत खराब हो गयी थी इसलिए वे बेस में ही रूक गये ।हम कुछ ही दूर चले होंगे कि बूंदा-बांदी शुरू हो गयी। मौसम खराब होने लगा। फिरचे पर बर्फ नहीं--- पुरनै से डोक्सा तक आया एक व्यक्ति कह रहा था। पुरनै से यह व्यक्ति किसी विदेशी टीम से मिलने आया है यहां। विदेशी टीम डोक्सा पार की पहाडियों पर चोटियों में चढ़ने के अभियान में मशगूल है। इंग्लैण्ड से आयी यह टीम पुरनै में "विकास कार्य" करना चाहती है। इसी संबंध में पुरनै वाले इस व्यक्ति को यहां बुलाया गया था--- उसी ने बताया।
फिरचेन लम्बा पास है। यदि इस पर बर्फ हो तो शायद इसे पार न किया जा सके। यही वजह है फिरचेन ला ट्रैक का समय जुलाई के आखरी सप्ताह के आस पास रखा जाता है ताकि बर्फ कम हो जाए। भूल भुलैया वाले, तीखे धरों वाले इस पर बेस से टाप तक जाने में हमें पांच घंटे लगे। यह स्थिति तब है जबकि बर्फ किनारों पर ही है। बीच रास्ते में नहीं। यदि सारे मार्ग में बर्फ ही बर्फ हो तो अनुमान लगा सकते हैं कि कितना समय लगता। इसी लिए बर्फ के रहते इसे पार करने का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता। नीचे से ही जो मौसम खराब होना शुरू हुआ उपर आते आते तक बुरी तरह से बिगड़ चुका था। उपर बर्फ पड़ने लगी थी। कोहरा छा गया था । अपने से लगभग 20 मीटर की दूरी पर चल रहे साथी को भी हम देख नहीं पा रहे थे। यही कारण है कि टॉप पर पहुंचने से पहले उबड़ खाबड़ चढ़ाई भरे रास्ते पर मैं और मेरा साथी सतीश पीछे रह गए। हम लगभग 17500 फुट की ऊंचाई पर थे। सांस लेने में भी दित हो रही थी। हम दोनों से लगभग 20-30 मीटर आगे अनिल काला था जो अचानक ही दृश्य से गायब हो गया। कोहरा इतना घना हो गया कि कुछ भी दिखाई न दे रहा था। हमने उसे पुकारा तो कोई प्रत्युत्तर सुनाई न पड़ा। अनजानी आशांका न हमें घेर लिया। जोर-जोर से आवाज लगाकर हम अपने अदृश्य साथियों को पुकारने लगे। पुकारते रहे और आगे बढ़ते रहे। जमीन में हल्का गीलापन बिखरने लगा था। हम साथियों के पद चिह्न खोजने लगे। तभी हमें काला के जूतों के निशान और अन्य साथियों के जूते के निशान भी दिखाई दिये। किसी निर्जन में जूतों की छाप कैसी राहत देती है, इसे उस वक्त ज्यादा नजदीकी से महसूस कर सकते थे। जूतों की छाप से हम अपने साथी की तस्वीर गढ़ सकते थे। हमारे जूतों के तल्ले एक दूसरे साथी की निगाहों में हमारी तस्वीरें गढ़ते हैं। उन तल्लों की छाप पर ही हम आगे बढ़ने लगे। कुछ ही दूर चले होंगे कि छोरतेन में टंगे कपड़ों की झण्डियों की झलक दिखाई दी, फिर गायब। हमें विश्वास हो गया कि हम सही रास्ते पर हैं और टॉप के नजदीक पहुंच चुके हैं। टॉप के बारे में मेरी धारणा थी कि बौद्ध लोग टॉप में मौने और छोरतेन बनाते हैं, कपड़ों की झण्डियां लटकती रहती हैं। इसी धारणा के आधार पर हम टॉप की पहचान कर पाते हैं। नही तो फिरचे हर एक धार के बाद टॉप होने का भ्रम पैदा करता पास है। मौने के एकदम नजदीक पहुंचने पर हमने देखा कि हमारे बाकी साथी वहां पहले से पहुंचे हमारा इंतजार कर रहे हैं। बरसातियां हमने ओढ़ी हुई थी लेकिन पिट्ठु ही भीगने से बच पा रहे थे। पास पर तेज ठंडी हवा चल रही थी। पहने हुए कपड़े पूरी तरह से भीग चुके थे। बहती हुई ठंडी हवा में थोड़ी देर भी रूकने का मतलब था कि अपने भीतर की उर्जा को खत्म करना। लगभग 10 मिनट सांस लेने के बाद बरसाती ओढ़े हुए ही नीचे उतरना शुरू किया। नीचे काफी तेज ढलान थी। तेज धार वाली ढलान पर उतरते हुए घुटनों पर भारी बोझ पड़ रहा था। यदि इस पूरी ढलान पर बर्फ होती तो ज्यादा सचेत होकर उतरना पड़ता क्यों कि इसके साथ साथ ही गहरी खायी दिखायी दे रही थी। वैसे कोहरा घिरा होने की वजह से इस वक्त चलना बर्फ में चलने से ज्यादा कठिन था। फिरचे पर मौसम इतना खराब था कि फोटो नहीं खींचे जा सकते थे। सिर्फ दो चार मीटर के फासले पर ही हमारी आंख देख पाने में सक्षम थी फिर कैमरे की आंख से क्या देखा जा सकता था?
जिंकचेन से थोड़ा नजदीक ही रूके हम। फिरचे आकर्षित कर रहा है। खराब मौसम चुनौती है हमारे लिए जो भविष्य तक बनी रहेगी जब तक दूर तक फैले इस पास को जी भर कर न देख लें। फिर भी बर्फ से भरे फिरचे को पार करना तो हमारे लिए चुनौती बना ही रहेगा। बर्फ से भरे फिरचे की कल्पना मुझे और ज्यादा आकर्षित कर रही है। बर्फ से भरे इस पास पर भटकने और खाईयों में फंस जाने का भय मेरे अंदर सिहरन पैदा कर रहा है। जिंकचेन से आगे का मार्ग यूं हल्की चढ़ाई उतराई का ही है पर पहाड़ की वो धार जहां से जांसकर दिखायी देने लगता है वहां से एक दम नीचे सीधी उतराई उतरनी होगी। यूं कह सकते हैं हम इस वक्त तांग्जे की छत पर हैं जो लगभग 14000 फुट की उचांई पर होगी। जांसकर वैली के ज्यादातर गांव यहां से दिखायी दे रहे हैं। जैसे पीछे की ओर खीं, थांसो और सामने की ओर तांग्जे, कुरू, त्रेस्ता। लगभग 11500 से 12000 फुट की उचांई पर ही यह सारे गांव हैं। यहां से नीचे उतरने के लिए पथरीली चट्टान है। वासुकी ताल से केदार नाथ उतरते हुए तीखी ढलान है जैसी- उससे कहीं ज्यादा सीधी है यह चट्टान। यदि जांसकर घाटी की चट्टान से इसका ज्यामितिय कोण नापा जाए तो लगभग 80 डिग्री से कम नहीं होगा। वासुकी से केदार नाथ इतना सीधा नहीं। फिर वासुकी से नीचे उतरते हुए घास ही घास है। जिस पर उतरते हुए घुटनों में दर्द तो हो सकता है पर जान का उतना जोखिम नहीं जितना चहां दिखायी दे रहा है। यहां वनस्पति नाम की कोई चीज मौजूद नहीं है। पत्थर ही पत्थर हैं जो आपके पैर से फिसल कर नीचे उतरने वाले साथी के लिए भी खतरनाक हो सकते हैं। दृष्टि एकाग्रचित रहे, शरीर पर नियंत्रण रहे और कन्धों पर झूलते पिट्ठू को यदि पत्थरों पर टकराने से रोका जा सके तो ही उतरा जा सकता है। इतनी सावधानी के बाद भी कहीं कहीं चट्टानें इतनी लम्बी हैं कि पांव को नीचे लटका कर बड़ी ही सावधानी से कूदना पड़ रहा है। ऐसी ही अलग अलग जगह पर हम में से कोई न कोई फंसा ही है लेकिन जैसे तैसे एक दूसरे को दिच्चा और सहारा देते उतरते रहे। बांस की सीढ़ी में उतरते हैं जिस तरह कहीं कहीं तैसे ही चट्टान की ओर मुंह कर उतरना पड़ा। अभी तक के रास्तों में यह सबसे ज्यादा कठिन रास्ता है। अब जबकि तांग्जे एक दम नजदीक है। लगभग 2000 फुट नीचे इसी तरह उतरना पड़ा। इस रास्ते के अलावा हाल ही में तांग्जे वालों ने दूसरा रास्ता बनाया है जो कहीं और से जाता होगा, जिसके बारे में न तो हमें मालूम था और न ही नाम्बगिल को। नीचे उतरने के बाद एक बार निगाह ऊपर डाली तो आंखें फटी रह गयी। सीधी चट्टान जिससे उतरे हैं हम। ऊपर से ही जन जीवन का एहसास होने लगा था ऊपर के गांवों के आस पास जो हरियाली दिख रही थी, जिनमें एक लहर सी चलती हम देख रहे थे, वे गेंहू के खेत हैं।

6 comments:

मनोज कुमार said...

रचना अच्छी लगी।

Kishore Choudhary said...

रोचक
सफ़र आपका इतना तेज है कि कुछ दृश्य बनते हैं और आप आगे लिए जाते हैं. जारी ही रखिये.

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प है ....जारी रखिये

विनीता यशस्वी said...

humesha ki tarah hi shandaar...

अजेय said...

कुछ प्रोपर् नाऊंज़ विजय भाई, पाठ बधित होता है. वर्तनी ठीक कर दीजिए.

henry J said...

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