Friday, May 13, 2011

अक्लांत कौरव



अरविंद शेखर
      ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महाश्वेता देवी साहित्य-प्रेमियों के लिए कोई अनजाना नाम नहीं है। उत्पीडित, वंचित और शोषित लोगों के लिए सहानुभूति से भरा उनका लेखन स्वयं में एक मिसाल है। अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत जनता के संघर्ष को प्रमाणिकता के साथ, सटीक ढंग से प्रस्तुत करने में सफल रही है।
        अक्लात कौरव लघु उपन्यास उनकी अन्य प्रसिद्ध कृतियों जंगल के दावेदार, टैरोडिक्टल, 1084वें की मां, शालगिरह की पुकार पर, मास्टर साहब, श्रीश्री गणेश महिमा के क्रम में ही आता है। महाश्वेता देवी लगातार आदिवासी समाजों से जुडी रही है और उनके बीच कार्य करती रही हैं। उनके अन्य उपन्यासों की तरह अक्लात-कौरव के केंद्र मे पश्चिमी बंगाल का अत्यंत पिछडा इलाका चौबीस परगना और उसके आस-पास के क्षेत्र का आदिवासी समाज है।
        इस उपन्यास की कथा जायज संघर्षो में हारे लोगों की कहानी है जो स्वयं को संघर्ष के लिए पुन: तैयार कर रहे हैं। कहानी का समय सत्तर के दशक के नक्सलवादी आंदोलन के बाद का है। जबकि आंदोलन के असफल होने का बाद पश्चिम बंगाल में सी।पी।एम। के नेतृत्व वाला वाममोर्चा सत्तारूढ हो चुका है। यह उपन्यास बताता है कि किस तरह सत्तारूढ होने के बाद वाममोर्चा अपने प्रमुख चुनावी वादे भूमि-सुधर को पूरा करने में असफल ही नहीं हो जाता बल्कि यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश भी करता है। यही नहीं जनदबाब बढ़ने पर वहां की भूमि सुधर के नाम पर सिपर्फ छोटी जमीन के मालिकों को ही छेड़ा जाता है। जबकि बड़े जमींदार क्योंकि पाला बदलकर अब सी।पी।एम। को चंदा देने लगे है अत: पार्टी नेतृत्व उन्हें पूरा-पूरा संरक्षण देता है। परिवर्तन के नाम पर चुनाव जीत कर सत्ता में आई सरकार के यहां ग्राम जीवन में भी कोई परिवर्तन नहीं होता है, बल्कि पुराने संपत्ति-शाली वर्ग की सत्ता ही कायम रहती है। बदलता है तो सिर्फ झंडा- तिरंगे के स्थान पर लाल। लेखिका के शब्दों में- ''चूड़ामणि जैसे लोग समाज के प्रतिष्ठित अंग है। सरकारें आती है, सरकारें जाती है, चूड़ामणियों का कुछ नही बिगड़ता ।" निर्वाचित प्रतिनिधि सामंत पर टिप्पणी करते हुए वह कहती हैं-''शासकदल के निर्वाचित नेता के तौर पर सामंत जागुला में सभी को दबा कर रख सकते है, कलकत्ता में वह संभव नहीं है। जागुला के विरोधियों से सामंत नहीं डरता। गुप्त समझोते में उन्होंने जागुला का बंटवारा उसके नाम पर कर दिया है। वास्तव में शहर, अभी उनके गुण्डे-मस्तान-ठेकेदार-व्यापारियों के कब्जे में है। इस शासन से सभी खुश है। मनमाना मुनाफा लूटा जा रहा है, मनमानी गुंडागर्दी चल रही है। मनमानी कीमतें बढाई जा रही है, कालाबाजारी जोरों पर है। इसके बाद भी इस शासन का पतन कौन चाहेगा, क्यों चाहेगा सामंत सोच भी नहीं पाता।"
        अक्लांत कौरव की कथा छोटी सी, परन्तु बहुत सी कड़वी सच्चाईयां उजागर करती है। इस कथा का नायक इंद्र सी।पी।एम। का एक ईमानदार कैडर है। वह पहले मजदूर संगठन में कार्य कर चुका है तथा अब ग्रामीण क्षेत्रा में कार्य करना चाहता है। लेकिन जब वह आदिवासी संथालों के बीच पहुंचता है तो पाता है कि भूमि सुधर का आपरेशन बर्गा लुंज-पुंज ढंग से चल रहा है। यहां तक कि उनकी पार्टी का निर्वाचित प्रतिनिधि सामंत भी आपरेशन बर्गा को सफल नहीं होने देना चाहता। और उसने भ्रष्ट पुलिस और प्रशासन से भी एक नापाक गठजोड़ कायम कर लिया है। इस सबके चलते अपने अधिकारों और मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित ग्रामीणों की हालात बद से बदतर हो गयी है। ये वे ही आदिवासी है जिनकी संघर्ष की एक लम्बी परंपरा रही है। विरसा मुंडा, सिंधु कानू के ये वंशज अपना संघर्षशील चरित्र छोड़ दें इसलिए उनके बीच एक अध्येता बुद्धिजीवी द्वैपायन सरकार को प्रवेश कराया जाता है। द्वैपायन सरकार दिल्ली में स्थित विदेशी देशों से धन लेकर चलने वाले एक फाउंडेशन से संबंद्ध है। द्वैपायन सरकार आदिवासियों को कायरता तथा संघर्ष से विरत रहने का पाठ ही नहीं पढ़ाना चाहता बल्कि वह सिद्ध कर देना चाहता है कि संथाल एक डरपोक व लालची कौम है। परन्तु अपने इस षडयंत्र में वह सफल नहीं हो पाता, भले ही उसे सत्ताधरियों का पूरा सहयोग प्राप्त होता है।
        इंद्र को अपने प्रवास के दौरान नक्सलवाडी के दिनों के ईमानदार नेता कालीबाबू  के विषय में पता चलता है कि जिनकी सामंत की शह पर पुलिस ने निगर्म हत्या ही नहीं कर दी थी बल्कि इस तथ्य को छुपाने की पूरी कोशिश आज भी जारी है। इंद्र को इस पर सहसा विश्वास नहीं होता और व काफी समय तक वह सही गलत के अंर्तद्वन्द का शिकार रहता है। एक तरफ पार्टी के सिद्धांत और दूसरी तरफ नेतृत्व की काली करतूतें। पर अंत में उसका विश्वास गहरा होता जाता है। जब सामंत और पार्टी नेतृत्व उसे व उसके साथियों को संघर्ष से दूर रहने के लिए शांति का पाठ पढ़ाता है। यहां तक कि जब वह भूमिहीन मजदूरों के लिए मजदूरी की सरकारी दरें लागू करवाने हेतु आंदोलन करता है तो इस भटकाव कहा जाता है। और उसे उत्पीड़क पुलिस प्रशासन से सहयोग करने को कहा जाता है। इतना ही नहीं वरन जायज हकों की बात करने पर उस पर नक्सली होने जाने का आरोप लगाया जाता है। इस तरह वह अपने अंर्तद्वन्द से मुक्त होता जाता है और सच्चाई की राह पर अग्रसर होता जाता है। आदिवासी भी उस पर आसानी से विश्वास नहीं करते पर उसकी ईमानदारी तथा उत्पीडितों के प्रति पक्षधरता के कारण वे उसे पहचान लेते है, और जान लेते हैं कि वह उनका सच्चा हितैषी है।
        यही अक्लांत कौरव की कथा है जो धीरे-धीरे पश्चिमी बंगाल के बहुप्रचारित भूमि-सुधरों के ढोल की पोल खोलते हुए, सत्ताधरियों के चरित्र की बखिया उधेडते हुए आगे बढती है। बांग्ला से अनुदित होने के कारण संभवत: यह मूल उपन्यास का सा आनन्द न दे परन्तु अपने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तेवरों के कारण यह पठनीय ही नहीं अपितु संग्रहणीय है।

4 comments:

kainthola said...

Khareed kar padhna chahunga, kahan milegi

नीरज बसलियाल said...

बेशक , संग्रहणीय

Anonymous said...

ab samajh me aya cpm ka bangal me bura haal kyon hua

विजय गौड़ said...

Anonymous

8:12 PM (13 hours ago)

to me
Anonymous has left a new comment on your post "अक्लांत कौरव":

Great article and blog and we want more :)