Monday, July 4, 2011

याद आया "विचारधारा वाला पत्रकार"

अभिनव श्रीवास्तव की यह रिपोर्ट एक मित्र के मार्फ़त मेल से प्राप्त हुई। राजस्थान पत्रिका जयपुर में काम करने वाले अभिनव भारतीय जनसंचार सस्थान से पास आऊट हैं। पत्रकारिता के साथ साथ साहित्य में उनकी गहरी अभिरूचि है। अभिनव का आभार।
गाँधी शांति प्रतिष्ठान में शनिवार 2 जुलाई को दोपहर एक बजे से ही छात्रों,नौजवानों और मानवधिकार कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गयी थी. धीरे धीरे सभागार भरने लगा था और २ बजते बजते लगातार आ रहे  लोगों के लिए सभागार में खड़े  होने की जगह नहीं बची थी. यह मौका था उस पत्रकार को याद करने का जिसने बदलाव के सपने और चट्टानी इरादों  के साथ अपनी पूरी जिन्दगी को जिया. जिसने आदिलाबाद के जंगलों में फर्जी मुठभेड़ में आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा मारे जाने से पहले  दमनकारी होते राज्य की  नीतियों पर अपनी बेबाक कलम से लगातार हमले  किये . बात हो रही है पत्रकार हेम चन्द्र पाण्डेय की जिनकी पहली बरसी पर हेम चन्द्र पाण्डेय मेमोरियल लेक्चर सीरीज की शुरुआत की गयी. यह शुरुआत जनता के पत्रकार हेम चन्द्र पाण्डेय के सपने को जिन्दा रखने का प्रयास भी था और गंभीर चर्चा के माध्यम से हेम जैसे मीडिया एक्टिविस्टों की लड़ाई को समझने का भी.यही कारण था कि सीरीज का पहला लेक्चर जनपक्षीय पत्रकारिता और मीडिया एक्टिविजम के रिश्ते जैसे विषय पर आधारित था. प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता सुमंता बनर्जी ने अपनी मुख्य वक्तृता में हेम चन्द्र पाण्डेय की हत्या का उदहारण लेकर भारतीय राज्य में पत्रकारों की सुरक्षा, पुलिसिया राज के  कारण लगातार प्रभावित होती पत्रकारीय स्वतंत्रता जैसे मुद्दों के माध्यम से कई महत्वपूर्ण सवाल उठाये. उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान मीडिया का आर्थिक ढांचा  ऐसा है कि यह  पूरी तरह  लाभ लेने वाली संस्था बन गयी है.जब एक संचार मीडिया का उद्देश्य ज्यादा ज्यादा लाभ कमाना हो तो वह लोगो को राजनीतिक रूप से शिक्षित करने की भूमिका  से बहुत दूर होती चली जाती है. इस तरह का मीडिया  सरकारी योजनाओ की पोल खोलने वाले पत्रकारों को सुरक्षा नहीं दे सकता.  भारत में  मीडिया एक्टिविजम के भविष्य पर
बोलते हुए बनर्जी ने कहा कि मीडिया एक्टिविजम के स्वरूप को और अधिक संगठित बनाने की जरुरत है. इसके बिना कोई व्यापक हस्तक्षेप नहीं हो सकता.अरुंधती रॉय ने भारतीय राज्य के लगातार होते सैनिकीकरण पर चिंता जताते हुए बोला  कि बेशक हम सैधांतिक तौर पर लोकतंत्र हैं लेकिन आज भारतीय राज्य  में एक भी ऐसी लोकतान्त्रिक संस्था नहीं है जिसमे जाकर एक आम आदमी
न्याय की उम्मीद कर सके. अरुंधती के विचार में लोकपाल बिल को पास कराने की आड़ में कई महत्वपूर्ण मुद्दों को छिपाया गया.

साहित्यकार मंगलेश डबराल ने इस बात जोर दिया कि जब तक छोटे छोटे स्तर पर चल विरोधों को संगठित  नहीं किया जायेगा तब तक  कोई भी विचार हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं पहुंचेगा . बाजार के ही विचार माने जाने वाली मान्यता पर भी उन्होंने सवाल उठाये. उन्होंने कहा कि  मीडिया का आकार में लगातार विस्तार होने के बावजूद फलक पर सच दिखाई नहीं देता.यह अफ़सोस जनक
स्थिति है. मीडिया विश्लेषक आनंद प्रधान ने भारतीय राज्य के दमनकारी चरित्र पर जमकर बरसे और मीडिया की वर्तमान आर्थिकी में विलुप्त होते पत्रकार संघो को पत्रकारों की खराब हालत के लिए जिम्मेदार बताया. उन्होंने  अखबार के मालिको  द्वारा इस बात का प्रचार किये जाने पर  आश्चर्य व्यक्त किया कि वेज बोर्ड लागू होने के बाद आर्थिक भार के कारण अखबार बंद हो जायेंगे.  कवी और पत्रकार नीलाभ ने माना कि पत्रकारों की आर्थिक स्थिति का खराब होना उनको सच कहने और लिखने से रोकता है.सत्ता और संरचना जान-बूझकर ऐसी स्थितियां बनाती है जिससे पत्रकार सच लिखने में असमर्थ हो जाये. संजय काक ने वैकल्पिक पत्रकारिता को मजबूत बनाये जाने पर जोर दिया. काक ने मुख्य धारा पत्रकारिता के समान्तर खड़ी हो रही वैकल्पिक पत्रकारिता को सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे उठाने का सशक्त माध्यम बताया. संजय ने वैकल्पिक पत्रकारिता की ताकत को नए सिरे से समझने की जरुरत पर बल दिया.  हेम के याद करते हुए पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्त्ता भूपेन सिंह द्वारा सम्पादित किताब "विचारधारा वाला पत्रकार" का विमोचन भी किया गया.
विमोचन हिंदी मासिक हंस के संपादक  राजेंद्र यादव ने किया. किताब के एक लेख में हेम चन्द्र पाण्डेय की पत्नी बबिता उप्रेती ने हेम को याद करते हुए लिखा है कि कुछ लोगों की मौत पर्वत से भी ज्यादा भारी और कुछ की पंख से भी हलकी होती है. जनता के पत्रकार हेम की मौत वाकई पर्वत से भी ज्यादा भारी थी

1 comment:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

इस समझौते के समय में हेम जैसे पत्रकारों का होना उम्मीद का होना है...उन्हें सलाम!