Friday, January 27, 2017

स्वामी श्रॄद्धानन्द की अद्भुत आत्मकथा (२)



    बनारस कालिज के प्रिन्सिपल और प्रोफेसर
बनारस में विद्यार्थी बनकर मैं संवत१९३० के पौष मास से लेकर संवत१९३४ के ज्येष्ठ मास तक बराबर रहा.इस अन्तर में केवल संवत१९३२ का पूरा वर्ष रेवड़ी तालाब के स्कूल ‘जयनारायनज कालेज’ में गुजारा, शेष साढ़े तीन वर्ष बनारस कालिज की चारदीवारी में ही व्यतीत किये.रेवड़ी तालाब के स्कूल में एक वर्ष मेहमान बनकर ही काटा,असली विद्यागृह मैं कुइन्स कालिज को ही समझता रहा.
एक बात यहाँ बतला देनी आवश्यक है.उन दिनों संयुक्त प्रान्त में कोई यूनिवर्सिटी न थी  और ना पंजाब में ही .दोनों प्रान्तों के विद्यार्थी एण्ट्रेंस से लेकर एम.ए.  तक की परीक्षा कलकत्ता यूनिवर्सिटी के अधीन देते थे.हाँ,संस्कृत विद्यालय विभाग अपने आप में अवश्य स्वतन्त्र था.
कालिज के प्रिन्सिपल ग्रिफिथ साहब थे जो वाल्मीकीय रामायण का अनुवाद इंग्लिश पद्य में करने के अतिरिक्त चारों वेदों के भी अनुवादक थे.पाँच फीट से शायद एक आध इंच ही लम्बे हों,परन्तु थे नख-शिख से दुरूस्त.जैसे वामन आप थे वैसा ही बौना भृत्य आपको मिला हुआ था.उसने भी साहब बहादूर के अनुकरण में गमुच्छे रक्खे हुए थे.ग्रिफिथ साहब एक टांग से लंगड़े हो चुके थे.इसका कारण भी विचित्र था.कवि ही तो ठहरे, टमटम इतनी ऊँची बनवाई कि जब एक सड़क से दूसरी सड़क की ओर घुमाने लगे तो गला तार में फंस गया और साहब शेष जीवन भर के लिये लंगड़े हो गये.लंगड़ी टांग की एड़ी जरा ऊंची रखवाते और ऐसी सावधानी से चलते कि देखने वाले को टांग का व्यंग प्रतीत न होता.शौकीन ऐसे थे कि नया कोट वा नई पतलून पहिरते समय यदि तनिक भी बेढब मालूम हुई तो ब्बाहर के बरामदे में फेंक दी गई.जो भी भृत्य उपस्थित हुआ उसके भाग्य उदय हो गये.बंगले की सजावट जगत-प्रसिद्ध थी.ऐसा कोई ही हतभाग्य विद्यार्थी होगा जिसने गल्मुच्छ वाले बौने भृत्य को अठन्नी वा रूपया देकर ,प्रिन्सिपल साहब की अनुपस्थिति में उनकी नरम गद्देवाली कोचों और कुर्सियों का आनन्द न लूटा हो.कवि ने विवाह तो किया नहीं था, परन्तु बीच के सड़क की दूसरी ओर एक कोठी किराये पर  लेकर अपनी सदा साहागिन प्रिया को रखा हुआ था.नाजुक इतने कि यदि कोई उनकी ओर बढ़े तो पीछे हटते जाते थे.साधारण पुरूष के मुँह से निकली अपावायु को सहन नहीं कर सकते थे.प्रायः बोते बहुत धीरे थे और इसीलिए मिलने वाले को आगे बढ़ना पड़ता था,परन्तु जब पढ़ाते तो गरज ऐसी होती कि एक-एक शब्द स्पष्ट सुनाई देता.शायद गरज की सारी शक्ति का संचय उसी समय के लिये कर छोड़ते थे.मेरे अंग्रेजी प्रोफेसर की बीमारी पर एक बार , संवत १९३४ मेंउन्होंने मेरी कक्षा को एक सप्ताह तक इंग्लिश पद्य पढ़ाया था,जिसे मैं कभी नहीं भूला.

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (29-01-2017) को "लोग लावारिस हो रहे हैं" (चर्चा अंक-2586) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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