Thursday, May 26, 2011

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए


कथाकार                  धीरेन्द्र अस्थाना  की कहानी पिता को बिना किसी औपचारिकता के यहां प्रस्तुत करते हुए मुझे इस बात की खुशी है कि देहरादून से बाहर रह रहे देहरादून के हमारे इन तमाम रचनाकार साथियों के लिए देहरादून और वहां के लोग अभी भी उतने ही प्रिय हैं जैसे अपने युवा दौर में वे उनके साथ थे। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि इस बहुत ही अनाम सी ब्लाग पत्रिका से जुड़ते हुए वे अपने आप को कहीं देहरादून के साथियों के बीच देखने की इक्षाओं के साथ होते हैं। उनके इस स्नेह को आभार के किसी भी शब्द से व्यक्त नहीं किया जा सकता। भाई सुरेश उनियाल, सूरज प्रकाश, धीरेन्द्र अस्थाना, एक समय में पुणे में रहते हुए फ़िल्मों पर गम्भीर रूप से लिखने वाले मनमोहन चड्ढा (वर्तमान में देहरादून में ही हैं) देहरादून की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनकी उपस्थिति आज देहरादून की फ़िजाओं में किस्से कहानियों के रूप में सुनी जा सकती है।
समकालीन जीवन स्थितियों और बदले नैतिक मूल्यों से टकराती कथाकार धीरेन्द्र अस्थाना की कहानी पिता उनके वेब साइट से यहां साभार प्रस्तुत है।
पिता

धीरेन्द्र अस्थाना

‘अपन का क्या है/अपन तो उड़ जायेंगे अर्चना/धरती को धता बताकर/अपन तो राह लेंगे अपनी/पीछे छूट जायेगी/घृणा से भरी और संवेदना से खाली/इस संसार की कहानी‘ - एयर इंडिया के सभागार में पिन ड्रॉप साइलेंस के बीच राहुल बजाज की कविता की पंक्तियां एक ऐंद्रजालिक सम्मोहन उपस्थित किये दे रही थीं। अब किसी सभागार में राहुल बजाज की कविता का पाठ शहर के लिए एक दुर्लभ घटना जैसा होता था। प्रबुद्ध जन दूर दूर के उपनगरों से लोकल, ऑटो, बस, टैक्सी या अपनी निजी कार से इस क्षण का गवाह बनने के लिए सहर्ष उपस्थित होते थे। राहुल शहर का मान था। साहित्य के जितने भी भारतीय अवार्ड थे वे सब के सब राहुल के घर में एक गर्वीले ठाठ के साथ शोभायमान थे। दुनिया भर की प्रसिद्ध किताबों से उसकी स्टडी अंटी पड़ी थी। अखबार, पत्रिकाओं और टीवी चैनल वाले जब तब उसका इंटरव्यू लेने के लिए उसके घर की सीढ़ियां चढ़ते उतरते रहते थे। उसके मोबाइल फोन में प्रदेश के सीएम, होम मिनिस्टर, गवर्नर, कल्चररल सेक्रेटरी, पुलिस कमिश्नर, पेज थ्री की सेलिब्रिटिज और बड़े पत्रकारों के पर्सनल नम्बर सेव थे।
वह युनिवर्सिटियों में पढ़ाया जा रहा था। असम, दार्जिलिंग, शिमला, नैनीताल, देहरादून, इलाहाबाद, लखनऊ, भोपाल, चंडीगढ़, जोधपुर, जयपुर, पटना और नागपुर में बुलवाया जा रहा था। मुंबई जैसे मायावी नगर में वह टू बेडरूम हॉल के एक सुविधा और सुरुचि संपन्न फ्लैट में जीवन बसर कर रहा था। वह मारुति जेन में चलता था। रेमंड तथा ब्लैक बेरी की पैंटें, पार्क एवेन्यू और वेनह्यूजन की शर्टें और रेड टेप के जूते पहनता था। विगत में घटा जो कुछ भी बुरा, बदरंग और कसैला था, उन सबको वह झाड़-पोंछकर नष्ट कर चुका था। लेकिन चीजें इस तरह नष्ट होती हैं क्या! ‘अतीत कभी दौड़ता है, हमसे आगे, भविष्य की तरह, कभी पीछे भूत की तरह लग जाता है। हम उल्टे लटके हैं आग के अलाव पर, आग ही आग है नसों के बिल्कुल करीब, और उनमें बारूद भरा है।‘ यह उसके बचपन का एक बहुत खास दोस्त बंधु था जो कॉलेज पहुचने तक कविताएं लिखने लगा था और नक्सली गतिविधियों के मुहाने पर खड़ा रहता था। वह बारूद की तरह फटता इससे पहले ही देहरादून की वादियों में कुछ अज्ञात लोगों द्वारा निर्ममता पूर्वक मार दिया गया।
राहुल डर गया। इसलिए नहीं कि उसने पहली बार मौत को इतने करीब से देखा था। इसलिए कि चौबीस बरस का बंधु बीस साल के राहुल के जीवन की पाठशाला बना हुआ था। यह पाठशाला उजड़ गई थी। उसने गर्दन उठाकर देखा, शहर के तमाम रास्ते निर्जन और डरावने लग रहे थे। एक खूबसूरत शहर में कुछ अभिशप्त प्रेतों ने डेरा डाल दिया था। वह एकदम अकेला था और निहत्था भी। कुछ कच्ची अधपकी कविताएं, थोड़े बहुत विद्रोही किस्म के विचार, कुछ मौलिक और पवित्र तरह के सपने, एक इंटरमीडियेट पास का सर्टिफिकेट, अहंकारी, तानाशाह, सर्वज्ञ और गीता इलेक्ट्रिकल्स के मालिक पिता के एकाधिकारवादी साये के नीचे बीत रहा था जीवन। यह सबकुछ इतना थोड़ा और आततायी किस्म का था कि राहुल डगमगा गया। उस रात वह देर तक पीता रहा और आधी रात को घर लौटा। पीता वह पहले भी था लेकिन तब वह बंधु के साथ उसके घर चला जाता था।
राहुल को याद है। एकदम साफ साफ। पिता ने उसे पर्दे की रॉड से मारा था। वह पिटते पिटते आंगन में आ गया था और हैंडपंप से टकराकर गिर पड़ा था। पंप और हत्थे को जोड़ने वाली मोटी-लंबी कील उसके पेट को चीरती गुजर गई थी। पेट पर दायीं ओर बना छह इंच का यह काला निशान रोज सुबह नहाते समय उसे पिता की याद दिलाता है। सिद्धार्थ अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर एक रात घर से गायब हुआ था और गौतम बुद्ध कहलाया था। राहुल अपने पिता, अपनी मां और कमरे की खिड़की से झांकते अपने तीन भाई-बहनों की भयाक्रांत आंखों को ताकते हुए, खून से लथपथ उसी हैंडपंप पर चढ़कर आंगन की छत के उस पार कूद गया था। उस पार एक आग की नदी थी और तैर के जाना था। पीछे शायद मां पछाड़ खाकर गिरी थी।
मेरे पास गाड़ी है, बंगला है, नौकर हैं। तुम्हारे पास क्या है? अमिताभ बच्चन ने दर्प में ऐंठते हुए पूछा है। शशि कपूर शांत है। ममत्व की गर्माहट में सिंकता हुआ। उसने एक गहरे अभिमान में भरकर कहा - मेरे पास मां है। अमिताभ का दर्प दरक रहा है।
राहुल को समझ नहीं आता। उसके पास मां क्यों नहीं है? राहुल को यह भी समझ नहीं आता कि क्यों दुनिया का कोई बेटा घमंड से भरकर यह नहीं कहता कि मेरे पास बाप है। बाप और बेटे अक्सर द्वंद्व की एक अदृश्य डोर पर क्यों खड़े रहते हैं?
‘अब जबकि उंगलियों से फिसल रहा है जीवन/ और शरीर शिथिल पड़ रहा है/ आओ अपन प्रेम करें वैशाली।‘ एस.एन.डी.टी. महिला विश्विविद्यालय के कॉन्फ्रेन्स रूम में राहुल बजाज की कविता गूंज रही है। कविता खत्म होते ही वह ऑटोग्राफ मांगती नवयौवनाओं से घिर गया है।
वह कुमाऊं विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का सभागार था। उसके एकल काव्यपाठ के बाद विभागाध्यक्ष ने अपनी सबसे मेधावी छात्रा को नैनीताल घुमाने के लिए उसके साथ कर दिया था। इस छात्रा के साथ राहुल का छोटा-मोटा भावत्मक और बौद्धिक पत्र-व्यहार पहले से था। वह पत्रिकाओं में राहुल की कविताएं पढ़कर उसे खत लिखा करती थी। बीस साल पहले माल रोड की उस ठंडी सड़क पर केतकी बिष्ट नाम की उस एम.ए. हिन्दी की छात्रा ने सहसा राहुल का हाथ पकड़कर पूछा था -‘मुझसे शादी करोगे?‘
राहुल अवाक। हलक भीतर तक सूखी हुई। अक्तूबर की उस पहाड़ी ठंड में माथे पर चली आई पसीने की चंद बूंदें। आंखों में अचरज का समंदर। एक युवा, प्रतिभाशाली, तेज-तर्रार कवि के रूप में राहुल को तब तक मान्यता मिल चुकी थी। वह दिल्ली के एक साप्ताहिक अखबार में नौकरी कर रहा था। लेकिन शादी के लिए इतना काफी था क्या? फिर वह लड़की के बारे में ज्यादा कुछ जानता नहीं था। सिवा इसके कि वह कुछ कुछ रिबेलियन किस्म के विचारों से खदबदाती रहती थी, कि जीवन की चुनौतियां उसे जीने की लालसा से भरती थीं। उसकी आंखें गजब के आत्मविश्वास से दमक रही थीं।
आत्मविश्वास की इस डगर पर चलता हुआ क्या मैं अपने स्वप्नों को पैरों पर खड़ा कर सकूंगा? राहुल ने सोचा और केतकी की आंखों में झांका। ‘हां!‘ केतकी ने कहा और केतकी का माथा चूम लिया। आसपास चलती भीड़ आश्चर्य से ठहरने लगी। बीस बरस पहले यह अचरज की ही बात थी। खासकर नैनीताल जैसे छोटे शहर में। बिष्ट साहब की बेटी... बिष्ट साहब की बेटी... हवाओं में हरकारे दौड़ पडे।
लेकिन अगली सुबह नैनीताल कोर्ट में बिष्ट दंपती तथा विभागाध्यक्ष की गवाही में राहुल और केतकी पति-पत्नी बन गए। उसी शाम राहुल और केतकी दिल्ली लौट आए-सरोजिनी नगर के एक छोटे से किराये के कमरे में अपना जीवन शुरू करने। एस.एन.डी.टी. के सभागार में ऑटोग्राफ सेशन से निपटने के बाद एक कुर्सी पर बैठे राहुल को अपना विगत अपने से आगे दौड़ता नजर आता है।
राहुल अंधेरी स्टेशन की सीढ़ियां उतर रहा था। विकास सीढ़ियां चढ़ रहा था। उसकी उंगलियों में सिगरेट दबी थी। राहुल ने विकास की कलाई थाम ली। सिगरेट जमीन पर गिर पड़ी। राहुल विकास को घसीटता हुआ स्टेशन के बाहर ले आया। एक सुरक्षित से लगते कोने पर पहुंचकर उसने विकास की कलाई छोड़ दी और हांफते हुए बोला, ‘मैंने तुमसे कहा था, जीवन का पहला पैग और पहली सिगरेट तुम मेरे साथ पीना। कहा था ना?‘ ‘ज्जी!‘ विकास की घिघ्घी बंधी हुई थी। ‘तो फिर?‘ राहुल ने पूछा। विकास ने गर्दन झुका ली और धीरे से कहा, ‘सॉरी पापा! अब ऐसा नहीं होगा।‘ राहुल मुस्कुराया। बोला, ‘दोस्त जैसा बाप मिला है। कद्र करना सीखो।‘ फिर दोनों अपने अपने रास्तों पर चले गए।
विकास मुंबई के जेजे कॉलेज ऑफ आर्ट्स में प्रथम वर्ष का छात्र था। केतकी उसे डॉक्टर बनाना चाहती थी लेकिन विकास के कलात्मक रूझान को देख राहुल ने उसे हाई स्कूल साइंस के बाद इंटर आर्ट्स से करने और उसके बाद जेजे में एडमिशन लेने की स्वीकृति दे दी थी। वह कमर्शियल आर्टिस्ट बनना चाहता था। राहुल उन दिनों एक दैनिक अखबार का न्यूज एडीटर था। आधी रात को आना और सुबह देर तक सोते रहना उसकी दिनचर्या थी।
इतवार की एक सुबह उसने केतकी से पूछा, ‘विकास नहीं दिख रहा।‘
‘बेटे की सुध आई?‘ केतकी व्यंग्य की डोर थामे उस पार खड़ी थी।
‘लेकिन घर तो शुरू से ही तुम्हारा ही रहा है।‘ राहुल ने सहजता से जवाब दिया।
‘यह घर नहीं है।‘ केतकी तिक्त थी। उसे बहुत जमाने के बाद संवादों की दुनिया में उपस्थित होने का मौका मिला था, ‘गेस्ट हाउस है। और मैं हाउस कीपर हूं। सिर्फ हाउस कीपर।‘
राहुल उलझने के मूड में नहीं था। सीईओ ने उसे पुणे एडीशन की रूपरेखा बनाने की जिम्मेदारी सौंपी थी। दोपहर के भोजन के बाद अपनी स्टडी में बंद होकर वह होमवर्क कर लेना चाहता था। उसने विकास का मोबाइल लगाया।
‘पापा...।‘ उधर विकास था।
‘बेटे कहां हो तुम?‘ राहुल थोड़ा तुर्श था।
‘पापा, बांद्रा के रासबेरी में मेरा शो है अगले मंडे। इसलिए एक हफ्ते से अपने दोस्त कपिल के घर पर हूं। रिहर्सल चल रही है।‘
‘रिहर्सल? कैसा शो?‘
‘पापा आपको अपने सिवा कुछ याद भी रहता है, पिछले महीने मैंने आपको बताया नहीं था कि मैंने एक रॉक बैंड ज्वाइन किया है।‘
‘रिहर्सल घर पर भी हो सकती है।‘ राहुल उत्तेजित होने लगा था, टिपिकल पिताओं की तरह।
‘पापा, आप यह भी भूल गए?‘
विकास की आवाज में भी व्यंग्य तैरने लगा था, ‘अभी कुछ दिन पहले जब मैं रात को प्रैक्टिस कर रहा था तब आपने घर आते ही मुझे कितनी बुरी तरह डांट दिया था कि यह घर है नाचने गाने का अड्डा नहीं।‘
‘शटअप‘ राहुल ने मोबाइल ऑफ कर दिया। उसने देखा, केतकी उसे व्यंग्य से ताक रही थी। उसने सिर झुका लिया। वह धीमे कदमों से अपनी स्टडी में जा रहा था। पीछे पीछे केतकी भी आ रही थी।
‘क्या है?‘ राहुल ने पूछा और पाया कि उसकी आवाज में एक अजीब किस्म की टूटन जैसी है। इस टूटन में किसी शोध में असफल हो जाने का दर्द समाया हुआ था।
‘तुम हार गए राहुल।‘ केतकी की आंख में बरसों पुराना आत्मविश्वास था।
‘तुम भी ऐसा ही सोचती हो केतकी?‘ राहुल ने अपनी कमीज और बनियान उलट दी। ‘क्या तुम चाहती थीं कि पेट पर पड़े ऐसे ही किसी निशान को देखकर विकास को अपने बाप की याद आया करती?‘
‘नहीं।‘
‘तो फिर?‘ राहुल की आवाज में दर्द था। ‘मैंने विकास को एक लोकतांत्रिक माहौल देने का प्रयास किया था। मैं चाहता था कि वह मुझे अपना बाप नहीं, दोस्त समझे।‘
‘बाप दोस्त नहीं हो सकता राहुल। वह दोस्तों की तरह बिहेव भले ही कर ले। लेकिन होता वह बाप ही है। और उसे बाप होना भी चाहिए।‘ केतकी ने झटके से अपना वाक्य पूरा किया और स्टडी से बाहर चली गई।
राहुल अराम कुर्सी पर ढह गया। अगली सुबह जब वह बहुत देर तक नहीं उठा तो केतकी ने अपने फैमिली डॉक्टर को तलब किया। डॉक्टर ने बताया, ‘इनके जीवन में हाई ब्लड प्रेशर ने सेंध लगा दी है।‘
राहुल की आंखें आश्चर्य से भारी हो गईं। वह सिगरेट नहीं पीता था। शराब कभी कभी छूता था। तला हुआ और तैलीय भोजन नहीं खाता था। घर से बाहर का पानी तक नहीं पीता था।
‘तो फिर?‘ उसने केतकी से पूछा।
लेकिन तब तक डॉक्टर की बताई दवाइयां लेने के लिए केतकी बाजार जा चुकी थी।
ग्यारह सितंबर दो हजार एक को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए विनाशक हमले के ठीक एक हफ्ते बाद राहुल बजाज को रात ग्यारह बजे उसके बेटे विकास ने मोबाइल पर याद किया। राहुल उन दिनों एक टीवी चैनल में इनपुट एडीटर था और पत्नी के साथ दिल्ली में रहता था। चैनल की नौकरी में विकास तो विकास, केतकी तक राहुल को कभी कभी किसी भूली हुई याद की तरह उभरती नजर आती थी। वह विकास को अपने मुंबई वाले बसे-बसाये घर में अकेला छोड़ आया था। विकास तब तक एक मल्टीनेशन कंपनी के मुंबई ऑफिस में विजुलाइजर के तौर पर नौकरी करने लगा था। आम तौर पर विकास का मोबाइल ‘नॉट रीचेबल‘ ही होता था। पंद्रह बीस दिनों में कभी उसे मां की याद आती तो वह दिल्ली के लैंडलाइन पर फोन कर मां से बतियाता था। केतकी के जरिये ही राहुल को पता चला कि विकास मजे में है। उसकी नौकरी ठीक है और वह एक उभरता रॉक गायक भी बन गया है। वह मां को बताता था कि मकान का मेंटेनेंस समय पर दिया जा रहा है, कि लैंड लाइन फोन का बिल और बिजली का बिल भी समय पर दिया जा रहा है। सोसायटी के लोग उन्हें याद करते हैं और उसने अपने एक दोस्त से किस्तों पर एक सेकिंड हैंड मोटर साइकिल खरीद ली है। वह बताता कि मुंबई की लोकल में भीड़ अब जानलेवा हो गई है। अब तो किसी भी समय चढ़ना-उतरना मुश्किल हो गया है। एक खाते-पीते मध्यवर्गीय परिवार के लक्षण यहां भी थे, वहां भी। राहुल की जिंदगी बीत रही थी। केतकी की भी। व्यस्त रहने के लिए केतकी दिल्ली में कुछ टयूशन करने लगी थी।
इसीलिए विकास के फोन ने राहुल को विचलित कर दिया।
‘बापू....‘ विकास लाड़, शराब और स्वतंत्रता के नशे में था, ‘बापू, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की बिल्डिंग में हमारा भी हेड ऑफिस था। सब खल्लास हो गया। ऑफिस भी, मालिक भी। मालकिन ने ई-मेल भेजकर मुंबई ऑफिस को बंद कर दिया है।‘
‘अब?‘ राहुल ने संयत रहने की कोशिश की, ‘अब क्या करेगा?‘
‘करेगा क्या स्ट्रगल करेगा। अभी तो एक महीने नोटिस की पगार है अपने पास। उसके बाद देखा जाएगा।‘ विकास आश्वस्त लग रहा था।
‘ऐसा कर, तू घर में ताला लगाकर दिल्ली आ जा। मैं तुझे अपने चैनल में फिट करवा दूंगा।‘ राहुल की हमेशा व्यस्त और व्यावसायिक आवाज में बहुत दिनों के बाद एक चिंतातुर पिता लौटा।
‘क्या पापा...।‘ विकास शायद चिढ़ गया था, ‘आप भी कभी कभी कैसी बातें करते हैं। मेरा कैरियर, मेरे दोस्त, मेरा शौक, मेरा पैशन सब कुछ यहां है... यह सब छोड़कर मैं वहां आ जाऊं, उस गांव में जहां लोग रात को आठ बजे सो जाते हैं। जहां बिजली कभी कभी आती है। ओह शिट... आई हेट दैट सिटी।‘ विकास बहकने लगा था, ‘मम्मी मुझे बताती रहती है वहां की मुसीबतों के बारे में। अपुन इधरीच रहेगा। आई लव मुंबई, यूू नो। अगले महीने मैं अपना बैंड लेकर पूना जा रहा हूं शो करने।‘
‘जैसी तेरी मर्जी।‘ राहुल ने समर्पण कर दिया, ‘कोई प्रॉब्लम आए तो बता जरूर देना।‘
‘शाब्बाश। ये हुई न मर्दों वाली बात।‘ विकास ने ठहाका लगाया फिर बोला, ‘टेक केयर... बाय।‘
राहुल का जी उचट गया। उसने खुद को सांत्वना देने की कोशिश की। आखिर सब कुछ तो है मुंबई वाले घर में। टीवी, फ्रिज, कंप्यूटर, वीसीडी प्लेयर, वाशिंग मशीन, गैस, डबल बेड, वार्डरोब, सोफा, बिस्तर। इतना सक्षम तो है ही अपना बेटा कि दो वक्त की रोटी जुटा ले। उसने निश्चिंत होने की कोशिश की लेकिन कुछ था जो उसके सुकून में सेंध लगा रहा था। थोड़ी देर बाद वह घर लौट आया। लौटते वक्त उसने मोबाइल पर अपनी सोसायटी के सेक्रेटरी से रिक्वेस्ट किया कि कभी मेंटेनेंस मिलने में देर हो जाये तो वह मिस कॉल दे दे। पैसा सोसायटी के अकाउंट में ट्रांस्फर हो जाएगा। फिर उसने सेक्रेटरी से आग्रह किया कि विकास का ध्यान रखना। सेक्रेटरी सिख था। खुशमिजाज था। बोला, ‘तुसी फिक्र न करो। असि हैं न। वैसे त्वाडा मुंडा बड़ा मस्त है। कदी-कदी दिखता है बाइक पर तो बाय अंकल बोलता है।‘
राहुल को घर आया देख केतकी विस्मित रह गई। अभी तो सिर्फ पौने बारह बजे थे। राहुल कभी भी दो बजे से पहले नहीं आता था।
‘विकास का फोन था।‘ राहुल ने बताया, ‘उसकी नौकरी चली गई है लेकिन यह कोई चिंता की बात नहीं है।‘
‘तो?‘ केतकी कुछ समझी नहीं।
‘उसने शराब पी रखी थी।‘ राहुल ने सिर झुका लिया। उसकी आवाज दूसरी शताब्दी के उस पार से आती हुई लग रही थी। राख में सनी, मटमैली और अशक्त। केतकी के भीतर बुझते अंगारों में से कोई एक अंगार सुलग उठा। राहुल की आवाज ने उसे हवा दी थी शायद।
‘जब हम दिल्ली आ रहे थे मैंने तभी कहा था कि विकास को मुंबई में अकेला मत छोड़ो।‘
‘केतकी, मूर्खों जैसी बात मत करो। बच्चे जवान होकर लंदन, अमेरिका, जर्मनी और जापान तक जाते हैं। नौकरियां भी आती-जाती रहती हैं। फिर हम अभी जीवित हैं न!‘ राहुल सोफे पर बैठ गया और जूते उतारने लगा, ‘उसका नशे में होना भी कोई धमाका नहीं है। ऑफ्टर ऑल बाइस साल का यंग चैप है।‘
‘तो फिर?‘ केतकी पूछ रही थी, ‘तुम परेशान किस बात को लेकर हो?‘
‘परेशान कहां हूं?‘ राहुल झूठ बोल गया, ‘एक प्रतिकूल स्थिति है जो फिलहाल विकास को फेस करनी है। टेलेंटेड लड़का है। दूसरी नौकरी मिल जाएगी। इस उम्र में स्ट्रगल नहीं करेगा तो कब करेगा? उसे अपने खुद के अनुभवों और यथार्थ के साथ बड़ा होने दो।‘
‘तुम जानो।‘ केतकी ने गहरी निश्वास ली, ‘कहीं तुम्हारे विश्वास तुम्हें छल न लें।‘
‘डोंट वरी। मैं हूं न!‘ राहुल मुस्कुराया। फिर वे सोने के लिए बेडरूम में चले गये। रात का खाना राहुल दफ्तर में ही खाया करता था। उस रात राहुल ने सिर्फ दो काम किये। दाएं से बाएं करवट ली और बाएं से दाएं।
सुबह हमेशा की तरह व्यस्तताओं भरी थी। अखबार, फोन, खबरें, न्यूज चैनल, इंटरव्यू, प्रशासनिक समस्याएं, कंट्रोवर्सी, मार्केटिंग स्ट्रेटेजी, ब्यूरो कोऑर्डिनेशन, आदेश, निर्देश, टार्गेट...। एक निरंतर हाहाकार था जो चौबीस घंटे, अनवरत उपस्थित था, इस हाहाकार में समय हवा की तरह उड़ता था और संवेदनाएं मोम की तरह पिघलती थीं। इन्हीं व्यस्तताओं में दिल्ली का दिसंबर आया। ठंड, कोहरे और बारिश में ठिठुरता। विकास से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था। घर का फोन बजता रहता। दिल हूम हूम करता। पता नहीं विकास ने क्या खाया होगा? खाना हलक से नीचे उतरने से इंकार कर देता। केतकी कुमार गंधर्व और भीमसेन जोशी की शरण लेती। विकास का मोबाइल ट्राई करती। सोसायटी की सक्रेटरी की पत्नी से फोन पर पूछती, ‘विकास का क्या हाल है?‘ एक ही जवाब मिलता, ‘दिखा नहीं जी बड्डे दिनों से। मैं इनसे पूछ के फोन करांगी।‘ पर उसका फोन नहीं आता। केतकी अपनी कातर निगाहें राहुल की तरफ उठाती तो वह गहरी निस्संगता से भर कर जवाब देता, ‘नो न्यूज इज गुड न्यूज।‘
‘कैसे बाप हो?‘ आखिर एक रात केतकी ढह गई, ‘तीन महीने से बेटे का अता-पता नहीं है और बाप मजे में है।‘
‘केतकी?‘ राहुल ने केतकी को उसके मर्मस्थल पर लपक लिया, ‘मैं बीस साल की उम्र में अपना घर छोड़ कर भागा था। देहरादून से। फिर तुमसे शादी की। स्ट्रगल किया, अपना एक मुकाम बनाया। बेशक तुम साथ साथ आ रही थीं। हम देहरादून से दिल्ली, दिल्ली से लखनऊ, लखनऊ से गुवाहाटी और गुवाहटी से मुंबई पहुंचे। और अब दिल्ली में हैं। क्या तुम्हें एक बार भी याद नहीं आया कि मेरा भी एक पिता था। मैं भी एक बेटा था?‘
‘लेकिन इस मामले में मैं कहां से आती हूं राहुल?‘ केतकी ने प्रतिवाद किया। ‘वह तुम्हारा और तुम्हारे पिता का मामला था। लेकिन यहां मैं इन्वॉल्व हूं। मैं विकास की मां हूं। मेरे दिल में हर समय सांय-सांय होती है। सोचती हूं कि कुछ दिनों के लिए मुंबई हो आती हूं।‘
‘ठीक है।‘ राहुल गंभीर हो गया, ‘मैं कुछ करता हूं।‘
नये वर्ष के पहले दिन दोपहर बारह पैंतीस की फ्लाइट से राहुल मुंबई के लिए उड़ गया। उसके ब्रीफकेस में घर की चाबियों और पर्स में तीन बैंकों के डेबिट तथा क्रेडिट कार्ड थे।
घर विस्मयकारी तरीके से बदरंग, उदास, अराजक और उजाड़ था। राहुल का घर, जिसे वह बतौर अमानत विकास को सौंप गया था। दरवाजे के बाहर लगी नेमप्लेट जरूर राहुल के ही नाम की थी लेकिन भीतर मानों एक अपाहिज पहरेदार की छायाएं डोल रही थीं।
धीरे-धीरे राहुल को डर लगना शुरू हुआ। ‘मैं उधर से बन रहा हूं, मैं इधर से ढह रहा हूं।‘ राहुल ने सोचा। इक्कीसवीं सदी का अंधेरा उसके जिस्म में भविष्य की तरह ठहर जाने पर आमादा था। उसके विश्वास, उसके मूल्य, उसकी समझ जिस पर देश का पढ़ा-लिखा तबका यकीन करता था, उसके अपने घर में विकास के मैले-कुचैले कपड़ों की तरह जहां-तहां बिखरे पड़े थे। हॉल में बने बुक शेल्फ में मकड़ी के जाले लगे हुए थे और उनमें छिपकलियां आराम कर रही थीं। उसने फोन का रिसीवर उठाकर देखा - वह मृतकों की दुनिया में शामिल था। यानी घंटी एक्सचेंज में बजा करती होगी। नागार्जुन, निराला और मुक्तिबोध की रचनावलियों के साथ कालिदास ग्रंथावली जैसी दुर्लभ और बेशकीमती पुस्तकें सदियों पुरानी धूल के नीचे हांफ रही थीं। सोफे के ऊपर एक इलेक्ट्रोनिक गिटार औंधा पड़ा था। टीवी के ऊपर एक नहीं तीन-तीन ऐश-ट्रे थीं, जिनमें चुटकी भर राख झाड़ने की भी जगह नहीं थी। शोकेस के किनारे कोने में सिगरेट के खाली पैकेट पड़े थे। फर्श पर चलते हुए धूल पर जूतों के निशान छप रहे थे।
राहुल भीतर घुसा- एक साबुत आशंका के साथ। किचन के प्लेटफार्म पर बिसलरी के बीस लीटर वाले कई कैन कतार से लगे थे - खाली, बिना ढक्कन। वाशिंग मशीन का मुंह खुला था और उसमें गरदन तक विकास के गंदे कपड़े ठुंसे हुए थे। पर्दों पर तेल और मसालों के दाग थे। बाथरूम और लैटरीन के दरवाजों पर कुछ विदेशी गायकों के अहमकों जैसी मुद्रा वाले पोस्टर चिपके थे। राहुल का स्टडी रूम बंद था। बैडरूम में रखा कंप्यूटर और प्रिंटर नदारद था। राहुल ने चाबी से स्टडी का दरवाजा खोला- वहां धूल, उमस और सीलन जरूर थी लेकिन बंद होने की वजह से बाकी कमरा जस का तस था- जैसा राहुल उसे छोड़ गया था। थका हुआ, प्रतीक्षातुर और उदास। यह कमरा मानों राहुल को यह सांत्वना दे रहा था कि अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है। अपनी राइटिंग टेबल के सामने पड़ी रिवॉल्विंग चेयर पर बैठकर राहुल ने विकास का मोबाइल लगाने की एक व्यर्थ सी कोशिश की लेकिन आश्चर्य कि घंटी बज गई।
‘हैलो...‘ यह विकास था हूबहू राहुल जैसी आवाज़ में। तीन महीने से अदृश्य।
‘कहां है?‘ राहुल ने पूछा।
‘पापा...!‘ विकास चीखा, ‘कैसे हो, मॉम कैसी है?‘
‘तुझसे मतलब?‘ राहुल चिढ़ गया।
‘पापा, मेरा मोबाइल बंद था, परसों ही चालू हुआ है। मैं आपको बताने ही वाला था। गुड न्यूज। परसों ही मेरी नौकरी लगी है- रिलायंस इन्फोकॉम में। पगार है पंद्रह हजार रुपये। तीन महीने से खाली भटकते-भटकते मैं पागल हो गया था। बीच में मेरा एक्सीडेंट भी हो गया था। मैं पंद्रह दिन अस्पताल में पड़ा रहा। बाइक भी टूट गई। भंगार में बेच दी।‘ विकास बताता जा रहा था। बिना रुके, बिना किसी दुख, तकलीफ या पछतावे के। खालिस खबरों की तरह।
‘तूने एक्सीडेंट की भी सूचना नहीं दी?‘ राहुल को सहसा एक अनाम दुख ने पकड़ लिया।
‘उससे क्या होता?‘ विकास तर्क दे रहा था, ‘आपका ब्लड प्रेशर बढ़ जाता। आप लोग भागे-भागे यहां आते। ठीक तो मुझे दवाइयां ही करतीं न? फिर दोस्त लोग थे न। किस काम आते साले हरामखोर। आप देखते तो डर जाते पापा। बाईं आंख की तो वाट लग गई थी। पूरी बाहर ही आ गई थी। माथे पर सात टांके आये। होंठ कट गया था। अब सब ठीक है।‘
‘पैसा कहां से आया?‘ राहुल ने पूछा।
‘दोस्त ने दिया। कंप्यूटर बेचना पड़ा। अब धीरे धीरे सब चुका दूंगा।‘
‘और घर कबसे नहीं गया?‘
‘शायद आठ-दस दिन हो गए।‘ विकास ने आराम से बताया।
‘और घर का फोन?‘
‘वो डैड है।‘ विकास ने बताया, ‘मैं भाड़ा कहां से देता? खाने के ही वांदे पड़े हुए थे।‘
‘मेंटनेंस भी नहीं दिया होगा?‘
‘हां।‘ विकास बोला।
‘तुझे यह सब बताना नहीं चाहिए था?‘ राहुल झुंझला गया, ‘इस तरह बर्ताव करती है तुम लोगों की पीढ़ी अपने मां-बाप के साथ?‘
‘पापा आप तो लेक्चर देने लगते हो।‘ विकास भी चिढ़ गया, ‘मकान कोई छीन थोड़े ही रहा है? अब नौकरी लग गई है, सब कुछ दे दूंगा। अच्छा सुनो, मम्मी से बात कराओ न!‘
‘मम्मी दिल्ली में है।‘
‘दिल्ली में? तो आप कहां हैं?‘ विकास थोड़ा विस्मित हुआ।
‘मुंबई में। अपने घर में।‘ राहुल ने बताया।
‘ओके बाय, मैं शाम तक आता हूं।‘ विकास ने फोन काट दिया। उसकी आवाज में पहली बार कोई लहर उठी थी। क्या फर्क है? राहुल खुद से पूछ रहा था। सिर्फ इतना ही न कि मैं घर से भाग गया था और विकास घर से दूर है - अपनी तरह से जीता-मरता हुआ। अपनी एक समानांतर दुनिया में। वह एक अदृश्य सी डोर से अपने मम्मी-पापा के साथ बंधा हुआ है और राहुल की दुनिया में यह डोर भी नहीं थी। घर से भागने के पूरे सात वर्ष बाद जब जोधपुर में पिता का ब्रेन कैंसर से देहांत हो गया, तब मां का मौन टूटा था। और मां की आज्ञा से छोटे भाई ने उसका पता खोज कर उसे टेलीग्राम दिया था -‘पिता नहीं रहे। अगर आना चाहो तो आ सकते हो।‘
वह नहीं गया था। अगर पिता उसके जीवन से निकल गए थे, अगर मां, मां नहीं बनी रह सकी थी, अगर भाई-बहन उसे ठुकरा चुके थे तो राहुल ही क्यों एक बंद दुनिया का दरवाजा खोलने जाता? जब अपने लहुलुहान शरीर को लिए वह घर के बाहर कूद रहा था तब दरवाजा खोलकर मां बाहर आकर उसके कदमों की जंजीर नहीं बन सकती थी? पिता को एक बार भी ख्याल नहीं आया कि बीस साल का एक इंटर पास लड़का इतनी बड़ी दुनिया में कहां मर-खप रहा है?
राहुल बजाज ने पाया कि उसकी बाईं आंख से एक आंसू ढुलककर गाल पर उतर आया है। शायद बाईं आंख दिल से और दाईं आंख दिमाग से जुड़ी है। राहुल ने सोचा और अपनी खोज पर मुस्कुरा दिया।
दो बाइयों की मदद से घर शाम तक सामान्य स्थिति में आ गया। सोसायटी का सेक्रेटरी बदल गया था। नोटिस बोर्ड पर मेंटेनेंस न देने वालों में राहुल बजाज का नाम भी शोभायमान था। राहुल ने पूरे हिसाब चुकता किये और बारह महीने के पोस्ट डेटेड चेक सेक्रेटरी को सौंप दिये। बिजली के बिल के खाते में भी उसने पुराने चौदह सौ और अग्रिम सोलह सौ मिलाकर तीन हजार का चेक जमा करवा दिया। टेलीफोन सरेंडर करने की अप्लीकेशन भी उसने सेक्रेटरी को दे दी- साइन किये हुए क्रॉस्ड चेक के साथ। विकास के सारे गंदे कपड़े धोबी के यहां भिजवा दिए। टीवी, फ्रिज और वाशिंग मशीन उसने दस हजार रुपये में केतकी के एक दोस्त को बेच दिये। इसी दोस्त रेवती के पति ललित तिवारी के घर वह रात के खाने पर आमंत्रित था।
रात आठ बजे विकास आया। वह अपने साथ बैगपाइपर की बॉटल लाया था।
‘आपने कहा था न, पहला पैग मेरे साथ पीना।‘ विकास बोला, ‘वह तो नहीं हो सका लेकिन मेरी नयी नौकरी की खुशी में हम एक साथ चियर्स करेंगे।‘
‘मंजूर है।‘ राहुल निर्विकार था, ‘मैं घर में ताला लगाकर जा रहा हूं।‘
‘चलेगा।‘ विकास तनिक भी परेशान नहीं हुआ, ‘मेरा दफ्तर मरोल में है। अंधेरी से मीरा रोड की ट्रेन में चढ़ना अब पॉसिबल नहीं रहा। मैं दफ्तर के पास ही कहीं पेइंग गेस्ट होने की सोच रहा हूं।‘
विकास रेवती और ललित के घर खाने पर नहीं गया। उसने पुष्पक होटल से अपने लिए चिकन बिरियानी मंगवा ली।
अगली सुबह इतवर था। राहुल सोकर उठा तब तक विकास तैयार था। उसने पापा के लिए दो अंडों का ऑमलेट बना दिया था।
‘कहां?‘ राहुन ने पूछा।
‘मेरी रिहर्सल है।‘ विकास ने कहा, ‘आज शाम सात बजे बांद्रा के रासबेरी में मेरा शो है।‘
‘क्या उस शो में मैं नहीं आ सकता?‘ राहुल ने पूछा।
‘क्या?‘ विकास अचरज के हवाले था। ‘आप मेरा शो देखने आएंगे? लेकिन आप और मम्मी तो कुमार गंधर्व भीमसेन जोशी टाइप के लोगों...।‘
‘ऑफ्टर ऑल, जो तू गाता है वह भी तो संगीत ही है न?‘ राहुल ने विकास की बात काट दी।
‘येस्स‘ विकास ने दोनों हाथों की मुट्ठियां हवा में उछालीं, ‘मैं इंतजार करूंगा।‘ फिर वह अपना गिटार लेकर सीढ़ियां उतर गया। देर तक राहुल की आंख में विकास के कानों में लटकी बालियां और छोटे छोटे कलर किये गए खड़े बाल उलझन की तरह डूबते-उतराते रहे। जब केतकी का फोन आया तो राहुल ठीक ठीक बता नहीं पाया कि वह किसके साथ है - विकास के या अपने? केतकी जरूर विकास के साथ थी, ‘जब उसके लिए तुमने घर ही बंद कर दिया है तो उसका अंतिम संस्कार भी हाथोंहाथ क्यों नहीं कर आते?‘ वह रो रही थी। वह मां थी और स्वभावतः अपने बेटे के साथ थी। राहुल मां को नहीं जानता। वह केतकी के रुदन से तनिक भी विचलित नहीं हुआ।
रासबेरी। नई उम्र के लड़के-लड़कियों का डिस्कोथेक। बाहर पोस्टर लगे थे - न्यू सेंसेशन ऑफ इंडियन रॉक सिंगर विकास बजाज। राहुल तीन सौ रुपये का टिकट लेकर भीतर चला गया। वहां अजीबोगरीब लड़के-लड़कियों की भीड़ थी। हवाओं में चरस की गंध थी। बीयर का सुरूर था। यौवन की मस्ती थी। क्षण में जी लेने का उन्माद था। लड़कियों की जीन्स से उनके नितंबों के कटाव झांक रहे थे। लड़कों ने टाइट टी शर्ट पहनी हुई थी। उनके बाल चोटियों की तरह बंधे थे। स्लीवलेस टी शर्ट्स से उनके मसल्स छलके पड़ रहे थे। ब्रा की कैद से आजाद लड़कियों के स्तन शर्ट्स के भीतर टेनिस की गेंद की तरह उछल रहे थे। राहुल वहां शायद एकमात्र अधेड़ था जिसे रासबेरी का समाज कभी कभी कौतुक भरी निगाह से निहार लेता था।
एक संक्षिप्त से अनाउंसमेंट के बाद विकास मंच पर था - अपने गिटार के साथ। उसने कान-फाड़ शोर के साथ गर्दन को घुटनों के पास तक झुकाते हुए पता नहीं क्या गीत गाया कि हॉल तालियों से गड़गड़ाने लगा, लड़कियां झूमने लगीं और लड़के उन्मत्त होकर नाचने लगे।
इस लड़के की रचना हुई है उससे? राहुल ने सोचा और युवक-युवतियों द्वारा धकेला जाकर एक कोने में सिमट गया। भीड़ पागल हो गई थी और विकास के लिए ‘वन्स मोर‘ का नारा लगा रही थी। राहुल का दिल दो-फांक हो गया। उसने केतकी को फोन लगाया और धीरे से बोला, ‘शोर सुन रही हो? यह विकास की कामयाबी का शोर है। मैं नहीं जानता कि मैं सुखी हूं या दुखी। पहली बार एक पिता बहुत असमंजस में है केतकी।‘ राहुल ने फोन काट दिया और मंच पर उछलते-कूदते विकास को देखने लगा।
ब्रेक के बाद वह बाहर आ गया। ‘हाय गाइज, हैलो गर्ल्स‘ करता हुआ विकास भी बाहर निकला। उसके मुंह में सिगरेट दबी थी। उसने राहुल के पांव छू लिए और बोला, मैं बहुत खुश हूं कि मेरा बाप मेरी खुशी को शेयर कर रहा है।‘
‘मेरे बच्चे‘ राहुल ने विकास को गले लगा लिया, ‘जहां भी रहे, खुश रहे। मुझे अब जाना होगा। मेरी दस पैंतीस की फ्लाइट है। अपने सारे प्रेस किये हुए कपड़े तुझे रेवती आंटी के घर से मिल जाएंगे।‘ राहुल बजाज का गला रूंध गया था, ‘कल से तू कहां रहेगा? क्या मैं घर की चाबियां?‘
राहुल बजाज के भीतर एक पिता पिघलता, तब तक विकास का बुलावा आ गया। उसने वापस राहुल के पांव छुए और बोला, ‘मेरी चिंता मत करो पापा। मैं ऐसा ही हूं। आप जाओ। बेस्ट ऑफ जर्नी। सॉरी।‘ विकास ने हाथ नचाए, ‘मैं एयरपोर्ट नहीं आ सकता। मां को प्यार बोलना।‘ विकास भीतर चला गया। भीड़ और शोर और उन्माद के बीच।
बाहर अंधेरा उतर आया था। इस अंधेरे में राहुल बजाज बहुत अकेला, अशक्त और दुविधाग्रस्त था। वह सबके साथ होना चाहता था लेकिन किसी के साथ नहीं था। उसके पास न पिता था, न मां। उसके पास बेटा भी नहीं था। और दिल्ली पहुंचने के बाद उसके पास केतकी भी नहीं रहने वाली थी। राहुल ने हाथ दिखाकर टैक्सी रोकी, उसमें बैठा और बोला, ‘सांताक्रूज एयरपोर्ट।‘
टैक्सी में गाना बज रहा था -‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए।‘

Sunday, May 22, 2011

बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा लेखक होना बेहतर है.

सूरज प्रकाश हमारे मित्र हैं और देहरादूनिये भी। फेसबुक में लगा उनका नोट्स जो एक बेहतरीन संस्मरण है, फेस बुक पर उनके मित्रों से इतर इस ब्लाग के लेखक भी पढ़ सके- उनकी इजाजत के बिना ही साभार यहां लगाने की गुस्ताखी कर दे रहा हूं। 
वि.गौ. 


विजय
नेट पर आयी मेरी रचना पर तुम्‍हारा, तुम्‍हारे ब्‍लाग का और मेरे शहर का पूरा हक है। इजाज़त की बात ही नहीं है। ये मेरा अतिरिक्‍त सम्‍मान हुआ ना।
कल शरदजी का जनमदिन था। इसीलिए ये रचना डाली थी।
कल से ही शरदजी की बेटी नेहा ने indradhanushpatrika.com शुरू की है। उसका लिंक दोगे तो हमें अतिरिक्‍त सुख मिलेगा।
कथाकार
 बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा लेखक होना बेहतर है.
आदमी के पास अगर दो विकल्प हों कि वह या तो बड़ा अफसर बन जाये और खूब मज़े करे या फिर छोटा मोटा लेखक बन कर अपने मन की बात कहने की आज़ादी अपने पास रखे तो भई, बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा सा लेखक होना ज्यादा मायने रखता है. हो सकता है आपकी अफसरी आपको बहुत सारे फायदे देने की स्थिति में हो तो भी एक बात याद रखनी चाहिये कि एक न एक दिन अफसर को रिटायर होना होता है. इसका मतलब यही हुआ न कि अफसरी से मिलने वाले सारे फायदे एक झटके में बंद हो जायेंगे, जबकि लेखक कभी रिटायर नहीं होता. एक बार आप लेखक हो गये तो आप हमेशा लेखक ही होते हैं. अपने मन के राजा. आपको लिखने से कोई रिटायर नहीं कर सकता.
लेखक के पक्ष में एक और बात जाती है कि उसके नाम के आगे कभी स्वर्गीय नहीं लिखा जाता. हम कभी नहीं कहते कि हम स्वर्गीय कबीर के दोहे पढ़ रहे हैं या स्वर्गीय प्रेमचंद बहुत बड़े लेखक थे. लेखक सदा जीवित रहता है, भावी पीढियों की स्मृति में, मौखिक और लिखित विरासत में और वो लेखक ही होता है जो आने वाली पीढियों को अपने वक्त की सच्चाइयों के बारे में बताता है.
तो भाई मेरे, जब लेखक के हक के लिए, लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए और लेखक के सम्मान के लिए आपको पक्ष लेना हो तो आपको ऐसी अफसरी पर लात मार देनी चाहिये जो आपको ऐसा करने से रोके. आखिरकार लेखक ही तो है जो अपने वक्त को सबसे ज्यादा ईमानदारी के साथ महसूस करके कलमबद्ध करता है और कम से कम अपनी अपनी अभिव्यक्ति के मामले में झूठ नहीं बोलता.
ये और ऐसी कई बातें थीं तो शरद जोशी ने मुझसे उस वक्‍त कही थीं जब सचमुच मेरे सामने एक बहुत बड़ा संकट आ गया था कि मुझे तय करना था कि मुझे एक ईमानदार लेखक की अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के पक्ष में खड़ा होना है या अपनी अफसरी बचाने के लिए अपने आकाओं के सामने घुटने टेकने हैं.
एक बहुत बड़ा हादसा हो गया था. शरद जी का भरी सभा में अपमान हो गया था. बेशक सारे एपिसोड में सीधे सीधे मुझे दोषी करार दिया जा सकता था और दोष दिया भी गया था लेकिन एक के बाद एक सारी घटनाएं इस तरह होती चली गयीं मानों सब घटनाओं का सूत्र संचालक कोई और हो और सब कुछ सुनियोजित तरीके से कर रहा हो. मैं हतप्रभ था और समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा कैसे हो गया और क्यों हो गया. बेशक शरद जी का अपमान हुआ था लेकिन मेरी भी नौकरी पर बन आयी थी.
हादसे के अगले दिन सुबह सुबह शरद जी के गोरेगांव स्थित घर जा कर जब मैं इस पूरे प्रकरण के लिए उनसे माफी मांगने आया था तो मैंने उनके सामने अपनी स्थिति स्पष्ट की थी और सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम के बारे में बताया था तो बेहद व्यथित होने के बावजूद शरद जी ने मेरी पूरी बात सुनी थी, मेरे कंधे पर हाथ रखा था और पूरे हादसे को रफा दफा करते हुए नेहा से चाय लाने के लिए कहा था..
तब उन्होंने वे सारी बातें मुझसे कहीं थीं जो मैंने इस आलेख के शुरू में कही हैं.
ये शरद जी की प्यांर भरी हौसला अफजाई का ही नतीजा था कि मैंने भी तय कर लिया था कि जो होता है होने दो, मैं अपने दफ्तर में वही बयान दूंगा जो शरद जी के पक्ष में हो, बेशक मेरी नौकरी पर आंच आती है तो आये..
जिस वक्त की ये घटना है उस वक्त तक मैंने लिखना शुरू भी नहीं किया था और लगभग 34 बरस का होने के बावजूद मेरी दो चार लघुकथाओं के अलावा मेरी कोई भी रचना कहीं भी प्रकाशित नहीं हुई थी. छटपटाहट थी लेकिन लिखना शुरू नहीं हो पाया था.. शरद जी से मैं इससे पहले भी एक दो बार मिल चुका था जब वे एक्सप्रेस समूह की हिन्दी पत्रिका के संपादक के रूप में काम कर रहे थे. तब भी उन्होंने मुझे कुछ न कुछ लिखते रहने के लिए प्रेरित किया था लेकिन मैं नहीं लिख पाया तो नहीं ही लिख पाया.
जिस घटना का मैं जिक्र कर रहा हूं, उस वक्त की है जब राजीव गांधी प्रधान मंत्री थे और वे देश भर में घूम घूम कर आम जनता की समस्या्ओं का परिचय पा रहे थे. इसी बात को ले कर शरद जी ने अपनी अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय रचना पानी की समस्या को ले कर लिखी थी कि किस तरह से राजीव गांधी आम जनता से पानी को ले कर संवाद करते हैं.. मैंने मुंबई में चकल्लस के कार्यक्रम में ये रचना सुनी थी और बहुत प्रभावित हुआ था. उस दिन के चकल्लस में जितनी भी रचनाएं सुनायी गयी थीं, सबसे ज्या्दा वाहवाही शरद जी ने अपनी इस रचना के कारण लूटी थी.
चकल्लस के शायद दस दिन बाद की बात होगी. हमारे संस्थान में एक राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम होना था जिसके आयोजन की सारी जिम्मेवारी मेरी थी. कार्यक्रम बहुत बड़ा था और इससे जुड़े बीसियों काम थे जो मुझे ही करने थे. तभी मुझसे कहा गया कि इसी आयोजन में एक कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया जाये और कुछ कवियों का रचना पाठ कराया जाये. मैंने अपनी समझ और अपने सम्पर्कों का सहारा लेते हुए शरद जी, शैल चतुर्वेदी, सुभाष काबरा, आस करण अटल और एक और कवि को रचना पाठ के लिए आमंत्रित किया था. शरद जी और शैल चतुर्वेदी जी को आमंत्रित करने मैं खुद उनके घर गया था. सब कुछ तय हो गया था.
मैं अपने आयोजन की तैयारियों में बुरी तरह से व्यस्त था. कार्यक्रम में मंच पर रिज़र्व बैंक के गवर्नर, उप गवर्नर, अन्य वरिष्ठ अधिकारी गण उपस्थित रहने वाले थे और सभागार में कई बैंकों के अध्यक्ष और दूसरे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद होते.
कार्यक्रम के‍ दिन सुबह सुबह ही मुझे विभागाध्यक्ष ने बुलाया और पूछा कि कार्यक्रम में कौन कौन से कवि आ रहे हैं. मैं इस बारे में उन्हें पहले ही बता चुका था, एक बार फिर सूची दोहरा दी. तभी उन्होंने जो कुछ कहा, मेरे तो होश ही उड़ गये.
विभागाध्यक्ष महोदय ने बताया कि पिछली शाम ऑफिस बंद होने के बाद कार्यपालक निदेशक महोदय ने उन्हें बुलाया था और बुलाये जाने वाले कवियों के बारे में पूछा था. जब उन्हें बताया गया कि शरद जी भी आ रहे हैं तो कार्यपालक निदेशक ने स्पष्ट शब्दों में ये आदेश दिया कि देखें कहीं शरद जी अपनी पानी वाली रचना न सुना दें. सरकारी मंच का मामला है और कार्यक्रम में रिज़र्व बैंक सहित पूरा बैंकिंग क्षेत्र मौजूद होगा, इसलिए वे किसी भी किस्म का रिस्क ‍ नहीं लेना चाहेंगे.
विभागाध्यक्ष महोदय अब चाहते थे कि मैं शरद जी को फोन करके कहूं कि वे बेशक आयें लेकिन पानी वाली रचना न पढ़ें. मेरे सामने एक बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ था. मैं जानता था कि जो काम मुझसे करने के लिए कहा जा रहा है. वह मैं कर ही नहीं सकता. शरद जी जैसे स्वाभिमानी व्यंग्यकार से ये कहना कि वे हमारे मंच से अलां रचना न पढ़ कर फलां रचना पढ़ें, मेरे लिए संभव ही नहीं था. मैं घंटे भर तक ऊभ चूभ होता रहा कि करूं तो क्या करूं. मुझे फिर केबिन में बुलवाया गया और पूछा गया कि क्या मैंने शरद जी तक संदेश पहुंचा दिया है. मैं टाल गया कि अभी मेरी बात नहीं हो पायी है. उनका नम्बर नहीं मिल रहा है.
उन दिनों हमारे विभाग में डाइरेक्ट टैलिफोन नहीं था और आपरेटर के जरिये नम्बर मांग कर किसी से बात करना बहुत धैर्य की मांग करता था. मैंने उस वक्त तो किसी तरह टाला लेकिन कुछ न कुछ करना ही था मुझे.
मेरी डेस्क पर आयोजन की व्यवस्था से जुड़े कई काम अधूरे पड़े थे जो अगले दो तीन घंटे में पूरे करने थे. अब ऊपर से ये नयी जिम्मेवारी कि शरद जी से कहा जाये कि वे हमारे कार्यक्रम में पानी वाली रचना न सुनायें. सच तो ये था कि शरद जी से बिना बात किये भी मैं जानता था कि वे हमारे कार्यक्रम में पानी वाली रचना ही सुनायेंगे.
चूंकि उन्हें आमंत्रित मैंने ही किया था, ये काम भी मुझे ही करना था. उनसे साफ साफ कहना तो मेरे लिए असंभव ही था लेकिन बिना असली बात बताये उन्हें आने से मना तो किया ही जा सकता था. तभी मैंने तय कर लिया कि क्या करना है. मैंने शरद जी के घर का फोन नम्बर मांगा ताकि उनसे कह सकूं कि बेशक कवि सम्मेललन तो हो रहा है‍ लेकिन हम आपको चाह कर भी नहीं सुन पायेंगे.
यहां मेरे लिए हादसे की पहली किस्त‍ इंतज़ार कर रही थी. बताया गया कि शरद जी दिल्ली गये हुए हैं और कि उनकी फ्लाइट लगभग डेढ़ बजे आयेगी और कि वे एयरपोर्ट से सीधे ही रिज़र्व बैंक के कार्यक्रम में जायेंगे. हो गयी मुसीबत. इसका मतलब मेरे पास शरद जी को कार्यक्रम में आने से रोकने का कोई रास्ता नहीं. वे सीधे कार्यक्रम के समय पर आयेंगे और सीधे आयोजन स्थल पर पहुंचेंगे तो उनसे क्या कहा जायेगा और कैसे कहा जायेगा, ये मेरी समझ से परे था.
मैंने अपने विभागाध्यक्ष को पूरी स्थिति से अवगत करा दिया और ये भी बता दिया कि मैं जो करना चाहता था, अब नहीं कर पाऊंगा. कर ही नहीं पाऊंगा.
मैं अभी कार्यक्रम की तैयारियों में फंसा ही हुआ था कि कई बार पूछा गया कि शरद जी का क्या हुआ. मैं क्या जवाब देता. मुख्य कार्यक्रम साढ़े तीन बजे शुरू होना था और मुझे दो बजे बताया गया कि कैसे भी करके किसी बाहरी एजेंसी के माध्यम से कवि सम्मेालन की आडियो रिकार्डिंग करायी जाये.
हमारे संस्थान की एक बहुत अच्छी परम्प‍रा थी कि आपका पोर्टफो‍लियो है तो सारे काम आपको खुद ही करने होंगे. कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आयेगा और न ही किसी को आपकी मदद के लिए कहा ही जायेगा. मरता क्या न करता, मैं एक दुकान से दूसरी दुकान में रिकार्डिंग की व्य वस्था कराने के लिए भागा भागा फिरा. अब तो इतने बरस बाद याद भी नहीं‍ कि इंतज़ाम हो भी पाया था या नहीं.
मुख्य कार्यक्रम शुरू हुआ. आधा निपट भी गया और बुलाये गये पांचों कवियों में से एक भी कवि का पता नहीं. कहीं सब के सब तो दिल्ली से नहीं आ रहे.. मैं परेशान हाल कभी लिफ्ट के पास तो कभी सभागृह के दरवाजे पर. कुल 5 लिफ्टें और कम्बख्त कोई भी ऊपर नहीं आ रही. मेरी हालत खराब. कार्यक्रम किसी भी पल खत्म हो सकता था और कवि सम्मेलन शुरू करना ही होता. एक भी कवि नहीं हमारे पास.
तभी एक लिफ्ट का दरवाजा खुला और एक कवि नज़र आये. मैं उन्हें फटाफट भीतर ले गया और उनसे फुसफुसाकर कहा कि अभी कोई भी नहीं आया है. बाकियों के आने तक आप मंच संभालिये. संचालन हमारे विभागाध्यक्ष महोदय कर रहे थे. उन्हों ने ज्यों ही इकलौते कवि को देखा, उनके नाम की घोषणा की दी और कवि सम्मेलन शुरू. अब मैं फिर लिफ्टों के दरवाजों के पास खड़ा बेचैनी से हाथ मलते सोच रहा था कि अब मैं किसी भी अनहोनी को नहीं रोक सकता. किसी भी तरह से नहीं.
एक लिफ्ट का दरवाजा खुला. चार मूर्तियां नज़र आयीं. शैल जी, शरद जी, सुभाष काबरा जी और एक अन्‍य कवि. मेरी सांस में सांस तो आयी लेकिन अब मैं शरद जी से क्या कहूं और कैसे कहूं. किसी तरह उन्हें भीतर तक लिवा ले गया. अब जो होना है, हो कर रहेगा. शरद जी ने कुर्सी पर बैठते ही कहा, सूरज भाई एक गिलास पानी तो पिलवाओ. मैं लपका एक गिलास पानी के लिए. आसपास कोई चपरासी या टी बाय नज़र नहीं आया. मैं लाउंज तक भागा ताकि खुद ही पानी ला सकूं. जब तक मैं एक गिलास पानी ले कर आया, शरद जी के नाम की घोषणा हो चुकी थी. पानी पीया उन्हों ने और मंच की तरफ चले.
तय था वे पानी वाली रचना सुनायेंगे. मेरी हालत खराब. इतनी सरस रचना सुनायी जा रही है और सभागृह में एकदम सन्नाटा. सिर्फ शरद जी की ओजपूर्ण आवाज़ सुनायी दे रही है.
गवर्नर महोदय ने उप गवर्नर महोदय की तरफ कनखियों से देखा. उप गवर्नर महोदय ने इसी निगाह से कार्यपालक निदेशक महोदय को देखा और कार्यपालक निदेशक महोदय ने अपनी तरफ से इस निगाह में योगदान देते हुए हमारे विभागाध्यक्ष को घूरा और आंखों ही आंखों में इशारा किया कि ये रचना पाठ बंद कराया जाये. हमारे विभागाध्यक्ष महोदय की निगाह निश्चित ही मुझ पर टिकनी थी और मेरे आगे कोई नहीं था. मैंने कंधे उचकाये – मैं कुछ नहीं कर सकता. मंच पर तो आप ही खड़े हैं..
एक बार फिर तेज़ निगाहों का आदान प्रदान हुआ और एक तरह से विभागाध्‍यक्ष को डांटा गया कि वे ये रचना पाठ बंद करायें. नहीं तो.. नहीं तो.. मैं आगे कल्पना नहीं कर पाया कि इस नहीं तो के कितने आयाम हैं. विभागाध्यक्ष डरते डरते शरद जी के पास जा कर खड़े हो गये लेकिन कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाये. यहां ये बताना प्रासंगिक होगा कि विभागाध्यक्ष खुद व्यंग्य कवि थे और दिल्ली में बरसों से कवि सम्मेलनों का सफल संचालन करते रहे थे. एक और कड़ी निगाह विभागाध्यक्ष की तरफ और उन्होंने धीरे से शरद जी से कहा कि आप कोई और रचना पढ़ लें, इसे न पढ़ें.
यही होना था. शरद जी हक्के बक्के. समझ नहीं पाये, क्या कहा जा रहा है उनसे.. फिर उन्होंने काग़ज़ समेटे और माइक पर ही कहा - ये तो आपको पहले बताना चाहिये था कि मुझे कौन सी रचना पढ़नी है और कौन सी नहीं, मैं पहले तय करता कि मुझे आना है या नहीं. मैं यही रचना पढूंगा या फिर कुछ नहीं पढूंगा.. बोलिये क्या कहते हैं...
एक लम्बा सन्नाटा. . . किसी के पास कोई शब्द नहीं.. कोई उपाय नहीं.. बिना शब्दों के ही सारा कारोबार हो रहा था.. अब शरद जी मंच से नीचे उतरे और सीधे सभागृह के बाहर..
अनहोनी हो चुकी थी.. मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था.. हमारे एक वरिष्ठ अधिकारी जो कभी टाइम्स में पत्रकार रह चुके थे और कभी बंबई में शरद जी के साथ धोबी तलाव इलाके में एक लॉज में रह चुके थे, शरद जी को मनाने उनके पीछे लपके.
शरद जी बुरी तरह से आहत हो गये थे.. ये बताने का वक्त नहीं था कि ये सब क्यूं कर हुआ और इस स्थिति को कैसे भी करके टाला ही नहीं जा सका.
अगले दिन अखबारों में ये खबर थी. ऑफिस में मुझसे स्प्ष्टी करण मांगा गया और मेरे लिए आने वाले दिन बहुत मुश्किल भरे रहे.. लेकिन शरद जी से‍ मिलने के बाद मेरी हिम्मत बढ़ी थी और मैं किसी भी अनचाही स्थिति के लिए अपने आपको तैयार कर चुका था.. शरद जी से उस मुलाकात के बाद ही मुझमें लिखने की हिम्मत आयी थी. अब मुझे लिखते हुए बीस बरस होने को आये.. शरद जी के वे शब्दे आज भी हर बार कलम थामते हुए मेरे सामने सबसे पहले होते हैं‍ कि बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा सा लेखक होना ज्यादा मायने रखता है.
मैं बेशक अपने संस्थान में मझोले कद का अफसर हूं लेकिन अपना परिचय छोटे मोटे लेखक के रूप में देना ही पसंद करता हूं. मुझे पता है,. जब तक चाहूं सक्रिय रह सकता हूं.. लेखन से रिटायरमेंट नहीं होता ना....
सूरज प्रकाश

Wednesday, May 18, 2011

स्याह रात में चमकता जुगनू- जैसे उग आया अंधेरे के बीच एक सूरज


हिन्दी में दलित धारा के मूल्यांकन को लेकर एक बहस लगातार जारी है। क्षेत्रवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, लिंगभेद और अन्य गैर-प्रगतिशील मूल्यों के विरोध के साथ अम्बेडकर के विचार से पोषित हिन्दी की दलित धारा किसी भी जनवादी संघर्ष के साथ कदम दर कदम बढ़ाते हुए है।  साम्राज्यवादी पूंजी की मुखालफ़त और आवाम की खुशहाली का स्वप्न उसकी संवेदनाओं का हिस्सा है। ऎसे तमाम मसलों से टकराते हुए और एक स्पष्ट पक्षधरता की वकालत के साथ, अपनी उपस्थित के एक बहुत छोटे से अंतराल में ही, हिन्दी दलित धारा ने आलोचना के क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। विधाओं के तमाम क्षेत्रों में दलित धारा के रचनाकारों की आवाजाही कोई आनायास नहीं है।
ओम प्रकाश वाल्मीकि मूलतः कवि हैं लेकिन कविता, कहानी, नाटक, आलोचना आदि के बीच उनके लगातार हस्तक्षेप से हिन्दी का पाठक जगत अपरिचित नहीं है। सदियों का संताप उनकी पहली काव्य पुस्तिका है, जिसने बिना ज्यादा शौर मचाए हिन्दी में दलित धारा की पदचाप को स्वर दिया है। बेशक उस पुस्तिका का प्रकाशन एक छोटे से शहर के बेहद अनजान  प्रकाशन से हुआ और प्रकाशन के वक्त हिन्दी में दलित धारा की किंचित अनुपस्थिति के चलते काव्य पुस्तिका में दलित धारा को दर्ज करने का एक संकोच रहा पर कथ्य के लिहाज से देख सकते हैं कि उन रचनाओं की काव्य संवेदना तत्कालीन हिन्दी की कविताओं से कुछ भिन्न स्वर के साथ हैं-
यदि तुम्हें,
धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाये
पानी तक न लेने दिया जाये कुंए से
दुतकारा-फटकारा जाये
चिलचिलाती दुपहर में
कहा जाये तोड़ने को पत्थर
काम के बदले
दिया जाये खाने को जूठन
तब तुम क्या करोगे।
हाल में ही लिखी कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि की कुछ अन्य कविताओं यहां प्रस्तुत है। इन कविताओं पर अलग से बातचीत हो,  पाठकों से अनुरोध एवं अपेक्षा है कि वे हिस्सेदारी करें।










opvalmiki@gmail.com
०९४१२३१९०३४

शब्द झूठ नहीं बोलते

मेरा विश्वास है
तुम्हारी तमाम कोशिशों के बाद भी
शब्द जिन्दा रहेंगे
समय की सीढियों पर
अपने पांव के निशान
गोदने के लिए
बदल देने के लिए
हवाओं का रुख

स्वर्णमंडित सिंहासन पर
आध्यात्मिक प्रवचनों में
या फिर संसद के गलियारॉं में
अखबारों की बदलती प्रतिबद्धताओं में
टीवी और सिनेमा की कल्पनाओं में
कसमसाता शब्द
जब आयेगा बाहर
मुक्त होकर
सुनाई पडेंगे असंख्य धमाके
विखण्डित होकर
फिर –फिर जुडने के

बंद कमरों में भले ही
न सुनाई पडे
शब्द के चारों ओर कसी
सांकल के टूटने की आवाज़

खेत –खलिहान
कच्चे घर
बाढ में डूबती फसलें
आत्महत्या करते किसान
उत्पीडित जनों की सिसकियों में
फिर भी शब्द की चीख
गूंजती रहती है हर वक्त

गहरी नींद में सोए
अलसाये भी जाग जाते हैं
जब शब्द आग बनकर
उतरता है उनकी सांसों में

मौज-मस्ती में डूबे लोग
सहम जाते हैं

थके हारे मजदूरों की फुसफुसाहटों में
बामन की दुत्कार सहते
दो घूंट पानी के लिए मिन्नते करते
पीडितजनों की आह में
जिन्दा रहते हैं शब्द
जो कभी नहीं मरते
खडे रहते हैं
सच को सच कहने के लिए

क्योंकि,
शब्द कभी झूठ नहीं बोलते !
4 मई,2011



 जुगनू


स्याह रात में
चमकता जुगनू
जैसे उग आया
अंधेरे के बीच
एक सूरज

जुगनू अपनी पीठ के नीचे
लटकाये घूमता है
एक रोशनी का लट्टू
अंधेरे मे भटकते
जरूरतमंदों को राह दिखाने के लिए

जुगनू की यह छोटी सी चमक भी
कितनी बडी होती है
निपट अंधेरे में

जिसके होने का सही-सही अर्थ
जानते हैं वे
जो अंधेरे की दुनिया में
पडे हैं सदियों से

जिनका जन्म लेना
और मरना
एक जैसा है

जिंनके पुरखे छोड जाते हैं
विरासत में
अंधेरे की गुलामगिरि

रोशनी के खरीदार
एक दिन छीन लेंगे जुगनू से

उसकी यह छोटी - सी चमक भी
बंद कर लेंगे तिजोरी में
जो बेची जायेगी बाजार में
ऊंचे दामों पर
संस्कृति का लोगो चिपका कर !



29.04.2011




अंधेरे में शब्द

रात गहरी और काली है
अकालग्रस्त त्रासदी जैसी

जहां हजारों शब्द दफन हैं
इतने गहरे
कि उनकी सिसकियां भी
सुनाई नहीं देती


समय के चक्रवात से भयभीत होकर
मृत शब्द को पुनर्जीवित करने की
तमाम कोशिशें
हो जायेंगी नाकाम
जिसे नहीं पहचान पायेगी
समय की आवाज़ भी

ऊंची आवाज में मुनादी करने वाले भी
अब चुप हो गये हैं
’गोद में बच्चा
गांव में ढिंढोरा’
मुहावरा भी अब
अर्थ खो चुका है

पुरानी पड गयी है
ढोल की धमक भी

पर्वत कन्दराओं की भीत पर
उकेरे शब्द भी
अब सिर्फ
रेखाएं भर हैं

जिन्हें चिन्हित करना
तुम्हारे लिए वैसा ही है
जैसा ‘काला अक्षर भैंस बराबर’
भयभीत शब्द ने मरने से पहले
किया था आर्तनाद
जिसे न तुम सुन सके
न तुम्हारा व्याकरण ही


कविता में अब कोई
ऎसा छन्द नहीं है
जो बयान कर सके
दहकते शब्द की तपिश

बस, कुछ उच्छवास हैं
जो शब्दों के अंधेरों से
निकल कर आये हैं
शुन्यता पाटने के लिए !

3 मई,2011

Monday, May 16, 2011

कहीं खण्डित न हो जाये सौन्दर्य को उपजाने वाली चेतना

ओसामा के मारे जाने के समाचार से खुश होती दुनिया की खबरें अखबारों और दूसरे माध्यमों पर पिछले दिनों खूब छायी रही। तालिबानी विध्वंश की आक्रामकता की पराजय को देखने की ख्वाइश शायद हर सचेत नागरिक के भीतर थी। आतंक की परिभाषा को गढ़्ते बाजार की चकाचौंध दुनिया के प्रभाव में डूबे  लोगों की खुशी के बाबत तो क्या ही कहना। बल्कि कहा जाये कि जीवन में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप करते बाजार के प्रभाव के प्रतिरोध की धाराओं में बंटे लोगों के सामने एक संकट स्पष्ट रहा कि आक्रामकता के विरोध में सिर्फ़ व्यापारिक हितों की चिन्ता से भरे अमेरिका का क्या करें ? अपनी बात को बहुत साफ साफ दोनों ही तरह की  आक्रामकता को लक्षित करने की कोशिश में कई बार किसी एक के साथ दिख जाना हो जाता रहा। हाना मखमलबाफ़ की फ़िल्म   इस द्रष्टि से देखी जाने योग्य फ़िल्म है।  इरादों में  तालिबानी आक्रमता और मानवीय चिंताओं पर झूठी अमेरिकी संवेदनशीलता- जो बम वर्षकों का  बेहद दिल्चस्प खेल है, दोनों को ही लक्षित करती एक युवा फ़िल्मकार की फ़िल्म Budha collapsed out of shame एक महत्वपूर्ण फ़िल्म है। बुध की करूणा में उसका संयोजन एक अनूठा प्रयोग  है। 

बाखती ! यदि घर जाना चाहती हो तो अभी मर जाओ।
यह किसी अमेरीकी सिपाही की सीख नहीं एक दोस्त की सीख है, अपनी हम उम्र दोस्त को जो तालिबानी आक्रामकता के खेल में निरीह अफगानी नजर आ रही है। वही दोस्त जिसकी हर कोशिश उस युद्ध से और युद्ध की आक्रामकता से बाहर निकलने की है। 
जीने के लिए मरना जरूरी है।  तालिबानी आक्रमकता को झेलने के बाद टूटी बोध गुफाओं में जीवन बिताते बच्चों के जीवन में तालिबानी होना भी एक खेल हो जाता है। कथा पात्र बाखती युद्ध के ऐसे खेल की बजाय जीवन को जगमगाने का खेल खेलना चाहती है। स्कूल जाना चाहती है। उस कहानी को फिर-फिर पढ़ना चाहती जिसको सुनना ही उसे लुत्फ देता रहा है। वही कहानी जिसमें एक आदमी पेड़ के नीचे लेटा है। हम उम्र और पड़ोसी अब्बास जिसको जोर-जोर से पढ़ता है। वही अब्बास जिसे तालीबानी होते बच्चे अमेरिका का प्रतीक बना देना चाहते है, बावजूद इसके कि बुद्ध की सी तटस्थता में वह शान्त बना रहता है। अमेरीकी होता हुआ कहीं दिखता ही नहीं।
युवा फिल्मकार हाना मखमलबाफ़ की फिल्म  Budha collapsed out of shame एक रूपक है। एक खेल है जिसे देखने से ज्यादा खेलने का मन करता है। तकनीक की दृष्टि से कहें चाहे कथ्य की दृष्टि से, बहुत ही लाजवाब फिल्म है। एक उम्दा वृत्तचित्र का सा सच उदघाटित करती।  तालिबानी दौर की आक्रामकता जिसमें खूबसूरत आंखों को आजादी नहीं कि दुनिया के खूबसूरत को मंजर को खुली आँखों से देख सके। बबलगम खाती बेफिक्र किस्म की स्त्री को कैद करना तो और भी जरूरी है। लिपिस्टिक अपने पास रखने वाली स्त्री को छूट नहीं दी जा सकती कि वह स्कूल भी जाए। ईश्वर के बताये रास्ते पर दुनिया को चलाने के लिए उन्हें कैद किया जाना जरूरी है। कोई अमेरीकी बम वर्षक नहीं आता मुक्त कराने पर एक खेल चलता रहता है। बाखती स्कूल के लिए निकली है। अण्डे बेचने की थकाऊ कार्रवाई के बाद भी पैसे हासिल नहीं हुए। अण्डों के बदले में जुटाई गई रोटी को बेचने के बाद ही नोट-बुक खरीदी जा सकी है। पेंसिल फिर भी नहीं। स्कूल का कायदा नोट-बुक के साथ पेंसिल भी ले जाने का है। माँ की लिपिस्टिक पेंसिल हो सकती है, यह कल्पना ही इस फिल्म को वह उछाल दे देती है कि फिर तो खेल खेल रह ही नहीं जाता।
हिंसा के खेल को बुद्ध की सहजता से पार पाने की युक्ति बेशक अतार्किक और अव्यवहारिक हो पर युवा फिल्मकार हाना मखमलबाफ़ जिस खूबसूरती से दृश्य रचती है उसमें खेल चरमोत्कर्स तार्किक परिणीति तक पहुँचता है। बाखती मृत्यु के आगोश में दुबक जाने को मजबूर है। हथियारबंद  तालिबानी गिरोह से मुक्ति आत्म समर्पण की युक्ति से ही संभव है। खास तौर पर ऐसे में जब चारों ओर एक घनीभूत तटस्थता छायी हो। चौराहे का सिपाही नियम के कायदे में बंधा बंधकों को छुड़ाने में अपनी असमर्थता जाहिर कर रहा हो। बल्कि असमर्थता जाहिर करते वक्त भी उसके चेहरे पर जब कोई पश्चाताप या ग्लानी जैसा भाव भी मौजूद न हो। बस एक काम-काजी किस्म का व्यवहार ही उसको संचालित किये हो। मेहनतकश आवाम भी जब युद्धोन्मांद में फँसी लड़की की कातर पुकार पर तव्वजो देने की बजाय बहुत ही तटस्थता से बच्चों को दूसरी जगह जाकर खेलने को कह रहा हो। दूसरी जगह- जहाँ जारी खेल बेशक खूनी आतंक की हदों को पार कर जाए पर उनके काम में प्रत्यक्ष रुकावट डालने वाला न हो। मध्य एशिया में जारी हमले के दौरान अमेरीकी प्रतिरोध की दुनिया का कदम इससे भिन्न नहीं रहा है। और उसके चलते ही कब्जे की लगातार आगे बढ़ती कार्रवाई जारी है, यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं।
एक मारक स्थिति से भरी कैद से निकल भाग स्कूल पहुँची लड़की को कक्षा में बैठने भर की जगह हासिल करने के लिए की जाने वाली मश्त अपने प्रतीकार्थ में व्यापक है। झल्लाहट और परेशनी के भावों को चेहरे पर दिखाये जाने की बजाय उदात मानवीय भावना से ताकती आंखों वाली बाखती अपने दृढ़ इरादों और खिलंदड़पन के साथ है। लिपिस्टिक पेंसिल की जगह नोट-बुक पर लिखे जाने के लिए प्रयुक्त होने वाली चीज नहीं, सौन्दर्य का प्रतीक है और इसी वजह से वह उस चुलबुली लड़की को अपनी गिरफ्त में ले लेती है जिसके नजदीक ठुस कर बैठी है बाखती। छीन-झपट कर हथिया ली गई लिपिस्टिक को बेशऊर ढंग से पहले वह अपने होठों पर लगाती है, फिर उतनी ही उत्तेजना के साथ बाखती के होठों को भी रंग देने के लिए आतुर है। उसके इस तरह झपटने से सौन्दर्य को उपजाने वाली चेतना खण्डित हो सकती है, मानवीय सरोकारों से भरी बाखती की अदायें इस बात का अहसास करा देती हैं। लिपिस्टिक बाखती की जरूरत नहीं, उसे तो एक अद्द पेंसिल चाहिए जो उन अक्षरों को नोट-बुक में दर्ज करने में सहायक हो जिसे अघ्यापिका दोहराते हुए बोर्ड पर लिखती जा रही है। बाखती लिपिस्टिक के उपयोग को भी जानती है और सौन्दर्य को कैसे सहेजता से उकेरा जा सकता है, वाकिफ है। तालीबानी अमेरीकी युद्ध खेलते बच्चों की कैद में फँसी सुंदर आँखों वाली लड़की के कागजी नकाब को उतार कर जिस अंदाज में उसने लिपिस्टिक के प्रयोग से उसकी सुदरता को और बढ़ा दिया था बिल्कुल उसी अंदाज में, चुलबुली लड़की के हाथ से लिपिस्टिक लेकर हौले-हौले वह उसके होठों पर, गालों पर सौन्दर्य की लाली के चकते छोड़ते हुए उसे सजाने लगती है। एक-एक कर कक्षा की हर लड़की को सजाकर सुंदरता का संसार रच देना चाहती है। बोर्ड पर अक्षर उकेरती अध्यापिका बेखबर है कि फैल जा रही लिपिस्टिक को थूक की लार से पोंछ-पोंछ कर तराश देने की कार्रवाई में जुटी बच्चियां अपने उस बचपन को छलांगती जा रही हैं जो दक्षिणपंथी उभारों से भरी तालीबानी दिनों के रूप में उनके जीवन का शुरूआती दौर है। तालीबानी विध्वंस के प्रतिरोध में यह दृश्य एक स्वाभाविक लय के साथ फिल्मांकित है।
तालिबानी बने बच्चों द्वारा अमेरिका के प्रतीक बना दिए अब्बास के प्रति बाखती की आत्मीयता बेहद मानवीय है। हाथ पकड़कर स्कूल पहुँचा देने का साथ भर। मुसीबत के वक्त मद्द की गुहार भर का। युवा फिल्मकार सचेत है और आत्मीय प्रेम के चालू मुहावरे में संबंधों को फिल्माने से बच निकलती है। जबकि उस तरह के संबंध पनपने की स्वभाविक गुंजाइश साफ-साफ हैं। यहां इस बात का उल्लेख इधर हाल के दिनों में आई उन हिन्दी की कहानियों के संबंध में करना मौजू है जिनमें कथा विन्यास को गूंथते हुए ऐसी स्थितियों तक पहुँचने की पकड़ में आ जाने वाली युक्तियां साफ दिखाई देती हैं। एक गम्भीर विषय को दैहिक विन्यास तक सीमित कर देने वाले विवरणों से भरे और लहराते पेटीकोटों की छायाओं से भरी ऐसी रचनाओं का संसार क्यों अराजक हो जाता है, युवा फिल्मकार मखमलबाफ की इस फिल्म से सीखा जा सकता है।           



विजय गौड़
  (jansandesh times में पूर्व प्रकाशित)

Sunday, May 15, 2011

विश्वास रखो, रास्ते में विश्वास रखो


पिछले साल 14 जुलाई, २०१० को जब बादल दा ८५ के हुए थे, हम में बहुत से साथियों ने  लिख कर और उन्हें सन्देश भेजकर जन्मदिन की बधाई के साथ  यह आकांक्षा प्रकट की थी कि वे और लम्बे समय तक हमारे बीच रहें . लेकिन परसों १३ जुलाई ,२०११ को वे हम सबसे अलविदा कह गए.  भारतीय रंगमंच के  क्रांतिकारी, जनपक्षधर  और अनूठे रंगकर्मी बादल दा को जन संस्कृति मंच लाल सलाम पेश  करता है.  उनके उस लम्बे, जद्दोजहद  भरे सफर को  सलाम पेश  करता है, जो १३ मई  को अपने अंतिम मुकाम को पहुंचा.  लेकिन हमारे संकल्प , हमारी स्मृति  और सबसे बढ़कर  हमारे कर्म में बादल दा का सफ़र कभी विराम नहीं लेगा. क्या उन्होंने ही नहीं लिखा था, "और विश्वास  रखो, रास्ते में विश्वास  रखो. अंतहीन रास्ता, कोइ मंदिर नहीं हमारे लिए. कोइ भगवान नहीं, सिर्फ रास्ता. अंतहीन रास्ता"  
     जनता का हर बड़ा उभार अपने सपनों और विचारों को विस्तार देने के लिए अपना थियेटर माँगता है. बादल दा का थियेटर का सफ़र नक्सलबाड़ी  को पूर्वाशित करता सा शुरू हुआ, जैसे कि मुक्तिबोध की ये अमर पंक्तियाँ जो आनेवाले कुछेक वर्षों में ही विप्लव की आहट को  कला की अपनी ही अद्वितीय घ्राण- शक्ति से सूंघ लेती हैं-
'अंधेरी घाटियों के गोल टीलों, घने पेड़ों में
कहीं पर खो गया,
महसूस होता है कि वह , बेनाम
बेमालूम  दर्रों के इलाकों में 
( सचाई के सुनहरे तेज़ अक्सों के धुंधलके में )
मुहैय्या कर रहा  लश्कर
हमारी हार का बदला चुकाने आएगा
संकल्प्धर्मा चेतना का रक्ताप्लावित स्वर
हमारे ही ह्रदय का गुप्त स्वर्णाक्षर
प्रकट हो कर विकट हो जाएगा. 
  नक्सलबाड़ी के महान विप्लव ने जनता के बुद्धिजीवियों से मांग की कि वे जन -कला की क्रांतिकारी भूमिका के लिए आगे आएं.  सिविल इंजीनियर और  टाउन प्लैनर  के पेशे  से अपने वयस्क सकर्मक जीवन की शुरुआत  करने वाले बादल दा जनता की चेतना के  क्रांतिकारी दिशा में बदलाव के  किए तैय्यार करने के  अनिवार्य उपक्रम के  रूप में नाटक और रंगमंच को  विकसित करनेवाले अद्वितीय रंगकर्मी के रूप में इस भूमिका के  लिए समर्पित हो गए.  ”थर्ड थियेटर” की  ईजाद के साथ उन्होने  जनता और  रंगमंच, दर्शक और कलाकार की दूरी को  एक झटके  से तोड  दिया. नाटक अब हर कहीं हो सकता था. मंचसज्जा, वेषभूशा और  रंगमंच के  लिए हर तरीके  की विशेष ज़रूरत को उन्होंने  गैर- अनिवार्य बना दिया. आधुनिक नाटक गली, मुहल्लों ,चट्टी-चौराहों , गांव-जवार तक यदि पहुंच सका , तो  यह बादल दा जैसे महान रंगकर्मी की भारी सफलता थी. 1967 में स्थापित ”शताब्दी” थियेटर संस्था के  ज़रिए उन्होंने  बंगाल के  गावों में  घूम-घूम कर राज्य आतंक और गुंडा वाहिनियों के हमलों का खतरा उठाते हुए जनाक्रोश को  उभारनेवाले व्यवस्था-विरोधी  नाटक किए. उनके  नाटको  में नक्सलबाडी किसान विद्रोह का ताप था. 
     हमारे आन्दोलन  के नाट्यकर्मियों ने   खासतौर पर  १९ ८० के दशक में बादल दा से प्रेरणा  और प्रोत्साहन प्राप्त किया. वे  इनके बुलावे पर इलाहाबाद और  हिंदी क्षेत्र के दूसरे हिस्सों में भी बार बार आये, नाटक किए, कार्यशालाएं   कीं, नवयुवक  रंगकर्मियों  के साथ-साथ रहे , खाए , बैठे  और उन्हें  सिखाया.  जब मध्य बिहार के क्रांतिकारी किसान संघर्षों के इलाकों में युवानीति और हमारे दूसरे नाट्य-दलों पर सामंतों के हमले होते तो साथियों को जनता के समर्थन से  जो बल मिलता सो मिलता ही, साथ ही यह भरोसा और प्रेरणा भी मन को बल प्रदान करती कि बादल सरकार जैसे अद्वितीय कलाकार बंगाल में  यही कुछ झेल कर जनता को जगाते आए हैं.
    एबम इंद्रजीत, बाकी इतिहास, प्रलाप,त्रिंगशा शताब्दी, पगला घोडा, शेष  नाइ, सगीना महतो ,जुलूस, भोमा, बासी खबर और  स्पार्टाकस(अनूदित)जैसे उनके  नाटक भारतीय थियेटर को  विशिष्ट  पहचान तो  देते ही हैं, लेकिन उससे भी बडी बात यह है कि बादल दा के  नाटक किसान, मजूर, आदिवासी, युवा, बुद्धिजीवी, स्त्री, दलित आदि समुदाय के संघर्षरत लोगों के  साथी हैं, उनके  सृजन और संघर्ष में  आज ही नहीं, कल भी मददगार होंगे ,उनके  सपनॉ के  भारत के  हमसफर होंगे.
( प्रणय कृष्ण , महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी)