Thursday, November 15, 2018

कथाकार पूनम तिवारी की कहानी बेबसी

नया ज्ञानोदय के सितंबर 2016 के अंक में कथाकार पूनम तिवारी की कहानी "मौसम सी  बदल गई  जिंदगी" पढ़ने का एक सुयोग हुआ। उससे पहले मैंने पूनम तिवारी जी की कोई भी रचना नहीं पढ़ी थी। वह एक अलग मिजाज की कहानी है। खासतौर पर गंवई आधुनिकता में डूबी कहानियों से कुछ कुछ अलग मिजाज की कहानी। चाहता था कि उस कहानी को ब्लाग में लगा कर अपने अध्ययन के लिए सहेज लूं। यही सोचकर रचनाकार पूनम तिवारी जी से सम्पर्क साधकर उस कहानी को भेजने का आग्रह किया था। संभवत: वह कहानी उनके प्रकाशनाधीन संग्रह का हिस्सा है और पाठक उसे पुस्तक से भी पढ़ पाएंगे। अभी उनके द्वारा भेजी गयी कहानी ‘बेबसी’ को यहां प्रकाशित करना संभव हो पाया है। कथाकार पूनम तिवारी के तीन उपन्याास एवं दो कहानी संग्रह एवं एक नाटक अभी तक प्रकाशित हैं।

बीसवीं सदी के आखिरी दशक तक जिस मन मिजाज की कहानियां अक्सर पढ़ने को मिल जाती थी, ‘बेबसी’ कमोबेश एक वैसी ही रचना है। वे कहानियां जिनमें जीवन की आपाधापी का सच गरीब गुरबों के जीवन संघर्ष से गुंथा रहता था। इस तरह की कहानियों की अपनी एक खास विशेषता होती है कि इनके जरिये पाठक लेखक के उस सच से वाकिफ हो सकने का सुयोग पा जाता है जो लेखक की संवेदनाओं, जीवन दृष्टि और मूल्यपबोध को परिभाषित करते हैं।

बेबसी 


पूनम तिवारी 
मोबाइल - 9236164175   



आज भी पूरा दिन यूँ ही निकल गया। सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम, काम की तलाश में मानों शरीर का सारा पानी ही सूख गया हो। पेट के लिए तो वैसे भी पिछले दो दिनों से अन्न का दाना भी नहीं नसीब हुआ था। गाँव में सूखा पड़ने के बाद भुखमरी के हालात में रामलाल ने गाँव से शहर की ओर रुख किया। चार बच्चों और पत्नी के किसी तरह सिर छिपाने वास्ते ठौर बना कर निकल पड़ा, दो जून की रोटी के जुगाड़ में, थोड़ी सी मशक्कत के पश्‍चात् एक चूड़ी के कारखाने में जैसे तैसे पेट भरने का इन्तजाम हो गया। धधकती आग की लौ पर काँच पिघलाने से पेट की आग ठण्डी होने लगी।
अभी कुछ माह ही बीते थे। रामलाल को, कारखाने में काम करते हुए, एक दिन तैयार फैन्सी चूड़ी का बक्सा गोदाम में ले जाते वक्त हाथ से छूट गया। जमीन में बिखरे रंग-बिरंगे काँच के टुकड़ों को रामलाल काँपती टांगों व विस्फरित आँखों से, यूँ देखने लगा, मानों काँच के टुकड़े नहीं, वह स्वयं टूट कर बिखर गया हो। उसे यूँ बुत बना खड़ा देख, वहाँ काम कर रहे रामलाल के साथी एक स्वर में चिल्लाये ‘‘भाग रामलाल जल्दी भाग, बड़ा बेरहम है मालिक, बिना दिहाड़ी दिये, बन्दी बनाकर भरपायी करवायेगा, जल्दी भाग यहाँ से, निकल बाहर।’’ अपने उतारे हुए कपड़े, चप्पल सब छोड़कर भागा वह सिर्फ कच्छा बनियाइन में, हाँफता-डीपता नंगे पाँव, कारखाने के बाहर आकर एक लम्बी सी सांस  ली,  उसे  महसूस हुआ यदि कुछ क्षण कारखाने से बाहर निकलने में और लग जाते तो शायद उसका दम ही घुट जाता।
कारखाने की आग अभी भी धधक रही थी, लेकिन रामलाल के घर का चूल्हा ठण्डा पड़ गया था। बच्चे भूख-भूख की रट लगा कर बेहाल हुए जा रहे थे। बच्चों का मुरझाया सूखा चेहरा देखकर पिता व्याकुल हो रहा था।
उस घड़ी को और अपने आप को कोस रहा था। फर्श पर हाथ पटक-पटक कर उन्हें दण्डित कर चुका था जिन हाथों से चूड़ी का बक्सा छूटा था। रात गहरा गयी थी, लेकिन नींद कोसों दूर थी। बच्चे श्वान निद्रा सो जाग रहे थे, और निरन्तर खाने की गुहार लगा रहे थे ‘‘अम्मा कुछ खाने को दो, बड़ी भूख लगी है।’’ बच्चों के लगातार एक ही राग सुनसुन कर कान थक चुके थे, बच्चों की आवाजें अब रामलाल के कानों में शीषे पिघला रही थी। वह दांत पीसता हुआ उठा। उसे लगा बच्चों का गला ही दबा दे। बन्द हो जाये आवाज, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी, दूसरे ही पल बच्चों की तरफ से ध्यान हटाकर पत्नी की ओर मुड़ा जो बच्चे को पानी पिलाकर-पिलाकर कर चुप कराने का असफल प्रयास कर रही थी। रामलाल ने अपनी सारी भड़ास बेकसूर पत्नी पर निकाल दी ‘‘कैसी माँ हो तुम ? बच्चों को चुप करवा कर सुला भी नहीं सकती’’ गाँव की सीधी सरल पत्नी जिसने शहर की भीड़ भरी सड़कों पर अभी तक ठीक से चलना भी नहीं सीखा था, पति को अनिमेष मूक देखती रह गयी। रामलाल पत्नी से ज्यादा देर नजरें नहीं मिला सका। बाहर निकल गया। घुटनों पर सिर टिका कर बैठ गया। फुटपाथ में बैठकर भोर होने का इन्तजार करने लगा। पत्नी को डाटने के पश्‍चात स्वयं आत्मग्लानि से भर गया। वह सोचने लगा। जब वह कमा कर भी लाता है, तब भी शायद ही किसी रोज पत्नी पूरा पेट भोजन कर पाती होगी। चार बच्चों और पति से जो बचा कुचा मिलता वह अपने लिए उसे ही पर्याप्त समझती है। उसने कभी शिकायत नहीं की, रामलाल को आज पहली बार अहसास हुआ कि परिवार नियोजन के बारे में सोचा होता। चार बच्चों की जगह दो बच्चे होते तो उसकी मेहनत से कमाया हुआ कुछ हद तक पूरा पड़ जाता। विचारों का जाल बुनते-बुनते वहीं फुथपाथ पर लेट गया। चिन्तातुर करवटें बदलता रहा। नींद तो कोसों दूर थी। भोर के चार बज रहे थे। रामलाल उठा। जिधर रास्ता समझ आया उधर ही चल पड़ा। न रास्ते का ज्ञान था, न मंजिल का पता था, बस चलता जा रहा था। चलते-चलते आ पहुँचा चौरास्ते वाले चौराहे पर। चौराहा दूधिया रोशनी से नहाया हुआ था। कुछ क्षण ठहर गया। चार रास्ते वह भी नितान्त अन्जान, चौराहे पर फैली रोशनी आँखों में चुभने लगी। शरीर का तापमान बढ़ने लगा। उसे महसूस हुआ यदि कुछ क्षण और रुका तो कहीं शरीर में फफोले न पड़ जायें। वह भागा अपने शरीर में मौजूद पूरे दम के साथ, रुक कर पलटा, रोशनी बहुत दूर हो चुकी थी। वह अपने आप से ही बुदबुदाया ‘‘हम गरीब को रोशनी नहीं, रोटी की दरकार है।’’ चलते चलते आ पहुँचा स्टेशन के बाहर शायद कोई गाड़ी अपने गन्तव्य में पहुँची थी। कुछ मुसाफिर अपना सामान स्वयं उठा सकने में समर्थ थे, लेकिन कुछ नजाकतवश और कुछ शारीरिक अक्षमतावश उनकी नजरें कुली की तलाश में थी। रामलाल भी आगे बढ़ा। काम मिलने की सुई नोंक समान उम्मीद से ही उसका मन का मयूर झूमकर नाच उठा। वह लपका कुली.कुली की आवाज दे रहे एक सज्जन की ओर, हाथ जोड़ कर बोला।
‘‘बाबू साहब सामान उठायें ?’’ दो बड़े ब्रीफकेस, एक बड़ा बैग, एक गत्ते का  डिब्बा, कूल जग सब कुछ लाद दिया। शरीर में बिना कुछ खाये पिये जान तो थी नहीं, लेकिन चार पैसे मिल पाने की ललक से, न जाने घोड़े जैसी ताकत कहाँ से आ गयी थी। अभी दस पन्द्रह कदम ही चला होगा। उधर से जिन सज्जन का सामान था उनका बेटा दौड़ता हुआ आ गया। पास आकर बोला ‘‘बिल्ला नं0 कितना है ? कहाँ है बिल्ला ?’’ रामलाल तो इन सबका मतलब भी नहीं जानता था। वह भौचक्का सा देखता रहा ‘‘पापा आप भी, ये रेलवे का कुली नहीं है, पलक झपकते ही सामान इधर.उधर कर देते हैं ये लोग। उतारो सामान’’ रामलाल ने लाख समझाने की कोशिश की। वह उठाईगीर नहीं बेहद जरूरतमन्द है, लेकिन यह बात सत्य है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है। अचानक अपना जीवन ही निरर्थक लगने लगा। जालिम दुनिया और बेदर्द लोगों के बीच से अपने को समाप्त करने के उद्देष्य से उसके कदम तेजी से प्लेटफार्म की ओर बढ़ रहे थे, और आँखों के सामने पटरी पर दौड़ती तेजरफ्तार की ट्रेन घूम रही थी। वह बढ़ता जा रहा था, तभी दो मासूम बच्चे सामने आकर खड़े हो गये। जिनकी उम्र तकरीबन रामलाल के बच्चों के बराबर थी। ‘‘बाबू, कुछ दे दो, बड़ी भूख लगी है। कुछ खाया नहीं है बाबू।’’ रामलाल के भीतर के जंगल के हारे पक्षी, सब एक साथ फड़फड़ाने लगे, मानों उसका आत्महत्या का यह फैसला उसके जीवन का सबसे बड़ा पराजय बन गया हो। वह अपने आप से ही बड़बड़ाने लगा। मैं एक मेहनती इन्सान हूँ। आज परिस्थितियाँ प्रतिकूल हैं कल अनुकूल होंगी। वह वापस स्टेशन से बाहर निकल कर चल दिया। रास्ते में एक ब्लड बैंक के पास रुका। अन्दर गया। कुछ देर पश्‍चात बाहर निकला शरीर पीला पड़ा था। लेकिन आँखें खुषी से चमक रही थीं। हाथ में पकड़े सौ-सौ के दो नोट देखकर।
जहाँ सामाजिक संस्थाओं से जुडे़ कुछ लोग अपना खून जरूरतमन्दों के लिए दान कर रहे थे। वहीं कुछ शराबी, नषेड़ी, जुआड़ी अपनी बुरी आदतों के चलते अपने शरीर का खून बेच रहे थे किन्तु, रामलाल ने अपने बच्चों की क्षुदा शान्त करने का जुगाड़ किया था अपने शरीर का खून बेचकर। भूख से आँतें सिकुड़ गयी थीं। प्यास के कारण गला सूख रहा था। खून दान देने वालों के लिए वहाँ जूस, ग्लूकोस पानी, व कुछ देर आराम करने के वास्ते बेन्च की व्यवस्था ब्लड बैंक वालों ने कर रखी थी। रामलाल को महसूस हुआ कि वह बिना पानी पिये कुछ कदम भी आगे चलने में असमर्थ है। रामलाल वहीं पास पड़ी बेन्च में अपने को सम्भालता हुआ बैठ गया। पानी के लिए वहीं पास की मेज पर रखे गिलासों में से एक पानी का भरा गिलास उठाने के लिये हाथ बढ़ाया ही था, कि उधर से एक लड़का दौड़ता हुआ आया। जिसकी उम्र तकरीबन उन्नीस बीस की रही होगी शायद अपनी ड्यूटी के बीच ही यहाँ से उठकर किसी काम के लिये गया होगा। रामलाल के हाथ से पानी का गिलास छीन लिया और तेज आवाज में डाँटते हुए बोला।
‘‘बड़े अजीब आदमी हो। यहाँ पहली बार आये हो क्या ?’’ रामलाल ने  पानी के गिलास की ओर ताकते हुए हाँमें सिर हिला दिया।
‘‘इसीलिए तुम्हें यहाँ के कायदे कानून नहीं मालूम हैं। तुम जैसे दारूबाजों को यहाँ ये ग्लूकोस नहीं पिलाया जाता है। ये सारे इन्तजाम उन भले लोगों के लिए हैं। जो मुफ्त में अपना खून दान देते हैं। समझे तुम, तुम्हें तो अपने पैसे मिल गये न ?’’
‘‘हाँ, बस थोड़ा सर घूम रहा था, गला भी सूख रहा था।’’
‘‘उठो यहाँ से जो पैसे मिले हैं। बाहर जाकर उससे अपनी प्यास बुझाओ वैसे भी इस सफेद ग्लूकोस पानी से तुम्हारी प्यास कहाँ बुझेगी। जाओ दो चार पन्नी अपने हलक से उतारो। उठो यहाँ की बेन्च खाली करो।’’ रामलाल उठा बिना कुछ बोले चल दिया। सड़क किनारे सार्वजनिक नल की तलाश में, जानता था अपनी सफाई में कुछ बोलना बेकार है, उसकी हकीकत कौन सुनेगा, यदि सुन भी लिया तो मानेगा कौन ?
रामलाल को किसी तरह कई फाकों के पश्‍चात एक पंसारी की दुकान पर सौदा तौलने का काम मिल गया। रामलाल की खुशियों के पंख फैल गये। दुकान से घुना-फफूंदा ही सही अनाज व कुछ पैसे तो मिलेंगे। जिससे बच्चों की भूख की व्याकुलता तो नहीं देखनी पड़ेगी। एक पिता व पति के लिए बेरोजगारी सबसे बड़ा अभिषाप है। रामलाल मेहनत, लगन व ईमानदारी से सुबह दस बजे से रात्रि के नौ बजे तक काम करता यानि पूरे ग्यारह घण्टे किन्तु मालिक उसके ईमानदारी से सौदा तौलने पर उसे कई बार डाँटता भी रहता। मंगलवार की बन्दी के दिन भी रामलाल को दुकान में बुलाकर सभी खाद्य सामग्री में मिलावट का काम करवाता। यह काम रामलाल को बिल्कुल नहीं भाता, किन्तु पुरजोर विरोध भी न कर पाता।
मालिक ने रामलाल को काली मसूर में काले छोटे कंकर मिलाने को कहा। स्वीकृति में सिर हिला दिया किन्तु मालिक की नजर बचाकर कंकर फेंक दिये। दाल का वजन करने पर जब कंकरों का वजन दाल में नहीं आया। दाल का वजन उतने का उतना ही। रामलाल को मालिक ने धक्के मारकर दुकान से निकाल दिया।
रामलाल फिर से गलियों-गलियों नौकरी की तलाश में भटकने लगा। दूसरी दुकान में नौकरी मांगने गया, वहाँ के मालिक ने उसे पहचानते हुए पूछा ‘‘तुम तो जनरल स्टोर में काम करते थे क्यों छोड़ दिया वहाँ से’’ ?
‘‘साहब-वो....।’’ अभी रामलाल अपनी बात कह भी नहीं पाया था कि वहाँ बैठा दूसरा दुकानदार बोल पड़ा।
‘‘अरे साले ने की होगी वहाँ चोरी, इसीलिए भगा दिया गया होगा।’’ रामलाल की बिना बात सुने ही वहाँ से भी भगा दिया।
‘‘अरे भाई जरूरत होते हुये भी हम तुम्हें यहाँ नहीं रख सकते। हमें कई बार दुकान अकेले भी छोड़नी पड़ती है तुम जैसां को छोड़कर दुकान साफ करानी है क्या ? कोई भरोसे का आदमी चाहिये। चलो आगे देखो हमें अपना काम करने दो। रामलाल की ईमानदारी ही उसपर भारी पड़ गयी। उसे आज समझ में आया कि समय के साथ चलने में ही भलाई है।
रामलाल की सहनशक्ति की मानों परीक्षा हो रही हो। जेब में एक फूटी कौड़ी नहीं। छोटा बेटा बीमार हो गया। सरकारी अस्पताल से मुफ्त में दवा लिख कर दे दी गयी, पर मिली नहीं। पचास रुपये की दवा के लिए सारे प्रयास कर डाले किन्तु असफल व निराश खाली हाथ वापस लौट आया। बुखार तेज होता जा रहा था। डाक्टर के कथनानुसार बुखार बढ़ने नहीं देना था। बच्चा बुखार में तपा जा रहा था। दिमाग पर असर होने का खतरा भी बढ़ता जा रहा था।
रामलाल फिर एक बार सड़क पर निकल पड़ा, मंजिल का पता नहीं था। बस तेज कदमों से चला जा रहा था। चेहरे पर बेचारगी नहीं। इस समय गुस्से व उत्तेजना के भाव थे। एक मैदान में लगे  कार्निवाल  वहाँ लोगों की ऐसी भीड़ मानों  पूरा शहर यहीं एकत्रित हो गया हो। रामलाल ने कूड़े के ढेर से उठाया ब्लेड धीरे से अपनी जेब से निकाल कर अपने हाथ में ले लिया और तेजी से भीड़ में घुस गया। कुछ देर पश्‍चात उतनी ही तेजी से बाहर निकल आया चेहरे पर आवष्यकता और पश्‍चाताप के भाव स्पष्ट दिखायी दे रहे थे। बेहद मजबूरी में चुराया हुआ बटुआ अपनी जेब में रखकर तेज गति से दवाखाने की ओर बढ़ गया। अंततः परिस्थितियों वष एक ईमानदार व्यक्ति के सब्र का बाँध आखिरकार टूट ही गया।



Friday, November 9, 2018

इस मुश्किल समय में आशा का आश्ववास देती कविताएँ


गीता दूबे


आज जहाँ भरोसा शब्द पर से ही लोगों का भरोसा उठता जा रहा है वहां संभवतः कवि या फिर रचनाकार ही एकमात्र ऐसा जीव है जो भरोसे को बचाए रखने की बात करता है। वस्तुतः कभी कभार गंभीरता से सोचने पर ऐसा लगता है कि साहित्य एक ऐसा अजायबघर है जहाँ वे सारी वस्तुएं एक- एक कर अपनी जगह बनाकर सुरक्षित होती जाती हैं जो एक एक कर सचमुच के संसार से गायब हो रही हैं। और इसीलिए कवि निरंतर लुप्तप्राय भरोसे को अपना ही नहीं पाठकों का संबल बनाकर दुनियावी उलझनों को सुलझाने की भरपूर कोशिश करता नजर आता है। अपने पांचवे कविता संग्रह "भरोसे की बात" में कवि शैलेंद्र अतीत की स्मृतियों को संजोने के साथ साथ वर्तमान के सवालों से रुबरु होते हुए भविष्य के सपने भी सजाते दिखाई देते हैं। अतीत की स्मृतियाँ कवि ही नहीं साधारण मनुष्य के लिए भी बहुधा संजीवनी का काम करती हैं जिसकी शक्ति के बल पर वह अपने वर्मान के दुखों और तकलीफों का भरदम सामना करता है। कवि भी इन स्मृतियों को खूबसूरती से अपने दिल ही नहीं अपनी कविताओं में भी संजोते हुए सुकून की सांस लेता दिखाई देता है। यह अतीत हमेशा ही खूबसूरत रहा हो यह जरुरी नहीं पर कवि अपनी स्मृतियों के झोले से अतीत के जिस टुकड़े को निकालकर उसे पाठकों के साथ साझा अरता है वह निस्संदेह अपनी खूबसूरती से सबको मोह लेता है। प्रसाद की कविता "वे कुछ दिन कितने सुंदर थे" का प्रेमिल अहसास या मादकता भले ही इनमें न हो पर रोमानीपन का भला भला सा लगनेवाला संस्पर्श जरूरत मौजूद है जो पाठकों को अंतर्मन को मृदुता से सहलाते हुए उसे वर्तमान की भयावहता से भी परिचित कराता है। "उस वक्त की कहानी" कहते हुए कवि अतीत और वर्तमान के इस फर्क को किस तरह उभारता है यह गौरतलब है-
"रोटियां बांटी थी
बांटी थी किताबें
कपड़े भी बांटे थे
* * * * * * *
मिल- बांट कर
भगाया था दुखों को
हांक ह़ाक कर
यह उस वक्त की कहानी है
जब बंटे नहीं थे घर -आंगन।" (पृ. 59)

हालांकि कहने को तो देश ने एक बंटवारा झेला पर उस बंटवारे की पीठ पर अनगिनत बंटवारों की लाशें लदी हुईं हैं जो वर्तमान को सड़ांध से भर देती हैं और दर्दीले आतंक की खौफनाक परछाइयाँ आज तक आम आदमी को दहलाती हैं। अतीत की ये यादें कवि को लगातार कोंचती और बेचैन बनाए रखती हैं और इसी कारण विकास की दुहाई देनेवाली  इक्कीसवीं सदी की उस अजीब सी घड़ी को भी अपनी कविता में दर्ज करने से नहीं चूकता जब मानवता को शर्मसार करनेवाली घटनाएं घटती हैं -
"अपने ही हाथों में थे
ईंट- पत्थर
लाठी , ड़डे, खंजर भी थे
* * * * * * *
व्‍याभिचार की शिकार बेटियां
और अभियुक्तों की कतार में खड़े पराक्रमी
अपने ही थे
* * * * * * *
पर सबको
 अपनी अपनी ड़ी थी
इक्कीसवीं सदी की।
यह एक अजीब सी घड़ी थी।" (पृ.73)

लेकिन इनके साथ ही कुछ मृदु मृदु स्मृतियाँ भी हैं जो किसी भी व्यक्ति का बहुत बड़ संबल होती हैं। वे स्मृतियां कवि की उदासी और जिंदगी के बासीपन को भी अर्थवत्ता प्रदान करती हैं क्योंकि खुशी और उदासी के योग से ही जिंदगी की लय बनी रहती है। "तुम बिन" ऐसी ही कविता है-
"कल
खुशी टहल रही थी
घर में
आज उदासी
बाकी के सारे किस्से
वही
बासी के बासी।" (पृ.36 )

कवि शैलेंद्र की यह विशेषता है कि वह बहुत लंबी कविताएं नहीं लिखते, उनकी छोटी -छोटी कविताओं में जिंदगी का मर्म लिपटा दिखाई देता है। और कविता का अर्थ बहुधा अंतिम पंक्ति में आकर मुखर ही नहीं होता खिल भी उठता है।  कई मर्तबा तो उनकी छोटी सी कविता अपने में बहुत गहरा अर्थ समेटे नजर आती है जो उसकी ताकत बन जाती है,  'जिंदगी' शीर्षक कविता का उदाहरण देना चाहूंगी- -
"इस किताब के पन्ने
पलटने नहीं पड़ते
फड़फड़ाने लगते हैं
खुद--खुद
नित नये सबक के साथ" (पृ.47)

जिंदगी के इन्हीं सफों को पलटते हुए कवि बहुत से अनुभवों के पन्नों को हमारे साथ साझा करता है। आलोच्य कविता संग्रह की यह विशेषत है कि इसका कोई मूल केंद्रीय स्वर नहीं है ,यह प्रेम, प्रकृति आदि के साथ -साथ अपने समय के सवालों के साथ टकराता है।  कवि की पक्षधरता स्पष्टतः हाशिए के लोगों के साथ है और स्वयं मध्यवर्ग का प्रतिनिधि होते हुए भी वह मध्यवर्गीय लोगों की मानसिकता पर गाहे बगाहे व्यंग्य करने से नहीं चूकता। सत्ता ओर राजनीति के खिलाड़ी हों या नवधनाढ्य वर्ग के विलासी उन सब पर वह हौले से प्रहार करके आगे बढ़ जाता है।विरोधी की इन कविताओं में जरूरत से ज्यादा आक्रमकमता नहीं है जो कविता को नारे में बदल देती है लेकिन साजिशों को समझने और उकेरने की ईमानदारी जरूर है। इसी क्रम में वह अंधाधुंध विकास के नाम पर होनेवाले विनाश को भी वह रेखांकित करना नहीं भूलता। और उसकी समझदारी इस बात से जरूर  स्पष्ट होती है जब वह आज के पाखंडी समय में लोगों को भरमाने और भटकाने वाले मुद्दों की न केवल पहचान करता है बल्कि इनके झूठे रंगों को धोने की हिम्मत भी करता है -
"हम पढ़ते हैं, सफाई से टंकित झूठ
चम-चम चमकते पन्नों पर
और देखते हैं श्याम-सफेद
रंगीन पर्दों पर दोहराए जाते
और पाते हैं उसे
 सच के रूप में स्थापित होते
* * * * * * * * *
यह एक ऐसा खेल है , जिसे खेला जा रहा है अरसे से
अब तो झूठ भी एक उपलब्धि है
बा-जरिए अभिव्यक्ति की आजादी के।" (पृ.58)

जमाने के इन झूठों और फरेबों से बौखलाया कवि कभी कभार अपनी कविता में एक स्टेमेंट देता नजर आता है और वहीं कविता का स्वर सपाटबयानी में ढलता नजर आता है। दरअसल आज के समय के कई ऐसे संवेदनशील मुद्दे हैं जिनपर कुछ कहने या बोलने के मोह से प्राय रचनकार बच नहीं पाते वह मुद्दा चाहे धर्म का हो ता राजनीति का। और इन विषयों पर लिखी कविताएं महज एक बयान बन कर रह जाती हैं , ऐसे बयान जो बार बार दोहराए जाने के कारण अपना अर्थ खो चुके हैं। बल्कि वे कुछ कविताएं ज्यादा विश्वसनीय बन पड़ी हैं जहां कवि बड़ी ईमानदारी से अपनी बेबसी को बयान करता नजर आता है। आज सच में रचनकार सत्ता या राजनीति के सामने बेबस ही है लेकिन फिर भी वह सृजनरत रहकर समाज के प्रति अपना दायित्व जरूर निभाने की कोशिश करता है। इसी कारण वह साफ साफ अपनी बात कहने की कोशिश करते हुए इस साफगोई को जरूरी भी मानता है
"जब साफ-साफ कुछ कहते हैं- च्‍छे लगते हैं।" ( पृ.48)

संग्रह की  इन बहुरंगी और विविध आयामी कविताओं का मूल छोर मनुष्य की संवेदना से जुड़ता है और संवेदना के रेशों से बुनी  गई कविताएँ जीवन के मधुतिक्त अनुभवों का बहुरंगी कोलाज बनाती हैं। वहाँ अगर स्मृतियों का माधुर्य है तो उस माधुर्य के चूक जाने या बीत जाने की पीड़ा भी है । इस सुख दुख की आंखमिचौली के बीच कवि सुख को तो सबके साथ बांटना चाहता है लेकिन दुख की गठरी अकेले ही उठाने की बात करता दिखाई देता है शायद वह इस दुनिया का यह दस्तूर जानता है कि दुख में अक्सर अपनी परछाई भी साथ छोड़ देती है-
 "सुख को बांट लो मिलकर
दुख को मगर चुपचाप अकेले ले लो ।"( पृ.25)

किसी भी रचनाकार के लिए एक बड़ी चुनौती होती है उसकी समकालीन संवेदना। कई मर्तबा  कालातीत कविताएँ लिखने के व्यामोह में अपने समय की छोटी छोटी घटनाओं को नजरअंदाज भी कर देता है। यहां तात्कलिकता में बहने की बात नही बल्कि कुछ दर्ज करने लायक टनाओं को  दर्ज करने की कोशिशों का जिक्र है। कवि अपने जीवन के बेहद छोटे अनुभव को भी अगर महत्वपूर्ण मानता है तो उसे दर्ज करना नहीं भूलता। इसी के साथ एक महत्वपूर्ण सवाल स्थानीयता का भी है। कवि देश के किस हिस्से में सृजनरत है वह हिस्सा अपनी तमाम वशेषताओं के साथ अगर उसकी रचनाओं में अंकित होता है  तो वह भी कवि की एक बड़ी विशेषता है।

रचनाकार अपनी रचनाओं में वही रचत या उकेरता है जो कुछ वह देखता, सुनता या महसूस करता है। कवि शैलेंद्र का रचनकार अपने आस- पास के परिवेश को ही अपनी रचनाओं में उकेरता है और यह अगर उसकी सीमा है तो उसकी विशेषता भी । वस्तुत:  कई मर्तबा एक बड़े यथार्थ को रचने की चाह में हम अपने आस पास के परिवेश को उपेक्षित करते हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो राष्ट्रीय अथवा वैश्विक दिखाई देने की होड़ में हम अपनी स्थानीयता को नकारने से भी नहीं कतराते गोया कि स्थानीय होना कमतर होना है लेकिन शैलेंद्र की कविताओं में यह स्थानीय होना बखूबी दिखाई देता है। वह कलकत्ते में रहते हुए अपनी कलकतिया पहचाना पर गर्व करते हुए वहाँ के इतिहास को तो उकेरते ही हैं । इसके साथ ही वह जब जहाँ होते हैं वहाँ की खासियत या खूबसूरती से प्रभावित हुए बिना भी नहीं रह पाते।  
अपनी कलकतिया पहचान को "साल्टलेक" शीर्षक कविता में अभिव्यक्ति देते हुए वह वहाँ समय के साथ आये बदलाव को रेखांकित करना भी नही भूलते और उनका उद्देश्य संभवतः कलकत्ता के सांस्कृतिक ऐतिहासिक परिवेश में आए बदलावों को रेखांकित करना भी रहा हो। जो कलकत्ता किसी समय क्रांति का शहर था, जहाँ कुछ सिरफिरे नौजवान व्यवस्था को बदल देने का सपना देखने की कोशिशों में लगे हुए थे वही अब अन्य विकसित शहरों की तरह विलासिता के छोटे- छोटे द्वीपों में कैसे बदल गया, यह सचमुच सोचने की बात है। कविता की ये पंक्तियाँ विचारणीय हैं -
"कोलकाता में एक जगह है साल्टलेक
जहां न तो साल्ट है न लेक
यानि कि है वह पूरी तरह फेक
* * * * * * * * * * * *
तब झील के आसपास क्रांति के सपने भी बुनते थे कुछ सिरफिरे
और अब वह मालो- माल
तिजोरियों की पुजारी, अलमस्त, दिलफेंक है।" ( पृ. 33)

इसी तरह जब कवि दिल्ली पुस्तक मेले का भ्रमण करता है तो वहाँ के परिवेश में शब्दों की बरसात में भींगते हुए भी कलकत्ता में उस समय हो रही बरसात से अनछुआ नहीं रह पाता। अपनी पहाड़ी यात्रा के अनुभवों को भी वह पूरे हुलास के साथ शब्दबद्ध करता है। लेकिन सैलानी हुलास के बीच भी उसका सजग कवि मन जागृत हो उठता है और वह बांझ सौंदर्य की सीमा को भी समझता और समझाते हुए कह उठता है-
"जहां तुम आए हो
बदलने हवा-पानी
वहां के बहुत से लोग
पहुंच चुके हैं राजधानी
तुम्हें मालूम है सैलानी
खूबसूरती बांझ भी हुआ करती है
और सौंदर्य नपुंसक भी
और यह तो तुम्हें मालूम ही है
कि जिस्म को चाहिए होता है दाना-पानी।" (पृ. 70)

संग्रह की कविताओं में प्रगतिशीलता का ऐसा मृदुल स्वर भी मुखरित होता है जहाँ रूढ़ियों के विरोध या तिरस्कार के साथ साथ परंपरा का सम्मान भी नजर आता है। वह रूढ़ियों के विरोध के द्वारा अपनी आधुनिकता या तार्किकता को स्थापित करने की कोशिश जरूर करते हैं, उदाहरण के लिए ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं -
"सारे व्रत
तीज त्योहार
निर्जल उपवास
कब तक करती रहोगी
उनकी सलामती के लिए
जो एक दिन भी नहीं करते
तुम्हारे लिए
अरे, कुछ तो छोड़ो
कुछ तो तोड़ो।" ( पृ.32)

मुश्किल यही है कि कवि जिन रुढियों को तोड़ने या छोड़ने की ख्वाहिश जताता नजर आता है वे सारी रूढ़ियां परंपराओं के नाम पर ही इस देश में फलफूल रही हैं और प्रगतिशीलता के जबर्दस्त पैरोकार भी अपनी -अपनी पत्नियों को इन स्वर्णिम परंपराओं को निभाते हुए देखकर ऊपर -ऊपर चाहे कुछ भी क्यों न कह लें मन ही मन खुश भी होते रहते हैं। वस्तुतः यह एक बड़ा अंतर्द्वंद्व है जो तार्किकता एक अभाव से जन्म लेता है। बहुधा हम प्रगतिशील दिखना चाहते हैं और अपने हाव-भाव, वेशभूषा , बोलचाल आदि से प्रगतिशीलता का छद्म भी रच लेते हैं लेकिन जब तक हमारा मानस पूरी तरह परिष्कृत या परिमार्जित नहीं होता तब तक हमारी प्रगतिशीलता प्रश्नांकित ही रहती है।  

इसके बावजूद इस संग्रह का उल्लेखनीय बिंदु है इसमें व्याप्त सकारात्मकता जिसके कारण अविश्वास के इस घटाटोप में भी कवि भरोसा नहीं खोता। वह आपने साथ- साथ दुनिया पर भी भरोसा रखता है और इस भरोसे को बनाए रखने में बहुत बड़ी -बड़ी नहीं बल्कि बेहद छोटी छोटी चीजें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती नजर आती हैं और इसी कारण तमाम छोटी -बड़ी मुश्किलों, विवशताओं और बेचैनियों के बावजूद वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट है-
"जिंदगी गुजर गई
और पूछते हो
क्या मिला
बहुत मिला
बहुत मिला
जो भी मिला
बहुत मिला
यूं ही तो नहीं कटा
दुश्वारियों का सिलसिला।" (पृ. 71)

इस अति महत्वाकांक्षी समय में यह संतोष सचमुच सराहनीय है। कुल मिलाकर कवि शैलेंद्र का आलोच्य संग्रह इंसानियत ही नहीं साहित्य के प्रति भी हमारे भरोसे को कायम करता है। मुक्त छंद में रचित ये कविताएं बेहद सहजता से पाठकों के अंतर्मन में अपनी जगह बना लेती हैं। बहुत सी कविताओं में लयात्मकता भी है जो प्रायः प्रूफ की गलतियों से बाधित होती दिखाई देती है। प्रूफ अगर थोड़ी और सावधानी से देखा गया होता तो संग्रह की खूबसूरती और भी बढ़ जाती।  

भरोसे की बात, कविता संग्रह, शैलेंद्र शांत 
बोधि प्रकाशन, जयपुर 
अक्टूबर 2017, मूल्य 120/- पेपरबैक।

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