Sunday, January 1, 2023

महेश कटारे की कहानी- पार

हमारे लिये यह खुशी की बात है कि कथाकार राज बोहरे ने अपनी पसंद की कहानियो का चयन हमारे साथ शेयर करने का दायित्व लिया है. उसी शृंखला की आज पहली कहानी उनकी टीप के साथ प्र्स्तुत है.
महेश कटारे हिंदी कहानी का वह चेहरा हैं जिसे ग्रामीण कथाओं का उस्ताद कथाकार कहा जाता है। अपनी कहन में किस्सागोई को अनायास शामिल कर लेने वाले महेश कटारे जितना हिंदी बेल्ट में पढ़े जाते हैं उतना ही वे अहिंदी भाषी क्षेत्र में पढ़े जाते हैं । उनकी कहानियों की एक सीरीज जब इंटरनेट की एक वेब पोर्टल पर डाली गई तो उसके 10,000 डाउनलोड हिंदी बेल्ट में थे तो 9800 डाउनलोड अहिंदी भाषी क्षेत्र में थे। केवल गांव ही नहीं अपने परिवेश से जुड़े डाकू, पकड़, अपहरण और पुलिस से जुड़े तमाम वे तथ्य जो इस इलाके का एक गहरा भुक्तभोगी ही जान सकता है और जो हिंदी के पाठकों के लिए एकदम नया विषय व परिवेश लेकर आता है, वह सब महेश कटारे की कहानियों में होता है। यह कहानी 'पार' अपने शीर्षक में ही कई अर्थ देती है। प्रकट में तो केवल चंबल नदी के पार जाने की कथा है। एक महिला डकैत (जो पिछड़े वर्ग से आती है )अपने साथियों के साथ यह तय करती है कि जब तक पुलिस की सख्ती है मध्य प्रदेश से निकलकर उत्तर प्रदेश में चले जाओ । मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश जाने का रास्ता चंबल नदी पार करने पर ही सुगम होता है, सड़कों पर पुलिस नाके हैं तो चंबल पार करने की यह कहानी अपने अर्थ विस्तार में बहुत सारी हदों को पार करा देती है। चंबल घाटी में भी पिछड़े वर्ग से डकैत आने लगे हैं तो स्त्रियों की डकैत बनने लगी हैं। इन नए जमाने के डकैतों का बर्ताव भी ठीक वैसा ही है जैसा अगड़े वर्ष के डकैतों का होता था। हां इतना फर्क है कि यह सब वह सारे काम और शोषण अगड़े वर्ग के साथ करते हैं उसी तेवर के साथ। उसी तरह की सख्ती करने में उन्हें कोई गुरेज नहीं है। इस कहानी के अंत में नायिका कमला केवल नदी नहीं एक और हद, एक और सीमा, एक और टैबू को पार करती है । नर नारी जून का फर्क मिटाती इस कहानी को जरूर पढ़ना चहिए प्रस्तुति -राज बोहरे

पार

        जान-पहचानी गैल पर पैर अपने-आप इच्छित दिशा को मुड़ जाते थे। हरिविलास आगे था-पीछे कमला उसके पीछे अपहरण किया गया लड़का तथा गैंग के तीन सदस्य और थे यानी कुल छह जने। जिस समय वे ठिकाने से चले थे तब सामने पूरब में शाम का इन्द्रधनुष खिंचा था अतः अनुमान था कि सबेरे पानी बरसेगा-संझा धनुष सबरे पानी। ठिकाने पर एक दिन भी सुस्ताते हुए न काट पाए थे कि मुखबिर की खबर आ गई थी-ठिकाने पर कभी भी घेरा पड़ सकता है। ऊपर का दबाव है इसलिए डी0आई0जी0 भन्ना रहा है। दो जिलों की पुलिस का खास दस्ता एक नये डिप्टी को सौंप दिया है। नाक में दम कर रखा है हरामजादे ने।

                ऊँ.... कुछ कहा हरिविलास पथरीली पगडण्डी पर बढ़ता हुआ            बोला।

                नहीं तो ! कमला जाने किस सोच से बाहर आई-कभी-कभी पहाड़ दूभर हो जाता है।

                बूँदा-बाँदी से रपटन बढ़ गई है। पहाड़ की ऊँचाई तो पहले ही जितनी है। बात को मजाकिया मोड़ देने की आदत है हरिविलास को।

                तीन घण्टे में इस कीच-खच्चड़ के मौसम में छह कोस बढ़ आना कम नहीं है। ऊपर से कंधे पर पाँच-सात सेर वजन बंदूक का रहता है पीठ के सफरी बैग में जरूरत की चीजें और कपड़े-लत्ते ठुँसे होते हैं। पुलिसवालों के खाने-पीने गोली-बारूद के इंतजाम में तो पूरी सरकार पीछे होती है। यहाँ तो एक-एक चीज़ खुद जुटानी पड़ती है। सुई से लेकर माचिस तक के लिए दहेज-सा देना पड़ता है।

                इस बार की पुलिसिया सरगर्मी में कमला के गिरोह ने तय किया है कि पूरब में पचनदा पार कर यू0पी0 में दस-पन्द्रह दिन गुजार लिये जाएँ। खबरे हैं कि उधर की पुलिस और सरकार दूसरी उठा-धराई में उलझी है इसलिए माहौल अनुकूल है। वैसे डाँग ही डाँग (जंगल) शिवपुरी की ओर भी निकला जा सकता था या धौलपुर को बगल देते हुए राजस्थान में भी कूदने से सुरक्षित हुआ जा सकता था।

                पहाड़ की आधी चढ़ाई तक पहुँचते-पहुँचते कमला की पिण्डलियाँ और पंजे पिराने लगे। धाराधार धावे में केवल दो जगह पानी पिया है। चलते-चलते बैठने पर थकान चढ़ दौड़ती है और बागी जीवन में आलस नींद और खाँसी तीनों खतरनाक हैं। माता की मढ़ी बस एक सपाटे-भर दूर है-बीस बाइस मिनिट का रास्ता पर कमला ने हाथ की टार्च जमीन की ओर झुकाकर दो बार जलाई-बुझाई। इसका मतलब वहाँ कुछ सुस्ताना है।

                वह पगडण्डी के पत्थर पर बैठ गई तो गिरोह आसपास सिमट आया। अपहत यानी पकड़ छीतर बनिया का पन्द्रह सोलह साल का लड़का है। पखवारे पहले गाँव के बाहर से गिरोह ने धर लिया था। हँगने आया था-पूँजी के नाम पर वही लोटा उसके पास है। दो लाख की फिरौती माँगी गई है। बिचौलिया एक पर लाना चाहता है। कहता है कि बनिया जरूर है जाति से पर दम नही है उसमें। गाँव-गाँव फेरी लगाकर परिवार पालता है। गाँठ की कुल जमा चार बीघा जमीन बेच-बाचकर ही एक लाख की रकम जुटा पाएगा। खरीदार भी तो ऐसे बखत औनी-पौनी कीमत लगाते हैं।

                कमला डेढ़ लाख पर उतरकर अड़ी है। गरीब सही, पर है तो बनिया ! हाथी लटा (दुबला) होने पर भी बिटौरा सा होता है।

                इधर आ रे मोंड़ा !

                कमला की कड़क से सहमता लड़का उकरूँ आ बैठा। थकान से वह भी टूटा हुआ था। कमला उसे लद्दू बनाए थी। लद्दू यानी लादनेवाला। छह कोस से वह कमला का बैग और बंदूक ढो रहा है। अपनी ग्रीनर दोनाली कमला को बेहद प्रिय है, पर लंबे कूच में वह केवल पिस्तौल लटकाती है।

                तेरी फट क्यों रही है  पास आ.....के !

                मर्दो की तरह गंदी-गंदी गालियाँ कमला के मुँह से शुरू-शुरू में लड़के को बहुत भद्दी लगती थीं पर अब जान चुका है कि यह सब काम मर्दो की नकल पर करती है। वैसे ही कपड़े जूते व्यौहार ठसक और डॉंट-डपट बदहवासी से बलात्कार तक...।

                कमला ने लड़के की ओर पाँव पसार दिए। लड़का कुछ और सरककर पिंडिलियाँ दबाने लगा। पैरों पर सिपाहियों जैसे किरमिच के बूट चढ़े थे।

                बाबा के पास चून धरा हो तो आज रात माता के मंदिर में काट लें  आसपास गीधों की तरह बैठे साथियों से कमला ने सलाह ली।

                रात-रात में ही पार होना ठीक रहेगा। डर के मारे वह खुद भी रात को सटक लेता है। दूसरे ने मत प्रकट किया।

                नदी का पता नहीं कि चढ़ी है या पाट है। चढ़ी मिली तो औघट पार कौन करेगा ये पिल्ला अलग से संग बँधा है-भो....का !

                अपने आदमी कुछ न कुछ इंतजाम करेंगे ही.....।

                वो बम्हना भी तो होगा वहाँ। महीने-भर में ही तबादला थोड़े हो गया होगा उसका। इधर आने को कोई तैयार नहीं होता सो तीन साल से मजा मार रहा है हरामी। लैनेमेन की तनखा झटकता है। काम क्या है .... बिजली का तार इधर से उधर उधर से      इधर। सो भी बिजली चली गई तो अट्ठे पखवारे-भर पड़ा-पड़ा पादता रहेगा। इन साले बाम्हनों को तो लैन में खड़ा करके गोली मार देनी चाहिए। सब सीटों पर जमे बैठे हैं।

                कमला ने चिड़चिड़ाकर लड़के पर लात फटकार दी-भैंचो....! हाथों में जान नहीं है क्या  अभी छूट दे दो तो भैंस को गाभिन कर देगा।

                आकस्मिक प्रहार से लड़का गुलांट खाता हुआ लुढ़क गया। दर्द से कराहता हुआ वह आँसूस बहाने लगा। पकड़ को इसी तरह रखा जाता है। भूख, मार और दहशत से इतना तोड़ दिया जाता है कि अवसर मिलने पर भी निकल भागने का साहस न कर सके।

                लड़के की दुर्दशा पर कोई न पसीजा। यह तो होता ही है- उठ बे ! साले ठुसुर-ठुसुर की तो गोली मार के घाटी में फेंक दूँगी। कहते हुए कमला की निगाह घाटी की ओर घूम गई।

                कमला मोहिनी में बँध उठी। घाटी और उसके सिर पर तिरछी दीवार की तरह उठे पहाड़ पर जगर-मगर छाई थी। जुगनुओं के हजारो-लाखों गुच्छें दिप्-दिप् हो रहे थे। लगता था जैसे भादों का आकाश तारों के साथ घाटी में बिखर गया है। चमकते-बुड़ाते जुगनू कमला को हमेशा से भाते हैं। सांझी में क्वार के पहले पाख में लड़कियाँ कच्ची-पक्की दीवार पर गोबर की साँझी बनाती थीं। दूसरी लड़कियाँ तो अपनी-अपनी पंक्ति तोरई के पीले लौकी के सफेद, या तिल्ली के दुरंगे फूलों से सजाती थीं, कमला अपनी पंक्ति में जुगनू चिपका देती फिर कुछ दूर खड़ी हो मुग्ध आँखों से अपना करतब निहारती थी। तब यह उसका खेल था- कहाँ समझती थी कि उसके खेल में जुगनू जान से जाते हैं।

                इलाके में आतंक है कमला का अपनी पर आती है तो किसी को नहीं छोड़ती। वह उसका खास था, जाति का था सप्लाई करता था, सुना जाता है कि कमला उससे जरूरत का काम भी लेती थी। गिरोह तक के लोग दबते थे उससे। अचानक जाने कैसे बिगड़ी कि कमला ने पचीसों के सामने उसके मुँह में मुतवाया और कोहिनी के ऊपर से दोनों हाथ गँडासेस से कतर दिए। जातिवाला था नहीं तो जैसा कि उसका तकिया कलाम है-अंगविशेष मे गोली घुसेड़ देती। वह आदमी इलाके में कमला का विज्ञापन बना घूमता है।

                चलो...माता की मढ़ी पै बिसराम करेंगे। कह कमला खड़ी हो गई।

                लड़के ने ग्रीनर बाँस की तरह कंधे पर रखी, ढीले बैग के फीते कसे और नाक सुड़कता हुआ बढ़नेवाले कदमों की प्रतीक्षा करने लगा। जानता है उसे न घाव सहलाने का     अधिकार है न दिखाने का। नाक में छल्ला-छिदे बछड़े की तरह उसी ओर मुड़ता है जिधर रस्सी का संकेत मिले।

                मंदिर पर पहुँच सबने चबूतरा छू, माथे से लगा, पा-लागन किया और जूते उतार फेरी लगाते हुए मढ़ी में घुस गए। मूर्ति के पैरों में एक चीकट दिया जल रहा था जिसकी आभा में मूर्ति प्राणवान् और रहस्यमय दिख रही थी। बाबा अँधेरा होते ही संझा-बत्ती कर शायद नीचे उतर गया होगा।

                पहाड़ के छोर पर बना यह छोटा-सा मंदिर रतनगढ़ की माता के नाम से प्रसिद्ध है। किंवदंती है कि दूज-दीवाली के दिन यहाँ आल्हा पूजा करने आते हैं। आल्हा अमर है-युधिष्ठिर का औतार। बड़े-बूढ़ों ने रात-बिरात किसी पचगजे (पाँच गज लम्बे) आदमी की पहाड़ी चढ़ती उतरती झलक देखी है। देखने वालों में ज्यादातर मर-जुड़ा गए। एकाध बचा है जिससे ब्यौरेवार कुछ पता नहीं चलता, बस धुंधा में कोई तस्वीर तनकर रह जाती है।

                मंदिर तक पहुँचने के केवल दो रास्ते हैं-एक तो पहाड़ी की कोर-कोर चलती ऊँची-नीची घुमावदार पगडण्डी और दूसरा खण्डहर हुए लौहागढ़ के किले होकर दीवार की तरह सीधी खड़ी पहाड़ियों के सिर पर माँग-सी-भरती तीन कोसी कच्ची सड़क। मढ़ी की छत पर बैठा आदमी पल्टन भी आगे बढ़ने से रोक सकता है। दो चार को तो गोफनी में गिट्टी भरकर निपटाया जा सकताा है।

                चौमासे में यह स्थान गिरोहों के लिए मैया का वरदान है। ऋषि-मुनियों की तरह दस्युदल चातुमार्स ऐसे ही ठिकानों पर बिताते हैं। कमला के गिरोह का नाई सदस्य हरविलास जनम का हँसोड़ है। कहता है- हम लोग जोगी-जाती हैं। करपात्री हैं। जब जहाँ जो मिल जाए खा लो और मौका मिल जाए तो सो लो। बाकी चलते रहो। जोगी-जती कहीं किसी से नहीं बँधते। हमारी भी वही गति है। न जिंदगी का मोह न घर-द्वार की मया (माया)।

                एक वही है जो कभी-कभी मौज में आकर कमला को बीबीजान कह देता है। पहली बार तो सुनकर कमला हत्थे से उखड़ गई थी, पर जब उसने बताया था कि फिल्मों में सबसे सुन्दर और घर की मालकिन को बीबीजान कहा जाता है तब से कमला यह सुनकर खिल जाती है। कमला ने हरिविलास की हैसियत बढ़ाई है, कैंची-उस्तरा की जगह बारह बोर सौंपी है।

                हरिविलास ने ही बताया था कि-बीबीजान को हम रण्डी समझते हैं.....कुछ जानते थोड़े हैं। जाननेवाले तो दिल्ली-बंबई में रहते हैं। तड़ातड़ मारनेवाले को वहाँ लाखों-करोड़ों, कोठी-कार मिलते हैं। हमें क्या मिलता है सेंतमेंत की दुःख-तकलीफ देते-लेते हैं।

                ऐसे में कमला हँसकर कहती है-साला नउआ घरवाली का टेंटुआ चीरकर     इधर क्या आ मरा  निकल जाता बंबई या दिल्ली।

                दिल्ली तो हम तुम्हें पहुँचाएँगे कमला बीबी ! वहाँ अपनी फूलन अकेली है- बस, एक बड़ा स्वयंवर रच दो। दिल्ली-बंबई वाले लार टपकाते तुम्हारे पीछे न घूमें तो मैं मूँछ मुड़ा के नाम बदल लूँगा। फूलन तो शकल-सूरत से मात खा गई। तू पहुँचते ही मिनिस्टर हो जाएगी।

                कमला सोचती है- नउआ ससुरा बड़ा ऐबी है। छत्तीसा साला ! सपनों के हिंडोले पे झुला देता है। प्रकट में कहती है- चुनाव तेरा बाप जितवाएगा

                मेरा बाप तो जाने सरग में है कि नरक में ....पर कोई न कोई बाप मिल ही जाएगा। और चुनाव तो आजकल जाति जितवाती है। तेरी जाति, मेरी जाति और बाप की जाति-बस हो गए पार। हरिविलास खी-खी कर देता है।

                टैम कितना हो गया ? कमला की पूछती निगाह हरिविलास पर घूमी। हरिविलास की घड़ी पानी भर जाने से बंद है। कमला की घड़ी पट्टा टूट जाने से सामान के साथ लद्दू की पीठ पर लदी है। बाकी बे-घड़ी हैं। बादलों की टुकड़ियों से सप्तऋषि और सूका (शुक्र) भी दुबके-ढके हैं।

                दस के लगभग होंगे। बन्दूक पर हाथ फेरते हरिविलास बोला।

                अब तो चार घड़ी यहीं बिसराम ठीक रहेगा। भोर में नदी पार कर लेंगे। छत की छॉव और चोटी का पवन पाकर गिरोह में आलस पसरने लगा था।

                थोडा-बहुत पेट में भी डालना है। भागमभाग में दोपहर आधा-अधूरा खाया, तब से एक घूँट चाय भी नहीं मिली।

                मौन स्वीकृति के साथ सबके झोले खुलने लगे। लड़के ने पीठ का थैला खोलकर कमला के सामने रख दिया। बोतल निकाल कमला ने तीन-चार बड़े बडे घूँट भरे। सबके पास इसी किस्म की बोतले हैं। इनका खास लाभ यह रहता है कि वजन में हल्की होती हैं। लड़का इस उसकी ओर टुकुर-टुकुर ताक रहा था कि कोई उसे दो घूँट पानी के लिए पूछ ले । मुँह से माँगने पर कमला के कोप का शिकार हो सकता है। संग-साथ रहते जान चुका है कि भूख-प्यास के बखत कमला खूँखार हो जाती है। पहाड़ी चढ़ते समय भी उसका गला चटका जा रहा था।

        प्यास के साथ उसे घर की याद भी आ रही थी। वहाँ पर वह भरपेट खाकर मजे से सो रहा होता। माँ याद आई- क्या वह सो चुकी होगी जग रही होगी। चारों भाई-बहनों पर हाथ फेरकर ही सोने लेटने है। मेरे बदले का हाथ किस पर फेरती होगी ?

        भूख-प्यास भूलकर लड़का झर-झर आँसू टपकाने लगा। हिलकियों से देह हिल उठी। कमला बिस्कुट कुतरने में लगी थी। भौंहे चढ़ाकर फुफकारती-क्या हुआ बे  बीछू लग गया क्या

        हिलकियाँ रोकने की कोशिश में लड़का और भी हिलने लगा।

        बोलते क्यों नहीं मादर....! कुछ खाने बैठो तभी खोटा करने लगता है। जी में आता है कि ....मैं गोली उतारकर ठूँठ पै टाँग दूँ हरामी को। चप....।

        कमला ने दो बिस्कुट उसकी ओर फर्श पर फेंक दिये। लड़का आँसू सँभालता हुआ बिस्कुट चबाने लगा। बिस्कुट का गूदा वह बार-बार जीभ से भीतरर की ओर ठेलता पर प्यासे मुँह लार न होने से पेट में न सरक पाता। लड़का घूँट से भरता बिस्कुट निगलने की कोशिश कर रहा था।

        दिए की पीली रोशनी में हरिविलास को लगा कि लड़के की आँखे बिल्कुल वैसी ही हो रही हैं जैसी उस्तरा गर्दन पर रखे जाते समय उसकी पत्नी की हो गई थीं। अनमने हरिविलास ने अपनी बोतल लड़के की ओर सरका दी- पानी पी ले पहले।

        लड़के ने बिस्कुट चबाती कमला की ओर देखा।

        पी ले ना ! हरिविलास ने नरमी से कहा।

        लड़का फिर भी हाथ न बढ़ा पाया।

        पी ना....के। हरिविलास की चीख मढ़िया में गूँज गई।

        लड़के ने सकपकाकर बोतल झपट ली। कमला मुस्करा उठी। दूसरे हँस पड़े- दीवारों के बीच कहकहे भर गए। माता की मूर्ति उसी तरह अविचल थी- सिंह पर सवार, सिर की ओर त्रिशूल ताने।

                सहमते लड़के ने गिनती के चार बड़े-बड़े घूँट भरे और ढक्कन कसकर बोतल हरिविलास की ओर बढ़ा दी।

                अब चल देना चाहिए। हरिविलास की गंभीरता से गिरोह के लोग चौंक गए।  

        क्यों ? यहाँ बिसराम .... दीवार के सहारे अधपसरी होती कमला ने पूछा।

                कान खोलो ! दखिनी तरी में मोर कोंक रहे हैं....सियार भी रोए हैं। दबस (दबिस) हो सकती है।’’

                अलसाता गिरोह चौकन्ना हो गया। कमला ने दीवार से टिकी ग्रीनर दुनाली झटके के साथ पकड़ ली। और कमर में बँधी बेल्ट से दो कारतूस निकाल तेजी के साथ बेरल में ठोंक दिए।

                अगले क्षण गिरोह खुले चबूतरे पर था। सबकेक आँख-कान टोह पर थे। अँधेरे में दुश्मन को गच्चा दिया जा सकता है तो दुश्मन भी अँधेरे का लाभ उठाकर घेर सकता है। मोर रह-रहकर कोंक उठते थे। संकेत, किसी के मंदिर की ओर बढ़ते जैसे थे।

                देखो-देखो। वो बाटरी चमकी !’’ तरी के घने बबूल वन में कुछ चमककर बुझा था।

        दूसरा गिरोह भी हो सकता है।

        कौन होगा ? चरन बाबा शहर में है। इधर है ही नहीं।

        देवा घूम सकता है। उसकी बिरादरी के काफी घर हैं इधर।’’

        पुलिस भी तो हो सकती है-गैल काटकर आ रही हो।’’

        डाबर में पुलिस वाले क्यों मरेगे ?

        नौकरी के लिए सब करना पड़ता है, मन-बेमन से।’’

        अब जल्दी से पार निकल जाना चाहिए।’’

        उधर यू.पी. की पुलिस डटी हो तो ? उधर की सूँघ-साँघ तो लेनी पड़ेगी।’’

                तो जा ! लुगाई के घाँघरे में दुबक जा। अबे साले, तू क्या पुलिस की जगह जिंदाबाद-जिंदाबाद गानेवाली भीड़ की उम्मीद रखता है ? बागी क्यों बना ? लुल्लू-लुल्लू करता घर रहता और टाँग पसारकर सोता।’’ हरिविलास की इस झल्लाहट पर चुप्पी हो गई। इसे अचानक हो क्या गया है ?

                जल्दी के लिए खड़ा उतार पकड़ा गया। टॉर्च जलाना खतरनाक था। पैरों को तौल-तौलकर रखना पड़ रहा था। लड़के को अब हरिविलास ने अपनी बगल में ले लिया- इन रास्तों के लिए कच्चा और निज़ोरा है लड़का। नेंक चूकते ही हजारों हाथ नीचे पहुँचेगा। हड्डियाँ भी नहीं बचेंगी- सबरे तक। लड़के की पीठ पर अब केवल सफरी बैग था। बंदूक कमला ने सँभाल ली थी।

                नीचे पहुँचते ही बेसाली के भरके (बीहड़) शुरू हो जाते हैं। यहाँ की मिट्टी पानी में बूँद के साथ घुलकर बहने लगती है। हर बरसात में बीहड़ा का नक्शा बदलता है। बड़े ढूह टूट और भहराकर निशान खो देते हैं तो छोटे ढूह नीचे की मिट्टी बहने से ऊँचे हो जाते हैं। हर साल पुराने के आसपास नए रास्ते बनते व चुने जाते हैं। गैर-जानकार के लिए पूरी भूल भुलैया हैं भरके। फँसने वाले का राम ही मालिक है। भेड़िए, बघेरे, साँप-सियार सभी का तो आसरा है इनमें। जंगली जानवरों से बचने के लिए गिरोह ने टॉर्च जला ली। रोशनी से चमकमकाए जानवर पास नहीं आते। पुलिस के यहाँ भय नहीं- कदम-कदम पर ओट व सुरंगो जैसे रास्ते हैं।

        आधी रात छूते-छूते गिरोह ने बेसली की रेत पकड़ ली। नदी में बाढ़ नहीं थी, पर बिना तैरे पार न हुआ जा सकता था।

        कमला ने नथुआ को बुलाकर समझाया-‘‘नत्थू ! तुम इस सुअरा को जलेकर खैरपुरा पहुँचो। मेहमानी करो दो-चार दिन। इसे भुसहरा में डाल देना- आराम कर लेगा। इधर की जानकारी लेते रहना ! ऐसी-वैसी बात न हुई तो छठे दिन मंदिर पै मिलेंगे। और सुन, चरन बाबा या भरोसा गूजरा की गैंग टकरा जाय तो बरक जाना। ये मादर....अपने को धरती से दो हाथ ऊँचा समझते हैं।’’

        नत्थू ने लड़के की पीठ से कमला का बैग निकलवाया और अपना कस दिया, फिर ‘‘जय भीमबोलकर दो छायाओं के साथ अँधेरे में समा गया।

        अब गिरोह तीन जगह बँट गया था। अपनी-अपनी जाति में सुरक्षा पाना आम चलन है। भरकों के बीच चौरस जगहों पर खेत हैं। जगह-जगह नलकूप व उसके साथ मंजिला-दोमंजिला कोठरियाँ हैं। आराम से खाते हुए पड़े रहो और खतरे की भनक मिलने पर बीहड़ में सरक लो।

        हरिविलास को कमला ने बिजली वाले रमा पंडित को लाने भेज दिया था। बाम्हन होकर भी तैरने में मल्लाहों के कान काटता है। यहाँ नौकरी करते, डाकुओं से साबका रोजमर्रा की चीज़ है, पर वह कमला से बेतरह डरता है। तरह-तरह के किस्से हैं, उसके बारे में-बड़ी जाति से घृणा करती है। आदमी छाँटकर महीने-दो महीने सेवा करवाती है, फिर गोली मार देती है। बुलावे पर पहुँचने की मजबूरी ठहरी-रोज यहीं रहकर बिजली के खंभों पर चढ़ना  उतरना है।

        रेत पर चित्त पड़ी कमला के पास पहुँच रामा ने हरिविलास के बताए अनुसार अभिवादन किया।

        तू ही रामा पण्डित है ? ’’ कमला ने पूछा।

        हाँ, बहन जी !’’

        भैंचो ....! तुझे मैं बहन दिखती हूँ ?’’

        रामा घबरा गया-मैंने तो .....मैं....माफ कर दें।’’ वह घिघियाने लगा। समझ नहीं पा रहा था कि कैसे संबोधित करें।

        ठीक है, जल्दी कर !’’ कमल बैठ गई- ‘‘और सुन, दगा-धोखा किया तो लाश चील-कौवे खाते दिखेंगे ! सामान ले जा पहले, तब तक मैं कपड़े उतारती हूँ।’’

        जी-ी-ी ?’’

        ठीक है।’’ रामा ने कंधे पर रखा मथना रेत पर रख दिया। बैग का सामान मथना के भीतर जमाया गया। दो बंदूकें खड़ी करके फँसाई गई।

        तुम दोनों इसके साथ तैरकर पार पहुँचो। मैं इसे निशाने पर रखती हूँ, तुम उस पार से से रखना।’’ कमला ने सुरक्षा-व्यवस्था समझाई।

        बादल छँट जाने से सप्तमी का चन्द्रमा उग आया था। पार के किनारे धुँधले-से दिखाई देने लगे थे। तीनों उघाड़े होकर पानी में ऊपर गए। कमर तक पानी में पहुँच रामा ने गंगा जी का स्मरण कर एक चुल्लू पानी मुँह में डाला, उसके बाद दूसरा सिर से घुमाते हुए धार की ओर उछाल दिया। दो कदम और आगे बढ़ रामा ने बाई हथेली तली से चिपकाई व दाहिनी मुट्ठी मथना के किनारे पर कस दी-जै गंगा मैया !

        जै गंगा मैया !

        तीनों पैर-उछाल लेकर पानी की सतह पर औंधे हो गए। गुमका मारता हुआ रामा आगे और बहमा छाँटते दोनों पीछे। पानी का फैलाव अनुमान से अधिक निकला। दोनों बागी पार पहुँचते-पहुँचते पस्त हो गए थे।

        पंडित थक गए क्या  लम्बी साँसे भरते हरिविलास ने पूछा।

        थकान तो आती ही है। मथना से सामान निकालते रामा ने उत्तर दिया।

        तुम आराम से आना-जाना। जल्दबाजी की जरूरत नहीं है। उधर सुस्ता लेना कुछ। औरत वाली बात है। मथना थामने की क्रिया बता देना उसे। हरिविलास ने समझाया।

        बैफिकर रहो कहा रामा पंडित मथना के साथ फिर पानी में आ गया। धार काटते हुए सोच रहा था कि बस आज की रात खेम-कुशल से गुजर जाए। कल इंजीनियर के सामने जाकर खड़ा हो जाऊँगा कि साब तीन साल हो गए सूली की सेज पर सोते, अब तबादला कर दो। जान सदा जोखिम में ऊपर से अपमान।

        सोच में उतराता रामा किनारे आ गया। कंधे पर मथना रख चुचुआती देह लिये वह कमला की दिशा में चलने लगा। हल्की-हल्की हवा से देह ठण्ड पकड़ने लगी थी। चाँद कभी खुलता कभी ढँक जाता। उस पार के आदमी धब्बे की झाँई मार रहे थे। नदी का फैलाव अस्सी-नब्बे हाथ तो रहा ही होगा।

        आ गया  कमला की आवाज आई।

        रामा के मुँह से केवल हूँ निकल सका। आने-जाने में हुई देर पर खींझकर कहीं भड़क न बैठे, इसके डर से रामा सहमा-सा खड़ा हो गया-सामान दे दो, रख दूँ।

        ले ! कमला ने अपने जूते बढ़ा दिए। रामा को लेने पड़े। वह ग्लानि से भर गया-साली नीच जाति की औरत। बड़उआ जाति का कोई ऐसा कभी न करता। उसेन जूते मथना की तरी में जमा दिए।

        और...

        इस बार कमला की पेंट थी। रामा सनाका खा गया। पेंट के साथ चड्डी थी। सिर नीचा किये उसने ये भी भर दिए।

        तेरे घर कौन-कौन है घरवाली है

        बस एक बिटिया है पाँच बरस की। घरवाली तीन साल पहले रही नहीं।

        अच्छा मैं अगर तुझे रख लूँ तो.... जैसे मर्द औरत को रखता है।

        ----------

        कुछ कहा नहीं तूने  कमला की आव़ाज कठोर हुई।

        मैं ...क्या कहूँ  तुम ठहरी जंगल की रानी और मैं नौकरपेशा। आज यहाँ, कल वहाँ।

        यहाँ है तब तक रहेगा मेरा रखैला

        अब मैं क्या बोलूँ

        गूँगा है  डर मत ! मैंने जिनकी कुगत की है वे दगाबाज थे। संग सोकर बदनामी करने वाले को मैं नहीं छोड़ती। तुझसे भी साफ कह रही हूँ-ले ये भी रख दें।

        लेने के लिए हाथ बढ़ाते रामा ने देखा कि कमला कमीज़ उतारकर बढ़ा रही है।

        हल्के-से उजाले में कमला की देह किरणें छोड़ रही थी। रामा की आँखें भिंच गई। उसे मथना का मुँह नहीं मिल रहा था। हाथ कभी इधर पड़ता कभी उधर। पसीना छलछलाकर रोएँ खड़े हो गए। नथुनों में कोई विकल गंध भर रही थी। पैर झनझना आए। कसमसाती देह फट पड़ने को हो गई।

        और ये भी....। कमला की काँसे की खनकती हँसी के साथ रामा ने पाया कि वह रेत पर पटक लिया गया है।

                ना....ना ! छोड़ो.....! करता रामा रेत रौंदने में शामिल हो गया।

                थोड़ी देर बाद उस पार से कूक आई। कमला ने कूक से उत्तर दिया कि- सब ठीक है।...ला पेंट निकाल।

                रामा ने अपराधी की तरह पेंट निकाली।

                कमीज...।

                पेंट कमीज कसकर सिर से साफी बाँध कमला ने बंदूक उठा ली-चल पार पहुँचा।

                मथना में दुनाली रखते हुए लोहे के ठण्डे स्पर्श से रामा में कँपकँपी भर आई। वह कमर तक पानी में खड़ा हो कमला के कदम गिनने लगा।

Sunday, December 18, 2022

दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी - प्रवासी साहित्य और भारतीयता

 कोलकाता, 17 दिसंबर 2022|


भारतीय भाषा परिषद और सदीनामा के संयुक्त तत्वावधान में आज भारतीय भाषा परिषद के सभागार में दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया| उद्घाटन से पहले वागर्थ के दिसंबर में अंक में प्रकाशित प्रवासी लेखिका प्रियंका ओम की कहानी ‘बाज मर्तवा जिंदगी’ का पाठ किया ‘सदीनामा’ पत्रिका की सह संपादक रेणुका अस्थाना ने| परिषद के वित्त सचिव घनश्याम सुगला ने उपस्थित विद्वानों और श्रोताओं का स्वागत करते हुए परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी जी का संदेश सुनाया| खेमानी जी ने कहा कि आप सबों की उपस्थिति बताती है कि आप सबों को भारतीयता से अत्यधिक प्रेम है| मंच पर परिषद के पूर्व सचिव बिमला पोद्दार भी उपस्थित रहीं|

मंच पर उपस्थित विद्वानों ने तेजेंद्र शर्मा (लंदन) और डॉ. इंदु सिंह के संयोजन में आई सदीनामा प्रकाशन की पुस्तक ‘प्रवासी कहानियां’ का लोकार्पण किया|


वैचारिकी पत्रिका के संपादक बाबूलाल शर्मा ने ‘प्रवासी साहित्य में भारतीयता’ पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रवासी साहित्य पर आयोजन बहुत ही कम देखने को मिलते हैं| आज का यह कार्यक्रम इस अर्थ में बेहद महत्वपूर्ण है| वागर्थ के संपादक और भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ.शंभुनाथ ने प्रवासी, अप्रवासी और भारतीयता के अर्थ विस्तार पर चर्चा की| उन्होंने कहा कि भारतीयता के साथ साथ स्थानीयता को भी समझना होगा|

एशियाटिक सोसायटी की प्रतिनिध चंद्रमलि सेनगुप्ता ने एशियाटिक सोसायटी की क्रायकलापों से परिचय कराते हुए प्रवासी साहित्य पर चर्चा की| उन्होंने बांग्ला के लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, विभूतिभूषण बंद्योपाध्या, सतीनाथ भादुड़ी द्वारा प्रवास में रहकर लिखे गए साहित्य से अवगत कराया| बंगवासी कॉलेज (सांध्य) के प्रिंसिपल डॉ. संजीव चट्टोपाध्याय ने आज हिंदी सीखने की जरूरत पर बल दिया| साथ ही बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में बोली जाने वाली बांग्लाभाषा के रूप सौंदर्य पर बात की|

हिंदी विश्वविद्याल, हावड़ा के उप-कुलपति प्रो.दामोदर मिश्र ने कहा कि आज इतिहास को मिटाने की कोशिश की जा रही है| ग्लोबलाइजेश हमें कहां लेकर खड़ा करेगा कहना मुश्किल है| साथ ही उन्होंने साहित्य चर्चा के माध्यम से मनुष्यता को बचाए रखने की अपील की|

प्रथम सत्र का संचालन और धनयवाद ज्ञापन सदीनामा के संपादक जीतेंद्र जितांशु ने किया|


द्वितीय सत्र में रचना संवाद के अंतर्गत आशा बोड़ाल, गोपाल भित्री कोटी, मीना चतुर्वेदी, शकील गौंडवी, रौनक


अफरोज, सेराज खान बातिश, अभिज्ञात, सुरेश शॉ, रामनारायण झा, जतिव हयाल, ओम प्रकाश दूबे, शिप्रा मिश्रा, रवींद्र श्रीवास्तव, मीनाक्षी सांगानेरिया, सोहैल खान सोहैल, रमेश शर्मा, श्रद्धा टिबड़ेवाल, पूनम गुप्ता, संतोष कुमार वर्मा, अभिलाष मीणा, सीमा शर्मा, फौजिया अख्तर, जूली जाह्नवी, मौसमी प्रसाद, वंदना पाठक, रश्मि भारती, मोहन तिवारी, नीतू सिंह गदौलिया ने अपनी कविता का पाठ किया|

इस सत्र का संचालन और संयोजन किया रचना सरन, संदीप गुप्ता, सोहैल खान सोहैल, मीनाक्षी सांगानेरिया, रेणुका अस्थाना,

Tuesday, November 29, 2022

मेले ठेले में दर्शक की एकाग्रता सिर्फ मंच पर घटित होते दृृृश्‍य पर रहती है

विजय गौड 


जब झूठ की कोई भी बात लिख देना सोशल मीडिया में हलचल मचा देने वाला हो रहा हो, ऐसे में इतिहास की उस धारा को सामने लेकर आना, दुनिया को खुशहाल बनाने के लिए जिसकी बेचैनी बेशक कभी संदेह के दायरे में न रही हो लेकिन शासन-प्रशासन एवं अधिकारिक संस्‍थायें जिसका जिक्र करने तक से कन्‍नी काटती हो, जब उस इतिहास को सामने लाने का उद्यम सामने दिखे तो उसका उल्लेख होना ही चाहिए। इतिहास की ऐसी घटना का जिक्र करने वाली संस्‍था बेशक क्षेत्रिय अस्मिता को संतुष्ट करने वाली कोई भी संस्था हो चाहे। वर्तमान का घटनाक्रम ही तो भविष्य में इतिहास है। नाट्य संस्‍था वातायन के साथ मिलकर गढ़वाल महासभा, देहरादून जब नागेन्द्र सकलानी और मोलाराम भरदारी की शहादत और तिलाड़ी के नर संहार को  कौथिग 2022 के विषय के रूप में प्रस्तुत करें तो वह साधारण बात नहीं थी। इतिहास की एक क्रांतिधर्मा घटना को अपने कार्यक्रम का हिस्‍सा  बनाते  हुए गढ़वाल महासभा, देहरादून ने निश्चित ही भविष्‍य के उस सवाल को भी ताक पर रखा होगा कि बडे बजट के ऐसे कौथिग कार्यक्रम का आयोजन करने में मुश्किल आ सकती है। खाता -पीते मध्‍यवर्गीय पहाडी समाज के सहयोगियों से तो धन फिर भी जुटाया जा सकता है, क्‍योंकि संस्‍कृति के प्रति पिलपिले आग्रह में उस मानसिकता में डूबे व्‍यक्ति की मासूमियत तो डोली नाचे चाहे बिगुल बजे, उसकी अ‍स्मिता को तुष्ट करती ही रहती है, इस बात से उसे खास फर्क नहीं पडता कि घटना का मर्म क्‍या था, लेकिन राजनीति की धारा से बह कर आते धन का पतनाला जरूर पतला हो सकता है। 

गढ़वाल महासभा, देहरादून की स्‍थापना का इतिहास, रोजी-रोटी की तलाश में गढवाल छोडकर शहरों में आ बसने वाले उन गढवालियों की एकजुटता के साथ शक्‍ल लेता है, शहरों के छल छद्म से निपटने के लिए जिन्‍हें उस वक्‍त सांस्‍कृतिक और भोगोलिक पहचान के साथ एकजुट होना हौंसला देता था। अपनी स्थापना के दौर में बेशक ऐसा जरूरी रहा हो लेकिन आज जब देहरादून गढ़वाल वासियों की तादाद से भरा है तो उसकी उपस्थिति एकजुटता की सांस्‍कृतिक आवाज तक सीमित नहीं रह सकती, यह बिल्‍कुल तय बात है। इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ऐसी संस्‍थाओं की राजनीति '' मुख्‍यधारा'' की राजनीति के साथ गलबहियां करने में परहेज नहीं करती। बल्कि, बहुत बचते-बचाते हुए भी शासन-प्रशासन की मद्द पा जाने की कामना उन्‍हें ऐसे रास्‍तों को चुनने का ''नैतिक'' आधार भी दे रही होती है। 

बावजूद इसके कौथिग-2022 के समाप्ति वाले दिन (कौथिग 2022 11 से 20 नवम्‍बर 2022) को कौथिग के मंच पर जो नजारा था, वह उस प्रवृत्ति से भिन्न था और नागेंद्र सकलानी और मोलाराम भरदारी की शहादत की कथा को आधार बनाकर रची गई डॉक्टर सुनील कैंथोला की कृति ''मुखजात्रा'' नाटक का मंचन हुआ। नाटक का निर्देशन राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यायाल से शिक्षित रंगकर्मी  सुवर्ण रावत ने किया। वातयान द्वारा आयोजित नाट्यशाला में तैयार किये गये इस नाटक में अभिनय करने वाले सभी कालाकार बधाई के पात्र हैं जिन्‍होंने न सिर्फ अपनी अभिनय क्षमता बल्कि दफन कर दी जा रही इतिहास गाथाओं को साकार करने के लिए उत्‍तराखण्‍ड के एक सीमित क्षेत्र ही सुनायी देने वाली रंवाई  भाषा को भी मंच पर उतारने की सफल कोशिश की। मेरी जानकारी में यह पहला ही अवसर होगा जब हिंदी नाटक के मंच पर रंवाई का इतना खूबसूरत प्रयोग किया गया हो। कलाकार जिस वक्‍त अपने अपने तरह से सुरीली रंवाई बोल रहे थे, बेशक उसको हूबहू अर्थों में समझना इतना आसान नहीं था, लेकिन तिलाड़ी नरसंहार की वह घटना, जिसे रंवाई का ढंडक के नाम से जाना गया ; टिहरी राजशाही के अमानवीय फरमानों  की मुखालफत से उपजा विद्रोह, सुंदर ढंग से बयां हो रही थी। मेले-ठेले के बीच इतिहास की बात करना, वह भी इस गंभीरता से, कोई सामान्य बात नहीं। न सिर्फ भाषाई उपस्थिति के लिए, बल्कि चाट पकोडों के स्‍वाद के लिए मेले में पहुंंचे खाते पीते मध्‍यवर्ग और मस्‍ती के लिए एक स्‍टाल से दूसरे स्‍टाल पर पहुंचते युवाओं से संवाद का माहौल बना देना कोई सरल बात नहीं, निर्देशक सुवर्ण रावत की कल्पना और उसका मंचीय प्रयोग एक यादगार क्षण है।  

1947 में भारत तो आजाद हुआ लेकिन टिहरी की जनता को तो राजशाही के शिकंजे से आजादी उस वक्‍त भी नहीं मिली। प्रजामंडल का आंदोलन, कम्युनिस्टों का आंदोलन टिहरी की जनता की उस आजादी का ही आंदोलन था जिसने राजशाही के उस क्रूर चेहरे को एक बार फिर सामने रख दिया जो 1930 में तिलाडी के ढंडकियों के नरसंंहार से गंदलाये अपने चेहरे के साथ था। 84 दिन जेल में रखने के बाद श्री देव सुमन की हत्या कर दी जाती है और हत्या का बदला लेने की इच्छाएं रखते हुए टिहरी राजसत्‍ता का खात्‍मा कर उसे भारत में विलय कर देने की आकांक्षा के साथ नागेंद्र सकलानी के नेतृत्व में जब टिहरी का जनसैलाब फिर से ढंडक रूप धरने लगता है तो हत्‍यारी सत्‍ता नागेंद्र सकलानी और माेलूू भरदारी की हत्‍या कर देने से नहीं चूकती। लेकिन अपने नेताओं की शहादत की मुखजात्रा के साथ परचम लहराती जनता को रोकना उसके लिए संभव नहीं रहता और टिहरी पर तिरंगा फहरने लगता है।  यह ऐसा मंचन था जो मेले की रोल-धौल के बीच भी अपनी बात कहने में सक्षम था। 

इसी नाटक का एक दूसरा पाठ 26 एवं 27 नवंबर देहरादून नगर निगम के टाउन हॉल में हुए प्रदर्शित हुआ। इसे दूसरा पाठ कहने के पीछे आशय स्‍पष्‍ट है; कौथिग में प्रदर्शित नाटक यहां अपने संपादित रूप में था। संपादित रूप नाट्य संस्‍था वातायन उसकी अहम भूमिका की बानगी बन रहा था जिससे डॉक्टर सुनील कैंथोला की कृति ''मुखजात्रा'' मंचित होने वाले हिंदी नाटकों की सूचि का विस्‍तार कर रही थी। यही कारण है कि कोथिग में हुए मंचन


और 26 एवं 27 दिसंबर देहरादून नगर निगम के टाउन हॉल में हुए को एक ही तरह से विश्‍लेषित नहीं किया जा सकता। टाऊन हाल में प्रदर्शित नाटक संपादन की स्थितियों के बावजूद उस झोल में ही लटकता रहा जहां तिलाडी काण्‍ड का समय और टिहरी रियासत के भारत में विलय संबंधी आंदोलन के समय को अलग अलग पहचानना मुश्किल था। कौथिग में किये गये प्रदर्शन के दौरान यह झोल इस कारण से नजरअंदाज किये जाने वाली बात हो सकती है कि मेले ठेले में दर्शक की एकाग्रता सिर्फ घटित होते दृृृश्‍य पर रहती है। ऐसे में बहुत तार्किक हुए बगैर भी छुपा दिये जा रहे इतिहास को सामने लाना स्‍तुत्‍य ही है। लेकिन एक नाटक जब साहित्‍य के मानदण्‍डों पर अपने को प्रस्‍तुत किये जाने के साथ हो तो एक नाटकीय स्‍वरूप की विशिष्‍टता में भी कथा का तार्किक संयोजन बना रहे तो निर्देशक और लेखक के मंतव्‍य ज्‍यादा प्रभावी ढंग से दर्शक तक पहुंच सक‍ते हैं। यानी टिहरी राजशाही का अमानवीय चेहरा कथा की अतार्किकता में बेदाग भले न दिखाई दे, उस पर लगे दागों को देखना दर्शक के लिए संभव नहीं हो पाता। यह सवाल इसलिए भी महत्‍वपूर्ण है, क्‍योंकि नाट्य लेखक स्‍वयंं भी एक पात्र की तरह नाटक में मौजूद हैं। यदि ये मंचन ''मुखजात्रा'' की स्‍क्रिप्‍ट को फाइनल रूप में पहुंचाने में कोई भूमिका निभाते हैं, हालांकि नाटक तो पहले से प्रकाशित है लेकिन लेखक स्‍वयं जानते होंगे कि नाटक सिर्फ पढने की विधा नहीं है बल्कि मंचन के बाद ही वह अपने असली रूप को पाता है, तो निश्‍चित ही इसे सिर्फ चूक नहीं माना जा सकता। यह चूक तो उस मूल अवधारणा के ही विरूद्ध है जिसके लिए नागेन्‍द्र सकलानी की शहादत को और तिलाडी कांड के नर संहार को याद रखा जाना जरूरी है। टाऊन हाल के प्रदर्शन में इस बात को भी छूट नहीं दी जा सकती कि मंच पर घास काटती महिलाओं क‍े दृृृश्य में पहाडी झलक दिखने के बावजूद यह पहचानना मुश्किल है कि वे महिलायें ब्रिटिश गढवाल का नहीं टिहरी का चेहरा है। इस बारीक फर्क को रखने की जरूरत इसलिए भी है कि रंवाई के ढंडकियों की कथा कहते कलाकारों से निर्देशक ने रवांई को जीवंत कर दिया था। समूह नृत्‍य को रंवाई का रंग देते लेखक महावीर रवालटा स्‍वयं मंच में थे। उत्‍तराखण्‍ड के पहाड के अन्‍य हिस्‍सों में भी होने वाले ऐसे ही समूह नृत्‍यों से अलग यहां कलाकारों के वे बोलते बदन थे जिसमें रंवाई के मानुष की झलक दिखती थी। भाषायी स्‍तर पर सचेत रहकर रंवाई भाषा को मंच पर लाने वाले निर्देशक से यह उम्‍मीद तो बंधती है कि रियासती टिहरी की भाषायी लटक और ब्रिटिश गढवाल की भाषयी लटक के फर्क को भी बनाये। भड्डू देवी का अभिनय कमाल का था लेकिन उनकी  भाषायी लटक टिहरी के बजाय चमोली की महिला की झलक दे रही थी।        


टाऊन हॉल के मंचन पर और भी बातें ध्‍यान खींचती हैं जिन पर चर्चा हो तो उम्‍मीद कर सकते हैं कि एक बेहतरीन नाटक से हिंदी नाटकों  का संसार जरूर समृृद्ध होगा। 

Tuesday, November 15, 2022

ज़करिया स्ट्रीट से मेफ़ेयर रोड तक : विसंगतियों का सिलसिला थमता नहीं

पढ़ते हैं हाल ही में प्रकाशित रेणु गौरीसरिया की आत्मकथात्मक पुस्तक पर लिखी वाणी श्री बाजोरिया की समीक्षा।

वाणी श्री बाजोरिया एक स्नातकोत्तर  अवकाश प्राप्त शिक्षिका हैं, जिन्होंने साउथ प्वाइंट स्कूल और गोखले मेमोरियल गर्ल्स स्कूल में 20 वर्षों तक अध्यापन का कार्य किया।कविताएँ,कहानियाँ,समीक्षा,यात्रा-संस्मरण आदि लेखन में उनकी विशेष रूचि है। उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। 'साहित्यिकी' नामक साहित्यिक संस्था से वे वर्षों से जुड़ी हैं जिसमें साहित्य चर्चा में वे समय समय पर वक्तव्य रखती हैं। वे विश्व में महिलाओं की सबसे बड़ी संस्था इनरव्हील से जुड़ी हैं जिसमें समाज सेवा का कार्य किया जाता है ।गरीब और निचले तबकों के लोगों के जीवन में सुधार लाने के लिए अनेक तरह के छोटे-बड़े काम करने में उन्हें सुख मिलता है।वे विभिन्न  रोगों के निवारण के लिए प्राणिक हीलिंग भी करती हैं। 

 

वाणी श्री बाजोरिया

9830617013

 रेणुजी से जब एक छोटी सी बातचीत मैंने उनकी आत्मकथा पर शुरू की और कहा कि आपको देखकर लगता नहीं कि आपने इतना कुछ सहा है तो बोलीं-' अरे बचपना था उस समय उम्र कम थी तो बचपने में ये सब कुछ हो गया था।'यही एक बात उन्हें सबसे अलग करती है।

न दुरूह शब्दों की श्रृंखलाओं के बोझ से दबी स्त्री-विमर्श की बड़ी-बड़ी बातें  न नारी शोषण के मुहावरों में स्वयं को फिट करने की मंशा। यही बेबाकी, ईमानदारी और सच्चाई उनकी पूरी पुस्तक, उनकी जीवनी में है- जिसका नाम है 'ज़करिया स्ट्रीट से मेफ़ेयर रोड तक'।

उच्च मध्यवर्गीय संपन्न व्यवसायिक परिवार में पैदा हुई रेणुजी के जीवन की घटनाओं को  चार भागों में बाँटकर देखा जा सकता है। प्रथम भाग में बचपन एवं परिवार की घटनाओं,  सुखद क्षणों एवं पारिवारिक माहौल का अत्यंत अंतरंगता से वर्णन किया है, क्योंकि  निर्माण की प्रक्रिया में बनी जीवन की इमारत का वह  कोना आज भी उनकी यादों से महक रहा है। भाई बहन के साथ खेलता- कूदता ,सुमधुर,किलकता प्यार भरा बचपन, संयुक्त परिवार में स्त्रियों का अपनापा, पुरुषों का संगठित पारिवारिक ढाँचा उनकी यादों के संसार में आज भी जीवित है। कोई भी नहीं भूल पाता इतना सुखमय बचपन, विशेषकर तब जब उसके बाद दुखों का अप्रत्याशित समुद्र लीलने सामने खड़ा हो। 

रेणु जी के जीवन का दूसरा अध्याय शुरू होता है उनके विवाह के पश्चात।प्रथम विवाह रेणु जी के जीवन में खुशियों का साम्राज्य लेकर आया  परंतु बहुत जल्द ही नियति के कुचक्र का ग्रास बन गया ।पत्नी पर जान छिड़कने वाले पति की असमय ही मृत्यु हो जाती है। वे चार महीने की  गर्भवती पत्नी को छोड़कर दुनिया से विदा ले लेते हैं। इतने बड़े बज्रपात के बाद एक तरह से वे पूरी तरह से टूट गईं परंतु उनके परिवार वालों ने उन्हें बहुत सहारा दिया और सँभाले रखा। रेणुजी लिखती है, "मैं सोचती हूँ जैसा बचपन मैंने जिया जैसे संस्कार मुझे मिले जिन आदर्शों को लेकर मैं आगे बढ़ी वह सब कैसे हुआ होगा! उस कच्ची उम्र में हठात् जो आँधी मुझे झकझोर गई थी उसे मैंने कैसे सहन किया होगा? मेरे परिवार वालों ने ,मेरे मित्रों ने मुझे टूटने नहीं दिया। मैंने तय किया कि मैं अपनी छूटी हुई पढ़ाई फिर से जारी करूँगी"।          

तत्पश्चात उनका पुनर्विवाह लंदन से पढ़ कर आए लक्ष्मीनारायण गौरीसरिया जो उम्र में उनसे दस वर्ष बड़े थे, से कर दिया गया। 

द्वितीय  विवाह की विसंगतियों को उन्होंने बेबाकी से लिखा। पति के साथ साथ ससुराल वालों का व्यवहार भी उनके साथ बहुत बुरा था। वे लिखती हैं " दर्द इतना बढ़ गया कि मेरा आत्मविश्वास डगमगाने लगा था और इन कष्ट कर हालातों से मुक्ति पाने के लिए तब मैंने दो दो बार आत्महत्या की चेष्टा की थी,जैसे -तैसे मुझे बचा लिया गया।"  "दूसरी बार होशियारी बरतते हुए किसी को कुछ बताए बगैर बहुत सारी नींद की गोलियाँ खा ली थीं पर समय रहते बचा ली गई। आज सोचती हूँ यह सब करते वक्त पम्मी नहीं थी क्या मेरे विचारों में कहीं भी।" एक जगह वे लिखती है कि "कुछ मधुर तो कुछ कटु दिन बीती रहे थे अचानक कुछ ऐसी घटना घटी कि मैं बुरी तरह घबरा कर बहुत ही असहाय महसूस करके माँ भैया के पास चली गई। आगे  लिखती हैं-यह कैसा पति है जो मेरी सुरक्षा का दायित्व नहीं ले सकता।" तीसरी बार उन्होंने फिर आत्महत्या का प्रयास किया मकान से कूदकर। तारीख थी 23 जून 1963 अगले महीने वे  22 वर्ष की होतीं।"

उम्र के उस पड़ाव पर जब कलियों जैसी वनिताओं को ससुराल में सुकोमल परिवेश की आवश्यकता होती है पर वह हमेशा नहीं मिल पाता ।वह कुछ समझने लायक हो उसके पहले ही पितृसत्तात्मक सोच और व्यवहार की चाबुकें उन्हें घायल कर देती हैं एवं कलियों का मासूम मन कुम्हला जाता है,जैसा कि रेणु जी के साथ हुआ। पुरुष अपनी वंशानुगत पुरानी सोच की श्रृंखला स्त्री के पैरों में डालकर सोचता है कि वह कदम से कदम मिलाकर चले,पर यह हो नहीं पाता है। अपनी मायके की जड़ों से काट दी गई स्त्री को दोबारा पनपने के लिए जिस कोमल जमीन  की आवश्यकता होती है उसकी जरूरत को पुरुष का अहंकार उपेक्षित कर देता है।दाम्पत्य की लंबी दायित्व पूर्ण यात्रा में स्त्री से ही अपेक्षा की जाती है कि उसे जो भी मिला है उसे शिरोधार्य मानकर अपना ले। अगर वह यह करने में चूक गई या उसने नकार दिया तो उसके सारे संबंधों के तार तोड़ दिए जाते हैं। अनकहा होकर भी यहाँ स्त्री- शोषण का एक व्यथा पूर्ण ढाँचा आकार ले ही लेता है, इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। अपनी पुत्री से दूरी एक माता के लिए कितनी वेदना पूर्ण है यह उनकी पुस्तक में  जाहिर है ग्यारह वर्षों तक पुत्री से उनका संपर्क तोड़ दिया जाता है ।यहाँ तक कि उनकी पुत्री को यह भी नहीं पता कि उनकी माँ जीवित है या नहीं। 

रेणुजी के जीवन में विसंगतियों का सिलसिला थमता नहीं ,उन्हें दूसरी बार वैधव्य का सामना करना पड़ता है ।

रेणुजी के जीवन का तीसरा अध्याय अब शुरू होता है। इतने वेदना भरे अतीत के बावजूद वे स्वयं को समेट कर खड़ा करतीहैं।  द्वितीय बार वैधव्य के पश्चात जिस ढंग से उन्होंने स्वयं को  स्थापित किया वह अपने आप में प्रेरणास्पद है ।यह एक आम सी दिखनेवाली स्त्री की संघर्षपूर्ण गाथा है जो इस मायने में अपने को खास बनाती है कि किस तरह एक परकटी चिड़िया अपनी जिजीविषा को कायम रख कर अंततः पंख पा ही लेती है ।वे धीरे-धीरे उच्च शिक्षा प्राप्त कर पग पग पर अपने अतीत की स्मृतियों की अवहेलना कर आगे बढ़ती हैं, अध्यापन के कार्य से स्वयं अपनी नियति-निर्मात्री बनती हैं एवं 'जीवन' की उपस्थिति को सार्थकता देती हैं । स्मृतियों के चित्रों को जिस तरह से उन्होंने माला की तरह पिरोया है वह बहुत खूबसूरत है पढ़ते रहने को बाध्य करता है,कहीं भी ऊब नहीं होती ।सबसे बड़ी बात है आत्मीयता से जीवन के सारे चित्रों को ऐसे साहस के साथ उकेरना ।पुस्तक में कहीं ना कहीं पूरे स्त्री वर्ग की विडंबना का दस्तावेज हमारे सामने आता है,साथ ही साथ एक बहुत गहरा संदेश भी है कि माता- पिता हमेशा पुत्री का साथ दें जैसा रेणुजी के मायकेवालों ने दिया। उसे पराया धन मान कर अकेला न छोड़ दें ताकि  वह स्वयं को असहाय महसूस न करे ।

बचपन के विभिन्न कलाकारों, साहित्यकारों का संसर्ग ,फिल्मी दुनिया के लोगों का साथ ,नाटक की दुनिया के लोगों के साथ संपर्क, महान विद्वानों एवं संगीतज्ञों के साथ संपर्क, विभिन्न संस्थाओं से जुड़ाव के साथ-साथ मित्र संबंधों का फैलाव उनकी जीवन यात्रा को बल देता है।पुस्तक का यह चौथा भाग इन्हीं  संबंधों एवं संपर्कों को समर्पित है ।जहाँ आरंभ में एक ओर अभिजात्य वर्ग की स्त्री का मौन रहकर मर्यादा की सीमा को न तोड़ कर सब कुछ चुपचाप भोगने का वर्णन है ,तो पुस्तक के अंत में उनके स्वयं के पुत्र, पुत्री के मुक्त जीवन शैली की चर्चा भी बेबाकी से करती हैं। पुस्तक में एक पूरा युग बोलता है, जिसमें जीवन के बदलते रंगों का समाहार है।ऐसा लगता है मानो कोई नाटक चल रहा है जिसका हर बदलता दृश्य हमें आश्चर्यचकित भी करता है तो वर्णन की खूबसूरती के कारण पूरा प्रभाव भी डालता है। इतनी लंबी यात्रा के बाद भी मौन रहकर आज भी वे कार्यरत हैं। पुस्तक में वर्णित कथ्य कहीं भी शब्दों एवं भाषा का मोहताज नहीं है। बड़ी सादगी ,सरलता, निस्पृहता से अत्यंत प्रवाहमयी प्राँजल भाषा में पुस्तक लिखी गई है ।उम्र के इस पड़ाव पर आकर जीवन का पुनरावलोकन करना एवं उसे शब्द बद्ध करना कोई साधारण काम नहीं है। अपने को खोने के लिए रेणुजी ने किसी अन्य चीज का सहारा नहीं लिया वरण स्वयं को पाने एवं पुनर्स्थापित करने के लिए कलम थामी ।साहित्यिकी को गर्व है ऐसे संघर्षमय व्यक्तित्व की स्वामिनी सदस्य को अपने बीच पाकर।

Thursday, October 27, 2022

न जन्नत देखा, न जहन्नुम देखा, जो कुछ देखा, यहीं देखा

 भारती सिंह 


      "ब़कद्रे-शौक़ नहीं ज़र्फे-तंगना-ए-ग़ज़ल 
      कुछ और चाहिए वुसअत मेरे बयाँ के लिए "
 अपने समय का प्रत्येक सृजनहार अपने-अपने तरीके से इतिहास के सहारे वर्तमान की चुनौतियों से लड़ते-भिड़ते, वक़्त की नब्ज को समझने की कोशिश करता है। यह अलग बात है कि अभिव्यक्ति की अपनी मौलिक धार से अपनी अनुभूतियों को कहां तक सशक्ति से प्रस्तुत कर पाता है। यह अनुभूतियाँ विभिन्न विधाओं का पैरहन बन, जन-मन तक, चेतना एवं विचारों को छूती हुई, देशकाल में बदलाव का अभीष्ट बयार लेकर आती हैं। इन्हीं विधाओं में ग़ज़ल का अपना रुआब और मिज़ाज रहा है। सदियों लम्बी यात्रा में बेशक़ ग़ज़ल को धीरज और भरोसे के साथ अपना सफ़र जारी रखना पड़ है। आज यही यात्रा अपने हासिल को पा सकी है। उर्दू के प्रभाव और संपर्क में पली-बढ़ी ग़ज़ल हिन्दी की जुबान को अपना कर अधिक असरकारक तथा समसामयिक मुद्दों पर और अधिक समृद्ध हुई है। 
कल्पनाओं के फ़लक से उतर कर, निजता एवं एकल मनोभावों से हटकर यथार्थ की ज़मीन पर अपनी नयी पहचान मुकर्रर की है। माधव कौशिक ने लिखा है-
       "सफ़र में दर्द भरी दस्तान रख दूंगा
        मैं पत्थरों पे लहू का निशान रख दूंगा"
 उस यथार्थ में जीवन की कितनी विषमताओं का यथार्थ है और कितना कुंठित कामनाओं का यथार्थ, इसकी भी पड़ताल एवं मूल्यांकन आवश्यक है। मानवीय तत्वों के विघटन से उत्पन्न कुंठाएं एवं वाह्य आवरण के ढकोंसलोंं ने इस सीमा तक पंगु एवं शिथिल बना दिया है कि अपनी अकर्मण्यता, निष्क्रियता एवं क्षरित मूल्यों का कारुणिक, विवादास्पद तथा अश्लीलता का प्रदर्शन ही उसकी नियति बन गई है। नतीजतन, कभी-कभी सृजनात्मकता हाशिए पर आ गई लगती है। ऐसे में चिंतन मनन तक में ना सिमटकर संवेदनाओं की मोटी पड़ती गई परत को खुरच कर अधिक संवेदनशील बनाने की सार्थक पहल आवश्यक होती है। तभी माधव कौशिक ने कहा है - 
     " ऊँगली ज़बान हाथ नज़र इस्तेमाल कर 
       बेखौफ़ होके वक़्त से सीधे सवाल कर।"
हिन्दी कविता के सृजन के लिए जिन तत्वों, जिन संवेदनाओं की आवश्यकता थी, उन्हीं को लेकर हिंदी ग़ज़लों की ज़मीन तैयार हुई है। हालांकि हिंदी साहित्य में गज़लों को वह मुकाम अब तक हासिल न हो सका है जिसकी वह हक़दार है। जबकि पचास, सत्तर वर्षो में ग़ज़लें ,गीत और दोहे ही हैं जो जन-जन तक अपनी पकड़ काफी मजबूत बनाए हुए हैं। फिर अन्य विधाओं की तरह ग़ज़ल को आलोचना के केंद्र में क्यों न रखा गया ! मैनेजर पाण्डेय जैसे वरिष्ठ आलोचक ने  माना है कि वह रचनाएँ  जो अनुशंसित एवं आलोचना के केंद्र में रहीं, काफी हद तक लोकप्रियता एवं सार्थकता की सीमा तक पहुंची। तो क्या हिन्दी कविता से हिन्दी ग़ज़ल को दूर ही रखा गया, या अन्जाने ही उपेक्षा की शिकार हुई । तभी ग़ज़लगो विनय कुमार मिश्र की पीड़ा छलछला उठी है इन पंक्तियों में-
                    "मैं किसे चाहूँ न चाहूँ बात होती है
                    पर ये भी तय कर रही है अब नई दिल्ली"
हालांकि ग़ज़लों की लंबी सुदृढ़ परंपरा में उर्दू ग़ज़लों  का रसूख एवं चलन जन- मन में अपनी मजबूत दखल बना चुका था। पाठकों की समृद्ध उपस्थिति भी देखने को मिलती रही है। लेकिन हिंदी में ग़ज़लें उपेक्षा एवं इग्नोरेंस की शिकार हुई, वज़ह हैरान करती है। नामवर सिंह जैसे आलोचना के शिखर पुरुष मिर्ज़ा ग़ालिब और अहमद फ़राज़ साहब की ग़ज़लों को कोट करते हुए अपने आख्यानों एवं वक्तव्यों की शुरुआत करते रहे हैं। लेकिन उनकी इनायत से ग़ज़ल महरूम रही। छह दशकों की लंबी यात्रा एवं हजारों ग़ज़लकारों की उन्नतिशील प्रवाहमय यात्रा आज भी अनवरत जारी है। फिर भी 'बड़ी हसरत से उम्मीद का चेहरा तकती' रही है। किंतु संतोषजनक बात है कि आज हिन्दी कविता के बीच ग़ज़ल अपनी शिनाख्त करा चुकी है। वैसे तो गज़लों की दीर्घ परम्परा रही है लेकिन हिन्दी में दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें बड़ी अदब और दमखम के साथ साहित्यिक दुनिया में खुद को साबित करतीं हैं और फिर यहीं से ग़ज़ल कल्पना और रुमानियत की हद से बाहर निकल कर ज़िन्दगी की असलियत से वाकिफ होती है -
      " मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ 
         वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ 
दुष्यंत अपनी ग़ज़लों में ज़िन्दगी को आईने के बतौर पेश करते हैं। फिर भी कहन का विस्तार में रचना की ज़मीन संकुचित नहीं होती है, बल्कि उसका फ़लक बड़ा और घना है-
       " वे कह रहें हैं इश्क़ पर संजीदा गुफ़्तगू 
         मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है" 
हालांकि दुष्यंत इस आग्रह से ख़ुद को पूरी तरह से मुक्त नहीं कर पाते। गाहे- ब -गाहे यह रूहानी भाव कुछ यूँ अभिव्यक्ति को प्राप्त होता है-
     " तू किसी रेल सी गुज़रती है
        मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ 
         
       एक आदत सी बन गयी है तू 
       और आदत कभी नहीं जाती "
अद्भुत शैली, भाव एवं ताज़गी से छलकता यह क़लाम दुष्यंत की लेखनी की समृद्धि का सुंदरतम नमूना है।प्रेम की सहजता, सघनता की यह लयात्मक अभिव्यक्ति दुष्यंत को अमर करती है। शायर ने भिन्न-भिन्न तरीके से शैली बदल -बदल कर बात की है।
          "अब तो इस तालाब का पानी बदल दो 
           ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं"

बहुत कम शब्दों का सहारा लेकर ग़ज़लों के मिज़ाज एवं तरबीयत पर कुछ तथ्य काबिले ग़ौर है कि कविताएं जहां एक खास वर्ग अर्थात बौद्धिक समाज एवं प्रबुद्ध पाठकों तक ही अपनी गरिमा को स्थापित कर पाईं, तब भी समय-समय पर इसकी स्थिति भी संतोषप्रद नहीं रही। कारण- शिक्षा का गिरता स्तर एवं पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं के प्रति पाठकों में कम होता लगाव। वहीं साहित्यिक अभिरुचि न रखने वाला व्यक्ति भी रोज़मर्रा की अपनी ज़िंदगी में ग़ज़लों की दो चार पंक्तियों के माध्यम से हमजुबा ग़ज़लों का सहारा लेकर अपनी अभिव्यक्ति को पुख्ता करता मिल जाता है। अब सवाल यह है कि ग़ज़लें इतनी लोकप्रिय होते हुए भी साहित्य की मुख्य धारा में स्वयं को सशक्ति से क्यों स्थापित नहीं कर पाईं। वज़ह साफ़ तौर पर यही मालूम होती है कि "ग़ज़ल को मुक्त छंद में लिखी जाने वाली कविता की तरह जीवन में खुली आवाजाही का अवकाश ज्यादा नहीं रहता, वह बहर और रदीफ़- क़ाफ़िया के बंधनों के अनुशासन में अपनी यात्रा तय करती है।" शायद एक यह भी वज़ह रही हो कि अभिव्यक्ति के लिए सरल और सहज पद्धति न होने के कारण ग़ज़लों को तनिक दुरूह मान लिया गया, जबकि मुक्त छंद में लिखी कविताओं को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना आसान रहा हो।अलंकार और मात्राओं की हद में बांधने की कवायद में कथ्य की संप्रेषणीयता, उसकी सरलता बाधित होने लगती हो, विषय-वस्तु, कहन का उद्देश्य व्यापक और जनकल्याणकारी हो तो उसे किसी बंदिश में न बाँधकर  मुक्त भी रखने में कोई ख़राबी नहीं है। महाप्राण निराला ने कभी न कभी इन्हीं नियमों एवं परम्पराओं की बंधन की लाचारगी को अवश्य समझा होगा तभी उन्होंने मुक्तक छंद की रवायतों पर बल दिया होगा। यह एक अलग वैचारिकता की मांग है। 
बहरहाल ग़ज़लों की समूची विरासत एवं इतिहास को मूल्यांकित करने के लिए व्यापक विमर्श एवं चर्चा की आवश्यकता को महसूस करना लाजमी है। इन संदर्भों को लेकर हाल के दिनों में कई पुस्तकें आई हैं जिन्‍होंने ग़ज़ल की परम्परा और मिज़ाज को परखने मेें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 
समकालीन ग़ज़ल में यथार्थ-बोध को लेेेकर कुछ चर्चा करना चाहूूँगी, उन ग़ज़लों में समय और समाज में फैली विषमता और त्रासदी को चिन्हित कर कुछ बात हो। ऐसे में  विनय मिश्र की इन पंक्तियों का आसरा लेना चाहूँगी-
      " तुक मिलाने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी थी कहन 
         बेतुकी-सी बात थी लेकिन ढिठाई से लिखा। "
ग़ज़ल के बंधन को निभाते हुए उसे आधुनिक रूप देना एक बड़ी रचनात्मक चुनौती है जिसे समकालीन ग़ज़लकारों ने बड़ी सफलता और सार्थकता के साथ निभाया। इसीलिए बल्ली सिंह चीमा ने लिखा है-
     " ये ग़ज़ल जो राजमहलों की कभी जागीर थी 
       अब तो इसको झोपड़ो की अंजुमन तक ले चलो"
बल्ली सिंह चीमा की यह ग़ज़ल इस बात का पुख्ता सबूत है कि समकालीन ग़ज़लकारों ने समय की संवेदना को बख़ूबी समझा और इस संकल्प के साथ अपनी साहित्यिक -यात्रा को जारी रखा कि अब ग़ज़लें एक ख़ास चौखटे से बाहर निकल कर जन-जन तक अपनी लोकप्रियता हासिल करें। ऐसे में इसका तेवर बदल गया। यह ग़ज़लें केवल मनोरंजन या शौक का जरिया नहीं रहीं बल्कि मनुष्य की विडम्बनाओं एवं सामाजिक अराजकता, असहिष्णुता और भौतिकतावदी मनोविकारों का सही-सही चित्र उकेरना इनका मूल उद्देश्य बना। इसलिए चीमा लिखते हैं-
         " बहुत जी लिए इन अंधेरों से डरकर 
           चलो देख लें काली रातों से लड़कर।"
 इसमें सबसे अधिक नुकसान मनुष्यता का हुआ -
         " जैसे तैसे बचा रह गया 
         आदमी और क्या रह गया" 
अपनी कहन एवं शैली के माध्यम से सामाजिक-बोध और जीवन-मूल्यों को सहेजने के लिए ग़ज़लकारों ने जिस आत्मसंघर्ष को अपनाया है, उसकी पड़ताल उदारता के साथ ही मुमकिन है। एक रचनाकार का संवेदन ही उसे सचेत और बेबाक बनाता है । विनय मिश्र की यह पंक्तियाँ क़ाबिल-ए-ग़ौर है -
       " ख़ुद में अपने से ही छूटकर 
         भीड़ में हर दफ़ा रह गया " 
 इन ग़ज़लों को पढ़ना और समझना अपने आप में अनुभव से गुजरते हुए परिपक्व होना है। इस दौर के ग़ज़लकारों की ख़ूबी यही है कि उनकी सृजनात्मकता का चेहरा निहायत व्यक्तिगत है, लेकिन इनमें गहरे उतरते जाएँ तो धीरे-धीरे वक़्त का अक्स उभरने लगता है। इन्होंने काल्पनिक सृजन-संसार की बजाय दुनिया की असलियत एवं गहरे जड़ जमाए हुए कुरीतियों और त्रासदियों को ग़ज़लों के लिए चुना। हरेराम समीप की लिखी यह पंक्तियाँ सोचने पर मजबूर करती हैं-
  " इस सियासत की गिनाऊ और क्या उपलब्धियां 
    त्रासदी- दर - त्रासदी -दर -त्रासदी -दर  त्रासदी " 
व्यंग्य मुस्कुराता हुआ है तो कहीं-कहीं यही व्यंग्य अधिक तल्ख और आक्रामकता के साथ हालातों को रखता है। अधिकतर विडंबनापूर्ण उक्तियाँ समय की जटिलता को व्यक्त करते हुए पाठकों को उत्तेजना और चिन्तन के लिए मजबूर करती हैं। अदम गोंडवी आक्रोश और आवेग- संपन्न रचनाकार हैं। उनका काव्यादर्श एक तीखी टिप्पणी बन पाठकों के भीतर बौखलाहट पैदा करता है। वह लिखते हैं- 
         "जी में आता है आईना को जला डालूँ
         भूख से जब मेरी बच्ची उदास होती है 

          जनता के पास एक ही चारा है बगावत
           ये बात कह रहा हूं होशो हवास में"
बगावती तेवर के साथ अपने अभाव एवं फकीरी में भी रचनाकार लिखता है और बिगुल फूंकता है कि अब हाथ पर हाथ धरे बैठने से कुछ ना होगा। अदम गोंडवी की ग़ज़लों में बेचैन आत्मा का संघर्ष पूरी शिद्दत और प्रमाणिकता के साथ मौजूद है। तेवर, मिज़ाज और कहन में तल्ख और आक्रोश एवं  विक्षुब्धता का गरजता स्वर है। उनकी ग़ज़लों में यथार्थ का स्वरूप अधिक आक्रामक और परिवर्तनकारी रहा है। यही वज़ह है कि अपने पूर्ववर्तियों और समकालीनों से अलग नज़र आते हैं ।सत्ता पर ,व्यवस्था पर काबिज़ अयोग्य एवं शोषकों को चुनौती देना होगा, तभी स्थितियाँ बदल सकती हैं, यह स्वर उनकी गज़लों  की पहचान है-
          " घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है। 
            बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है।।
             ×            ×                ×                   ×
     बगावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
     मैं जब भी देखता हूं आंख बच्चों की पनीली है ।।"्र
इस अभिव्यक्ति से यथार्थ की पेशानी पर भी बल पड़ जाए। अनुभवों की तीखी चुभन और टीस अदम गोंडवी की रचनाओं की ज़मीन है -
       " सदन को घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे। 
         अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे।।" 
अदम गोंडवी विकृत सामाजिक व्यवस्था एवं अवयवों का खाका अपनी ग़ज़लों में रूपायित करते हैं जो वास्तव में विकृत और कुरूप हो चुके हैं। कभी कठिन परिस्थितियां रचनाकार को जन्म देती है तो कभी यही रचनाकार अपनी लेखनी की ताक़त से विश्वव्यापी परिवर्तन का कारण बनता है। सब कुछ सहने और चुप रहने की फ़ितरत पर अदम बौखला जाते हैं और फिर कहते हैं-
      " नीलोफर शबनम नहीं अंगार की बात करो
        वक्त के बदले हुए मेयार की बातें करो 

        भाप बन सकती नहीं,पानी अगर हो नीम गर्म
        क्रांति लाने के लिए हथियार की बातें करो। 
अदम गोंडवी यहीं तक नहीं रुकते, वह गाँधी की नीतियों पर भी सुबहा और सवाल करते हुए कहते हैं-
      " लगी है होड़-सी देखो अमीरों और गरीबों में
        यह गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी ख़राबी है

      तुम्हारी मेज चांदी की तुम्हारे जाम सोने के 
     यहां जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है"
अदम तल्खी और तेज़ाबी तेवर में दुष्यंत कुमार से एक क़दम आगे हैं। दुष्यंत की ग़ज़लों में जीवन की इसी असामानता, असहिष्णुता, अव्यवस्था, अराजकता , अनैतिकता से भिड़ने की पूरी वफ़ादारी मिलती है।
   " हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए "
लेकिन अदम गोंडवी के यहाँ यह चिंगारी पाठकों  को परिवर्तनकारी निष्कर्ष तक पहुँचाता है, जो शुरुआत की चिंगारी दुष्यंत कुमार देते हैं। अदम के यहाँ वह आग अधिक जनप्रिय होकर हर दिल में घर कर गयी है- 
     "जामो -मीना की खनक से थी ये वाबस्ता जरूर 
        देखिए अब जिन्दगी की तजुर्मानी है ग़ज़ल। "
आज़ादी के बाद जिस समृद्ध और विकसित समाज और देश की परिकल्पना की गई थी, वह चंद स्वार्थी तत्वों और सत्तासीन शासकों की महत्त्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गयी।
       "कैसा सम्मोहन है उसकी बातों में 
        नेता तो पूरा जादूगर लगता है " 
क्या यह वर्तमान का यथार्थ नहीं है ! एक ऐसा यथार्थ,  जहां लोकतंत्र के नाम पर हम इस्तेमाल हो रहे हैं और चंद मुठ्ठी भर तथाकथित देश के कर्णधार बनते यह नेता अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से झांसे में लेकर हमारे अधिकारों एवं हितों का दोहन करते हैं और हम उनकी गिरफ्त में आ जाते हैं। हमारी स्थिति ऐसी है जैसे ' बहेलिया आएगा दाना डालेगा, फंसना नहीं'। लेकिन हमारी विडंबना है कि बहेलिया आता है, दाना डालता है, इसे रटते, समझते हुए भी हम 'फंस' जाते हैं। इस मुद्दे से ताल्लुक रखती महेश कटारे सुगम जी की ग़ज़ल भी स्वागत योग्य है-
      " बेईमान ख़िदमतगारों  से क्या होगा 
        लोक तंत्र के हत्यारों से क्या होगा " 
यह ग़ज़ल भी  समय को बताती है- 
     फट जाएंगे एक रोज़ शिक़म अहले हवश
     जनता का ये लोग बजट खाने में लगे हैं।" 
 विकास के नाम पर पूंजीवादी ताकतों का बंदरबांट, महत्वाकांक्षाओं एवं जरूरतों के बीच से मिटता भेद, आम जनजीवन को कितना खोखला और मूल्यरहित करता जा रहा है, इसकी बेचैनी इन पंक्तियों में देखी जा सकती है -
         "उन्हें पटरी बिछानी है, उन्हें सड़कें बनानी है
         तेरी खेती छिने या घर,उन्हें क्या फ़र्क पड़ता है।
राम नारायण हलधर की यह पंक्तियाँ भी समय की भयावहता को उजागर करती हैं। बेबसी और लाचारी का बड़ा मार्मिक चित्र पेश करते हैं अपनी ग़ज़लों में।अलग-अलग भाव-भूमि को लेकर ताज़गी और टटकेपन को बरकरार रखते हुए विभिन्न ग़ज़लगो ने बड़ी साफ़गोई से स्थितियों को उद्घाटित किया है। 
          "  श्रद्धा हो तो पत्थर शंकर लगता है 
             वरना शंकर में भी पत्थर लगता है।"
 लवलेश दत्त की इन पंक्तियों में लोक-जीवन में तैरता एक बंद 'मानो तो देव नहीं तो पत्थर' की स्मृतियों में ले जाता है। इसे जरा नए रूप में उतार कर अपनी लोक संस्कृति एवं आस्था को सहेजने का यह हुनर सराहनीय है। उनकी एक और ग़ज़ल की यह पंक्तियाँ बहुत स्पष्ट शब्दों में मौज़ूदा वक़्त को हमारे सामने रखती है-
      " रोटी कपड़ा घर को भूले 
        अब मंदिर-मस्जिद मुद्दा है " 
इतनी बेबाकी और स्पष्टता के साथ सृजन करना उसकी विश्वसनीयता को चिन्हित एवं सूचित करता है। यही वज़ह है कि रचनाकार को किसी खास विचारधारा अथवा खेमे से ताल्लुक न रखकर समसामयिक गतिविधियों एवं कार्यान्वयनो का सटीक परख होना, उसे दृष्टि संपन्न एवं कृतियों को कालजई बनाता है। हालातों को समझते हुए परिस्थितियों के साथ समझौते के लिए  विवश होने को इन पंक्तियों में बखूबी देखा जा सकता है-
      "अपनी शर्तों पर जीने का मंजर नहीं रहा
        जिंदा रहना अब अपने पर निर्भर नहीं रहा"
 मौजूदा दौर एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए किसी बड़ी विडंबना और विफलता के रूप में उपस्थित है। यह पंक्तियां साफ़तौर पर जता रही हैं। विषम परिस्थितियों से निर्मित खुरदरी ज़मीन पर विनय मिश्र की ग़ज़लें कहीं खिलखिलाती, कहीं मुस्कुराती तो कहीं उग्र तेवर का मिज़ाज लेकर प्रस्फुटित हुई हैं।
       "यह समय का खुरदुरापन है इसी पर तो 
       मेरी ग़ज़लों की उगी हैं मखमली घासें
        ×              ×        ×                 ×
       लड़ाई हार भी जाऊं मगर संघर्ष बोलेगा 
      मेरी ग़ज़लों में गूंगा देश भारतवर्ष बोलेगा "
मुलायमियत के साथ संघर्ष की चिंगारी को अपने भीतर जोगा कर रखती यह ग़ज़लें अपने उद्देश्यों को पुख्ता करती हैं, साथ ही आने वाली पीढ़ियों को समसामयिक अराजकता एवं व्यवस्था पर प्रतिरोध करने का हौसला देती हैं- 
     "हमारा काम है बाज़ार में भी आदमी गढ़ना 
      तुम्हारा काम घर आंगन को भी बाज़ार करना है"
उपनिवेशवादी ताकतों का फैलाव, बाज़ारवादी संस्कृतियों के हाथों हमारे सपने गिरवी रखे जा चुके हैं। विनय मिश्र आत्मसजग ग़ज़लगो हैं 
      "अपने घर में ही किराएदार हूँ 
      सोचिए मैं किस क़दर लाचार हूं"
भौतिकवादी मनोवृति आज इतना हावी हो चुकी है कि अपनी जरूरतों एवं महत्वाकांक्षाओं के बीच की खींची महीन लकीर को समझ पाने में पूर्णता असफल हो चुके हैं। नतीजा मनुष्य अकेलापन, हताशा और कुंठा का शिकार हो चुका है। अपनी अस्मिता को खोकर, संवेदनहीन हो मशीन बनता जा रहा है। इसलिए वह लिखते हैं -
             "यह आदमी जितना पढ़ो 
              पहचान में आता नहीं"

          बस किसी उम्मीद का था आसरा 
          इसलिए मैं टूट कर बिखरा ना था"
समय बार -बार अपने विद्रूप शक़्ल व सूरत में  बेढब और आक्रामक रूप से अलग-अलग ग़ज़लों में रूपायित होता  आया है ।ज़हीर कुरैशी की ग़ज़लों में समय का संत्रास, मनुष्य की जड़ता, एकाकीपन, मानसिक द्वंद, राजनीतिक पैतरेबाजी ,उपभोक्तावादी दबाव, बाज़ार का फैलता मकड़जाल का जटिल यथार्थ पेश करता है-
      "कितने हज़ार डर हैं हर एक आदमी के साथ
      क्या आपको भी आपके डर का पता लगा?"
 डर का यथार्थ कितने पुरज़ोर तरीक़े से मनुष्य से सवाल करता है कि प्रत्येक डरा हुआ व्यक्ति को अपने डर की वज़ह का पता चलता है। डर ,आशंका, हताशा के बीच से हमारी सहज मानवीय रागात्मकता कहीं लुटती जा रही है। अपने द्वारा रचे गए अप्राकृतिक परिवेश का कुछ तो असर रखेगा -
           "यहां हर व्यक्ति है डर की कहानी-
            बड़ी उलझी है अंतर की कहानी"
जीवनानुभूति जितनी गहन होगी, रचना उतनी ही प्रासंगिक एवं असरकारक होगी। ज़हीर कुरैशी ने लिखा है कि-
     " चिन्तन ने कोई गीत लिखा या ग़ज़ल कही
       जन्में हैं अपने आप ही दोहे कबीर के। "
विराट तकनीकी सभ्यता के विकास के समय में भी 'क्या खोया क्या पाया' का मलाल क़ायम रखना होगा। किन मूल्यों को खोकर, किस क़दर खोखला हो रहें हैं। 
     " सत्य का पक्ष लेने के बाद लोग कायर दिखाई दिए
       उस परीक्षा में हर प्रश्न के चार उत्तर दिखाई दिए" 
सत्य का कोई विकल्प नहीं होता है लेकिन आज का दौर की सच्चाई है कि सत्य का भी कई विकल्प है। सबके 'अपने-अपने सच' हैं। मेयार सनेही की कहन की शैली एवं विषय का यथार्थ की बानगी सोचने को विवश करती है-
        "कभी इसका तो कभी उसका निज़ाम आता है 
        देखना यह है कि कब दौरे आवाम आता है"
 ग़ज़ल की यह पंक्तियां लोकतंत्र पर कटाक्ष है। इस लोकतंत्र के दौर-ए-जहाँ में  कुछ भी सुरक्षित और स्थिर नहीं है। इसी तरह दिव्या जैन के अश्आरो  में जीवन का यही कड़वा यथार्थ समय की भयावहता को दर्शाता है-
     "मुझको अब घर से निकलते हुए डर लगता है 
      अब हर एक राम में रावण का बसर लगता है"
इसमें हमारे दौर का वह स्याह सच है,जिसे हम रोज़ सहते हैं और सहते रहने को अभिशप्त हैं।
     "ये रोटी कितनी महंगी है ये वो औरत बताएगी
     कि जिसने जिस्म गिरवी रख के ये कीमत चुकाई है"

वहीं लवलेश जी लिखा है - 
    " भूख से व्याकुल बचपना देखा है 
       हाट में बिकता यौवन देखा है " 
यानी, लगातार सभी संवेदनशील रचनाकारों ने अपने मिज़ाज और अनुभव के तर्ज़ पर समय को मूल्यांकित किया है। ऐसे ही तथाकथित सभ्य समाज का हकीकत बयां करते अदम अपनी लेखनी के दायरों को अधिक विस्तृत करते हुए जहां भूख और गरीबी को चिन्हित करते हैं, वहीं जीवन के फलसफे को भी हमारे समक्ष ला खड़ा करते हैं-
       "आप कहते हैं जिसे इस देश का स्वर्णिम अतीत
        वो कहानी है महज प्रतिशोध की, संत्रास की
          ×                 ×                ×                ×
        इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया 
       सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियां सल्फास की।" 
मिटती सभ्यता और घायल संस्कृति का मूल कारण बढ़ता बाज़ारवाद है और चाहे कि अनचाहे आज प्रत्येक व्यक्ति इसकी चपेट में आ गया है-
         " है कोई इन्सान जो उठकर कहे इस बज़्म में 
          मैंने अपने आप को बाज़ार में बेचा नहीं   " 
 कितना दारूण और स्याह पक्ष है हमारी तथाकथित उपलब्धियों का। जीवन का रंग और राग हमेशा के लिए रूठ गये लगते हैं। बाज़ार की रौनक बनती स्त्री, नई पीढ़ी का भटकाव, अतीत का मोह, राजनीति का गिरता स्तर ,समाजवाद का पतन, कामनाओं की अतिशयता, जातीयता और सांप्रदायिकता का बढ़ता विकृत रूप, भाषाई स्तर पर अलगाववाद का हिंसात्मक प्रतिरूप हर ओर विघटन है। ऐसे में किसी भी संवेदनशील व्यक्ति प्रतिरोध का स्वर दबाकर नहीं रह सकता। बल्कि वह गुहार लगाता है - 
            हमसफ़ीरों न तुम ख़ामोश रहना 
             मैं आवाज़ दूँ, तुम आवाज़ देना" 
और उस आवाज़ में असर होता है। आवाज़ आवाज़ को आमंत्रित करती है और वह साथ होने का नमूना पेश करती है माधव कौशिक के अल्फ़ाज में -
          " मेरी तरह उदास थे कुछ लोग भी 
            ऐसा नहीं मैं शहर में तन्हा उदास था"
यह उदासी कई आयामों को ज़ाहिर करती है। यह उदासी है विस्थापन की, खोखलेपन की, चिन्तन की जड़ता की, प्रतिरोध की नपुसंकता की, प्रेम के प्रति एकनिष्ठता की।
     "उस घर से कितनी यादें जुड़ी हैं मैं क्या कहूँ 
      जिस घर में लौटकर मैं दुबारा नहीं गया "
कितनी खलिश है विनय मिश्र की इस पंक्ति में। बाज़ार की चकाचौंध और दो वक़्त की रोटी की तलाश में अपनों से किस क़दर दूर हो गये। लेकिन इन स्थितियों के लिए ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने में भी हिचक अनुभव करते हैं लोग। और प्रतिरोध का मतलब आप अब उनके निशाने पर हैं ।तभी तो पुरुषोत्तम प्रतीक जी ने लिखा है -
     "चाकू के गांव में इंसान की बातें न कर 
      है बहुत खतरा यहां ईमान की बातें न कर "
अब यह आपका नैतिक दायित्व है कि आपको किस का पक्ष लेना है। अराजकता को हवा देंगे अथवा उन्हें रोकने, अंकुश लगाने के लिए अभिव्यक्ति के खतरे उठाएंगे।यह आपका निजी चुनाव है आप किस ओर रूख और करेंगे। इतिहास तो दोनों का लिखा जाना तय है और मनुष्यता एक न एक रोज़ कटघरे में खड़ा करेगी। तभी दुष्यंत को सुझा होगा - 
       "यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं 
       खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा"
यही आलम आज भी बना हुआ है। तभी मक़बूल मंजर की क़लम आह भरती है-
     "कहने को सलामत हूँ, मगर टूट रहा हूँ 
      हालात के हाथों का खिलौना जो हुआ" 
लेकिन ज़िन्दगी थमती नहीं, उम्मीदें टूटती नहीं। ' वो सुबहो कभी तो आएगी ' साहित्य समाज का प्रतिरूप है, और कल्पना उसमें नई भोर का अस्तित्व तलाशती है। 
यह तभी मुमकिन है जब हमारे भीतर ' जो है उससे बेहतर ' की चिंगारी जगी रहे। दुष्यंत के यहाँ यह भरोसा क़ायम है -
      " एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों 
        इस दीए में तेल से भीगी हुई बाती तो है"।
अमीर खुसरो से होते हुए भारतेंदु से लेकर चली हिंदी ग़ज़ल मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, दुष्यंत कुमार, नागार्जुन, पुरुषोत्तम प्रतीक ,केदार जी, रामकुमार  कृषक, अदम गोंडवी ,  ज़हीर कुरैशी, हरेराम समीप, बल्ली सिंह चीमा, ज्ञान प्रकाश विवेक, विनय मिश्र जैसे सशक्त ग़ज़लगो ने समय-समय पर मानवीय मूल्यों, वातावरण की संवेदना पर, वैश्विक सौहार्द्र,  सामाजिक समरसता के लिए, ग़ज़लों से सरोकार रखते हुए अभिव्यक्ति की तमाम आग्रहों को अपनाते हुए लेखनी की लंबी और चौड़ी रेखा खींची है। इन तमाम ग़ज़लों में अपने समय का समाज, आम आदमी की अजीयतें, प्रेम का पलायन ,अभावग्रस्त जीवन का संघर्ष, अव्यवस्था, महंगाई, शोषण से अभिशप्त जीवन जीने की बाध्यता को लेकर आए। साथ ही दुष्यंत कुमार ने ग़ज़ल की जो रहनुमाई की उसका अनुकरण करते हुए आगे की पीढ़ियां नए परिदृश्य रचने के लिए, बदलाव के बयार को लाने के लिए प्रतिबद्ध दिखते हैं -
    "दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
     और कुछ हो या ना हो आकाश-सी छाती तो है"।
निधि सिंह की ग़ज़लों में यही आश्वासन नज़र आता है -
     " बहुत मुमकिन है सोता फूट जाए 
       कई बरसों से हम पत्थर रहे हैं।" 


 परिचय





भारती सिंह 
साहित्यिक गतिविधि- दस्तावेज़, वागर्थ ,पाखी , लहक ,सापेक्ष, वाक ,परिकथा, चौपाल, ककसाड़,  सुबह की धूप आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित ।
संपर्क - नेहरू नगर ,चिनिया रोड, गढ़वा, झारखंड 
822114 
मोबाईल नम्बर- 9955660054