Thursday, December 25, 2008

क्रांतिकारी धारा के कवि ज्वालामुखी को विनम्र श्रद्धांजलि



सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी तेलुगू कवि,संस्कृतिकर्मी और मानवाधिकारवादी श्री ज्वालामुखी (वीर राघवाचारी) का गत 15 दिसंबर को 71वर्ष की आयु में हैदराबाद में देहान्त हो गया। श्री ज्वालामुखी आंध्रप्रदेश के क्रांतिकारी किसान आंदोलन का हिस्सा थे। श्रीकाकुलम,गोदावरी घाटी और तेलंगाना में सामंतवाद-विरोधी क्रांतिकारी वामपंथी किसान संघर्षों ने तेलुगू साहित्य में एक नई धारा का प्रवर्तन किया,ज्वालामुखी जिसके प्रमुख स्तंभों में से एक थे। 70 और 80 के दशक में जब इस आंदोलन पर भीषण दमन हो रहा था, उस समय सांस्कृतिक प्रतिरोध के नेतृत्वकर्ताओं में ज्वालामुखी अग्रणी थे.चेराबण्ड राजू,निखिलेश्वर, ज्वालामुखी आदि ने क्रांतिकारी कवि सुब्बाराव पाणिग्रही की शहादत से प्रेरणा लेते हुए युवा रचनाकारों का एक दल गठित किया.इस दल के कवि तेलुगू साहित्य में (1966-69 के बीच) दिगंबर कवियों के नाम से मशहूर हुए। नक्सलबाड़ी आंदोलन दलित और आदिवासियों के संघर्षशील जीवन से प्रभावित तेलुगू साहित्य-संस्कृति की इस नई धारा ने कविता, नाटक, सिनेमा सभी क्षेत्रों पर व्यापक असर डाला। ज्वालामुखी इस धारा के सशक्त प्रतिनिधि और सिद्धांतकार थे। वे जीवन पर्यन्त नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन से उपजी देशव्यापी सांस्कृतिक ऊर्जा को सहेजने में लगे रहे। वे इस सांस्कृतिक धारा के तमाम प्रदेशों में जो भी संगठन,व्यक्ति और आंदोलन थे उन्हें जोड़ने वाली कड़ी का काम करते रहे। हिंदी क्षेत्र में जन संस्कृति मंच के साथ उनका गहरा जुड़ाव रहा और उसके कई राष्ट्रीय सम्मेलनों को उन्होंने संबोधित किया। उनका महाकवि श्री श्री और क्रांतिकारी लेखक संगठन से भी गहरा जुड़ाव रहा।
ज्वालामुखी लंबे समय से जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय परिषद के मानद आमंत्रित सदस्य रहे। हिंदी भाषा और साहित्य से उनका लगाव अगाध था। उनके द्वारा लिखी हिंदी साहित्यकार रांगेय राघव की जीवनी पर उन्हें साहित्य अकादमी का सम्मान भी प्राप्त हुआ था। ज्वालामुखी अपनी हजारों क्रांतिकारी कविताओं के लिए तो याद किए ही जाएंगे, साथ ही अपनी कथाकृतियों के लिए भी जिनमें `वेलादिन मन्द्रम्´, `हैदराबाद कथालु´,`वोतमी-तिरगुबतु´अत्यंत लोकप्रिय हैं। वे लोकतांत्रिक अधिकार संरक्षण संगठन के नेतृत्वकर्ताओं में से थे तथा हिंद-चीन मैत्री संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी थे। उनकी मृत्यु क्रांतिकारी वामपंथी सांस्कृतिक धारा की अपूर्णीय क्षति है। जन संस्कृति मंच इस अपराजेय सांस्कृतिक योद्धा को अपना क्रांतिकारी सलाम पेश करता है।

मैनेजर पांडेय,राष्ट्रीय अध्यक्ष
जनसंस्कृति मंच

प्रणय कृष्ण,महासचिव,
जनसंस्कृति मंच

विद्यासागर नौटियाल का नया कथा-संग्रह " मेरी कथा यात्रा"




सुप्रसिद्ध आलोचक डा0 नामवरसिंह 25 दिसम्बर '08 को दूरदर्शन के ने्शनल प्रोग्राम के अंतर्गत
सुबह 8-20 बजे विद्यासागर नौटियाल के कथा-संग्रह
मेरी कथा यात्रा की समीक्षा करेंगे

Friday, December 12, 2008

तुम्हारी ओर मैं क्यों आकृष्ट हुआ - पत्र में कैसे कर दूं दर्ज

प्रस्तुति : यादवेन्द्र



गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ जगदीश चंद्र बसु की अंतरंग मित्रता थी जिसमें एक दूसरे के घर आना-जाना, पत्रों और पुस्तकों का आदान-प्रदान और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर विचार-विमर्श शामिल था। जब पहली बार गुरुदेव जगदीश बाबू के घर गये तो वे वहीं कहीं बाहर गए हुए थे- गुरुदेव वहां एक फूलों का गुच्छा छोड़ आए। यहीं से आने जाने का सिलसिला शुरु हुआ। एक बार गुरुदेव ने वैज्ञानिक को अपने साथ कुछ दिन रहने के लिए आमंत्रित किया। जगदीश बाबू इस शर्त पर राजी हुए कि हर रोज गुरुदेव उन्हें कोई कोई नयी कहानी जरुर सुनाएंगे। कहानियों का अनवरत क्रम जिस दिन टूट जाएगा उस दिन वे लौट जाएंगे वापिस। चौदह दिनों के बाद एक दिन यह सिलसिला भंग हुआ। रविन्द्र नाथ ठाकुर की कहानी "काबुली वाला" इसी विदित समागम की उपलब्धि है जिसे भगिनी निवेदिता ने 1912 में अंग्रेजी में अनुवाद करके और तपन सिन्हा ने फिल्म बनाकर अहिन्दी भाषियों के बीच भी अमर कर दिया। महान रचनाकार रोम्यां रोला और जार्ज बर्नाड शॉ से भी जगदीश बाबूका खासा मेल मिलाप और संवाद था। इन दोंनों ने अपनी एक-एक पुस्तक भारतीय वैज्ञानिक को समर्पित की है।जगदीश बाबू की साहित्य में रुचि को देखते हुए उन्हें बंग साहित्य परिषद का अध्यक्ष भी निर्वाचित किया गया था।इतना ही नहीं जगदीश बाबू गुरुदेव के सतरवें जन्मदिवस (सप्ततितम जन्मवार्षिकी) की आयोजन समिति के सभापति भी बनाए गए।

बौद्धिक आदान प्रदान तो इन दो महान विभूतियों के बीच होता ही था,पर इनकी बालसुलभ मित्रता यहां तक थी किवे मिलकर पुरी में एक साझाा मकान बनाने की सोच रहे थे। इस संबंध में अपने 18 अगस्त 1903 के पत्र में वैज्ञानिक स्पष्ट लिखते हैं - "एक बार सोचा था कि दोनों मिलकर एक कुटिया बनाएंगे और कभी-कभार वहां जाकररहेंगे। तुम्हारी जमीन तुम्हें ही मुबारक हो, तुम यदि इस तरह निरासक्त हो जाओ और पुरी में मेरे साथ रह सको तो मेरे लिए वह निर्जन एकांत असह्य हो जाएगा।"





17 सितम्बर 1900 को जगदीश चंद्र बसु को लिखा रवीन्द्र नाथ ठाकुर का पत्र

आपको यह सुनकर ताज्जुब होगा कि मैं आजकल स्केचबुक में पेंटिग करने लगा हूं। ऐसा नहीं है कि ये चित्र पेरिस की किसी कलादीर्घा के लिए बना रहा हूं और न ही यह मुगालता है कि किसी देश की राष्ट्रीय गैलरी अपने कर दाताओं का पैसा लगाकर इन्हें अपने यहां प्रदर्शन करने के लिए खरीदेगी। यह किसी व्यक्ति का अन्जान कला की ओर वैसे ही खिंच जाना है जैसे कुछ न कमाने वाले अपने बेटे के प्रति भी मां खिंच जाती है। अब जब मेरे ऊपर आलस्य हावी होने लगा है तब अचानक एक कलाकार का धंधा सूझा जिसमें लगकर समय खुशी-खुशी व्यतीत किया जा सकता है। मुश्किल यह है कि मेरी अधिकांश ऊर्जा रेखाएं खींचने में नहीं बल्कि उन्हें मिटाने में चली जाती है- परिणाम यह होता कि मैं पेंसिल की तुलना में मिटाने वाले रबर को पकड़ने में ज्यादा पारंगत हो गया हूं। इसे देखते हुए अब राफेले को चैन से अपनी कब्र में आराम फरमाते रहना चाहिए, कम से कम उसके रंगों के लिए मैं किसी तरह का खतरा नहीं बनने वाला।





जगदीश चन्द्र बसु के रवीन्द्र नाथ को लिखे गये पत्रों के उद्धरण


तुम्हारी ओर मैं क्यों आकृष्ट हुआ, बता दूं - हृदय की जो महत आकाक्षांए हैं वे संभवत: मन में ही रह जातीं यदि तुम्हारी बातों में, तुम्हारी रचनाओं प्रस्फुटित होते नहीं देख पाता।
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तुम्हारे स्वर में मुझे क्षीण मातृ-स्वर सुनाई पड़ता है - उस मातृ देवी के अतिरिक्त मेरा और क्या उपास्य हो सकता है ? उसी के वरदान से मुझे बल प्राप्त होता है। मेरा और है ही कौन ? तुम्हारे अपूर्व स्नेह से मेरी अवसन्नता दूर होती है। मेरे उत्साह तुम उत्साहित होते हो और मैं तुम्हारे बल से बलवान बनता हूं। मैं अपने सुख-दुख के बारे में नहीं सोचूंगा, तुम्हीं बताओगे कि मुझे क्या करना है। यदि मैं कार्य भार से अथक परिश्रम या निराशा से अवसन्न हो जाऊं तो इसे ध्यान में रखते हुए मुझे बराबर प्रोत्साहन भरे शब्दों से पुनर्जीवित करना।

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तुम्हारी पुस्तक के लिए मैंने कई जुगाड़ बिठाए हैं। मैं तुम्हें यशोमण्डित देखना चाहता हूं। अब तुम छोटे गांव में नहीं रह पाओगे। तुम्हारी रचनाओं का अनुवाद करके यहां के मित्रों को अक्सर सुनाता रहता हूं- वे अपने आंसुओं को नहीं रोक पाते हैं। पर इन्हें यहां कैसे प्रकाशित करवाया जाए, समझ में नहीं आता। एक बार यदि तुम्हारा नाम प्रतिष्ठित कर पाऊं तो अपने आपको परम सौभाग्यशाली समझूंगा।

Tuesday, December 9, 2008

संवेदना देहरादून, मासिक गोष्ठी - दिसम्बर 2008

संवेदना की मासिक गोष्ठी की रिर्पोट आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली पवि ने, हमारे द्वारा उपलब्ध करवायी गयीसूचनाओं के आधार पर लिखी है। जिसे ज्यों का त्यों, सिर्फ टाइप करके, प्रस्तुत किया जा रहा
पवि



देहरादून की साहित्यिक संस्था संवेदना हमेशा महीने के पहले रविवार को गोष्ठी आयोजित करती है। इस बार की दिसम्बर के पहले रविवार (7) को गोष्ठी आयोजित की। इसमें सभी कथाकर उपस्थित थे। इस बार की गोष्ठी को हिन्दी भवन पुस्तकालय में रखा गया। इसमें कथाकार सुभाष पंत जी,, सुरेश उनियाल जी,, दिनेश चंद्र जोशी जी,, नवीन नैथानी जी, विद्या सिंह जी,, प्रेम साहिल जी,, शकुंतला जी, मदन शर्मा जी आदि लोग उपस्थित थे। इस गोष्ठी में सुरेश उनियाल जी एवं सुभाष पंत जी ने अपने-अपने कहानी संग्रह से एक-एक कहानी पढ़ी। सुभाष पंत जी की कहानी का नाम एक का पहाड़ा था और सुरेश उनियाल जी कहानी का नाम बिल्ली था। मदन शर्मा जी ने एक संस्मरण पढ़ा और दिनेश चंद्र जोशी जी ने कविता पढ़ी।

Monday, December 8, 2008

शहंशाही में है बालकनी नाम का ठेका

देहरादून की लेखक बिरादरी के, अपने शहर से बाहर, कुछ ही सामूहिक दोस्त हैं। कथाकर योगेन्द्र आहूजा उनमें से सबसे पहले याद किये जाने वालों में रहे हैं। बेशक योगेन्द्र कुछ ही वर्षों के लिए देहरादून आकर रहे पर सचमुच के देहरादूनिये हो गये। यह सच है कि पहल में प्रकाशित उनकी कहानी सिनेमा-सिनेमा को पढ़कर इस शहर केलिखने पढ़ने वाली बिरादरी के लोग उन्हें देहरादून में आने से पहले से ही जानने लगे थे। वे भी देहरादून को वैसे हीजानते रहे होंगे- उस वक्त भी, वरना सीधे टिप-टाप क्यों पहुंचते भला। ब्लाग में अवधेश जी की लघु कथाओं कोपढ़ने के बाद हमारे प्रिय मित्र ने अवधेश जी को याद किया है। उनका यह पत्र यहां प्रकाशित है। पत्र रोमन में था, उसे देवनागरी में हमारे द्वारा किया गया है।
अवधेश जी कविताएं कुछ समय पहले पोस्ट की गयीं थीं। पढने के लिए यहां जाएं

प्रिय विजय

बहुत समय के बाद अवधेश जी की रचनाएं देखने का अवसर मिला। इन्हें इतने समय के बाद दुबारा पढ़ कर शिद्दत से एहसास हुआ कि उनकी असमय मृत्यु हम सबके लिए कितनी बड़ी क्षति थी।

उनके साथ बिताये दिन फिर स्मृति में कौंध गये। शहंशाही में बालकनी नाम के ठेके पर उनके साथ बिताये पल विशेष रूप से याद आये। लगातार बरसात, तेज सर्दी, हवा में हल्की-सी धुंध और समकालीन कविता और कवियों के बारे में उनकी अनवरत और बेशुमार बातें।

वे दिन ना जाने कहां चले गये और अब कभी लौट कर नहीं आयेंगे।

आज इतने समय के बाद में उन दिनों को भावसिक्ता होकर याद कर रहा हूं। लेकिन क्या उन दिनों और पलों को मैंने पूरी तरह डूब कर और शिद्दत के साथ जिया था ? नहीं।

शायद यह इजराइल के कवि इमोस ओज का या पोलैण्ड की कवियत्री विस्सवा शिम्बोरस्का का कथन है कि चूंकि सब कुछ क्षणभंगुर है और एक दिन सब कुछ समाप्त हो जाने वाला है, हमें हर दिन का उत्सव मनाना चाहिए।

अवधेश जी को हिन्दी कविता में वह जगह और पहचान नहीं मिली जिसके वे हकदार थे, हालांकि विष्णु खरे जैसे विद्धान आलोचक उनकी कविताओं के प्रशंसक थे। उन्होंने जिप्सी लड़की पर एक समीक्षा भी लिखी थी जो उनकी किताब "आलोचना की पहली किताब" में संकलित है।

आभारी होऊंगा यदि उनकी कुछ प्रतिनिधि कविताएं (फोटो के साथ हों तो और भी बेहतर है) भी ब्लोग पर उपलब्ध करा सकें। और हां उनके कुछ गीत भी, विशेषकर धुंए में शहर है या शहर में धुंआ

वे बहुत अच्छे पेंटर और स्क्रेचर भी थे। कृप्या उनकी कुछ पेंटिग और स्केच भी उपलब्ध करवायें। संभव हो तो नवीन कुमार नैथानी जी का उन पर लिखा संस्मरण भी।


आपका


योगेन्द्र आहूजा

दिल टेबिल क्लॉथ की तरह नहीं कि उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो

यूं तो अवधेश कुमार अपनी कविताओं या अपने स्केच के लिए जाने जाते रहे। पर अवधेश कहानियां भी लिखतेथे। "उसकी भूमिका" उनकी कहानियों का संग्रह इस बात का गवाह है। उनकी कहानियों में उनकी कवि दृष्टिकितनी गद्यात्मक है इसे उनकी लघु कथाओं से जाना जा सकता है।

अवधेश कुमार

भूख की सीमा से बाहर



उन्होंने मुझे पहले तीन बातें बताईं-
एक: जब तक लोहा काम करता है उस पर जंग नहीं लगता।
दो: जब तक मछली पानी में है, उसे कोई नहीं खरीद सकता।
तीन: दिल टेबिल क्लॉथ की तरह नहीं है कि उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो।

यह कहते हुए मेरे दुनियादार और अनुभवी मेजबान ने खाने की मेज पर छुरी के साथ एक बहुत बड़ी भुनी हुई मछली रख दी और बोले, "आओ यार अब इसे खाते हैं और थोड़ी देर के लिए भूल जाओ वे बातें जो भूख की सीमा के अन्दर नहीं आतीं।"




बच्चे की मांग

बच्चे ने अपने पिता से चार चीजें मांगीं। एक चांद। एक शेर। और एक परिकथा में हिस्सेदारी। चौथी चीज अपने पिता के जूते।

पिता ने अपने जूते उसे दे दिये। बाकी तीन चीजों के बदले उस बच्चे को कहानी की एक किताब थमा दी गई।

बच्चा सोचता रहा कि अपने पैर किसमें डाले ? जूते में या उस किताब में।



बच्चों का सपना


बच्चा दिनभर अपने माता-पिता से ऐसी-ऐसी चीजों की मांग करता रहा जो कि उसे सपने में भी नहीं मिल सकती थीं।

खैर वे उसे नहीं मिलीं।

श्रात को ज बवह सो गया तो उसकी नींद के दौरान उसका सपना उससे वो-वो चीजें छीनकर अपने पास छुपाता रहा जो-जो उसे सपने में नहीं दे सकता था।

Saturday, December 6, 2008

दिसम्बर 1992

(एक पुरानी कविता)
विजय गौड

आस्थओं का जनेऊ
कान पर लटका
चौराहे पर मूतने का वर्ष
बीत रहा है

बीत रहा है
प्रतिभूति घोटालों का वर्ष
सरकारों के गिरने
और प्रतिकों के ढहने का वर्ष

अपनी अविराम गति के साथ
बीत रहा है
सोमालिया की भीषण त्रासदी का वर्ष
हड़ताल, चक्काजाम
और गृहयुद्धों का वर्ष

अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का वर्ष

हर बार जीतने की उम्मीद के साथ
हारने का वर्ष

Friday, December 5, 2008

साहित्य धंधा नहीं है, जनाब!

यह आम बात है कि कई बार बातचीत के दौरान वक्ता अपनी बात को रखने के लिए कुछ ऐसे मुहावरों को प्रयोगकर लेते हैं जो गैर जरूरी तरह की टिप्पणी भी हो जाती है। जो अपने मंतव्य में वक्ता के ही उदगारों के विरुद्ध हो जारही होती है। ऐसी स्थितियां क्या कई बार रचनाओं में भी नहीं दिख जा रही होती हैं ? मुझे लगता है कि अवचेतन मेंमौजूद किसी विषय की अस्पष्टता ही ऐसी गैर जरूरी टिप्पणियों के रूप में रचनाओं में भी और बातचीत में दिखजाती है। वरना अध्यनशील लोगों के लिए यह चिन्हित करना कोई मुश्किल काम नहीं कि क्या बात तार्किक रूप सेगलत है और जिसे नहीं कहा जाना चाहिए। वो तो अवचेतन ही है जहां हमारे मानस की वह महीन बुनावट होती हैजिसमें हम अपनी तमाम कमजोरियों के साथ पकड़ लिए जाते है। कथाकर जितेन ठाकुर का यह आलेख ऐसी हीस्थितियों पर चोट करता है और गैर जरूरी तरह से की जाने वाली टिप्पणियों की पड़ताल करता है।

जितेन ठाकुर

मौका था एक उदीयमान लेखक के पहले कथा संग्रह पर आयोजित संगोष्ठी का। संगोष्ठी में चर्चाओं का दौर, सहमति-असहमति, शिक्षा-दीक्षा सभी कुछ उफान पर था। पुस्तक की समीक्षा में सम्बंधों का निर्वाह भी हो रहा था और निर्ममता भी बरती जा रही थी। 'मैं लिखता तो ऐसे लिखता" की तर्ज पर कहानियों की चीर-फाड़ जारी थी। तभी महफिल की शमा एक स्वनामधन्य कवि के सामने पहुँच गई। कविराज ने अपने पहले ही वाक्य में साहित्य को 'धंधा" बतलाया तो मुझे हंसी आ गई। बात गम्भीर थी- हंसी की तो बिल्कुल भी नहीं थी। पर पता नहीं क्यों मुझे हंसी आ गई। मुझे समझ लेना चाहिए था कि यह वक्ता का नितांत व्यक्तिगत अनुभव है और इसे वक्ता से ही जोड़ कर स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। पर सोच की जिस पैनी कनी ने मुझे तत्कला छील दिया था वह यह थी कि अगर साहित्य को धंधा मान लिया जाए तो लेखकों को तो धंधे वाला कह कर निपटाया जा सकता है पर लेखिकाओं को कैसे सम्बोधित किया जाएगा।
बहरहाल! मेरे हंसने के बाद वक्ताश्री सतर्क हो गए और अपनी कही हुई बात को सिद्ध करने की मुहिम में लग गए। अनेक उदाहरण देकर उन्होंने सिद्ध किया कि हम सब झूठ घड़ते हैं। ये झूठ की हमें साहित्यकार बनाता है, स्थापित करवाता है और बदले में ढेरों लाभ भी दिलवाता है। अब ये उन स्वनाम धन्य कवि का स्वानूभूत सत्य था, अतिरेक था या फिर अति आत्मविच्च्वास। पर ये जो भी था साहित्य के परिप्रेक्ष्य में व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ नकारात्मक सोच के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था।
जिस प्रकार कोई भी धंधा साहित्य नहीं हो सकता ठीक उसी प्रकार साहित्य भी धंधा नहीं हो सकता। साहित्य से जुडे अन्य सभी कर्म यथा छापाखाना, जिल्दसाजी विक्रय और प्रबंधन धंधा हो सकते हैं। साहित्य की आड़ लेकर पद, प्रतिष्ठा और पुरुस्कार हथियाने के लिए पैंतरे बाजी करना भी धंधा हो सकता है। साहित्यक चेले इठे करके महंत हो जाना, प्रायोजित चर्चाएं करना-करवाना, पुरुस्कारों की होड़ में सौदे पटाना, इसको उठाना- उसको गिराना यानी साहित्य की आड़ में ये सब धंधे हो सकते हैं पर इन सब कृत्यों की नींव में दफ्न साहित्य न कल धंधा था- न आज धंधा है। साहित्य को धंधा बना दिया जाए ये और बात है पर साहित्य धंधा हो जाए- ये मुमकिन ही नहीं है। इसलिए परिस्थितियों का सरलीकरण करते हुए साहित्य को धंधा कहने या फिर साहित्य कर्म को 'झूठ घड़ने" का फतवा देने से पहले आवच्च्यक है कि आत्म मंथन किया जाए। यह शोभनीय नहीं कि हम अपने को अपने से ही छुपाने की को्शिश में उन सब पर कीचड़ उछाल दें जो आज भी साहित्य को साहित्य ही मानते हैं- धंधा नहीं।
दरअसल, साहित्य जीवन की एक द्रौली है। तटस्थ और शुश्क इतिहास की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है। तीर और तलवार से पैनी और बारूद से अधिक विध्वंसक होते हुए भी जल से ज्यादा शीतल और प्रवाहमय है। साहित्य समय की अर्न्तधारा है, केवल स्थूल चित्रात्मकता नहीं। समाज की शिराओं में बहता हुआ लहू हैं साहित्य। साहित्य कंठ से नीचे उतरता कौर नहीं है बल्की श्वास नलिका में रिसती हुई प्राण-वायु है। साहित्य संस्कार है, आचमन है और तर्पण भी है साहित्य। शवों की सीढ़ियाँ चढ़ कर सिंहासन तक पहुँचने वालों के लिए चुभते रहने वाली कील है साहित्य। और यही साहित्य किसी प्रलंयकारी रात में सूरज की उम्मीद भी है।
साहित्य चेतना है, स्वाभिमान है और आत्ममंथन के लिए भी है। ऐसे में साहित्य को धंधा कहना किसी व्यापारी का दृष्टिकोण तो हो सकता है पर किसी साहित्यकार का नहीं।
साहित्य न तो त्रिवेणी में डुबकी का मोहताह है न हज का। न तो अमृत छकने में साहित्य बनता है और न ही शराब में भीगी रोटी जुबान पर छुआने से। इसे न तो कालिंदी तट की रास लीलाएँ दरकार हैं और न ही किसी आराध्य की एकांत उपासना। कोई दृद्गय, कोई स्थिति, कोई विचार, समय या समाज इनमें से कुछ भी अकेला साहित्य हो जाए ये सम्भव ही नहीं हैं- पर साहित्य इनमें से कुछ भी हो सकता है। क्योंकि साहित्य अनुकृति नहीं है सृजन है और सृजन की सीमाएँ नहीं होतीं। जिसकी सीमाएँ नहीं उसका व्यापार कैसा?
दरअसल जब हम साहित्य को धंधा कहते हैं तो हम आत्मप्रवंचना से भरे हुए होते हैं। हमें लगता है कि हमारा कहा हुआ वाक्य ही समय है और यही युगों के शिलालेख पर अंकित होने जा रहा है। आत्मकुंठा और आत्ममुग्धता के बीच की स्थितियों से गुजरते हुए, अपने होने के अहसास को बनाए रखने के लिए हम कई-कई बार ऐसी घोषणाएँ करते हैं- जो हमारे वजूद के लिए दरकार होती हैं। हम मान लेते हैं कि हमारा झूठ समय का झूठ है, हमारी कुंठा समय की कुंठा है। हम अपनी प्रवंचना को समय के साथ गूंथ कर उसे कालजयी बना देना चाहते हैं। हम यह सिद्ध कर देना चाहते हैं कि हम श्वास नहीं लेते फिर भी जीते हैं, हम नेत्र नहीं खोलते फिर भी देखते हैं। हमारे कान वो सब सुन सकते हैं जो पीढ़ियों पहले से वायुमण्डल में अटका हुआ है और हमारी जीह्वा जो कहती है- वही सत्य है। इसलिए जब हम कहें कि साहित्य धंधा है- तो उसे धंधा मान ही लिया जाए। नहीं तो इसे सिद्ध करने के लिए हमारे पास दलीलें हैं। हम जिरह कर सकते हैं और इस जिरह के लिए लावण्यमयी भाषा भी घड़ सकते हैं।
मुझे याद आता है कि वर्षों पहले अनेक संगोष्ठियों में साहित्य के कुछ पंडित अपना पांडित्य प्रदर्शित करते हुए बार-बार एक ही बात कहते थे कि साहित्य के पास अब पाठक नहीं रहा। साहित्य के पास पाठक रहा या नहीं- ये एक अलग बहस की बात हो सकती है पर उनके इस कथन में जो अर्थ निहित था वो यही था कि 'हे लेखक! हमारी शरण में आ जाओ क्योंकि साहित्य में तुम्हें स्थापित करने वाला पाठक अब शेष नहीं है। हमारे शरणागत होने के बाद ही तुम स्थापित और चर्चित हो पाओगे।" बहुत से लेखकों ने इस कथन के निहितार्थ को भांपा और शरणागत हुए। ऐसे ही साहित्य को धंधा बताने वाले स्वनामधन्य भी यदि नये लेखकों को अपने धंधे के गुर सिखाने के लिए कोई नया संस्थान खोल लें तो आश्चर्य नहीं।
अरविंद त्रिपाठी ने एक बार कहा था कि यह महत्वपूर्ण है कि हम अपनी रचना के साथ कितना समय बिताते है। इसका यही अर्थ है कि हमने जो लिखा उसका गुण-दो्ष हमें तुरंत ही पता नहीं चलता क्यों कि हम लम्बे समय तक अपनी रचना के सम्मोहन में जकड़े रहते हैं। इस सम्मोहन से मुक्त होने के बाद ही हम तटस्थ होकर अपने लिखे हुए का विश्लेषण कर सकते हैं। फिर ये कितना उचित है कि किसी संगोष्ठी में प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न हुए विचार से कोई स्वयं ही इतना सम्मोहित हो जाए कि उसे प्रमाणिक बनाने और मनवाने के लिए इतना जूझे कि विवेक को ही ताक पर रख दे। पर शायद कुछ लोगों का यही धंधा है क्योंकि उनके लिए यही साहित्य है।

Friday, November 28, 2008

यादों के झरोखों से

हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार डॉ कुसुम चतुर्वेदी का लम्बी बीमारी के बाद 26 अक्टूबर 2008 को अखिल भारतीयआयुर्विज्ञान संस्थान में निधन हो गया था। रविवार 2 नवम्बर 2008 को संवेदना की बैठक में देहरादून केरचनाकारों ने अपनी प्रिय लेखिका को याद करते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजली दी।
आगामी रविवार 30 नवम्बर 2008 को डॉ कुसुम चतुर्वेदी की पुत्री नीरजा चतुर्वेदी ने अपने निवास पर एक गोष्ठीआयोजित की है जिसमें जुलाई 2008 में प्रकाशित डॉ कुसुम चतुर्वेदी की कहानियों की पुस्तक मेला उठने से पहले पर चर्चा होनी है।
कथाकार जितेन ठाकुर डॉ कुसुम चतुर्वेदी के प्रिय शिष्यों में रहे हैं। डॉ कुसुम चतुर्वेदी पर लिखा गया उनका संस्मरण प्रस्तुत है।




जितेन ठाकुर

श्रीमती कुसुम चतुर्वेदी नहीं रहीं। सुनकर सहसा ही विश्वास नहीं हुआ। बार-बार नियति से जूझने वाली, पराजय स्वीकार न करने वाली। एक अनुशासित शिक्षिका, एक ममतामयी माँ, एक अकेली आशंकित महिला और एक गम्भीर लेखिका। मैडम अब कभी दिखलाई नहीं देंगी- यह सोच पाना मेरे लिए सरल नहीं है। स्व0 श्रीमती चतुर्वेदी देहरादून की उस संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती थीं जब आदमी को आदमी के पास बैठने की फुर्सत होती थी, मिल बैठ कर दुख-दर्द बांटे जाते थे, लिखने-लिखाने पर लम्बी बातचीत और बहस होती थी, सम्बंधों में अपनत्व की सुगंध होती थी और इस द्राहर के लोग एक दूसरे को आहट से पहचान लेते थे।
1981 में मैंने पहली बार मैडम चतुर्वेदी के द्वारा पर दस्तक दी थी। डरा सहमा हुआ मैं दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा में खड़ा था, किवाड़ श्री चतुर्वेदी ने खोले थे। लम्बा कद, गोरा रंग। भव्य व्यक्तिव के स्वामी थे, श्री चतुर्वेदी
"जी! मुझे श्रीमती नारंग ने भेजा है।" मैंने जैस-तैसे थूक निगल कर अपनी बात कही थी। घर का हरियाला परिसर, विशाल भवन और चमचमाते हुए फर्श मेरे भीतर हीन भावना भर रहे थे। प्रयत्न के बाद ही शब्द मेरे कंठ से बाहर आ पाए थे। उन दिनों ऐसे परिसर और भवन, भवनस्वामी की सुरूची और सम्पन्नता के प्रतीक हुआ करते थे।
"ओह! अच्छा तुम पी0एच0डी0 करना चाहते हो।" श्री चतुर्वेदी को शायद मेरे आने की जानकारी थी। मैं सहमा हुआ उनके साथ ड्राईंगरूम में प्रवेश कर गया और झिझकता हुआ सोफों से दूर पड़ी एक सैटी पर बैठ गया। कुछ समय बाद मैडम चतुर्वेदी ने ड्राईंगरूप में प्रवेश किया। उन्होंने एक बेहद सादी धोती पहनी हुई थी। लम्बे-लम्बे डग भरती हुई वे आकर सोफे पर बैठ गई थीं। उनकी बातचीत इतनी सरल और सहज थी कि मेरी कल्पना में भरा हुआ उनकी विद्वता का आतंक जाता रहा।
कुछ ही समय बाद चतुर्वेदी साहब का निधन हो गया था। चतुर्वेदी साहब का निधन उस परिवार को रीत देने के लिए पर्याप्त था। उनके साथ मेरा सानिध्य बहुत ही कम रहा पर मैंने जितना भी उन्हें जाना, वे केवल व्यक्तिव से ही भव्य और विशाल नहीं थे- विचारों से भी अत्यंत उदात और आधुनिक थे। उनका व्यक्तिव भी ऐसा था कि सहसा ही श्रद्धा उत्पन्न होती थी।
विवाह के बाद जब मैं पहली बार पत्नी सहित उस घ्ार में गया था और पत्नी ने चतुर्वेदी जी के चरण स्पर्श किए थे तो उन्होंने जो कहा था वो मुझे आज भी याद है। वे थोड़ा पीछे हटते हुए बोले थे
"बेटी झुको मत! अपने को ऊँचा उठाओ और सिर उठा कर जियो"
पर पास खड़ी हुई मैडम ने हंसते हुए अधिकार भरे स्वर में कहा था "आप पैर छुवाएं या न छुवाएं मैं तो पैर छुवाऊंगी। जितेन की पत्नी है मेरा तो पैर छुवाने का अधिकार बनता है।" ऐसा था वो घर- ऊर्जा और अपनत्व से भरा हुआ।
मैडम ने अपना ये अधिकार कभी छोड़ा भी नहीं। अपनी व्यस्तता अथवा अन्य कारणों से यदि मैं कुछ समय मैडम के यहाँ नहीं जाता तो मैडम, फौरन उलाहना देतीं "अच्छा! अब तुमने भी आना बंद कर दिया है।" और मैं चोरी करते हुए पकड़े गए बच्चे की तरह सफाई पेश करने लगता।
स्व0 चतुर्वेदी के निधन के बाद घर में बहुत उदासी और अकेलापन हो गया था। परंतु मैडम ने ऐसे में भी अपनी बेटी को अमेरिका जाने की स्वीकृति केवल इसलिए दे दी थी क्योंकि यह उनके स्वर्गीय पति की इच्छा थी। बेटी नीरजा के चले जाने के बाद जीवन में आए अकेलेपन और उदासी का उन्होंने अदम्य इच्छा शक्ति के साथ सामना किया था। घर की साफ-सफाई, मरम्मत-पुताई और जीवन की दैनिक आवश्यकताओं के लिए भी वो किसी पर ज्यादा आश्रित नहीं हुई थीं।
महिला लेखिकाओं में वो समय स्व0 शाशि प्रभा शास्त्री का था। दिल्ली में अपने सम्पर्क और बाद में दिल्ली प्रवास के कारण श्रीमती शास्त्री का वर्चस्व लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं पर था। लगभग उसी समय धर्मयुग में छपी अपनी कहानी 'उपनिवेश' से मैडम चतुर्वेदी ने चौंकाया था। देहरादून के ही एक नामी स्कूल पर लिखी गई यह कहानी अपने पीछे बहुत से प्रश्न छोड़ गई थी।
लेखन का वो दौर जीवन की सूक्ष्म अनुभूतियों को कलात्मक तरीके से पिरोने का दौर था। मैडम की कहानियों में उस दौर की विशेषताओं के साथ ही स्त्रीमन की अतृप्त इच्छाओं ओर आकांक्षाओं की एक सबल अन्तर्धारा भी मिलती है। सारिका में छपी एक लम्बी कहानी और 'तीसरा यात्री' नामक कहानियाँ स्त्रीमन की साहसपूर्ण अभिव्यक्ति है। मैडम ने जितना भी लिखा, स्तरीय लिखा। जीवन की छोटी-छोटी अनुभूतियों को आपने सफलतापूर्वक उकेरा। पर अपने अकेलेपन को आपने कभी किसी दूसरे पर नहीं थोपा, न जीवन में- ना साहित्य में।
बढ़ती आयु के साथ गिरते हुए स्वास्थ्य ने उन्हें चिंतित कर दिया था। इस चिंता के पीछे अकेलेपन का एहसास भी प्रभावी था। पर सात समुंदर पार बैठी बेटी को वो अपनी समस्याओं से अछूता रखने का प्रयत्न करतीं। एक बार उन्होंने ही मुझे बताया था कि बेटी के पूछने पर उन्होंन बहुत से नाम गिनवा कर कहा था- 'यह सभी लोग तो मिलने आते रहते हैं, मैं अकेली कहाँ हूँ। यद्यपि वास्तविकता ये थी लोग बहुत-बहुत दिनों के बाद ही मिल पाते थे।
पहली बार उनकी बीमारी की सूचना मिलने पर जब मैं हस्पताल में उन्हें मिलने गया था तो बातचीत में यूं तो वो सामान्य दिख रही थीं पर उनकी स्मृतियों से जैसे कुछ मिट गया था। काफी देर तक बातचीत करती रही थीं फिर बोली थीं
"मुझे तो याद ही नहीं आता कि मैं कैसे इतनी बिमार हो गई"
एक बार जब आँख के किसी डाक्टर ने उन्हें कहा था कि "देखती आँख है- चश्मा नहीं।" तब भी वो चिंतित हुई थीं। एक रात किसी लक्ष्ण से आच्चंकित होकर जब वो कारोनेशन हस्पताल चली गई थीं- तब भी वो चिंतित थी। जब एक डाक्टर ने अपना फोन नम्बर देकर उन्हें कहा था कि आपको सिर्फ फोन करना है बाकी हम देख लेंगे- हमारी एम्बुलेंस फौरन पहुँच जाएगी" तब भी वो चिंतित थीं पर इस अंतिम बिमारी में वो चिंतित नहीं थी क्यों कि उनकी बेटी उनके पास थी।
मैं अक्सर देखता था कि वो एक बहुत बड़े कप में पिया करती थीं। ड्राईंगरूम में रखी हुई स्व0 चतुर्वेदी साहब की तस्वीर पर धूल का एक भी कण बैठने नहीं देती थीं। किसी ने किसी कारण से हमेशा उनके फ्रिज में मिठाई रहती। ये बेसन के लड्डू और लौकी की लाज भी हो सकती थी और नारीयल की बर्फी और मोतीचूर के लड्डू भी। यह सब वो बहुत स्नेह और आग्रह से खिलाती थीं। बहुत सी घटनाएँ जो पिछली बार मिलने के बाद से आज तक हुई थीं- सिलसिलेवार सुनातीं। पर इन सब बातों के बीच वो लिखने और लिखते रहने की बात को अक्सर टाल जातीं।
अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने वहाँ के बहुत से संस्मरण सुनाए थे। मिशिगन के मोहक फोटोग्राफ भी दिखलाए थे। तब मैंने उनसे बार-बार संस्मरण लिखने के लिए कहा था। उन्होंने उत्साह भी दिखलाया पर शायद ही वो पूरे संस्मरण लिख पाई हों।
मैं बेहिचक कह सकता हूँ कि उनके पास औसत महिलाओं से कहीं अधिक तीक्ष्ण अर्न्तदृष्टि थी, विषयके मर्म को समझने की अद्भुत सामर्थ्य थी और बेहतर लेखकीय समझ थी। पर वो कभी भी इसे प्रकट नहीं करती थीं। उनके जीने की द्रौली बेहद सरल, सहज और एक घरेलू महिला जैसी थी। शिक्षिका होने का न दम्भ न लेखिका होने की दिखावट। सब कुछ स्वभाविक और प्राकृतिक परंतु सजग। उन्होंने मकान की नेम प्लेट हटवाकर वहाँ नया पत्थर केवल इसीलिए लगवाया था क्योंकि उसमें बेटी नीरजा का नाम खुदा हुआ नहीं था।
अपनी दिनचर्या में उन्हें जितनी चिंता मकान के फीके होते रंग-रोगन की सताती थी उतनी ही लान में खिलते और मुरझाते हुए फूलों की भी। उन्हें फर्श पर उभर आया दाग भी चिंतित करता था और बढ़ते हुए घास की कटाई भी। उन्हें अपने घर के रख-रखाव से उतना ही मोह था जितना किसी भी घ्ारेलु महिला को हो सकता है। सात समुंदर पार बैठी अपनी बेटी के एक-एक पल की उतनी ही चिंता थी- जितनी किसी ममतामीय मां को हो सकती है। वो अपने अकेलेपन से उतना ही आतंकित रहतीं- जितना इस आयु में कोई भी अकेली महिला रह सकती हैं। पर उनकी बातचीत में सदा एक संकल्प होता था। परिस्थितियों से जूझने की अद्भुत सामर्थ्य थी उनमें।
मैडम सदा चाहती थीं कि उनके यहाँ साहित्यकारों का जमावड़ा हो। संगोष्ठी हो पर हमेशा संकोच कर जातीं। पता नहीं क्यों आमंत्रित साहित्याकारों की आवभगत को लेकर वो सदा चिंतित रहा करती थीं। यही एक कारण था कि उनके चाहने पर भी उनके यहाँ बैठकें टलतीं रहीं।
आज जब मैडम स्व0 श्रीमती चतुर्वेदी हमारे बीच नहीं है- उन्हें याद करते हुए अंत में मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता और हमारे संस्कारों में एक महिल का जो बिम्ब बनता है- वो ठीक वैसी ही थीं। देहरादून के साहित्य जगत में वो सदा याद की जाएंगी।

Wednesday, November 26, 2008

दम तोड़ती भाषा

यादवेन्द्र जी संवेदनशील और एक सचेत नागरिक हैं। दुनिया जहान की खबरों से अपने को जोड़े रहते हैं और हर उस गतिविधि के साथ अपना जुड़ाव बनाए रखना चाहता हैं जो इस दुनिया की विविधता को तहस नहस करनेवाली ताकतों के खिलाफ हो। ऐसी ही सामाग्री जब उन्हें कहीं भी दिख जाती है तो वे चाहते हैं उससे हिन्दी का पाठक समुदाय भी वाकिफ हो सके। इसके चलते ही वे अक्सर ऐसी सामाग्री को खोज-खोज कर अनुवाद में जुटे रहते हैं। हम उनकी इस कोशिश के साथ अपने को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं- जब उनके अनुवादों को कहीं भी पढते हैं। उनके अनुवादों को इस ब्लाग में प्रकाशित कर हम उनका आभार व्यक्त करना चाहते हैं।

भाषा के सवाल को यादवेन्द्र जी विश्व मानचित्र में व्यक्ति और समुदाय के जनतांत्रिक अधिकार के रूप में देखते हैं। किन्हीं खास षड़यंत्रों के चलते विलुप्त होती भाषाओं को बचाये रखने की कोशिश उन षड़यंत्रों की मुखालफत ही है जो विविधता की बजाय एक जैसे धर्म, एक जैसे समाज, एक जैसी जीवन शैली को आरोपित करने पर आमादा है। "काउंटर पंच" में 26/27 नवम्बर 2005 को प्रकाशित एक आलेख में उल्लेखित कविता को अनुवाद कर यादवेन्द्र जी ने अपने हस्तलेख की फोटो के रूप में भेजा है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।


दम तोड़ती भाषा


जब कोई भाषा दम तोड़ती है
तो दैवी वस्तुएं
तारे, सूर्य और चन्द्रमा- और
मानवीय वस्तुएं
चिंतन और अनुभूति -
सब कुछ ओझल होते होते
बंद हो जाते हैं दिखना
इस दर्पण में।

जब कोई भाषा दम तोड़ती है
तो सब कुछ
जो इस दुनिया में मौजूद है-
महासागर और नदियां
पशु पक्षी और पौधे,
बंद हो जाता है
कहीं भी उसके बारे में सोचना
और कभी भी उनके नाम उचारना---
बस इस धरती से पुंछ जाता है
उनका अस्तित्व ही।

जब कोई भाषा दम तोड़ती है
तो दुनियाभर के लिए
तमाम दरवाजे और खिड़कियां
हो जाते हैं सब बंद---
अब कोई कभी नहीं समझ पाएगा
दैवी और मानवीय वस्तुओं को
पुकारने के इतर ढंग---
इनकी दरकार है बड़ी
इस धरती पर रहते रहने के लिए।

जब कोई भाषा दम तोड़ती है
प्यार के बोल
पीड़ा और स्नेह की भंगिमाएं
पुराने गीत
किस्से, कहानियां, बोलचाल, प्रार्थनाएं-
चाहे तो भी किसी के लिए
दुहरा नहीं पाएगा कोई
इन्हें अब कभी भी ।

जब कोई भाषा दम तोड़ती है
इससे पहले भी लोप हो चुका होगा कईयों का
तथा कई और कगार पर होंगी
दम तोड़ने के
अमूल्य दर्पण खण्डित हो जाएंगे
सदा सदा के लिए
जिनमें संवाद की छवियां
नहीं दिखेंगी अब कभी
मानवता और भी दरिद्र होती जाएगी दिनों दिन
जब तक दम तोड़ती रहेगी कोई भाषा।

Friday, November 21, 2008

चेखव के घर में

अभी कुछ दिन पहले प्रिय मित्र योगेन्द्र आहूजा से बात हो रही थी, जो स्वंय कथाकार होते हुए कविताओं के अच्छे पाठक हैं, तो बातों ही बातों में उन्हें स्पेनि्श के कवि लोर्का की कविता याद गयी। कथाकार विद्यासागर नौटियाल की डायरी को पलटता हूं तो पाता हूं कि सुनी गयी वह कविता मुझे भी, खुद को दोहराने के लिए मजबूर कर रही है-

अलविदा

जब मैं मरूं/ खिड़की खुली छोड़ देना/ एक बच्चा संतरा खाता है
खिड़की से मैं उसे देख सकता हूं/ एक किसान महकाता है फसल
अपनी खिड़की से मैं उसे सुन सकता हूं
जब मैं मरूं
खिड़की खुली छोड़ देना

प्रस्तुत है कथाकर विद्यासागर नौटियाल की डायरी के पृष्ठ-



चेखव के घर में
विद्यासागर नौटियाल

याल्टा,29 जुलाई 1981 : 4 बजे शाम ।

रोसिया सेनिटोरियम से हमारी कारें कुछ ही देर में चेखव -स्मारक में पहुँच गईं । महान साहित्यकार चेखव के घर को एक बार देख लेने की मेरी लालसा आज पूरी हो गई । कारों से उतर कर हम पाँचों साथी आँध्रवासी नरसैय्या, पाकिरप्पा, उड़िया सेठी और आसामी कामिनी मोहन सर्माह दोनों दुभाषिया रूसी लड़कियों इरिना तथा आल्ला के साथ चेखव के बागीचे में आ गए । इरिना मॉस्को विश्वविद्यालय में हिंदी तथा मराठी की प्राध्यापिका ह। यों जानती पंजाबी भी है। लेकिन हमारे बीच कोई पंजाबी नहीं । आल्ला तमिल तथा अंग्रेजी जानती है। हमारे प्रतिनिधिमंडल में कोई तमिल-भाषी भी नहीं ।
वहाँ पहुँचते ही मेरा ध्यान देवदार के दो वृक्षों की ओर गया । एक की ओर इशारा करके मैने इरिना को बताया कि यह पेड़ रूसी नहीं लगता, इसे हमारे यहाँ से मँगवाया गया होगा ।
-इस तरह का देवदार सिर्फ हमारे यहाँ होता है। दूसरा पेड़ जो है वह है तो देवदार पर कहीं और से लाया गया होगा ।
अपनी खोजी नज़रों से किसी अंग्रेजी बोलने वाले गाइड के आने की राह देख रही इरिना ने सवाल किया ।
-आप किस पेड़ को अपना बता रहे हैं नौटियालजी ?
मैने एक देवदार के पेड़ की ओर इशारा करके उसे बता दिया ।
-रूस में इससे मिलती-जुलती प्रजाति शिश्नात की है । उसके यहाँ सोवियत संघ में बहुत खूबसूरत, घने जंगल हैं । लेकिन ये दोनों पेड़ उस प्रजाति से भिन्न हैं । इन्हें हम देवदार कहते हैं ।
कामरेड सेठी ने फिकरा कसा - आते ही पेड़ों की बात करने लगे हैं,कामरेड नौटियाल ।
अंग्रेजी भाषा के गाइड ने हमारे पास आते ही अपना काम शुरू कर दिया । उसने हम लोगों को अपने साथ घुमाना शुरू कर दिया है । और एक-एक चीज़ के बारे में तफसील से बताने लगा है ।
गाइड की बात पूरी होते न होते मैं उसका हिंदी अनुवाद करने का फर्ज निभाने लगा हूँ चूँके हमारे कुछ साथी अंग्रेजी भी नहीं जानते । मेरे सामने समस्या यह है कि मैं उन बातों को अपनी डायरी में दर्ज करूँ कि उसके आगामी वाक्यों को सुनते हुए उनका अनुवाद प्रस्तुत करूँ । वह भी चलते-चलते । और उसके द्वारा बताई जा रही चीज़ों को अपनी आँखों से देखते जाना तो इस मौके की सबसे बड़ी ज़रूरत है । मेरी आँखें उन चीज़ों को देखें कि अपनी डायरी पर ध्यान केंद्रित करें? बहरहाल! मैं अपने भरसक पूरी बातों को यथासंभव सही रूप में हिंदी में कहते जाने की कोशिश कर रहा हूँ ।
इस बाग की उम्र 80 वर्ष की है । 1898 में चेखव ने यह बाग खरीदा । उस समय यह खाली था । यह बागीचा खरीदने के बाद चेखव ने अपने हाथों से यहाँ कई प्रकार के पौधे लगाए,जिनमें कुछ अभी भी जीवित हैं। यहाँ सदाबहार तथा सर्दियों के समय झड़ जाने वाले पेड़ लगे हैं। बर्च वृक्ष इसी जगह लगाया गया था। चेखव के इस बेंच को 'गोर्की का बेंच' कहते थे। इस पर आगन्तुक बैठते थे। चेखव 1904 में मरे । मैक्सिम गोर्की अंत तक यहाँ आते रहते थे। बागीचे से सागर तट तक के रास्तों पर पत्थर बिछे हैं। चेखव यही चाहते थे। चम्पा के पेड़,बाँस का झाड़ उनके अपने हाथ से लगाये है। यह खूबसूरत,कलात्मक पात्र एक मदिरा निर्माता ने चेखव को भेंट किया था। चेखव का घर इस बागीचे के पश्चिम में है। उन्होंने अपने मन के माफिक घर बनाया था। इसके निर्माण में दस महीने लगे। चेखव मूल रूप से याल्टा के निवासी नहीं थे। विभिन्न स्थानों में निवास करने के बाद वे यहाँ आए। टी0बी0 हो जाने पर अपना पिछला घर बेच कर स्थायी तौर पर यहाँ रहने चले आए थे। पहले घर की योजना कुछ और थी। पर वैसा भवन बनाने के लिए पहले वाला घर बेचने पर पैसे नहीं मिल पाए। इसलिए चेखवने पुस्तकें लिखने की सोची। चेखव के मित्र उनसे अधिक काम नकरने को कहते थे । चेखव मजबूरी में भवन निर्माण के खर्चे उठाने के लिए लिखने में जुटे रहते थे। वह सिलसिला अंत तक जारी रहा। ज़ार के युग में इस घर की कीमत 20 हजार रूबल थी। एक देवदार का विशाल वृक्ष इस घर के आँगन में खड़ा है।
हम लोग एक बालकनी में चले आए हैं। इस बालकनी में खड़ा होना चेखव को बहुत प्रिय था। यहीं से,दूरबीन लेकर,वे सागर की ओर देखते थे। चार कमरे पहली मंजिल पर,चार दूसरी मंजिल पर,एक कमरा तीसरी मंजिल पर। तीसरी मंजिल पर बहन रहती थी,जिसे चित्र खींचने का शौक था। बर्च पेड़ चेखव ने स्वयं लगाया था,सुराही का पेड़ बहन ने लगाया । दूसरा 1919 में लगाया,जबकि चेखव की माता की मृत्यु हो गई। तीसरा सुराही का पेड़ 1957 में लगाया था,जब बहन की मृत्यु हो गई। 21 से 57 तक पार्यान्तोनेला इस संग्रहालय की मालिक रही। इस भवन के अन्दर सब चीजें जस की तस मौजूद हैं । जैसी कि चेखव के जीवनकाल में रहती थीं । उनमें किसी भी तरह के परिवर्तन नहीं किए गए हैं।
डाइनिंग रूम में दीवार पर पुश्किन का एक चित्र टँगा है। डाइनिंग मेज,दो सोफे की कुर्सियाँ,चेखव का एक चित्र। बहन का चित्र। युवती थी। दो चित्र चेखव के बनाए हुए। ये बर्तन, चेखव की सम्पत्ति थे। ये क्रिस्टल ग्लासेज़ उनकी पैतृक सम्पत्ति हैं,जो चेखव के माता-पिता के समय प्रयुक्त होते थे। चेखव का चित्र उनकी बहन ने बनाया था, जो एक लेखिका भी थीं । उनके छोटे भाई मिखाइल ने भी चेखव के बारे में एक पुस्तक लिखी । यह सामने का कमरा मेहमानों के लिए था । यहाँ आने पर गोर्की इसीमें रहते थे। शलातिन संगीतज्ञ भी यहीं रहते थे। कुप्रिन ने भी यहीं रह कर कहानियाँ लिखी थीं। गोर्की को यह स्थान बेहद प्रिय लगता था। पेन्टर लेवितान भी इसी कमरे में रहते थे। छोटी मेज पर लैम्प रखा है। यह कमरा उनकी पत्नी का कमरा था,जो छुट्टियों में आकर यहाँ रहती थीं। वह कमरा वैसा ही है(पूर्व की ओर)। वे एक्ट्रेस थीं। उनका मकबरा मॉस्को में चेखव के मकबरे के पास है। पत्नी मॉस्को में रहती थीं। चेखव ने एक पत्र में अपना असंतोष व्यक्त किया था कि मैं लेखक,तुम एक्ट्रेस इसलिए जुदा हैं। बीच के कमरे में सन्दूक है। ये सीढ़ियाँ अब प्रयुक्त नहीं की जातीं चूँके पुरानी पड़ गई हैं।
ऊपर की मंजिल के पश्चिम में सुराही का वृक्ष चेखव का लगाया है ।
पीछे छोटा भवन पहले से बना था। इस भवन के निर्माण की अवधि में चेखव यहीं रहे,बाद में वहाँ रसोई बनी। उसमें दो कमरे थे,एक में रसोइया रहती थी। दूसरे में माली। ऊपर के बाराम्दे के सामने एक छज्जा बाहर निकला है,जो चेखव के कमरे से जुड़ा है। अन्दर आल्मारी में चेखव के कपड़े रखे हैं। चमड़े का कोट प्रसिद्ध है। 1890 में सहालिन द्वीप पर इसे पहने कर रहे। अपनी डायरी में चेखव ने इस कोट का भी जिक्र किया है। सहालिन द्वीप पर वे तीन महीने रहे। वहाँ की जनसंख्या के बारे में जानकारी की। वहाँ शहर से कैदियों के रूप में रहने वाले लोग भी थे। वापिस आकर सहालिन द्वीप के बारे में पुस्तक लिखने लगे। फिर श्रीलंका देखने चले गए । देशों का तुलनात्मक विवाण प्रस्तुत किया। उन्होंने लिखा कि श्रीलंका अपेक्षाकृत स्वर्ग है। श्रीलंका से वे हाथिनों की दो मूर्तियाँ लाए, जो यहाँ रखी हैं। माँ के कमरे में नौ दिन की बनाई माँ की तस्वीर दीवार पर टँगी है । एक मीटर 83 से0मी0 का कद था, जूते भी बड़े थे। चद्गमा मॉस्को के संग्रहालय में है।
लिखने का काम भी ऊपर की मंजिल में । मेज पर कहानियाँ लिखते थे। मेडिकल औजार भी मेज पर रखे हैं। चेखव पहले डाक्टर थे। उन्होंने डाक्टरी का पेश छोड़ दिया था पर लोगों को देख लिया करते थे। एक पुराना फोन दीवार पर टँगा है। एक तख्ती पर 'सिगरेट पीना मना है'
लिखा है,जो एक मित्र ने लगाई थी। गुस्से में। खिड़की के ऊपर लाल और गहरे नीले काँच लगे हैं,जो पेड़ों के छोटा होने के कारण धूप से बचने के लिए लगाए गए थे। 20गुणा12 फिट का कमरा। पीछे एक सोफा भी लगा है। बीच में मिट्टी के तेल का लैम्प लटका है ।
इस कमरे में लोग आराम करने आते थे। यह आल्मारी और पियानो बहुत पुराने हैं। इनका उपयोग उनके संगीतज्ञ मेहमान करते थे । सामने का चित्र उनके दूसरे भाई का बनाया है । इसका शीर्षक गरीबी है। याल्टा में थियेटर बन जाने पर मास्को से कलाकारों ने यहाँ चेखव के दो नाटक प्रदर्शित किए। बाद में वे लोग इस कमरे में आए। उस ओर भी बाराम्दे हैं, उत्तर पूर्व में। चेखव इस घर में पाँच वर्ष रहे। चेखव यहाँ गंभीर रोगी होकर आए थे। उनकी मृत्यु हो गई । तब आयु 43 वर्ष थी । कुछ समय पहर्ले वे अपनी पत्नी से मिलने मॉस्को गए। सर्दी लग गई। वे जानते थे अंत निकट है ।( पूरा भवन पत्थरों का बना है।)
डाक्टरों ने उन्हें दक्षिण जर्मनी में आराम करने की सलाह दी । 1904 मई में वे द0 जर्मनी गए। तब उनकी पत्नी भी साथ थीं। 2 जुलाई को उनकी हालत खराब हो गई । अपनी सेहत की गंभीरता के बारे में उनको खुद ही जानकारी हो गई थी । हड़बड़ी में डाक्टरको बुलाने की तैयारी कर रही अपनी पत्नी को चेखव ने कहा- डाक्टर को मत बुलाओ,उसे बुलाना फिजूल होगा। उसके आने से पहले मैं चला जाऊँगा । बहुत धैर्य के साथ उन्होंने अन्त में शैमपेन का एक गिलास लिया । उसके बाद जर्मन में बोले- ICH STBR (मैं जा रहा हूँ)। उनका शव मॉस्को ले जाया गया। वहीं उनका मकबरा बना है।
उतना वर्णन सुन लेने के बाद मुझे लग रहा है कि चेखव के घर आकर मैने अपनी ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण फर्ज अदा किया है। उसे मैं अपने जीवन की एक महान उपलब्धि मानता रहूँगा। जिस रोग ने चेखव की ज़िन्दगी ले ली,इतने वर्षों के बाद मैं उससे निजात पाने के बाद यहाँ विश्राम करने आया हूँ। उनके जीवन के दौरान क्षयरोग को एक असाध्य रोग माना जाता था। बहुत बाद तक वैसी ही स्थिति कायम रही। डाक्टर अपने को निरूपाय मानने लगते थे। हमारे ज़माने के काफी करीब फ्रैंज काफ्का को भी उसने अपना शिकार बनाया। बीस साल बाद काफ्का की मौत 1924 में 41 वर्ष की उम्र में वियना के एक सेनिटोरियम में हुई। उसकी महत्वपूर्ण रचना ' ट्रायल' 1925 में छपी ।
और अब डाक्टर उसे कोई ऐसा भयंकर रोग नहीं मानते। तबसे अब तक विज्ञान और आयुर्विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है ।
गाइड ने मुझे इस विषय पर ज़्यादा सोचने का मौका नहीं दिया। अपनी बात जारी रखते हुए वह बताने लगा :-
याल्टावासी चेखव पर अभिमान करते हैं। यहाँ के पुस्तकालय को चेखव ने अनेक पुस्तकें दी थीं। चेखव के नाम से एक सेनिटोरियम और एक मार्ग भी है। 1901 में चेखव सेनिटोरियम का उद्दघाटन हुआ । उसके निर्माण के लिए,अन्य साहित्यकारों के साथ,चेखव ने भी चंदा दिया था। यहाँ का थियेटर भी चेखव के नाम का है। यहाँ हर रोज दर्शक आते हैं ।
1860 में अपने जन्म के बाद 1879 तक चेखव तगानरोफ में ही रहे। वहाँ भी चेखव परिवार का संग्रहालय है। पिता छोटे व्यापारी थे। 1879 में आर्थिक संकट के कारण पिता मॉस्को गए। चेखव अकेले कहीं गाँव में रहते थे । चेखव ट्यूशन करके अपना गुजारा करने लगे। फिर 92 तक चेखव परिवार सहित मॉस्को मे रहे। पिता को नौकरी नहीं मिलती थी । गरीबी में रहते थे। टी0बी0 ने उसी कारण दबोच लिया था । मॉस्को में चेखव विश्वविद्यालय में भर्ती ह। मॉस्को में किराए के मकानों में रहते थे। उन दिनों के बारे में उन्होंने अपनी डायरी में लिखा कि हमारे फ्लैट्स से आने-जाने वालों के सिर्फ पाँव दिखाई देते हैं। माँ चाहती थीं चेखव डाक्टर बनें। पढ़ते समय वे कहानियाँ लिखने लगे। उनके पारिश्रमिक की धनराशि से परिवार की कुछ सहायता करने लगे। लेखन जारी रहा । विनोदी कहानियाँ लिखीं । 1892 में पेलेखेवा गाँव में भवन खरीदा। 92 से 99 तक पेलेखेवा गाँव में रहे। यह मॉस्को के पास एक गाँव था,जिसका नाम अब चेखव है। और यह अब मॉस्को का अंग बन गया है। 7 साल तक वहाँ रहे। वहाँ कई साहित्यिक कृतियों की रचना की। डाक्टरी की डिग्री भी ली। हैजा फैला,उसकी रोकथाम की। चेखव के चार भाई एक बहन और थे। इन सात वर्षों में गरीबी का चित्र बनाने वाले भाई तथा पिता की मृत्यु हो गई । पहली बार याल्टा आने पर चेखव को यहाँ अच्छा नहीं लगा था । लिखा मुझे अच्छा नहीं लगा । यह यूरोपियन और रूसी का घालमेल है । पर सागर से परिचय हुआ तो याल्टा भी आया । फिर लिखा याल्टा का सागर एक युवती की तरह है । इसके तट पर हजार साल तक रहने
पर भी बुरा नहीं लगेगा । प्रथम बार यहाँ तीन सप्ताह व्यतीत किए थे। फिर 1894 में आए । इसके पूर्व सखालीन द्वीप के प्रवास पर रहे,जहाँ टी0बी0 बढ़ गई। रोसियन होटल में एक महीना याल्टा में बिताया। यहाँ आए तो खाँसी दूर हो गई। फिर लेखन का काम करने लगे। इलाज बन्द कर दिया। उसके बाद दो-तीन सप्ताह के लिए अक्सर यहाँ आकर मित्रों के घर पर रह लेते थे। 1899 में भावी पत्नी से परिचय हुआ। तब दोनों यहाँ आए । यहाँ आने के बाद चेखव होटल में और ओल्गा अपने मित्रों के घर पर रहने लगे। फिर योरोप, फ्राँस का प्रवास किया। डाक्टरों ने फ्राँस में रहने की सलाह दी । चेखव ने मातृभूमि में रहना अधिक पसन्द किया। पिता की मृत्यु व अपने रोग की गंभीरता के कारण यहाँ रहने लगे । उसके बाद उनका याल्टा का जीवन शुरू हुआ ।
दूसरे महायुद्ध के समय याल्टा पर फासिस्टों ने कब्जा कर लिया था। एक फासिस्ट अधिकारी ने आकर कहा -''यहाँ मैं रहूँगा ।'' उस दौरान यहाँ बहन रहती थी । बहन को सूझा कि वे कहीं उस घर को नष्ट न कर दें। उसने भवन की एक दीवार पर एक जर्मन नाटककार को फोटो लगा दिया । उस फोटो को देखकर हाकिम ने घर को नष्ट नहीं किया। जर्मन हाकिम यहाँ आठ दिन रहा। फिर सेवोस्तोपोल चला गया। जाते समय पीछे के दरवाजे पर उसने 'मेरबाकी'(जर्मन अधिकारी की संपत्ति है ) प्लेट लगा दी । सेवोस्तोपोल से वह वापस नहीं लौटा । वह तख्ती युद्ध के अंत तक यहाँ लगी रही और उसके कारण जर्मन सैनिकों ने इसे ध्वस्त नहीं किया। गोलियाँ भवन को लगी थीं । उसकी मरम्मत हो गई । यह पेड़ केदरगियाल्यस्की(देवदार) हिमालय से आया है । दूसरा देवदार अफ्रीका से आया है ।
मैने इरिना को बताया ।
-यह गंगोत्री के पास हर्षिल से लाया गया देवदार है ।
मैं एक टकनौरी देवदार के नीच आकर खड़ा हो गया तो लगा कि चेखव के बागीचे में आकर मैं हर्षिल ही पहुँच गया हूँ । मेरा ननिहाल । और मैं अकेला नहीं,चेखव भी मेरे साथ हैं ।
उस वक्त मैने देखा मेरे सभी साथी हमारी ओर पीठ फेर कर तेजी से बाहर की ओर लपकते जा रहे थे । उस ओर जहाँ अपनी कारें खड़ी थीं ।

Thursday, November 20, 2008

फायर लाइन का पहरेदार

कथाकार विद्यासागर नौटियाल की स्म्रतियों में दर्ज टिहरी के ढेरों चित्र उनके रचना संसार में उपस्थित हो कर पाठक के भीतर कौतुहल जगाने लगते हैं। इतिहास की ढेरों पर्ते खुद ब खुन खुलने लगती है।
प्रस्तुत है उनकी डायरी के प्रष्ठ
विद्यासागर नौटियाल

उन दिनों मेरे पिता टिहरी -गढ़वाल रियासत की राजधानी नरेन्द्रनगर के पास फकोट नामक स्थान पर तैनात थे । वहां एक राजकीय उद्यान था, पिता उसके अधीक्षक थे । उस उद्यान में सिर्फ सब्जियां उगाई जाती थीं । इतनी सब्जियां कि नरेन्द्रनगर राजमहल में रोजाना दो खच्चर सब्जी भेजी जी सके ।
बाद में पिता को फिर वन विभाग में रेंज ऑफीसर बना दिया गया । सन् 1939 ई0 उस वक्त मेरी उम्र सात बरस की थी जब शिमला की राह पर जुब्बल रियासत के पड़ोस में रियासत के अंतिम क्षेत्र में हमारा परिवार बंगाण पट्टी के कसेडी नामक रेंज दफ्तर में जा पहुंचा ।

टिहरी शहर से सौ मील की दूरी पर कसेडी रेंज दफ्तर बंगाण पट्टी में एक बेहद सुनसान जगह पर स्थित था । वहां से गांव बहुत दूरी पर थे । घाटी में सामने की ओर दूसरे पहाड़ पर जौनसार -बाबर का इलाका दिखायी देता था । वहां राजा का नहीं,अंग्रेज का राज था।
वन विभाग के कर्मचारियों के लिए एक ज़रूरी काम जंगलों को आग से संभावित नुकसान से बचाना होता था । घने जंगल में मामूली आग दावानल का रूप धारण कर सकती है। रियासत में वनों की आग से रक्षा करने के नियम बहुत कठोर थे। राह चलते आदमी के लिए अनिवार्य होता था कि वह आग दिखायी देने पर उसे बुझाने के काम में लग जाय । गांव के निवासियों को भी अपने आस-पास के किसी वन में धुंआ दिखायी देने पर अपने काम-धंधे छोड़ कर जंगल की ओर दौड़ जाना कानूनी तौर पर लाजमी होता था । गर्मियों का मौसम जंगलातियों के लिए विपदा का मौसम माना जाता था । जब तक बरसात शुरू नहीं हो जाती थी जंगलात के किसी भी अधिकारी-कर्मचारी को छुट्टी मंजूर नहीं हो सकती थी । आग से वनों की रक्षा करने के लिहाज से गर्मियों के शुरू होने से पेश्तर एतिहायत के तौर पर हर साल फ़ायर लाइन काटी जाती थी । रक्षित वनों के चारों ओर उसकी चौहद्दी में फैली हुई घास को एक निश्चित चौड़ाई में काट कर इस बात की व्यवस्था कर ली जाती थी कि उससे बाहर के क्षेत्र में फैलने वाली आग की लपटें उस जंगल के अन्दर प्रवेश न कर सकें । फ़ायर लाइन काटने का एक दूसरा उपाय यह भी होता था कि रक्षित वन की चौहद्दी में उगी हुई घास पर खुद ही आग लगा कर उसे वन की दिशा में बुझाते चलें । इस काम में कई लोगों को एक साथ मिल कर जुटना पड़ता है । आग को वन के अन्दर और वन के बाहर दोनों दिशाओं में बुझाते हुए आगे बढ़ते रहते हैं । उस लाइन के उस तरह काट दिए जाने से भी बाहर की आग के वन के भीतर प्रवेश कर सकने की संभावना खत्म हो जाती थी । हमारे रेंज दफ्तर से नीचे के इलाके में आम रास्ते के बराबरी पर पिछले कुछ दिनों से आग लगा कर लाइन काटी जा रही थी । उस काम को वन विभाग के कर्मचारियों के अलावा कुछ दिहाड़ी मजूर भी शामिल रहते थे। आग लाइन के काम के शुरू होते ही मैं भी उस जगह पहुंच जाता था । उनके साथ आग जलाते-बुझाते हुए आगे बढ़ते रहने में मुझे बहुत मज़ा आता था । मेरे मन में यह भाव भरने लगता था कि इस वक्त मैं भी एक बेहद जुम्मेदारी का काम निभा रहा हूं। उस काम में शरीक होने के लिए मुझे कोई बुलाने भी नहीं आता था,वहाँ से हट जाने को भी नहीं कहता था । रेंजर साहब के बेटे को कोई कुछ कह भी कैसे सकता था ?
उस काम की योजना के बारे में पिता को जब भी फुरसत में पाता मैं विस्तार से जानकारी लेता रहता था । रेंज क्वार्टर से नीचे के क्षेत्र में चल रहे काम के पूरा हो जाने के फौरन बाद उससे ऊपर की ओर के ढलानों पर काम किया जाना था । पहाड़ की चोटी तक । बड़े पाजूधार की तरफ घने जंगल थे । उन जंगलों के नक्शे मेरे दिमाग में दर्ज रहते थे । पाजूधार बंगले तक रोज जाते आते मुझे अच्छी तरह याद हो गया था कहां क्या है ्र क्या नहीं है ।
उस दिन जन्माष्ठमी के व्रत के कारण रेंज दफ्तर में छुट्टी थी । उस छुट्टी के कारण पिता दौरे पर नहीं थे, घर पर मौजूद थे । परिवार में हंसी-खुशी का माहौल था । बच्चों में भाईजी तो काफी लंबे समय से घर पर रहते नहीं थे । वे पढ़ाई करने के लिए देहरादून में रहने लगे थे। सिर्फ गर्मियों की छुट्टियों में हमारे पास आ पाते थे । दूसरे नम्बर पर दीदी थीं । उनके जीवन को पिछले काफी समय से नानीजी के निर्र्देशों के मुताबिक ढाला जाने लगा था, जिसमें उम्रदार लड़कियों का व्रत लेना एक मुख्य ज़रूरत होती थी । दीदी ने पिछले साल भी व्रत लिया था । साल में दो बड़े व्रत आते थे-शिवरात्रि और जन्माष्ठमी । उन दोनों व्रतों के दिन घर पर होने वाली कुल घटनाओं के विवरण मुझे यों भी पूरी तरह याद रहते थे । उस दिन सुबह की चाय पी लेने के फौरन बाद मेरा मांजी से झगड़ा होने लगा था । मुझे व्रत लेने के लिए मना किया जा रहा था । मेरा कहना था कि मेरी बहनें कमला और उर्मिला अभी छोटी हैं, इसलिए वे व्रत न रखें तो कोई बात नहीं। पर मैं तो अब खूब बड़ा हो गया हूं और मैं तो व्रत लूंगा ही लूंगा ।
-तू अभी छोटा है बेटा ।
-हां मांजी, मैं अभी छोटा हूं । पर यह बात तुम तब तो नहीं कहते जब मैं फायर लाइन बुझाने जाता हूं । तब नहीं होता मैं छोटा ।
-अच्छा विद्यासागर,जो तू बड़ा हो गया है तो पहले मेरे दूध के पैसे दे दे ।
दूध के पैसे । रोज़-रोज ताने देती रहती हैं -तुझे मैने दूध पिलाया है। उस दिन मैं पूरा हिसाब चुकता करने पर उतारू हो गया। मेरे पैसे भी मांजी के ही पास रहते थे। लकड़ी के संदूक के अन्दर, एक कोने पर । मेरे पास पैसे कहां से आते हैं ? जब कभी कोई मेहमान या रिश्तेदार हमारे घर आते हैं तो उनमें से कुछ लोग जाते वक्त मुझे कुछ पैसा दे देते हैं - ले विद्यासागर, तू अपने लिए किताब ले लेना । उस तरह की मेरी कुल जमा पूंजी कुल कितनी है, कितना पैसा किसने दिया था इस बात की मुझे बखूबी जानकारी रहती थी । और उनकी याद भी रहती थी । उस वक्त मांजी के संदूक में मेरे कुल पांच रूपए जमा थे ।
-ज्यादा से ज्यादा पांच रूपए का तो पिया होगा मैने तुम्हारा दूध। तुम ही रख लेना मेरे वे सब रूपए, जो तुम्हारे पास हैं ।
कमला और उर्मिला बहुत उत्सुक होकर देखने लगी थीं कि आज व्रत के दिन दूध के उस हिसाब के चुकता हो जाने के बाद अब मेरे व्रत लेने न लेने के बारे में मांजी क्या निर्णय देती हैं । इस मौके पर वे दोनों कामना करने लगी थीं कि मांजी की जुबान से किसी तरह फिसल कर, एक बार 'नहीं मानता तो रहले भूखा " निकल आए । मुझे इजाजत मिल जाने पर उनके लिए भी व्रत लेने की राहें खुल सकती थीं । तब उनकी भी व्रत रखने का अपना दावा पेश कर देने की बारी आ सकती थी । उसके लिए चाहे जितनी भी आरजू मिन्नत करनी पड़े । थोड़ा रोना, थोड़ा रूठना, थोड़ा हल्ला मचाना। पर पहले रास्ता रोक रही यह मुख्य बाधा तो दूर हो ।
मैं अपने को बाकायदा एक जुम्मेदार व्यक्ति मानने लगा था और मैने करीब करीब तय कर लिया था कि दिन के मौके पर, रात हो जाने से पहले, दीदी की तरह मैं भी खाना नहीं खाऊंगा और व्रत रखूंगा। पिछले साल की तरह अब मैं किसी के झांसे में नहीं आने वाला, जब मुझे दोपहर के वक्त, आकाश में सूरज के मौजूद रहते यह झूठ-झूठ कह कर खाना खिला दिया गया था कि बच्चों के आधा दिन के बाद खाना खा लेने पर भगवानजी नाराज नहीं होते और ऐसे बच्चों का खा लेने के बाद चर्त नहीं होता । (चर्त गढ़वाली में व्रत के उल्टे को कहा जाता है।)
बादल-विहीन आकाश में जब सूरज कुछ ऊपर चढ़ आया तो मैं अपने नि्श्चय को मन ही मन अटल मानता हुआ अपनी जेब में एक माचिस लेकर चुपचाप घर से निकल पड़ा । छुट्टी के फौरन बाद रेंज दफ्तर से ऊपर की ओर की फायर लाइन काटी ( लगाई-बुझाई)जानी थी । यह बात मुझे पहले से मालूम थी । अपने पिता के विभाग के कल के काम को कुछ हलका करने के लिहाज से मैं थोड़ा बहुत काम आज ही निपटा लेना चाहता था। रेंज दफ्तर की सीमा से बाहर जंगल में पहुंचते ही मैने पेड़ों की दो-तीन छोटी शाखाओं को उठा कर उनको जमीन पर एक साथ रखा । उनका इस्तेमाल आग बुझाने के लिए किया जाना था । तब धीरे से माचिस की एक तीली झाड़ी और बेतहाशा उगी हुई घास पर एक जगह पर आग छुआ दी । उस आग को इस हिसाब से बुझाते रहना था कि वह जंगल की ओर न बढ़ सके,रेंज दफ्तर की ओर ही आती रहे, जिधर उसके ज़्यादा फैलने की कोई संभावना नहीं हो सकती थी। उधर पहले ही फायर लाइन काटी जा चुकी थी। आग जो लगी तो लग ही गई । वह बेतहाशा फैलने लगी । मैने काफी को्शिश की कि आग को ऊपर की ओर बढ़ने से रोक लिया जाय । लेकिन वह सूखी घास की खूराक पाकर ऊपर की ओर ही लपकती जा रही थी । मेरे देखते-देखते उसका घेरा इतना बढ़ गया कि नीचे रेंज दफ्तर से आकाश की ओर उठता हुआ धुआं साफ-साफ नज़र आने लगा ।
जन्माष्ठमी का त्यौहार। कृष्ण के जन्म के मौके पर यमुना में बाढ़ आ गई थी। यहां यमुना हमसे काफी दूर है। और आकाश में,लगता है, धुंए के अलावा और कुछ है ही नहीं। त्यौहार मनाने में व्यस्त जंगलाती अचानक लग गई उस आग को देख भयभीत हो गए थे। किसका व्रत ? किसका त्यौहार ? अपने घर पर जो जैसी हालत में था वैसा ही वन की ओर दौड़ता चला आ रहा था ।
पता नहीं उस सुनसान जगह पर, जहां दो या तीन परिवारों के अलावा मीलों तक कोई इन्सानी आबादी नहीं थी, उतने सारे लोग उस वक्त कहां से आ लगे । लेकिन आग थी कि वह किसी के वश में नहीं आ रही थी।
ऐसे संकट के समय मुझे मौके पर पिता के हाथों कितनी मार पड रही है, उसका मैं कोई हिसाब कैसे रख सकता था । मुझे दिखायी दे रहा था कि आग की लपटें सुरक्षित वन के एकदम पास पहुंचने लगीं हैं। अचानक एक आश्चर्य घटित हुआ । आकाश में जाने कहां से बादल घिर आए और पानी बरसने लगा । ऐसी तेज बरखा कि कुछ ही देर बाद सुरक्षित जंगल की ओर बढ़ती आग की लपटों का कहीं पता ही नहीं चला । व्रतधारी विद्यासागर की भी जान में जान आ गई । मुझे याद नहीं कि उस मशक्कत के बाद घर लौट आने पर मेरे व्रत का चर्त करवा दिया गया था या नहीं ।

Wednesday, November 19, 2008

'ल्यूमिनस पीक्स" का लोकार्पण और काशीनाथ सिंह का कहानी पाठ

उदयपुर।
हमारी दृष्टि जरूर वैज्ञानिक हुई है लेकिन कल्पना की दुनिया अब सिमटती जा रही है। कहानी के समक्ष यह चुनौती है इसलिए कहानी में सुनाने का भाव आना जरूरी हो गया है। शीर्षस्थ हिन्दी कथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने उक्त विचार सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के नेहरू अध्ययन केन्द्र द्वारा आयोजित 'लेखक से मिलिए" कार्यक्रम में व्यक्त किए। प्रो. सिंह ने कहा कि कहना कहानी के जिंस में है और कहानी कहे जाने के लिए ही लिखी जाती है। उन्होंने इस आयोजन में चर्चित उपन्यास 'काशी का अस्सी" से एक अंश का पाठ भी किया।
आयोजन में डॉ. आशुतोष मोहन द्वारा अनुवादित कविताओं के संग्रह 'ल्यूमिनस पीक्स" का विमोचन प्रो. काशीनाथ सिंह ने किया। डॉ. मोहन ने वरिष्ठ कवि नंद चतुर्वेदी की प्रतिनिधि कविताओं का अनुवाद इस संग्रह में किया है। प्रो। शरद श्रीवास्तव ने इस अनुवाद को चुनौतीपूर्ण कर्म की संज्ञा देते हुए कहा कि भारतीय साहित्य की वैश्विक छवि के लिए ऐसे अनुवाद जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में साहित्य और चित्रकला का अभिनव संगम है। अनुवादित कविताओं के साथ समकालीन चित्रकारों की रेखाकृतियां इसे भिन्न आस्वाद देती हैं। अनुवादक डॉ। आशुतोष मोहन ने कहा कि अनुवाद रचना कर्म जैसा ही बैचेन करने वाला अनुभव है। लोकार्पण की रस्म चित्रकार अब्बास बाटलीवाला, अंग्रेजी आलोचक निखिलेश यादव और ''बनास"" के संपादक पल्लव ने प्रो. सिंह और नंद चतुर्वेदी को हाथों करवाई। आभार ज्ञापित करते हुए नंद बाबू ने कहा कि अपनी कविता की प्रशंसा सुनना एक कठिन काम है। उन्होंने इस दौर को निर्मम समय बताते हुए कहा कि यहां हम अनचाहे आ गए हैं जहां एक उत्सव भी है।
इस अवसर पर 'काशी का अस्सी" और अब्बास बाटलीवाला के कैनवास पर एक प्रायोगिक डाक्यूड्रामा ''कौन ठगवा!"" के संगीत की सी.डी. का लोकार्पण भी हुआ। यह फिल्म परम प्रोडक्शन के बैनर में बनाई जा रही है जिसके निर्देशक डॉ. आशुतोष मोहन हैं। कार्यक्रम का संयोजन शोधार्थी श्रुति शर्मा ने किया। अंत में नेहरू अध्ययन केन्द्र के निदेशक डॉ। संजय लोढ़ा ने आभार व्यक्त किया। आयोजन में डॉ। राजकुमार वर्मा (नई दिल्ली), डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय (नाथद्वारा), सी.एस. मेहता, प्रो. नवल किशोर, प्रो. एस.एन. जोशी, प्रो. आर.एन. व्यास, डॉ. विजय पारीक सहित अनेक साहित्यप्रेमी, पत्रकार व विद्यार्थी उपस्थित थे।

पूनम अरोड़ा,
द्वारा : पल्लव
उदयपुर