Saturday, May 3, 2008

ऊंचे पहाड़ों पर देवता नहीं चरवाहे रहते हैं

विजय गौड
(बेशक हम कोई इतिहासविद्ध नही तो भी यह तो कह ही सकते हैं कि सत्ता के लिए खूनी संघर्ष से भरे सामंतों के आपसी झगड़े और उनकी वंशावलियों की सांख्यिकी से भरी इतिहास की पाठ्य-पुस्तकें ऐतिहासिक दृष्टि से इस देश की भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्थिति को समुचित रुप से रख पाने में अक्षम हैं। उत्तरोतर भारत के बारे में हमारे पास बहुत ही सीमित जानकारी है। वहां रहने वाले लोगों का इतिहास क्या नृशंस आक्रमणों से जान बचाकर भागे हुए लोगों का इतिहास है ? पश्चिम भारत को हड़प्पा और मोहनजोदड़ों के बाद हमने खंगाला है क्या ? दक्षिण भारत में क्या एक ही दिन में विजय नगर राज्य की स्थापना हो गयी ? सिंहली और तमिलों के विवाद की जड़ कहां है ? नागा, कुकी और मिजो जन-जाति की संस्कृति को हम कैसे जान पायेगें ? जंगलों के भीतर निवास करने वाले लोगों से हमारा रिश्ता कैसा होना चाहिए ?- ऐसे ढेरों सवालों की जद में 2 जुलाई 2006 को हिमाचल की कांगड़ा घाटी से चम्बा घाटी की ओर शिवालिक ट्रैकिंग एवं क्लाईम्बिंग ऐसोसियेशन, आर्डनेंस फैक्ट्री देहरादून का एक नौ सदस्य अभियान दल अपने 15 दिन के अभियान पर मिन्कियानी-मनाली पास से गुजरते हुए कांगड़ा और चम्बा के गदि्दयों के जीवन को जानने-समझने निकला था। - पर्यटक स्थल धर्मशाला तक की यात्रा बस द्वारा की गयी। धर्मशाला के बाद मैकलोडगंज तक की यात्रा जीप से उसके बाद पैदल मार्ग शुरु होता है। मैकलोडगंज शरणार्थी तिब्बतियों का मिनी ल्हासा है, जहां दलाई लामा रहते हैं। नाम्बग्याल मोनेस्ट्री में। अपनी कसांग के साथ। मैकलोडगंज की संस्कृति में तिब्बत की हवा है। उसी यात्रा पर लिखे संस्मरण का एक छोटा सा हिस्सा और ऐसी ही अन्य यात्राओं के अनुभवों से सर्जित एक कविता भेड़ चरवाहे यहां प्रस्तुत है।)

भटकते हुए

आकाश की ओर उछाल लेती हुई या पाताल की ओर को बहुत गहरे गर्त बनाती हुई समुद्र की लहरों पर हिचकोले खाने का साहस ही समुद्र के भीतर अपनी पाल खोल देने को उकसा सकता है। अन्जान रास्तों की भयावता और अन्होनी की आशंका में आवृत दुनिया का नक्शा नहीं बदल सकता था, यदि वे सिरफिरे, जो सुक्ष्म विवरों के गर्भग्रह की ओर लगातार खिसकती पृथ्वी के खात्मे की आशंका से डरे आत्मा की खोज में जुटे अपनी-अपनी कुंडलिनी को जागृत कर रहे होते। घर, जनपद या राज्यों की सरहदों के किवाड़ ही नहीं थल के द्वार पर लगातार थपेड़े मारते अथाह जलराशि से भरे समुद्र में उतर गये। वास्कोडिगामा रास्ता भटकने के बाद भारत पहुंचा। कोलम्बस ने एक और दुनिया की खोज की। यह भी सच है कि ऐसा करने वाले वे पहले नहीं थे, पर इस बिना पर उनको सलाम न करें, ऐसा कहना तो दूर, सोचने वालों से भी मैं हमेशा असहमत ही रहूंगा। ह्वेनसांग, फाहयान, मेगस्थनीज की यात्रा इतिहास के पन्नों में दर्ज है और समय विशेष की प्रमाणिकता को उनके संग्रहित तथ्यों में ढूंढ़ते हुए कौन उसके झूठ होने की घोषणा कर सकता है ?

प्रार्थनारत बौद्धिष्टों की अविकल शान्ति

मैकलोडगंज हमारे रास्ते पर बस रूट का आखिरी क्षेत्र था। जब मैकलोडगंज में थे तो आधुनिकता की रंगीनियों में टहलते भारतीय और योरोपिय सैलानियों के खिलंदड़ चेहरों में आक्रामक किस्म का एक हास्य देख रहे थे। बौद्ध गोम्पा में प्रार्थनारत बौद्धिष्टों की अविकल शान्ति सुन रहे थे। अभी कांगड़ा के दुर्गम इलाकों में रहने वाले गदि्दयों के गांवों से गुजर रहे हैं तो देख रहे हैं कि दो सामांतर दुनिया साथ-साथ चल रही हैं।

गदि्दयों का भौगोलिक प्रदेश

हमारा घूमना इन दोनों रेखाओं पर तिर्यक रेखा की तरह अंकित हो तो शायद कह पायें कि गदि्दयों के इस भौगोलिक प्रदेश की तकलीफों को एक सीमा तक जान समझ पायें। शायद इसीलिए निकले हैं। अपनी भेड़ों के साथ जीवन संघर्ष में जुटे उस अकेले भेड़ चरवाहे के मार्ग पर बढ़ते हुए, उसके पदचिन्हों और भेड़ बकरियों की मेंगड़ी की सतत गतिशील रेखा के साथ-साथ नदी नालों को टापते हुए, घुमावदार वलय की तरह ऊपर और ऊपर बढ़ते रास्तों के साथ हम मिन्कियानी दर्रे की ओर बढ़ते रहे। मिन्कियानी दर्रे के पार ही खूबसूरत चारागाहों के मंजर की तलाश भेड़ चरवाहों की ख्वाहिश है। पसीने से चिपचिपाये बदन, जो खुद हमारे ही भीतर घृणा बो रहे हैं, उन हरियाले चारागहों पर लौटने को हैं आतुर।
मिन्कियानी के रास्ते पर बादल घाटियों से उठते तो कभी चोटियों से उतरते। इस चढ़ने और उतरने की प्रक्रिया में शायद कभी सुस्ताते तो घने कोहरे में ढक जाते। थोड़ी दूर पर छूट गये अपने साथी को भी हम पहचान नहीं सकते थे।

बादलों का यह खेल ही तो उकसाता है

बादलों का ऐसा ही खेल एक बार फिरचेन लॉ पर देखा था। फिरचेन लॉ जांसकर घाटी में उतरने का एक रास्ता है जो बारालचा पास के बाद सर्चू से पहले यूनून नदी के साथ आगे बढ़ते हुए फिर खम्बराब दरिया को पार कर पहुंचता है। उस समय जब खम्बराब को पार कर विश्राम करने के बाद अगले दिन तांग्जे के लिए निकले तो ऊंचाई दर ऊंचाईयों को ताकते हुए बेहद लम्बे फिरचेन लॉ को पार करने लगे। ऊंचाईयों की वह ऐसी लड़ी थी कि किसी एक को भी पार करने के बाद दिखायी देता विशाल मैदान। जब मैदान के नीचे की उस ऊंचाई को पार कर रहे होते तो शायद थका देने वाले चढ़ाई ही ऐसी रही होगी कि उसे पार करने की हिम्मत इसी बात पर जुटाते रहे हों कि शायद इस ऊंचाई पर ही होगा फिरचेन लॉ उसके बाद तो फिर फिसलता हुआ ढाल मिल ही जाना है। पर अपनी पुनरावृत्ति की ओर लौटती अनगिनत श्रृंखलाबद्ध ऊंचाईयों ने न सिर्फ शरीर की ताकत निचोड़ ली बल्कि एकरसता के कारण ऊबा भी दिया था।

कौन होगा मार्गदर्शक

मौसम भी साफ नहीं था। बादल कहीं चोटियों से उतरते और हमें ढक लेते। उस वक्त रास्ते का मार्ग दर्शक, हमारा साथी नाम्बगिल अपने घोड़ों के साथ आगे निकल चुका था। अन्य साथी भी आगे जा चुके थे। सतीश, मैं और अनिल काला ही पीछे छूटे हुए थे। मैं और सतीश बिल्कुल पीछे और अनिल काला हमारे आगे-आगे। जिस वक्त वह ऐसी ही एक चढ़ाई के टुक पर था और हम उससे कुछ कदम नीचे तभी अचानक तेज काले बादलों का झुण्ड कहीं से उड़ता हुआ आया। शायद तेज गति से नीचे उतरा होगा तभी तो जब हम तक पहुंचा, शायद थक चुका था और कुछ देर विश्राम करने के लिए हमें घेर कर खड़ा हो गया। फिरचेन लॉ का टॉप नजदीक ही था, जिसका कि उस वक्त हमें आभास नहीं था, क्यों कि पुनरावृत्ति की ओर लौटती ऊंचाईयों ने हमारे भीतर उसके जल्दी आने की कामना को शायद खत्म कर दिया था और हम सिर्फ इस बिना पर चलते जा रहे थे कि जहां पहुंच कर नाम्बगिल हमारा इंतजार कर रहा होगा, मान लेगें कि वही टॉप है। इस तरह से टॉप पर बहुत जल्दी पहुंच जायें- जैसी कामना जो हमें उसके पास न पहुंच पाने पर थका देने वाली साबित हो रही थी, उससे एक हद तक हम मुक्त हो चुके थे और अनगिनत लड़ियों से भरी इन ऊंचाईयों को पार करने की ठान कर बढ़ते चले जा रहे थे। काले घने बादलों के उस घेरे में हम पूरी तरह से ढक चुके थे। चारों ओर अंधेरा छा गया था। अंधेरा ऐसा कि बैग में रखे टॉर्च को भी नहीं खोज सकते। भयावह अंधेरा जिसमें हवायें सन-सना रही थी। सतीश और मैं साथ थे इसलिए हिम्मत बांधें बढ़ते रहे। पर हमसे कुछ ही फुट आगे चल रहा अनिल काला गायब हो चुका था। आंखों को फाड़-फाड़ कर भी देखे तो भी कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। हाथों के स्पर्श के सहारे ही हम एक दूसरे को देख पा रहे थे। काला किस दिशा में बढ़ा होगा, हम दोनों ही चिन्तित हो गये। गला फाड़-फाड़ कर पुकारने लगे। हवा इतनी विरल थी कि हमसे कुछ ही दूरी पर अंधेरे के बीच आगे बढ़ रहे अनिल काला को सुनायी नहीं पड़ रही थी। अपनी पुकार का प्रत्युतर न पा हम अन्जानी आशंकाओं से घिर गये। बस बदहवास से चिल्लाते हुए आगे बढ़ते रहे, उस ओर को जिधर उसके जूते के निशान, जो हल्की-हल्की गिरती हुई नमी से गीली हो चुकी धरती पर बेहद मुश्किलों से खोजने पर, दिखायी पड़ रहे थे। तभी अंधेरा छंटने लगा। आवाज लगाते हुए, पांवों के निशान के सहारे हम पास के एकदम नजदीक पहुंच चुके थे। पास पर पहुंचे हुए अन्य साथियों के साथ अनिल काला भी वैसी ही अन्जानी आशंकाओं से घिरा हमारा इंतजार कर रहा था। दूसरे साथियों के पद-चिन्ह उसका भी मार्ग दर्शन करते रहे थे।

भेड़ चरवाहे
एक
लकड़ी चीरान हो या भेड़ चुगान
कहीं भी जा सकता है
डोडा का अनवर
पेट की आग रोहणू के राजू को भी वैसे ही सताती है
जैसे बगौरी के थाल्ग्या दौरजे के
वे दरास में हों

रोहतांग के पार या,
जलंधरी गाड़ के साथ-साथ
बकरियों और भेड़ों के झुण्ड के बीच
उनके सिर एक से दिखायी देते हैं

बेशक विभिन्न अक्षांशों पर टिकी धरती
उनके चेहरे पर अपना भूगोल गढ़ दे
पर पुट्ठों पर के टल्ले तो एक ही बात कहेगें

दो
ऊंचे पहाड़ों पर देवता नहीं चरवाहे रहते हैं
भेडों में डूबी उनकी आत्मायें
खतरनाक ढलानों पर घास चुगती हैं

पिघलती चोटियों का रस
उनके भीतर रक्त बनकर दौड़ता है
उड्यारों में दुबकी काया

बर्फिली हवाओं के
धार-दार चाकू की धार को भी भोंथरा कर देती है
ढंगारों से गिरते पत्थर या,तेज उफनते दरिया भी

नहीं रोक सकते उन्हें आगे बढ़ने से
न ही उनकी भेड़ों को

ऊंचे- ऊंचे बुग्यालों की ओर
उठी रहती हैं उनकी निगाहें
वे चाहें तो किसी भी ऊंचाई तक ले जा सकते हैं भेड़ों को

पर सबसे वाजिब जगह बुग्याल ही हैं
ये भी जानते हैं

ऊंचाईयों का जुनून
जब उनके सिर पर सवार हो तो भी
भेड़ों को बुग्याल में ही छोड़
निकलता है उनमें से कोई एक
बाकि के सभी बर्फ से जली चट्टानों की किसी खोह में
डेरा डाले रहते हैं
बर्फ के पड़ने से पहले तक

भेड़ों के बदन पर चिपकी हुई बर्फ को
ऊन में बदलने का खेल खेलते हुए भी रहते हैं बेखबर
कि उनके बनाये रास्ते पर कब्जा करती व्यवस्था जारी है,
ये जानते हुए भी कि रुतबेदार जगहों पर बैठे

रुतबेदार लागे
उन्हें वहां से बेदखल करने पर आमादा हैं,
वे नये से नये रास्ते बनाते चले जाते हैं
वहां तक
जहां, जिन्दगी की उम्मीद जगाती घास है
और है फूलों का जंगल

बदलते हुए समय में नक्शेबाज दुनिया ने
सिर्फ इतनी ही मद्द की
कि खतरनाक ढाल के बाद
बुग्याल होने का भ्रम अब नहीं रहा
जबकि समय की नक्शेबाजी ने छीन लिया बहुत कुछ
जिस पर वे लिखने बैठें
तो भोज-पत्रों के बचे हुए जंगल भी कम पड़ जायेगें

भोज-पत्रों के नये वृक्ष रोपें जायें
पर्यावरणवादी सिर्फ यही कहेगें

उनके शरीर का बहता हुआ पसीना
जो तिब्बत के पठारों में
नमक की चट्टान बन चुका गवाह है
कि सुनी घाटियों को गुंजाते हुए भी
अनंत काल तक गाते रहेगें वे
दयारा बुग्याल हमारा है
नन्दा देवी के जंगल हमारे हैं
फूलों की घाटी में पौधों की निराई-गुड़ाई
हमारे जानवरों ने अपने खुरों से की है

No comments: