Wednesday, November 26, 2008

दम तोड़ती भाषा

यादवेन्द्र जी संवेदनशील और एक सचेत नागरिक हैं। दुनिया जहान की खबरों से अपने को जोड़े रहते हैं और हर उस गतिविधि के साथ अपना जुड़ाव बनाए रखना चाहता हैं जो इस दुनिया की विविधता को तहस नहस करनेवाली ताकतों के खिलाफ हो। ऐसी ही सामाग्री जब उन्हें कहीं भी दिख जाती है तो वे चाहते हैं उससे हिन्दी का पाठक समुदाय भी वाकिफ हो सके। इसके चलते ही वे अक्सर ऐसी सामाग्री को खोज-खोज कर अनुवाद में जुटे रहते हैं। हम उनकी इस कोशिश के साथ अपने को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं- जब उनके अनुवादों को कहीं भी पढते हैं। उनके अनुवादों को इस ब्लाग में प्रकाशित कर हम उनका आभार व्यक्त करना चाहते हैं।

भाषा के सवाल को यादवेन्द्र जी विश्व मानचित्र में व्यक्ति और समुदाय के जनतांत्रिक अधिकार के रूप में देखते हैं। किन्हीं खास षड़यंत्रों के चलते विलुप्त होती भाषाओं को बचाये रखने की कोशिश उन षड़यंत्रों की मुखालफत ही है जो विविधता की बजाय एक जैसे धर्म, एक जैसे समाज, एक जैसी जीवन शैली को आरोपित करने पर आमादा है। "काउंटर पंच" में 26/27 नवम्बर 2005 को प्रकाशित एक आलेख में उल्लेखित कविता को अनुवाद कर यादवेन्द्र जी ने अपने हस्तलेख की फोटो के रूप में भेजा है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।


दम तोड़ती भाषा


जब कोई भाषा दम तोड़ती है
तो दैवी वस्तुएं
तारे, सूर्य और चन्द्रमा- और
मानवीय वस्तुएं
चिंतन और अनुभूति -
सब कुछ ओझल होते होते
बंद हो जाते हैं दिखना
इस दर्पण में।

जब कोई भाषा दम तोड़ती है
तो सब कुछ
जो इस दुनिया में मौजूद है-
महासागर और नदियां
पशु पक्षी और पौधे,
बंद हो जाता है
कहीं भी उसके बारे में सोचना
और कभी भी उनके नाम उचारना---
बस इस धरती से पुंछ जाता है
उनका अस्तित्व ही।

जब कोई भाषा दम तोड़ती है
तो दुनियाभर के लिए
तमाम दरवाजे और खिड़कियां
हो जाते हैं सब बंद---
अब कोई कभी नहीं समझ पाएगा
दैवी और मानवीय वस्तुओं को
पुकारने के इतर ढंग---
इनकी दरकार है बड़ी
इस धरती पर रहते रहने के लिए।

जब कोई भाषा दम तोड़ती है
प्यार के बोल
पीड़ा और स्नेह की भंगिमाएं
पुराने गीत
किस्से, कहानियां, बोलचाल, प्रार्थनाएं-
चाहे तो भी किसी के लिए
दुहरा नहीं पाएगा कोई
इन्हें अब कभी भी ।

जब कोई भाषा दम तोड़ती है
इससे पहले भी लोप हो चुका होगा कईयों का
तथा कई और कगार पर होंगी
दम तोड़ने के
अमूल्य दर्पण खण्डित हो जाएंगे
सदा सदा के लिए
जिनमें संवाद की छवियां
नहीं दिखेंगी अब कभी
मानवता और भी दरिद्र होती जाएगी दिनों दिन
जब तक दम तोड़ती रहेगी कोई भाषा।

2 comments:

naveen kumar naithani said...

yadvendraji ko yaad kiye bahut din hue hain.bhasha hi dam nahin torati samvedanayen bhi lupt ho jaa rahin hain.achha kiyaa hai. badhaai.
naveen kumar naithani

अशोक पाण्डेय said...

जितनी अच्‍छी कविता है, उतना ही अच्‍छा अनुवाद है। यादवेन्‍द्र जी और आपका आभार।