Thursday, May 24, 2012

ब्या-काज के वे दिन

हिन्दी का रचनात्मक साहित्य ज्यादातर आपसी संबंधों या एक हद तक राजनैतिक आर्थिक ताने बाने के इर्द गिर्द ही सामाजिक सवालों का लेखा जोखा संजाये है। विज्ञान, खेल-कूद, शाखा दर शाखा बढ़ती ज्ञान विज्ञान की स्थिति के साथ-साथ बदलती हुई तकनीकी स्थितियां, जैसे इतर विषय हिन्दी लेखन के दायरे से बहुधा बाहर ही दिखायी देते हैं। विषयगत शुद्ध लेखन की अनुपस्थिति तो पूरी तरह देखी जा सकती है। शुद्ध साहित्य के अलावा किसी भी अन्य विषय की मौलिक पुस्तक ही नहीं, छोटे-मोटे आलेख भी मुश्किल से दिखायी देते हैं। मामले के विश्लेषण पर औपनिवेशिक मानसिकता से जकड़े समाज को दर किनार नहीं किया जा सकता लेकिन साथ ही साथ लम्बे समय से अपने प्रभाव का विस्तार करती बाजारू संस्कृति के आरोपित प्रभाव को भी चिहि्नत किया ही जा सकता है। देश का मध्यवर्ग इस आरोपित प्रभाव की जद में पूरी तरह से है। बल्कि इसे यूं कहा जाये जीवन मूल्यों के आदर्श और गढ़ी जा रही नैतिकतायें भी इसी केे दायरे में तय कर रहा है। समझा जा सकता है कि इसी कारण उच्च शिक्षा का माध्यम सिर्फ अंग्रेजी ही दिखायी देता है। देवेंद्र मेवाड़ी हिन्दी के ऐसे लेखक हैं जिन्होंने विज्ञान विषय को गल्प में शामिल करते हुए अपनी सक्रिय भागीदारी की है। बल्कि कहें सकते हैं कि हिन्दी में विज्ञान लेखन पर सक्रिय चंद रचनाकारों में वे शुमार है। अभी प्रस्तुत है उनका एक बेहद आत्मीय संस्मरण।
-वि.गौ.

  देवेंद्र मेवाड़ी
dsmewari@rediffmail.com,
dmewari@yahoo.com
 
किन---कि---क्यान् क्यान् क्यान्
घि---घ्यान्---घ्यान् घ्यान्
कि---क्यान् क्यान् क्यान्---
घि---घ्यान्---घ्यान्---घ्यान्

दूर किसी धार या मोड़ से आती हुई बाजे-गाजे की यह आवाज सुनते ही हम खाना छोड़ कर भागते हुए बाहर बट्या (सड़क)में आ जाते थे और सिर घुमा कर आवाज की दिशा में देखने लगते थे। हमारी आंख बर्यात देखने को बेचैन हो जाती थीं। कान बाजा की आवाज पर लगे रहते थे। 
तभी दूर से तूरी की आवाज आती---धूह्णह्ण तु  तु  तु तूह्णह्णह्ण हमारी उत्सुकता और बढ़ जाती। पंजा पर उचक-उचक कर उस तरफ देखते। बीच-बीच में हवा में शंख की लंबी आवाज गूंजती---पूह्णह्णह्णह्!
फिर अचानक धार के मोड़ से बारात निकल आती। ढोल-नंगारा की आवाज तेज हो जाती>---
किन---किन्---किन्---कि---किन्---किन्---किन्
घि---घ्यान्---घ्यान्---घ्यान!
घि---घ्यान्---घ्यान्---घ्यान!
ढोल-नगाड़े जैसे अपनी आवाज में बोल कर बताते थे-लो, हम ले आए हैं बरात। 
धीरे-धीरे बर्यात और नजदीक आ जाती। रंगीन छाता ओढ़े ब्यौला दिखाई देने लगता।
हमारी बाखली से भी कई बर्यात गईं। कई बर्यात बाखली में आईं। ददाओं की बर्यात जाती थी और वे ब्योली (दुल्हन) लेकर आते थे। जो बर्यात हमारे यहां आती थीं, वे किसी दीदी-बैनी को ब्योली बना कर ले जाते थे। दीदिया और बैनिया के जाने पर हम बहुत बुरा लगता था। लेकिन, ददाओं की बर्यात में सब खुश रहते थे।
बर्यात का दिन तय हो जाने पर ज्वेशिज्यू एक दिन पहले आकर हम बच्चों से गाय का गोबर, दूब और धूप देने के लिए "पाती" मंगाते। वैसे तो उसे "कुर्ज" कहते थे, लेकिन ब्या-काज और पूजा-पाठ में धूप देने के लिए पाती कहते थे। उसकी पत्तिया को घी में लटपटा कर जलते कोयलों पर रख देते। धूप का सुगंधित धुवां चारा ओर फैल जाता। कलश थापन करके, दिया जलाते, गणेश पूजा करते और वर के दांए हाथ की कलाई पर हल्दी रंग के पीले कपड़े में पिठियां, अक्षत और भेट (सिक्के) रख कर कंगन बांध देते।
घर में इष्ट-बिरादर आने लगते। दो-तीन लोग "पातों" (पत्तियों) के लिए भेज दिए जाते। वे सुबह ही गांव के पहाड़ के पार उतर कर जंगल से खूब मालू के पत्ते तोड़ते और पत्ता के गट्ठर लेकर शाम तक लौट आते। शाम को लोग बैठे-बिठाए बात करते-करते सिनके के टुकड़ा से जोड़-जोड़ कर पत्ता की दूनियां (दोने) और पत्तल बना देते। तिमिल के पत्ते मिल गए तो उनकी भी दूनियां बना लेते। दूनिया और पत्तला का ढेर जमा हो जाता। कमरे म हुक्का-चिलम और सुलपाई यानी हथेली में समा जाने वाली चिलम घूमती रहती। न्योतारे कश खींच कर, धुवां छोड़ते हुए उन्हें आगे बढ़ाते रहते। बीच-बीच में थाली में खूब मीठी गरमागरम चहा के गिलास घुमाए जाते। खाना तैयार हो जाने पर खाने का बुलावा आ जाता, "हं हौ, खान् हन उठा आब्।"
औरत, लड़कियां भीतर के कमरा में "त्यार सप्त दिदी" (तेरी कसम दीदी या "मैं खाली बैंनी" (मेरी प्यारी बहिन) कहते हुए अपने-अपने सुख-दुख लगी रहती। घर भीतर चूल्हे का गाढ़ा धुवां भरा रहता।
सुबह से ही झर-फर शुरू हो जाती। रश्यार (रसोइए) मकान की अगल-बगल में कहीं पर छप्पर के नीचे बड़े-बड़े पत्थर रख कर रसोई बना लेते। एक कमरे म सामल-पानी का भंडार बना दिया जाता। रश्यारा को वहीं से आटा, चावल, दाल, सब्जियां, घी, तेल, दूध, दही, चीनी, गुड़, मसाले छुहारे और किशमि्श वगैरह दिए जाते। बहू, बेटियां तांबे के फ्वांला (कलश), तौली और टीन के कंटरों में पानी भर देती। खा-पी कर बर्यात के जाने की तैयारी शुरू की जाती।
उधर ईजा, चाचियां, भाभियां और बहिन हल्दी-तेल का उबटन लगा कर ब्यौल (वर) को नहलाती। नहा-धोकर वह नए कपड़े पहनता। सफेद कुर्त्ता, पैजामा, टोपी। ऊपर से ब्यौले का झगुला पहनाया जाता। दोना कंधा और छाती पर से पीछे तक कस कर पट्टा बांधा जाता। कमर में कमरबंद और उसम खुकरी या तलवार। सिल पर चावल पीस कर सफेद और पिठियां घोल कर लाल घोल बनाया जाता था। फिर मुंह पर लिखाई की जाती। कपाल से गाला तक सफेद और लाल बिंदियां बनाई जाती थद्ध। माथे पर मुकुट बांधा जाता था। ब्यौल को रंगीन छाता ओढ़ाया जाता। इस सयानी फगारियां शकुन आंखर गा्तीं और हेलारियां उनके सुर में सुर मिला कर हेल देती रहती---
बट्यावाह्णह्णह्ण बट्यावाह्णह्णह्ण रामीचंदरह्णह्णह्ण
शकुना द्यालो, रामीचंदरह्णह्णह्ण
पैंलि शकुनो ध्यों-गूड़े को
फिरी दै-दूदै को---
पंचैनामा देबौ दैना ह्वै जायाह्णह्णह्ण
गोरखनाथ देबौ सुफल ह्वै जायाह्णह्णह्ण
तुमारा ऐ बेर ह्णह्ण हमरो काज
सुफल है जालो ह्णह्णह्ण
बट्यावाह्णह्णह्ण बट्यावाह्णह्णह्ण रामीचंदरह्णह्णह्ण
मां-बहिन आरती उतारती और अक्षत परखती। ईजा कहती, "द ज च्यला, भली-भलि सूनि (सुंदर) ब्यौलि लाए। भलि कै गए। द हिट ईजा---'' शकुन के लिए लोटे-गिलासा ्में पानी भर कर कलेश रखे जाते। कन्याएं पानी भरे कल्श लेकर खड़ी हो जा्ती। 
और, फिर बाजे गाजे के साथ बर्यात चल पड़ती।।।
क्यान्---कि---क्यान्---क्यान्---क्यान्,
घि---घ्यान्---घ्यान्---घ्यान्।
जाने से पहले तूरी अपनी तेज आवाज में दो-चार बार 'धूह्णह्णतू---तू---तू---तूह्णह्णह्ण---धुह्णह्णतूह्णह्णह्ण की धाद लगती और शंख लंबी 'पूह्णह्णह्णह!" कह कर चलने के लिए कहता। तब तक मशकबीन भी "आं---आंह्णह्णह्ण" करके चलने की तैयारी करती। 
हम बच्चों को मशकबीन बड़ी मजेदार लगती थी। बर्यात चलने से पहले मशकबीन बजाने वाला उसकी पिपिरियां साफ करता। धागे से बंधी पतली पत्ती जैसी पिपिरी को जीभ पर गीला करके उसम फूंक मारता था। फिर बाएं हाथ के नीचे मशकबीन का थैला दबा कर उसकी काले डंडे जैसी नलियां कंधे और बांह के सहारे पीछे की ओर टिका लेता। हम अंदाज लगा कर एक-दूसरे के कान में कहते थे, "पता है-मशकबीन का थैला बकरी की खाल से बनता है बल?'' हम तो वह बगल में दबाई हुई बकरी जैसा ही लगता था। मशकबीन वाला पतली नली मुंह में दबा कर, गाल फुला-फुला कर हवा भरता। खूब हवा भरने पर थैला तन कर मोटा हो जाता और डंडे जैसी नलियां भी आंह्णह्णह्ण आंह्णह्णह्ण करने लगती। तब वह बीन को हाथा म बंयी की तरह पकड़ता। उसके आगे बड़ा गोल सामा जैसा लगा रहता था। गाला से हवा फूंकता, बाएं बाजू से मयकबीन के थैले को दबाता और बीन को बंशी की तरह बजाने लगता---
आं ह्णह्णह्णआंह्णह्णह्ण आं ह्णह्णह्ण
पि पी पी पी ह्णह्णह्ण
पी ह्णह्णह्णपी ह्णह्णह्ण
बर्यात में आदमी आगे-पीछे निशान (झंडा) भी लेकर चलते थे। ऊंचे डंडे पर कपड़े का लंबा तिकोना निशान बंधा रहता था। आगे-आगे हवा में फहराता लाल और बर्यात के पीछे सफेद निशान। "क्यान् कि क्यान्---क्यान्---क्यान्, घि---घ्यान्---घ्यान्---घ्यान्" की आवाज पर छ्वलैतिए अपनी ढाल-तलवार हवा में लहरा कर फिरकी की तरह घूमते हुए चलते रहते। मकानों के आसपास आकर बर्यात रुकती। वहां बाजे की लय-ताल बदल जाती:
ट्यांक्ड़---टिक्ड़---ड्यांग्ड़---ड्यांग्ड
ट्यांक्ड़---टिक्ड़---ड्यांग्ड़---ड्यांग्ड
डिंग्डि---डिंग्ड़ि---टिक्ड़---टिक्ड़
टिक्ड़---टिक्ड़---डिंग्डि---डिंग्ड़ि---

नगाड़ा के बाजे पर छ्वलैतिए जोरदार नाच दिखाते। दो रुपए, पांच रुपए का नोट डाल देने पर तो उसे उठाने के लिए ऐसा नाच नाचते कि लोग देखते ही रह जाते। एक-दूसरे के हाठों में दबे नोट को छीनने के लिए भी जोरदार करतब दिखाते। छ्वलैतिए सफेद चोला, काला पट्टा और कमरबंद, काली भोटी, सफेद पगड़ी और चूड़ीदार पहने रहते थे।
घर के सभी लोग बर्यात को दूर किसी मोड़ पर ओझल होने तक टकटकी लगा कर देखते रहते। उसके बाद भी उस ओर कान लगाए रहते। ढोल, नंगारे, तूरी और यंख की आवाज काफी देर तक सुनाई देती रहती थी।
आदमिया के बर्यात में चले जाने के कारण घर में औरत और बच्चे ही रह जाते। बस, घर के दो-एक आदमी खाना पकाने और पहरा देने के लिए रोक दिए जाते थे। वह रत्याली की रात होती थी। औरता और छोटे बच्चा की रात। उस दिन वे खूब गातीं, भ्वैनी लगातीं। हंसी-ठिठोली करतीं। कोई औरत आदमी का भेष बना कर उनकी नकल उतारती। इसी तरह आंखों में रात बिता देतीं। अगले दिन सुबह से ही वे बर्यात की बाट जोहने लगतीं।
उधर, बर्यात बाजे-गाजे के साथ ब्योली के घर पहुंचती। घर के बाहर धूलिअर्ग की पूजा पूरा करके ब्योला और बर्याती घर म जाते। चाय-पानी के बाद गांव के रश्यारे खाने में पूरी, लगड़, हलुवा, साग, खटाई, रायता परोसते। खट्टी और मीठी दोना तरह की खटाई बनाने का रिवाज था। मीठी खटाई में छुहारे और किशमि्श भी होते थे। रात को लगन के समय विवाह कर दिया जाता। ब्योला-ब्योली को जीवन भर साथ निभाने का संकल्प कराया जाता था। उन्ह बाहर लाकर ज्वेशिज्यू सप्तऋव् की पूंछ में वसिष्ठ और अरुंधती तारे देखने को कहते थे। फिर बोलते, ""कहो, हम भी ऋषि वसिष्ठ और अरुंधती की तरह सदा साथ रहगे।''
बर्यात विदा करने से पहले सुबह या दिन में बर्यातियों को फिर जम कर खाना खिलाया जाता था-वही पूरी, लगड़, दाल, चावल, खटाई, छुहारे और गुड़ की मीठी खटाई, खूब राई पड़ा हुआ चरपिरा रायता और तली हुई लाल मिर्च! खा-पी कर, ब्योली को लेकर बर्यात वापस लौटती। ब्योली के जाते समय फगारियां फिर यकुनांखर गातीं:
---"बट्यावा---बट्यावा---शकुना द्यालो"---
और, मां-बहिन शक-शक् डाड़ मारते हुए बेटी को विदा करते बखत अपना आशीर्वाद दे रही होती थीं---द ईजा ज, भली कै जाए---(शक-शक्-शक्)। मेरि पोथी---सैनिक (औरत) जनम पायाक भै। जाना ही हुआ चेली। (शक्-शक्)
मैंने तुझे नौ महीने पेट में रखा, कारवी (गोद) में पाला पोथी---आज तू मुझे छोड़ कर जा रही है---(ओ ईजा! शक्-्शक्)---मैं कैसे रहूंगी? तुझे कोई कष्ट नहीं होने दिया मैंने---
(दूसरी औरत) क्या रुलाती है उसे? सभी को जाना हुआ एक दिन। हम नहीं आईं क्या मतिं (मायका) से? मन को समझा। अपने सौरास ही तो जा रही है बेटी---चल ईजू, चल। जल्दी फिर आएगी यहां मिलने। ठीक है?
(कोई और औरत) होई, किलै न? अपनी मयाड़ी (मां), अपने बाज्यू, ददा-भाई-बहना को जो क्या भूल जाएगी?---द, हिट चेली---आपन सौरास हन हिट--- शक्-्शक्
(तभी डाड़ मार कर बहिन) म क जन (मत) भुल्ये दिदी। आपनि बनि क जन भुल्यै!
पीछे से फगारियों के शकुनांखर---
बट्यावा---बट्यावा---
शकुना सुफल है जाओ, पंचनाम देबो
सुफल है जाओ, इष्टे भगबानो 
उस समय तो देख कर कठोर से कठोर कलेजे वाला के भी आंसू निकल आते थे।
बर्यात लौट आने पर ब्योली-ब्योला की आरती उतार कर, अक्षत परख करके उन्ह घर के भीतर ले जाते थे। ब्योली नई जगह और नए घर में अनजान लोगों के बीच सिकुड़ी-सिमटी बैठी रहती। नाक की टूकी से ऊपर पूरे कपाल तक पिठियां और अक्षत लगे रहते। औरत ओढ़नी उठा-उठा कर मुंह देखतीं और कहतीं, "ईजा, कतुक सूनि छ ब्योलि। अस्यानी छ। ईजु, नक जन मानेयां। हमरि ले चेली भई तू। तेरि सासु छों मैं।''
ब्योली को घर दिखाते। पानी की सीर (स्रोत) दिखाते। हम भी अपनी नई भौजी-ब्योलिया को धारे और डिग्गी पर ले जाते थे। वे देख लेती थीं कि पानी कितनी दूर से और किस धारे, नौले या डिग्गी से लाना है। ब्योल-ब्योली के चमकीले मुकुट हम पानी के शिराण में  रख देते थे। धीरे-धीरे भौजी अपनी नई घर-कुड़ि और गड़ि-भिड़ि देख कर पहचानने लगती थी। घर के लोगों और अपने गोरु-भैसा को भी पहचान लेती थी। गाय-भसिं भी उसे पहचानने लगतीं।

ब्याह के बाद भौजिया का घर में आना जितना अच्छा लगता था, उतना ही बुरा लगता था दीदिया और बहिना का जाना। बहुत नियाय लगता था। दीदी आती तो हम सब बहुत खुश हो जाते थे। लेकिन, जिस दिन मेरी सीता दीदी जाने वाली होती थी, उससे पहली रात को ईजा और दीदी तो सोती ही नहीं थीं। रात भर सुख-दुख लगी रहतीं। बीच-बीच में शक्-्शक् करके रो पड़्ते। मुंह अंधेरे ही ईजा, पूरी, हलुवा, कोश्योल (मीठा भुना चावल) और बड़े बना कर छापरी (टोकरी) में संभाल कर रख देती। धोती या ओढ़नी लपेट कर उसे चारा ओर से कस देती। रास्ते में खाने के लिए अलग से बांध देती। हमारा गला गगलसा उठता। दीदी के आंसू बहते रहते।
"द हिट ईजा, तू चेलि भई। सौरास जान्वे भै। मैं खाली इजू, हिट---'' दीदी की आंखा के भुमके (सोते) फूट पड़ते। चड़ी डाड़ मार देती। बाज्यू, ददा, को ढोक देकर पैंलाग कहती। मेरे गालों पर, माथे पर भुकी (चुंबन) ले-लेकर छाती से चिपटाती। और, फिर हम दीदी को दूर धार तक छोड़ने चल पड़ते। कभी भिना (जीजा) आए होते तो उनके साथ जाती या फिर किसी और चेलि-बेटी की संगीत (साथ) होती। दूर तक साथ जाकर ईजा छापरी उसे सौंपती। वह गले से लिपट-लिपट कर रोती। हमारे मुंह से भी बोल नहीं फूटते थे। कुछ कहने की कोशिश ्में गगलसाए हुए गले से रुलाई फूट पड़ती।
आखिर, जाना ही पड़ता था। दीदी सौरास को चल पड़ती। पांच-दस कदम चलती। फिर पलट कर हमारी ओर देखती। हर मोड़ से मुड़ कर देखती। फिर किसी धार से ओझल हो जाती। ईजा अब रो रही होती थी, ""चेलिकि जुहुनि में पैद भैछ, ईजा, जान्वे भै।'' फिर भारी कदमा से मुझे लेकर घर लौट आती। उदास होकर कहती थी, ""चेलि-बेटि चाड़ां जसि ह्व छ च्यला। आज हमारि कुड़ि में भैरी, भ्वल उड़ि बेरि दुसरि कुड़ि में न्हें जानीं।'' यानी, बेटियां तो चिड़िया की तरह होती हैं  बेटा। आज हमारे मकान में बैठी हैं, कल उड़ कर दूसरे के मकान में चली जाती हैं।  
"तू ले चड़ींकि परि उड़ि बेर ऐछी ईजा?''
"होई। यां आछा, ये कुड़ि में। फिरि तू भछै, तेरि दिदि-दाद् भईं।''
चेलि-बेटियां दूर-दूर के गांवा में ब्याही जाती थीं। वे त्यों-त्यारों या सुख-दुख में ही मायके आ पाती थीं। मेरी दीदी घने जंगलों, पहाड़ों के पार, हमारे गांव से करीब तीस-बत्तीस किलोमीटर दूर डांड़ा गांव में ब्याही गई थी। इसलिए दो-चार साल बाद ही आ पाती थी। हमारे और उसके गांव के पहाड़ा के बीच जंगला म श्यूं-बाघ् भी रहते थे। मैंत आने का इतना उत्साह होता था कि जंगल, जानवर, गाड़-गधेरे कुछ नहीं दिखाई देते थे। एक बार दीदी अपनी बेटी भगवती को लेकर उसी रास्ते से बिना संगीत के अकेली चली आई। रास्ते की उसकी बात सुन कर हम कांप गए---
दीदी ने बताया, "यहां घर के बारे में सोचते-सोचते लमालम चली आ रही थी। आगे से यही भगवती चल रही थी। दोना ओर कुरी की घनी झाड़ियां। उनके भीतर तो कुछ भी हो सकता था। ईजा, जमीन ्में जो देखूं तो श्यूं क तात् गोबर! भाप उठ रही थी। उसी समय निकला होगा। मैंने सोचा, आज हम मां-बेटी को खा जाता है। लेकिन, क्या करती? चलती रही---कुंडल गांव के आसपास पहुंची तो घनी झाड़िया के बीच खम्म से एक जोगी मिल गया। गेरुवा चोला, हाथ में कमंडल और लाठी। बोला-बेटी अकेले जा रहे हो। साथ में कोई नहीं है? मैंने हाथ जोड़ कर सिर हिलाया। कहा, मैत जा रही हूं बाबा। उन्हाने आर्शीवाद दिया। कहा-बेटी तू बड़ी हिम्मती है। ईश्वर तेरी मदद करेगा। तुझे कुछ नहीं होगा। डरना मत---आर्शीवाद देकर जोगी बाबा चले गए। हम मां-बेटी र की ओर चलते ही रहे।''
चेलि-बेटियां इसी तरह लंबे-लंबे रास्ते पार करके दूर अपने मैत या सौरास जाती ्थईं। दीदी कहती थी, उसे सदा अपना घर, ईजा-बाज्यू, ददा-भाई, मकान, पेड़-पौधे, गोरु-भैंसें सब याद आते रहते ह। घुघुती और कफुवा बोलते हैं तो मन घर पहुंच जाता है। कौवा बोलता है तो लगता है, मेरे मैत से कोई आने वाला है।
ब्याह से बहुत पहले या फिर ब्याह के एक दिन पहले जनेऊ या बर्तबंध (यज्ञोपवीत) किया जाता था। जिन लड़कों का बर्त हो जाता था, वे जनेऊ पहनते थे। सुबह-शाम कसौंड़ीं (लोटा) या गिलास में पानी लेकर आचमन करते। मंतर बुदबुदा कर संध्या-पूजा करते थे। वे तो शौच के लिए जाते समय कान में जनेऊ भी लपेट लेते थे। वे ब्या-काज के मौका पर, धोती पहनते और बड़ा के साथ पंगत म बैठ कर दाल-भात खा सकते थे। घर में भी वे सयाने लोगा के साथ रसोई में धोती पहन कर दाल-भात खाते। हम लगता था, अचानक वे हमसे सयाने हो गए हैं। हम पंगत में नहीं बैठने दिया जाता था। अलग बैठ कर खाना पड़ता था। उन दिना तो हम से उम्र में बहुत छोटे बच्चा का भी बर्त कर दिया जाता था।
एक बार जैंतुवा के साथ गजुवा के बर्त म गांव से 19-20 किलोेमीटर दूर गौन्यारो गया था। वहां खाना तैयार होने पर म "उठा, खान् तैयार छ" की आवाज आई। घर के सामने खेत में गए तो देखा धोती-जनेऊ पहने छोटे-छोटे बच्चा की लंबी लाइन लगी है। हम शरमाते-सकुचाते खड़े हो गए। हम देख कर कुछ लोग हंसने लगे, "है, तन क्व छ? कौन है ये? अभी तक बर्त नहीं हुआ है?'' औरत और लड़कियां भी मुंह दबा कर हंसने लगीं। हम चुपचाप फिर भीतर कमरे में चले गए। हम थाली में दाल-चावल डाल कर वहीं दे दिया गया।
जिस बच्चे का बर्त होता था, उसे देखने में बहुत आनंद आता था। उसके बालों में सिर पर चार तरफ जुटिका बांधी जाती थी। फगारियां मंगल गीत गातीं और धीरे-धीरे उस्तरे से बाल उतारे जाते। बीच में मोटी-सी चुली (चुटिया) छोड़ दी जाती। बर्त्यिया बच्चे के आंग में हल्दी-तेल का उबटन लगा कर मां-बहिन नहलाती थीं। फिर उसे धोती पहनाई जाती। कंधे पर जनेऊ पहनाया जाता। हाथ की अंगुलिया पर लपेट कर आचमन करने, संध्या पूजा करने और जल चढ़ाने की विधि बताई जाती। उसके कंधे पर धोती का फेट बनाया जाता। हाथ में लाठी दे दी जाती। ज्वैशिज्यू कहते, "बटुक, अब तुम काशी पढ़ने जा रहे हो। माताओं से भिक्षा मांग लाओ।'' सामने माताएं चावल लेकर खड़ी रहतीं। ज्वैशिज्यू बटुक से कहते, ""मेरे साथ कहो-भो गुरो, इदम भिक्षाम, मया लब्ध---माई भिक्षा दे। मैं हनले दे, म्यार गुरु हन ले दे---'' मेरे लिए भी दो, मेरे गुरु के लिए भी दो! मां-बहिन धोती के फेट में भिक्षा डाल कर आशीष दे्तीं, "खूब पढ़ि बेर आए।'' 
फिर वह काशी पढ़ने के लिए निकल जाता। हम उसके पीछे-पीछे दौड़ते। दरवाजे से बाहर जरा-सा चर लगा कर वह फिर भीतर लौट आता। सब लोग खुश हो जाते। मां कहती, ""ऐ गौ म्यर पोथि, का्शि पढ़ि बेर ऐगो।'' फिर बाकी काम संपन्न होता। उतरे हुए बाल दाड़िम के बोट की जड़ में डाल दिए जाते। बच्चा कई दिन तक जनेऊ हाथ पर लपेटने और संध्या-पूजा करने का अभ्यास करता रहता। फिर धीरे-धीरे घर भीतर या खेतों के काम में उलझे रहने के कारण कभी ध्यान रहता, कभी नहीं भी रहता था। हां, गांव के बड़े बुजुर्गों को हम जब भी रात्ते-ब्यान (सुबह) कान में जनेऊ लपेटे देखते तो जरूर समझ जाते, वे झाड़-पिशाब जा रहे हैं। उसके बाद वे हल-बैल या आंसी-कुटला लेकर खेति-पाति के काम के लिए निकल जाते। खेति-पाति भी कोई आज की जैसी जो क्या हुई?
सुन रहे हैं?
"अँ'' 
     

No comments: