Saturday, February 7, 2026

राजेश सकलानी की कविताएं

 (बहुत समय से हम  यहाँ नियमित उपस्थिति  दर्ज़  नहीं  कर पा रहे थे। अब उम्मीद यह सिलसिला नियमित होने की राह पकड़ रहा है। आज प्र्स्तुत हैं  हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि राजेश सकलानी की कुछ ताजा कविताएं ) 

 

 


 कपास से बनी नरम रातें.

 

हमारे लिए नहीं है कपास से बनी हुई नरम रातें

उन पर हमारा कोई बस नहीं है ,

 हमारे शत्रु रोज़ उन्हे अपनी ओर खींच लेते हैं

बेईमानी से,

 उनकी कई तहें बना कर

अपने काबू में कर लेते हैं

अश्लील शान्ति के साथ  मुस्कराते हैं ,

और अश्लील स्वप्न देखते हैं

 

 

  अपनी शर्मिन्दगी को छुटा  कर

 हम औरतें और आदमी अपने बच्चों से आंखें मिलाना चाहते हैं इन रेशमी रातों में ,

  जिनका निर्दोष स्पर्श  छत की तरह तन जाना चाहता  हैं,

 और कुटिल हवाओं से त्वचा की सुरक्षा करना चाहता  हैं,

 

सारी रात  अंधड़ की तरह बुरी आवाज़ें

 उन्मत्त होतीं हैं,

वे आज़ादी के ख़याल को तहस-नहस करना चाहतीं हैं,

और कच्ची दीवारों में बने सुराखों से घुस कर

हमारी नींदों को बिछौनों सहित उड़ा देतीं हैं,

 

इन्ही रातों के नीचे  तानाशाह अपनी फ़ौज़ों के साथ

रक्तपात के मंसूबे बनाते हैं ,

लूटे हुए माल असबाब को तहखानों में  छिपा कर  चांदी की चादरों से ढ़क देते हैं

 

हमारी हड्डियां बर्फ़बारी से

 मुक़ाबला करतीं थक जातीं हैं

पर  डटी रहतीं हैं,

हमारी मज्जा में हरक़त मचती है.

 

 

 

 हमारी नौली चांद पर है.

(गांव में पानी का स्रोत )

 

हमारी नौली चांद पर है

वह जितनी सुन्दर है

उतना ही दुख देती है

छेनी से काट काट कर

उसे सजाया मैने

झर झर  झर झर

उससे पानी गिरता है

चांदी की तरह

 

 

क्या मेरे बच्चे नौली तक जा सकते हैं 

क्या मेरी बीवी  ठंडे पानी से अपनी ऊंगलियां भिगो सकती है

क्या मेरे बंठे मे पानी गिरने का संगीत

बज सकता है,

सदियों से हमारी त्वचाएं चमकने का इंतजार कर रहीं हैं,

जिस्म  का तेल रेत की तरह भुरभुरा हो चुका हैं,

पसीने का नमक पपडियों की तरह

टूटता है,

 

 

तुम्हारे गाँव का नाम हमने त्याग दिया है  ,

पक्षी की तरह आत्मा एक पहाड़ से दूसरे तक हवा में पंख फड़फड़ाती है,

मुझे मेरे पानी की धार  लौटा दो

बीती सदियों की रोशनी समेत,

मेरे बच्चों के सारे के सारे गीत

छलक कर बहने दो,

उनकी आंखों की चमक वापस आने को

व्यग्र है,

 

तोड़ो तोड़ो इस नौली को तोड़ो

बादल फटे इस इस गांव पर ,

शापित है इसकी मिट्टी

और धूप यहां जो पड़ती है,

बहा ले जाए बारिश

यहां के ढ़ुगों को ,

रीख खा जाए उस भाषा को

जिसमें हमारे पुरखों की चीखें

चीड़ के लीसे की तरह चिपकी हैं।

 

 

 

साइकिल स्टैंड.

 

साइकिल स्टैंड पर बातूनी लड़के ने

टोकन की पर्ची पकड़ाई और

दस रुपया वसूल किया

उसने मुझे अंकल कहा,

लगा कि यह मेरी पुरानी आवाज़ है।

ये अपनी मुश्किलों को बेहतर तरीके से संभालता है और

इत्मीनान के साथ नीति और ब्यवहार की बातें बयान करता है

सयानों की तरह,

अभी उसकी मसें ठीक से भीगी भी नहीं हैं

  

भरे बाजार के इस अहाते में मैं लड़खड़ाया

और सिलसिलेवार खड़ी साइकिलें क्रम से गिरतीं चली गईं

मेरी कल्पना के पर्दे पर यह मंजर फिर दुबारा गुज़रा

मोन्ताज की तरह

पृष्ठ ध्वनि के साथ,

दो तीन दोस्त हरक़त में आए तत्काल

दिल्लगी करते हुए, साइकिलों को सीधे खड़े कर गए

 

वो लड़का अब सयाना होगा,

एक तंग कमरे में घर-बार संभाला होगा

बची होगी उसकी सलाहियत

बेवक्त सफ़ेद होंगी उसकी जुल्फ़ें

बुरे सुलूक ने उसकी जवान उम्र को बर्बाद किया होगा

उसकी जुबान में कुछ गालियां जरुर होंगी

 

 

कोई उसके लफ़्ज़ों के मायने न बदले

कोई उसके ऐतराज को न छिपाए

कोई उसके कद पर रोक न लगाए

कोई यह न पूछे कि तुम कौन हो

और तुम्हारी ज़मीन कहां है।

 

 

तपे हुए बरते हुए.

 

 

तपे हुए और बरते हुए सभी शब्द

अपनी तरफ़ हैं

कठिन दिनों से इनमें उम्मीद भरी क॔पन है,

निराशा के दौर में ये हौसला देते  हैं

और आत्मसम्मान को सही जगह बिठा देते हैं

 

हम किसानों ,बढ़इयों ,लुहारों,ठठेरों,

धुनारों,कारीगरों और मजूरों ने इन्हे

लहजा दिया

और फेरी वालों ने अपनी आवाज़ में

इन्हे चमकाया है.

 

हम इन्हे  बरबाद नहीं होने  देंगें

और फासीवादियों की जुबान से वापिस ले आएंगे

भद्दे बलाघातों और इशारों को रोक दिया जाएगा

 

इनके मायने खुद-ब-खुद  बहाल होते  जाएगें ।

 

 

 

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