Sunday, January 10, 2010

तू दिखयांदी जनि जुन्याली

उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के संघर्ष में सांस्कृतिक कर्मियों की भूमिका और भागीदारी को सुनिश्चित करने की जो कोशिशें दृष्टि देहरादून ने की उनके फलस्वरूप ही उत्तराखण्ड सांस्कृतिक मोर्चे के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी थी लेकिन जिन कारणों से वह पहल अपने शुरूआती दौर में ही बिखरने लगी थी, उस पर कभी विस्तार से चर्चा करने का मन है। अभी प्रस्तुत है भाई सुनील कैंथोला का विश्लेषण जिसमें राज्य निर्माण के बाद देहरादून में मेले ठेलों की संस्कृति के रूप में फैलते गए प्रदूषण को पकड़ने की कोशिश की गई है। 
सुनील समाजिक सांस्कृतिक उद्यमी हैं, वर्तमान में Mountain Sheperds से जुड़े हैं।






सुनील कैंथोला

टोपियों के थोक विक्रेता

‘‘पहाड़ी आदमी को दो चीज की रक्षा करनी चाहिए - अपनी टोपी और अपने नाम की। टोपी की रक्षा वही कर सकेगा जिसके पास टोपी के नीचे सिर है और नाम की रक्षा वह, जिसके दिल में आग है।’’ ऐसा मेरा दागिस्तानके लेखक रसूल हमजातोब कहते हैं। चूंकि इस लेख में टोपियों के कारोबार पर टिप्पणी करने का प्रयास किया  गया है। अतः रसूल का जिक्र करना मैने उचित समझा। जहां तक इसे लिखने की प्रेरणा है तो राजभवनों की एय्याशियों से सम्बन्धित ताजा सुर्खियां इसका मुख्य कारण है। दिलचस्प बात यह है कि इन खबरों में नया कुछ भी नहीं। ऐसा तो इस लोकतंत्र में आजादी के बाद से ही चल रहा है। वो जब यहां राज करते थे तो उनकी पसंद के चर्चे हर एक की जुबां पर थे। वो जब लखनऊ में थे या फिर दिल्ली में, तब भी उन्होंने ऐसी ही लीलाएं रचाई होंगी। राज भवनों के बाहर संतरी बन्दूकें लेकर खड़े रहे होंगे,
दरअसल उत्तराखण्ड निर्माण के उपरांत प्रदेश में एक विशेष कल्चरल ब्यूरोकेसी का जन्म हुआ, जिसके प्रथम सचिव संस्कृतिकर्म को टेंडर और परियोजना प्रस्तावों के अंतर्गत स्थापित करना चाहते थे। उनके ही सदप्रयासों से तम्बू लगाने वालों और वैरायटी शो दिखाने वालों का धन्धा चमकने लगा। सचिव का प्रसाद उन्हीं को मिलता था, जो सहलाना जानते थे। चूंकि चारण/भाटों की जमात इस कार्य में सिद्ध थी अतः उन्हे भी प्रसाद मिला और कालांतर में प्रसाद वितरण की ऐजेंसियां भी मिल गई। प्रदेश में यत्र/तत्र मेले ही मेले लगने लगे। मूल मुद्दे हवा हो गए और बांदों  गीत (बांकी गोरी के रुप और उनकी मोहक अदा से भरे) पूरे पहाड़ में गूंजने लगे।
और इसी तरह देश की आजादी के 6 दशक गुजर गए। इस घटना को मैं इसी परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश कर रहा हूं। आजादी के बाद इस प्रजाति के नेतृत्व ने भी देश चलाया और इसे कहां ले गए, इस बारे में विचार तो किया ही जाना चाहिए। यदि ये उत्तर प्रदेश को ढंग से चलाते तो भला हमें पृथक पर्वतीय प्रदेश के लिए क्यों संघर्ष करना पड़ता। इससे पहले कि ये छोटा सा पर्वतीय राज्य अपने छोटे-छोटे सपने पूरे करने की दिशा में बढ़ता, इन्हें हमारे ऊपर थोप दिया गया और जैसे कि होना ही था देखते ही देखते हमारे बुग्यालों के फूलों को राज महलों तक पहुंचाने का तंत्र खड़ा हो गया। यहां मैं पुनः अपनी बात को दोहराना चाहूंगा कि यह कोई बड़ी बात नहीं थी। जिसने जिन्दगी भर यही किया हो और जो सिर्फ इसी चीज में पारंगत हो, वह उम्र के इस दौर में भला आपके हिसाब से काम कैसे करेगा? बहरहाल! इस पृष्ठभूमि के साथ, इन्हें फिलहाल यहीं छोड़ते हैं और लेख के मुख्य शीर्षक पर आते हैं।
मेरी तरह शायद कुछ और लोग भी मानते होंगे कि मात्र राज आश्रय पर चलने वाले संस्कृतकर्म की अंतिम परिणिति चारण और भाटों के रूप में ही होती है। चारण/भाटों की मूल प्रतिबद्धता राजतंत्र से होती है और संस्कृतिकर्मियों की अपनी जड़ों  से। जब तक सत्ता के केन्द्र, महलों के रूप में संचालित होंगे तब तक चारणों की रोजी-रोटी चलेती रहेगी या इसे यूं भी कह सकते हैं कि तब तक जनपक्षीय राजनीति और संस्कृतिकर्मी इन महलों को ध्वस्त करने में जुटे रहेंगे। इस जटिल समाज/नृवंशास्त्रीय गणित में संस्कृतिकर्मियों और चारण/भाटों का परस्पर आंकड़ा हमेशा 36 का ही रहेगा। यहां एक बात और है कि चारण/भाटों का चोला हमेशा संस्कृतिकर्मियों का ही होता है और इनकी असली पहचान के अवसर यदा-कदा ही आते हैं। ऐसा ही एक दुर्लभ अवसर उत्तराखण्डी कवि और गायक नरेन्द्र सिंह नेगी के नौछमी गीत के प्रचारित होने के उपरांत आया था। तब टोपियों के थोक विक्रेता अपना आपा खो बैठे थे।
दरअसल उत्तराखण्ड निर्माण के उपरांत प्रदेश में एक विशेष कल्चरल ब्यूरोकेसी का जन्म हुआ, जिसके प्रथम सचिव संस्कृतिकर्म को टेंडर और परियोजना प्रस्तावों के अंतर्गत स्थापित करना चाहते थे। उनके ही सदप्रयासों से तम्बू लगाने वालों और वैरायटी शो दिखाने वालों का धन्धा चमकने लगा। सचिव का प्रसाद उन्हीं को मिलता था, जो सहलाना जानते थे। चूंकि चारण/भाटों की जमात इस कार्य में सिद्ध थी अतः उन्हे भी प्रसाद मिला और कालांतर में प्रसाद वितरण की ऐजेंसियां भी मिल गई। प्रदेश में यत्र/तत्र मेले ही मेले लगने लगे। मूल मुद्दे हवा हो गए और बांदों (बांकी गोरी के मोहक अदा से भरे) गीत पूरे पहाड़ में गूंजने लगे।
ऐसा माहौल बना कि जैसे सब पा लिया गया है। यह चारणों के प्रमोशन का काल था। कलम हो या जुबां, सब पर सत्ता के प्रसाद का अंकुश था। ऐसे में सत्ता के गलियारों में चरम आनन्द के सुमन पनपे और सरकार के साहित्य एवं कला मंचों में जाकर खिले। यह लम्बी फेरहिस्त है। जब यह सब हो रहा था, तब टोपियों के विक्रेता अपनी प्रसाद एजेंसी के विस्तार के गठजोड़ में लीन थे। पिछले दस बरसों में यहां अजब तमाशे हुए। कोई साहित्यकार नेता जी को प्रदेश का पिता बनाने पर तुला है तो कोई खिचड़ी खाऊ ठेकेदार बिरादरी का झंडाबरदार है। कहीं बायोग्राफी लिखी जा रही है तो कोई इनके जीवन पर वृत्तचित्र बना रहा है। कुटिल केन्द्रीय राजनीति का अहसास तो उत्तराखंड को अपने जन्म के समय से ही हो गया था। जब उसके नामकरण से लेकर राजधानी तक के निर्णयों से उसे अलग रखा गया। जब देहरादून के परेड ग्राउण्ड में 9 नवम्बर 2000 को उसके वैधानिक जन्म की पार्टी में शामिल होने के अगले ही दिन उ.प्र.के मुख्यमंत्री ने मुजफ्फरनगर काण्ड के दोषियों में से एक अनन्त कुमार सिंह पर मुकदमा चलाने की अनुमति देने से मना कर दिया। तब धर्म से बड़ी जात हो गई थी।
ऐसे समय में, ऐसा नहीं कि भाई लोग जानते न थे। सभी, सब कुछ जानते समझते थे। पर मंचों का मोह, महलों से घनिष्ठता का नशा और विशेषकर प्रसाद वितरण व टोपी पहनाने के विशेषाधिकार ने उन्हें न नर, न नारी की श्रेणी में खड़ा कर दिया और जिसके लिए यह पदवी गढ़ी गई थी, वह अपनी कथित जनसेवा में आकण्ठ डूबा रहा। उसने इस हेतु विशेष ओ.एस.डी. भी नियुक्त कर डाले। जब नरेन्द्र सिंह नेगी के गीत ने इस आधुनिक मुहम्मद शाह रंगीले की सतत् मधु चंद्रिका का पर्दाफाश किया तो गजब हो गया। कानूनी और गैर कानूनी शब्द जनता के लिए गढ़े गए हैं, सत्ता उनसे ऊपर है। वह सेंसर बोर्ड से लेकर मसूरी जैसे छोटे शहर तक अपनी धौंस जमा सकती है। उसने ऐसा ही किया। इस अभियान में वे सब भी शामिल हो गए, जो नरेन्द्र सिंह नेगी के रचनात्मक युग के खात्मे का बरसों से इन्तजार कर रहे थे। उनके पास इसके लिए खिसियाहट भरे अपने तर्क थे। परन्तु इसके मूल में उस विराट मधुचन्द्रिका में खलल पड़ने का आक्रोश था, जो जन संघर्षो से उपजे इस राज्य के शीर्ष में मनाई जा रही थी।
नौछमी नारायण का एक दूसरा पहलू भी है कि आखिर एक गीत में इतनी ताकत कि भोगतंत्र चरमरा उठे और यह भी कि यदि आरंभ से ही ऐसे गीतों की परंपरा होती तो संभवतः आज राज्य की दशा और दिशा कुछ और ही होती। इसी से जुड़ा एक और सवाल कि उत्तराखण्ड आन्दोलन में संस्कृतिकर्मियों की सशक्त भूमिका के उपरांत भी ऐसा क्यों न हो पाया? राज्य स्थापना के उपरांत इस सन्दर्भ में संस्कृतिकर्मियों के बीच यह चर्चा भी हुई थी कि अब राज्य के लाभार्थी बनें या इसके दिशासूचक का जिम्मा लें। जो लाभार्थी बनना चाहते थे, उनमे एका रहा और बाकी गैर रचनात्मक बहसों का शिकार हो गए। यहीं से टोपियों का धन्धा चल निकला। ये सब भी अपने ही लोग हैं, कोई पराये नहीं। सच कहूं तो ये बेईमान भी नहीं। सत्ता का मायाजाल अच्छों-अच्छों को सम्मोहित कर देता है, ये उसी का शिकार हुए। परन्तु इतिहास बड़ा ही निरपेक्ष और निर्मम है। इतिहास के गर्भ में यह सवाल इनके लिए सदैव जीवित रहेगा कि जब एक गीत इस लोकतंत्र के छद्म आवरण को गिरा रहा था, तब आपके टोपी-टोपी के खेल और प्रेमचंद के शतंरज के खिलाड़ियों में कितनी समानता/भिन्नता थी। मुझे लगता है यहां पाश की निम्न पंक्तियों को रखना कोई अभद्रता न होगी
‘‘सबसे खतरनाक वो दिशा होती है
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए’’
अब पाश़ के बाद और कहने को यूं बचा ही क्या है, पर अभी हाल ही में केन्द्रीय गृह मंत्री द्वारा भारत में माओवाद को नेस्तनाबूद करने के लिए साठ हजार सैनिक/अर्धसैनिक बलों की तैनाती सम्बन्धी बयानों से मुझे झुरझुरी आने लगती है। कहीं ऐसा भी पढ़ा था कि आंध्र प्रदेश के राजभवन की रंगरेलियों का भांडा तब फूटा, जब माल सप्लाई के एवज में खनन का पट्टा दिए जाने का वादा रंगीले नवाब पूरा न कर पाये। क्या ये खनन पट्टे उन्ही  क्षेत्रों में आवंटित होने थे जहां माओवादियों को नेस्तनाबूद करने की मुहिम शुरू की जा रही है? न जाने कितने रंगीलों ने, कितने सप्लाईयरों को, न जाने किस की कीमत पर, जाने क्या-क्या देने का वादा कर रखा हो! नारायण-नरायण!!





Friday, January 8, 2010

पुरस्कार का एक अर्थ होता है प्रतिफल

"समांतर कोश में पुरस्कार के तमाम अर्थों में से एक है- प्रतिफल। अब यह प्रतिफल किसका?"
साहित्य और पुरस्कार के सवाल पर अशोक कुमार पाण्डे की यह टिप्पणी हिन्दी साहित्य की दुनिया की उन हलचलों को पकड़ते हुए जो वर्ष 2009 को आंदोलित करती रहीं, कुछ जरूरी सवाल छेड़ रही है। अशोक के परिचय के तौर पर इतना ही कि कविता, कहानी के साथ-साथ आलोचना लिखते हैं। हिन्दी का ब्लाग जगत उन्हें न सिर्फ एक जिम्मेदार टिप्पणीकार के रूप में जानता है बल्कि एक सजग और मानवीय सरोकारों से जुडे सवालों भरी पोस्टों को अपने ब्लागों में पोस्ट अपडेट करने वाले ब्लागर के रूप में भी पाता है। 






साहित्य के विकास में पुरस्कारों की भूमिका

अशोक कुमार पाण्डेय


इस नवसाम्राज्यवादी समय में संस्ह्नति, साहित्य और कला भी सर्वग्रासी बाजार से मुक्त नहीं है। वैसे ऐसा भी नहीं है कि साहित्य में पुरस्कारों की अवधारणा कोई नयी चीज है। दरअसल हर क्षेत्र में हमेशा से ही दो धारायें मौजूद रही हैं- एक वह जो राज्यव्यवस्था से नाभिनालबद्ध हो अपना मूल्य उगाहती रहती है तो दूसरी वह जो समाज का जैविक हिस्सा बनकर इसके सार्थक बदलाव के लिये अपना योगदान देती है। सामंतकालीन युग में भी एक तरफ केशव और बिहारी जैसे राज्याश्रित कवि थे तो दूसरी तरफ कबीर जैसे विद्रोही जनकवि। लेकिन पहली धारा के लोग वर्तमान में महत्व भले पा जायें इतिहास में तो जनपक्षधर रचनाकार ही जीवित रहता है।
एक साहित्यकार का मूल्यांकन उन पुरस्कारों से नहीं होता जो उसे राज्यव्यवस्था या श्रेष्ठिवर्ग देता है , उसका मूल्यांकन समय और समाज में उसके हस्तक्षेप से निर्धारित होता है। सार्त्र ने नोबेल इसलिये ठुकरा दिया था कि वह इसे देने वालों की वर्गीय भूमिका के विरुद्ध सर्वहारा के पक्ष में खड़ा था। क्या इससे वह कमतर साहित्यकार साबित होता है? ब्रेख्त, नेरुदा, नाजिम हिकमत, प्रेमचंद, गोर्की, लोर्का, निराला, मुक्तिबोध, शील या नागार्जुन को हम उन्हें मिले पुरस्कारों से नहीं उनकी युगप्रवर्तक जनपक्षधर रचनाओं और तदनुरूप जीवन से जानते हैं।

आज जिस तरह वरिष्ठ से लेकर बिल्कुल युवा साहित्यकारों में पुरस्कारों के लिये आपाधापी मची है यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि राज्याश्रित कवियों की ही भांति आज भी साहित्यकारों का एक तबका बस पुरस्कारों और सम्मान के लिये ही लिख रहा है। जिन्हें बड़े पुरस्कार नहीं मिल पाते उन्हें पुरस्कार देने के लिये शहर-शहर में छोटी-बडी दुकानें खुली हैं। हालत यह है कि अब तो ऐसी संस्थायें भी उपलब्ध हैं जो इन पुरस्कारों के बदले लेखकों से धन भी वसूल रही हैं।
समांतर कोश में पुरस्कार के तमाम अर्थों में से एक है- प्रतिफल। अब यह प्रतिफल किसका? निश्चित तौर पर पुरस्कारप्रदाता के हित में किये गये किसी कार्य का। जब कोई साहित्यकार किसी संस्था से पुरस्ह्नत होगा तो निश्चित तौर पर प्रभावित भी। पुरस्कारों का एक पक्ष प्रोत्साहन भी निश्चित रूप से है। ब्राजील की महान लोकगायिका मारिओ सूसो को उनके स्कूल के दिनों में मिले एक पुरस्कार ने उनका जीवन बदलकर रख दिया। उससे मिली प्रेरणा ने उनको वह ताकत दी की अपने क्रांतिकारी गानों से उन्होंने पूरे लैटिन अमेरिका में एक नयी चेतना का प्रसार किया। कम से कम आजादी के तुरंत बाद साहित्य एकेडमी जैसी तमाम संस्थाओं के गठन के पीछे भी एक हद तक यही उद्देश्य था। आरंभिक दौर में उन्होंने सकारात्मक भूमिका भी निभाई। लेकिन तमाम सरकारें, पूंजीपतियों के धन से चलने वाली संस्थायें इत्यादि जो पुरस्कार साहित्यकारों को देती हैं उनका एकमात्र उद्देश्य प्रोत्साहन देना नहीं होता अपितु कहीं न कहीं वे साहित्य को नियंत्रित तथा अपने हित में अनूकूलित करना चाहती हैं और हमारे समय में इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। कांग्रेसी सरकारों के दौर में दिये गये पुरस्कार उसके हितों के अनुरूप थे तो भाजपा के शासनकाल में दक्षिणपंथ के एजेण्डे को ध्यान में रखकर पद एवं पुरस्कार निर्धारित किये गये जिसके लोभ में तमाम लोगों ने अपने पाले भी बदले। इस तरह इन पुरस्कारों ने साहित्य की दिशा भी बदली है। अभी हाल में जब विष्णु खरे ने सैमसंग जैसी कंपनी के साहित्य एकेडमी से हुए करार पर आपत्ति जताई तो एक युवा लेखक ने इस करार का स्वागत करते हुए साहित्य को बाजार से जोडने की हिमायत की। पुरस्कारों का ही प्रभाव है कि कविता और कहानी में बेहद वाचाल लेखक समाज के तमाम मुद्दों पर जमीन पर बिल्कुल खामोश नजर आता है। लेखन और जीवन के बीच की खाई निरंतर गहरी होती गयी है।


आज जिस तरह वरिष्ठ से लेकर बिल्कुल युवा साहित्यकारों में पुरस्कारों के लिये आपाधापी मची है यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि राज्याश्रित कवियों की ही भांति आज भी साहित्यकारों का एक तबका बस पुरस्कारों और सम्मान के लिये ही लिख रहा है। जिन्हें बड़े पुरस्कार नहीं मिल पाते उन्हें पुरस्कार देने के लिये शहर-शहर में छोटी-बडी दुकानें खुली हैं। हालत यह है कि अब तो ऐसी संस्थायें भी उपलब्ध हैं जो इन पुरस्कारों के बदले लेखकों से धन भी वसूल रही हैं। हमारे अपने शहर में भी ऐसे खरीदे पुरस्कारों सहित अपने फोटो अखबारों में छपाने वाले साहित्यकारों की कोई कमी नहीं है।

पुरस्कारों के अतिरेक और पाठकों के अभाव से स्थिति यह बनी है कि आज साहित्य चर्चा के केन्द्र से बाहर जा रहा है और पुरस्कार तथा सम्मान चर्चा के केन्द्र में है। इस आपाधापी में वैचारिक प्रतिबद्धता, सामाजिक सरोकार और लेखकीय आत्मसम्मान जैसी चीजें पीछे छूट गयी हैं। अभी एक समय सांप्रदायिकता के खिलाफ सशक्त कहानियां लिखने वाले कहानीकार उदयप्रकाश गोरखपुर की मिलिटेंट हिन्दू राजनीति के अगुआ आदित्यनाथ से पुरस्कार ले आये तो 1857 में अंग्रेजों का साथ देने वाले अयोध्या के एक पूर्व राजा के नाम पर स्थापित पुरस्कार को स्वीकार करने वालों में उनके साथ मंगलेश डबराल जैसे प्रतिष्ठित कवि भी हैं। पिछले दिनों विष्णु खरे ने भारतभूषण पुरस्कार पाये कवियों पर सवाल खडा तो किया पर खुद को बचाकर। लेकिन इस पर भी किसी सार्थक बहस की जगह बस पुरानी समिति के कुछेक लोगों को हटाकर और अधिक विवादित लोगों को शामिल कर लिया गया। कुल मिलाकर पुरस्कारों के जरिये स्थापित होने की भूख ने साहित्य के व्यापक आधारों को संकुचित कर जनमानस में इसके प्रभाव को अत्यंत सीमित कर दिया है। ऐसे में उम्मीद उन्हीं से है जो कर्म और रचना के द्वैत से मुक्त हो अपने समय की विसंगतियों से जूझते हुए बेहतर दुनिया के निर्माण की लडाई में जनता के पक्ष में खडे होकर अपना रचनाकर्म कर रहे हैं।

Wednesday, January 6, 2010

और बुक हो गये उसके घोड़े- 4

 पिछले से जारी

चूंकि पानी नहीं है, इसलिए एक मात्र साधन है आगे बढ़ो। जहां पानी मिले वहीं पर लगायेंगे टैन्ट। धूप तेज पड़ रही है। नीचे से गर्म होती कंकरीट और मिट्टी हंटर शू के भीतर हमारे पावों को जला रही है। उपर से ठंड़ी हवा बह रही है जो हमारे चेहरे को फाड़ चुकी है। होठों पर और नाक पर कटाव के लाल लाल निशान है---कभी कभी पतला खून भी बह रहा है। धूल पूरे चेहरे और पिट्ठु पर जमा होती जा रही है। लगभग दस घन्टे चलने के बाद एक लम्बी दूरी तय कर पानी का पहला नाला मिला लेकिन जगह उबड़ खाबड़ थी। सो वहां से आगे बढ़ गये। गद्दी थांच है इसका नाम, जहां हम रूक गये। यह भेड़ वालों का दिया नाम है । शरीर बुरी तरह से थक चुका है। पानी न मिलने से थकान और भी ज्यादा बढ़ गयी। शाम के सात बज रहे हैं। सूरज अब भी चमक रहा है। यहां के पहाड़ों पर सूरज की पहली किरण सुबह 5.20 के आस पास ही दिखायी देती है और शाम के लगभग 7.20 तक चमकती रहती है। उसके बाद इतनी तेजी से डूब जाता है सूरज कि पन्द्रह मिनट पहले चमकती धूप को देखकर यह अन्दाजा लगाना मुश्किल होता है कि मात्र आधे घंटे बाद ही अंधेरा घिरने लगेगा।
गद्दी थांच से आगे तो पहाड़ी मरूस्थल बर्फीली हवाओं को फैलाता रहता है। खम्बराब नदी का तट हमारा पड़ाव होगा। यूं गद्दी थांच से आगे खम्बराब दरिया तक कई सारे नाले हैं। मगर दो तीन नालों में ही पिघलती बर्फ बह रही थी। खम्बराब को देखकर डर लगता था, कैसे कर पाएंगे पार। फिरचे से आती एक नदी यहां खम्बराब से मिल रही है। इन दोंनों नदियों के मिलन स्थल से पानी का बहाव तो उछाल मारता दिख रहा है।
नाम्बगिल से अपने घोड़ों को खम्बराब में डाल दिया। पानी में लहर खाते घोड़े आगे बढ़ रहे हैं। आगे की ओर बढ़ते हुए घोड़े लगातार छोटे होते जा रहे हैं। दूसरे किनारे तक पहुंचते हुए गर्दन और पीठ पर लदा सामान भर ही दिखायी दे रहा था। घोड़ों की पीठ पर लदे सामान के किट भी आधा पानी से भीग गये। दरिया में बहते पानी को छुआ, वही चाकू की धार। बदन में सिहरन सी उटी। कैसे कर पायेंगें पार। क्या हाल होगा पांवों का इस ठंडे पानी में। मित्रों का कहना है हमें जूते नहीं उतारने चाहिए। पानी के ठंडे पन को पांवों के तलवे झेल नहीं पायेंगें ओर थोड़ी सी असावधानी भी किसी बड़ी दुर्घटना में बदल सकती है। घोड़ों को खम्बराब में डाल नाम्बगिल ने वाकई जोखिम उठाया था, अब नाम्बगिल पानी में उतर गया। बदन को संभालते हुए वह आगे बढ़ने लगा। दूसरा किनारा पकड़ते वक्त मात्र धड़ से उपर का हिस्सा ही दिख रहा था। इसका मतलब है उस किनारे पर गहराई और भी ज्यादा है । जूते पहने हुए ही हम पांचों साथी एक दूसरे के सहारे खम्बराब में उतर गये। थोड़ा आगे बढ़ने पर पांव मानो सुन्न हो रहे थे। पानी का बहाव इतना तेज था कि संभलने नहीं दे रहा था। संतुलन को बनाये रखते हुए एक दूसरे को हिम्मत बंधाते हम आगे बढ़े। दूसरी ओर खड़ा नाम्बगिल अपने हाथों को आगे बढ़ाये , किनारे पहुंचते हम लागों को सहारा देता रहा। दरिया पार करने पर सारे कपड़े भीग गये थे। पांव एक दम सुन्न हो गये थे। जूते उतारने में बेहद कठिनाई हुई। खैर, जैसे तैसे जूते उतार कर पांवों के तलवों को मसल कर गरमी देते रहे। ट्रैक सूट का लाअर भीग चुका था। धूप तेज थी और हवा भी चल रही थी । लगभग आधे घंटे के बाद लोअर के सूखने का आभास होने लगा। नदी पार कैम्प गाड़ दिया गया। दो नदियों के बीच यह छोटा सा कैम्पिंग ग्राउंड बर्फिली चोटियों के एकदम नजदीक है। कैम्पिंग ग्राउंड से पश्चिम दिशा की ओर दिखायी देती बर्फिली चोटी शायद खम्बराब पीक हो। फिरचेन ला की ओर जाने वाला रास्ता उस नदी के किनारे किनारे है जो यहां खम्बराब दरिया से मिल रही है । कैम्पिंग ग्राउंड के आस पास साफ पानी का कोई भी स्रोत नहीं। खम्बराब में रेत ही रेत बह कर आ रहा है। जिसे खाना बनाने के लिए छानकर इस्तेमाल करना है। तब भी रेत तो पेट में पहुंचेगा ही। साफ पीये जाने वाले पानी के लिए नाम्बगिल और अमर सिंह तलाश में निकले। लगभग दो घन्टे के बाद एक एक लीटर की दो बोतलें भरकर लौटे। साफ पानी का स्रोत आस पास कहीं नहीं था। दूसरी नदी के किनारे काफी दूर जाकर साफ पानी मिला।
खम्बराब दरिया में जो दूसरा दरिया मिल रहा है, छुमिग मारपो से होता हुआ हमें फिरचेन ला के बेस तक ले जाएगा। दरिया के दांये किनारे से हम आगे बढ़ते रहे। लगभग दो घंटे की यात्रा करने के बाद जाना, दरिया के इस पार के पहाड़ पर चलते हुए आगे नहीं बढ़ा जा सकता । दरिया पार करना ही होगा। पानी यहां भी कम नहीं लेकिन खम्बराब से कम ही है। यूं अभी सुबह के दस बज रहे हैं। खम्बराब को जब पार किया उस वक्त दिन के बारह बज रहे थे। हो सकता है उस समय तक इसमें भी पानी का बहाव पार किये गये दरिया के बराबर हो जाये। पहाड़ों नदी नालों की एक खास विशेषता है कि इन्हें सुबह जितना जल्दी पार करना आसान होगा उतना दिन बढ़ते बढ़ते मुश्किल होता जायेगा। शाम को किसी नाले को पार करना भी आसान नहीं होता। यही वजह है कि गद्दी थांच से खम्बराब पहुंचने के लिए हमें सुबह जल्दी चलना पड़ा था। ताकि जितना जल्दी हो खम्बराब को पार कर लें। दो बजे के बाद तो खम्बराब में बहता पानी दहश्त पैदा करने वाला था। फिरचेन ला के बेस की तरफ तक आते इस दरिया का हमने पार किया। पार होने के बाद पांवों के तलवों को गरम कर आगे बढ़ने लगे। अब दरिया हमारे दांये हाथ पर, रास्ता चढ़ाई भरा है। बहुत कम जगह है पहाड़ में। जगह जगह पिट्ठु के पहाड़ के टकराने का खतरा मौजूद है। हल्की संगीत लहरियों सी कदम ताल भर ही है हमारे आगे बढ़ने की। लगभग एक घन्टे का सफर तय कर वही लम्बा मैदान नजर आ रहा है जैसा कैलांग सराय से आगे बढ़ते हुए दिखायी देता रहा। यहां स आगे दूर तक देखने पर ऐसा लगता है जैसे आगे कोई रास्ता नहीं । दूर जा पहाड़ की दीवार दिख रही है बस वहीं तक हो मानो रास्ता, पीछे जहां से आ रहे हैं उधर देख कर भी ऐसा लग रहा है मानो वहां भी कोई रास्ता न हो। यूं पहाड़ में ऐसे दृ्श्य बनते ही है पर इधर लद्दाख के पहाड़ों में यह दृश्य आम बात है। हर एक धार के बाद ऐसा लगता है जैसे किसी डिबिया में बन्द हो गये हैं। इन पहाड़ों पर आगे बढ़ने वाला ही जान सकता है आगे का रास्ता जो कहीं खत्म नहीं होता। यदि यूंही आगे बढ़ा जाए तो नापा जा सकता है दुनिया को जो आज सीमाओं में बंटी है। राहुल सांकृतयायन तो पहाड़ों को पार कर तिब्बत तक गये ही थे।       
फिरचे के बेस की तरफ बढ़ते हुए इन लम्बे मैदानों में भी पानी नहीं है। ''फिरचे के बेस में तांग्जे वालों का डोक्सा होगा।" बताता है नाम्बगिल। वहां पानी का स्रोत भी होगा ही। कारगियाक वालों का डोक्सा है शिंगकुन ला के बेस पर। तीन महीने तक अपने जानवरों के साथ डोक्सा में ही रहते है जांसकर वाले। बच्चे भी होते ही है उनके साथ।

फिरचे के बेस पर जो तांग्जे वालों का डोक्सा है, वहां तांग्जे वाले अपनी चौरू और याक के साथ मौजूद हैं। जांसकरी बच्चे घोड़ों पर सवारी कर रहे हैं। पहुंची हुई टीम के नजदीक टाफी रूपी मिठाई की उम्मीद लगाए जांसकरी बच्चे पहुंच रहे हैं। आठ-आठ, दस-दस साल के ये बच्चे, जिनमें लड़कियां ज्यादा हैं, चिल्लाते हुए, घोड़ों की पीठ पर उछल रहे हैं। ''जूले !! आच्चे बों-बोम्बे।" पिट्ठु के बहार निकाली टाफियां बच्चों को बांट दी गयी हैं। बड़ी ही उत्सुकता से बच्चे एक-एक चीज का निरक्षण कर रहे हैं। उन्हीं के बीच नाम्बगिल दोरजे का भांजा दस वर्षीय जांसकरी बालक गोम्पेल भी है। नाम्बगिल उनका अपना है। जांसकरी भाषा में वे नाम्बगिल से बातें कर रहे हैं। नाम्बगिल हमारे साथ हैं, इसलिए हमारे साथ भी उनकी नजदीकी दिखायी दे रही है। विदेशी टीम जो हमारे साथ केलांग सराय से चल रही है। उनके नजदीक जाने में बच्चे हिचक रहे हैं। नाम्बगिल के कहने पर गोम्पेल डोक्सा से दूध और दही पहुंचा गया है हमारे पास। दही का स्वाद अच्छा है। चौरू गाय की दूध की चाय पहली बार पी हमने।

जारी  ---

Saturday, January 2, 2010

उम्मीदों भरी एक शुरुआत

देहरादून

एक समय में उत्तराखण्ड ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में भी जन पक्षधर नुक्कड़ नाटकों की स्थापना के लिए सचेत देहरादून की नाट्य संस्था दृष्टि ने एक लम्बी खामोशी के बाद नये साल के पहले दिन जिस तरह से अपनी उपस्थिति को दर्ज किया है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्ष 2010 देहरादून के रंग आंदोलन में एक हिलौर लाने वाला हो सकता है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के दौरान देहरादून के उन तमाम रंग कर्मियों को, जो एक समय तक नुक्कड़ नाटकों से परहेज करते रहे, सड़क पर उतारते हुए जो भूमिका दृष्टि ने उस वक्त निभाई थी, वह आज इतिहास हो चुकी है।

नब्बे के दशक में मंचीय नाटकों से हटकर दादा अशोक चक्रवर्ती, अरुण विक्रम राणा, कुलदीप मधववाल और विजय शर्मा जैसे प्रतिबद्ध रंगकर्मियों ने दृष्टि की शुरुआत की थी। वह समय हिन्दी नाटकों में नुड़ नाटकों का शुरूआती दौर था। रंगकर्मी सफदर हाशमी और दर्शक के रुप में मौजूद कामरेड राम बहादुर की सहादत के दिन को नुक्क्ड़ नाटक दिवस के रुप में मनाने के लिए दृष्टि ने जन नाट्य मंच, दिल्ली, शमशूल इस्लाम और उनके साथी, बिहार के कई नाट्य ग्रुप, नैनीताल के नाट्य ग्रुप युवमंच जैसे दूसरे प्रतिबद्ध नाट्य ग्रुपों के साथ एक संवाद कायम किया और अपने सहोदर संगठनों के साथ लगातार मिलकर नुक्कड़ नाटकों की रंग यात्रा को एक मुकाम तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाई। लेकिन उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के उस संयुक्त संघर्ष के दौरान कई कारणों से विभ्रम की स्थितियों के चलते और राज्य निर्माण के बाद जो स्थितियां दिखाई दी, दृष्टि के साथियों को एक गहरी चुप्पी में ले जाने वाली रही। उस लम्बी चुप्पी की छाया को देहरादून के रंगमंच पर देखा भी जाता रहा। 1 जनवरी के दिन अपने बैनर और कविता पोस्टरों के साथ गांधी पार्क पहुंचे दृष्टि के साथियों ने जिस तरह से अपनी भूमिका को फिर से पहचाना है उससे देहरादून के रंग-आंदोलन में एक बहुत से गहरे उठती हलचल को हर कोई महसूस कर सकता था। सुबह 11 बजे से शुरू हुई पोस्टर प्रदर्शनी को देखने के लिए शहर के कई रंगकर्मी, साहित्यकार और नाटकों के वे दर्शक जो दृष्टि को उसके मिजाज से जानते रहे, दिन भर गांधी पार्क में मौजूद रहे। इप्टा, मसूरी के साथियों ने दृष्टि के मंच पर जनगीत और नाटक की प्रस्तुति दी। 
नुक्कड़ नाटक दिवस के अवसर पर अपने बैनर पोस्टरों के साथ पहुंचे धरातल नाट्य संस्था और ज्ञान विज्ञान जत्थे के साथियों ने भी कविता पोस्टर प्रदर्शनी, जनगीत और अपने नाटकों की प्रस्तुति से गांधी पार्क में हलचल मचाए रखी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए धरातल संस्था ने अपने छ दिवसीय, पोस्टर, जनगीत और नुड़ नाटक अभियान की शुरूआत गांधी पार्क से ही की। इस अवसर पर डा। अतुल शर्मा द्वारा लिखित जनगीत ''बादशाह गश्त पर है"" का एक एकल अभियन युक्त पाठ रंगकर्मी पवन नारायण रावत द्वारा किया गया। ज्ञान विज्ञान समिति के सतीद्गा धौलाखण्डी ने भी अपने युवा साथियों के साथ एकल गीत नाटिका का मंचन किया।
दृष्टि, धरातल और ज्ञान विज्ञान समिति की हलचल भरी इस उपस्थिति को लम्बे समय से बेचैनी भरी कसमसाहट को महसूस करते रंगकर्मी, दर्शक और सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन को उम्मीदों भरी निगाहों से सराहने वाले आखिर एक नई शुरुआत के रुप में ही देख रहे हैं।
ऐसा वहां मौजूद डा। जितेन्द्र भारती, मदन शर्मा, प्रेम साहिल, डा। अतुल शर्मा, अरविन्द शेखर, जयंति सिजवाल, रंजना शर्मा, रेवा नन्द भट्ट, रमेश डोबरियाल, जगदीश बाबला, रेखा शर्मा, कमला पंत, बी बी थापा, जगदीश कुकरेती और दूसरे कई जनसंगठनों के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ दर्शकों के रुप में मौजूद लोगों की उपस्थिति से जाना जा सकता है।  

Thursday, December 31, 2009

शब्द का अर्थ मनुष्यता के बोध से ही खुल सकता है

हिन्दी दलितधारा अपने से पूर्व के साहित्य और इतर  रचनाओं पर, ब्राहमणवादी और समांती सरोकार से गुंजित होने का आरोप लगाती है, क्या उसे पूरी तरह से झुठलाया जा सकता है ?  हिन्दी का एक महत्वपूर्ण कवि शब्द की महिमा के बखान में, बेशक गप ही मारे चाहे, जब एक गरीब की बेटी को नग्न करके उसको अर्थों तक पहुंचने की कथा पूरी तटस्थता से सुनाता हो और उस घटना को अपनी स्मृति के दम पर ज्यों का त्यों रखने वाला हिन्दी का एक महत्वपूर्ण लेखक जो शिक्षाविद्ध भी हो, बिना विचलित हुए लिखता हो तो फिर क्या कहा जा सकता है ? क्या उस पत्रिका को सवालों के घेरे से बाहर रखा जा सकता है (?) जिसमें यह आलेख बिना किसी सम्पादकीय टिप्पणी के प्रकाशित होता है।
प्रस्तुत है  कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह द्वारा लिखित उस आलेख ( एक विरोधाभास त्रिलोचन) का वह आपत्तिजनक अंश जिस पर कवि राजेश सकलानी ने सवाल उठाया है। कवि राजेश सकलानी की टिप्पणी पाठकों की सुविधा के लिए यहां पुनः प्रस्तुत है:


लेखक महोदय आपने शर्म कर दी

लेखक सिर्फ एक माध्यम है। लेखन मूलत: एक सामुदायिक-नैतिक क्रिया है। यह गहरी जिम्मेदारी की माँग करता है। शब्द मानव अस्मिता के प्रतिफल होते हैं। शब्द-चर्चा को शोध माना जाता है। थोड़ा सा खिलावाड़ भी सहज माना जा सकता है। लेकिन प्रतिष्ठित कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह त्रिलोचन पर लिखे अपने संस्मरण में "जोबन" शब्द पर लिखते हुए गरीब दलित महिला के सम्मान की चिंदि्या उड़ा देते हैं। आधार शिला पत्रिका के त्रिलोचन केन्द्रित अंक मेंप्रकाशित आलेख "एक विरोधाभास त्रिलोचन " में वर्णित घटना सच है या नहीं लेकिन त्रिलोचन के पिता से लेकर आज तक की सामन्ती सड़ांध का पता जरूर लग जाता है। लेखक ने जिस गैर-जिम्मेदारी से एक घृणित प्रकरण को लिखा है वह सदमे में डालने वाला है। त्रिलोचन पर केन्द्रित इस विशेषांक में विद्वान कवि त्रिलोचन और जाने-माने कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह की प्रतिष्ठा में कोई इजाफा नहीं होता। भर्त्सना के सिवाय कुछ नहीं सूझता है। पीड़ित बहन का हम दिल से समर्थन करते हैं।
-राजेश सकलानी



एक विरोधाभास त्रिलोचन
अब्दुल बिस्मिल्लाह

शब्द का अर्थ बोध से खुलता है, प्रत्यक्ष अनुभव से खुलता है, यह बात संभवत: त्रिलोचन जी के मन में तभी से बैठ गई थी जब वे अपने गांव चिरानी पट्टी में रहते थे और किशोर वय के थे। एक बार उन्होंने एक रोचक किस्सा सुनाया। (किस्सा कितना सच है, कहा नहीं जा सकता)। बोले, मुझे सुने-सुनाए लोकगीतों को गुनगुनाने में मज़ा आता था। एक दिन हुआ क्या, कि मैं एक लोकगीत गुनगुनाता हुआ खेतों की तरफ से घ्ार आ रहा था। उस गीत में एक शब्द 'जोबना" बार-बार आता था। घ्ार के बाहर का दृश्य यह था कि पिताजी (शायद) तखत पर बैठे थे। थोड़ी दूर पर ण्क किशोर वय की लड़की खड़ी थी। शायद वह हरवाहे की बेटी थी और कुछ मांगने आई थी। मलकिन का इंतजार कर रही थी। पिताजी ने मुझे अपने पास बुलाया और पूछा, जोबना क्या होता है, जानते हो ? (प्रश्न अवधी में था) मैं पहले तो चुप, फिर बोला, नहीं। पिताजी उठे, आगे बढ़े और लड़की के ब्लाउज़ को चर्र से फाड़ दिया। बोले, देख लो यह होता है जोबना। मेरी तो घिघ्घी बंध गई और मैं भाग खड़ा हुआ। तब से इस शब्द का इस्तेमाल करने से डरने लगा हूं। मुझे ध्यान नहीं कि त्रिलोचन जी ने अपनी रचनाओं में इस शब्द का इस्तेमाल किया है अथवा नहीं। और किया है तो कब, कहां और कैसे ? मगर त्रिलोचन जी की इस बात में बहुत दम है कि अर्थ तो बोध से ही खुलता है।