Tuesday, October 5, 2010

भरोसे के सूत्र आंकड़ों में नहीं पनपते




5 -6 अगस्त की रात जिस अबूझ विभीषिका ने लदाख के लेह नगर के लोगों को अपने खूनी बाहुपाश में जकड़ लिया था   उसकी  जितनी भी तस्वीरें देख ली जाएँ ,वास्तविक नुक्सान का अंदाजा लगाना मुश्किल होगा.लेह भारत का क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा जिला है पर इसमें आबादी का घनत्व मात्र 3  व्यक्ति प्रति वर्ग किलो मीटर है,इसलिए ढाई सौ के आस पास बताई जाने वाली मौतें  देश के प्रचलित मानदण्डों के अनुसार बहुत भयानक नहीं मानी जायेंगी...हांलाकि 300 लोग दुर्घटना के महीने भर  बीतने के बाद भी लापता बताये जा रहे हैं.पैंतीस के लगभग गाँव इसकी चपेट में आ के नक्शे से लगभग लुप्त ही हो गए....मीलों लम्बी सड़कें,दर्जनों पुल और सैकड़ों खेत बगीचे इसकी विकराल धारा के हवाले हो गए,वो भी देश के उस हिस्से में जहाँ सड़कें और पुल सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं.अपनी पहचान उजागर न करने की शर्त पर सीमा सड़क संगठन के एक अधिकारी ने बताया कि अकेले लद्दाख के इलाके में ढाई से तीन सौ करोड़ तक की सड़के ध्वस्त हो गयी हैं। अब भी सड़कों के दोनों किनारे मलबे की ऊँची लाइनें देखी जा सकती हैं--उनके अन्दर से झांकते कपडे लत्ते और घर के साजो सामान साफ़ साफ़ दिखाई देते हैं.कभी कभार इनके अन्दर से लाशें अब भी निकल आती हैं. लोगों से बात करने पर मालूम हुआ कि मरने वाले अधिकतर लोग या तो सोते हुए मारे गए, या फिर बदहवासी में घर से निकलकर भागते हुए। बाजार में अनेक दुकानें  ऐसी हैं जो हादसे के बाद से अब तक खुली ही नहीं हैं...जाने इन्हें हर रोज झाड पोंछ कर खोलने वाले हाथ जीवित बचे भी हैं या नहीं?
 -यादवेन्द्र

 

विज्ञान की भाषा में जब हम बादल फटने की बात करते हैं तो इसका साफ़ साफ़ ये अर्थ होता है कि  बहुत छोटी अवधि में एक क्षेत्र  विशेष में (20 से 30 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा नहीं)अ  साधारण  तीव्रता के साथ -- एक घंटे में 100 मिलीमीटर या उससे भी ज्यादा-- बरसात हुई.भारत सरकार ने हांलाकि बादल फटने के लिए आधिकारिक तौर पर कोई मानक तय नहीं किया है पर मौसम विभाग अपनी वेबसाईट पर ऊपर बताई परिभाषा का ही हवाला देता है.अब पूरे मामले के कारणों की बात करते समय यदि हम 5-6 अगस्त की रात को लेह में हुई बरसात के आधिकारिक आंकड़ों की बात करेंगे तो मौसम विभाग ( लेह नगर में उनकी वेधशाला मौजूद  है) चुप्पी साध लेता है.नगर के दूसरे हिस्से में स्थित भारतीय वायु सेना के वर्षामापी यन्त्र का हवाला देते हुए मौसम विभाग जो आंकड़ा प्रस्तुत करता है वो इतना काम है कि बादल फटने की घटना पर संदेह होने लगता है-- पूरे 24  घंटे में 12.8  मिली मीटर बरसात,बस.वाल स्ट्रीट जर्नल  ने इस पर विस्तार से लिखा है कि तमाम जद्दोजहद के बाद भी उस काली रात में हुई बरसात का कोई आंकड़ा कहीं से नहीं मिल सका.यहाँ ये ध्यान देने की  बात है कि पिछले कई सालों से अगस्त माह का  बरसात का औसत मात्र ... है.दबी जुबान से अनेक लोगों ने ये कहने की कोशिश की कि यह विभीषिका कोई प्राकृतिक घटना नहीं थी,बल्कि चीन के मौसम बदलने वाले प्रयोग का एक नमूना
 थी.कोई भरोसेमंद सूत्र भले ही ऐसा कहने के लिए सामने न हो,पर इसको यूँ ही खारिज  नहीं किया जा सकता  क्योंकि हाल में ही ब्रिटिश वायु सेना के कृत्रिम बारिश कर के दुश्मन को तबाह कर देने के एक प्रयोग से  सैकड़ों लोगों की जान जाने की एक घटना का खुलासा हुआ है-- विनाश के स्थान  से 40 -50 किलो मीटर दूर ये प्रयोग कोई पचास साल पहले किया गया था और देश की रक्षा का हवाला दे कर इसमें गोपनीयता बरती गयी थी.कुछ साल पहने द गार्डियन ने इसका खुलासा किया है.   
 
  भूगोल की किताबों में लदाख को सहारा जैसा रेगिस्तान बताया जाता है,फर्क बस इतना है कि यहाँ का मौसम साल के ज्यादातर दिनों में  भयंकर सर्द बना रहता है.मनाली या श्रीनगर चाहे जिस रास्ते से भी आप लेह तक आयें,रास्ते में नंगे पहाड़ और मीलों दूर तक फैले सपाट रेगिस्तान  दिखेंगे... हरियाली को जैसे सचमुच कोई हर ले गया हो.दशकों पहले रेगिस्तान को हरा भरा बनाने को जो नुस्खा पूरी दुनिया में अपनाया जाता रहा है-- पेड़ पौधे रोपने का -- वो नुस्खा लदाख में भी आजमाया गया और लदाखी जनता को वृक्ष रोपने के लिए प्रोत्साहित करने के वास्ते नगद इनाम देने की योजना राज्य सरकार ने शुरू की.साथ साथ लेह में स्थापित रक्षा प्रयोगशाला ने भी बड़े पैमाने पर इस बंजर इलाके को हरियाली से पाट  देने का अभियान शुरू किया.आज वहां दूर दूर तक हरियाली के द्वीप दिखाई देने लगे है.रक्षा प्रयोगशाला दावा करती है की लेह में उनके प्रयासों से हवा में आक्सिजन की उपलब्धता 50 %  तक बढ़ गयी है और इस क्षेत्र की सब्जी की करीब साठ फीसदी आपूर्ति   उनके प्रयासों से स्थानीय स्तर पर पूरी की जा रही है.सब्जी की करीब 80 नयी और सेब की लगभग 15  नयी  प्रजातियाँ इस समय वहां उगाई जा रही हैं.पिछले सालों में जहाँ इस क्षेत्र में हरियाली  की चादर बढ़ी है वहीँ वर्षा की मात्रा भी निरंतर बढती गयी है.हांलाकि  सरकार के दस्तावेज अब भी लदाख क्षेत्र में हरियाली से ढका हुआ क्षेत्र महज 0 .1 % ही  दर्शाते हैं और वैज्ञानिकों का बड़ा वर्ग मानता है कि हरियाली को  मौसम प्रभावित  करने के लिए कम से कम अपना दायरा 30 %  तक बढ़ाना पड़ेगा-- पर इस बार की अ प्रत्याशित त्रासदी ने ऐसे लोगों का एक वर्ग तो खड़ा कर ही दिया है जो लदाख के सर्द रेगिस्तान को हरा भरा करने के अभियान को शंका की दृष्टि से देखता  है और अत्यधिक बरसात से बाढ़  जैसी स्थिति पैदा करने के लिए हरियाली को ही दोषी मानता  है.दबी जुबान से लेह  के एक सम्मानित धर्मंगुरु  जो राज्य सभा के सदस्य भी रहे हैं,ने  भी विभीषिका के लिए इसको ही दोष देने की कोशिश की.लेह में लोगों से बात करने पर कई लोगों ने ये भी कहा कि दलाई लामा भी पिछले कई सालों से अपने उद्बोधनों में लदाख में हरियाली की संस्कृति को रोकने की अपील करते आ  रहे हैं.त्रासदी के दिनों के उपग्रह चित्रों को देखने से मालूम होता है कि कैसे देश के सुदूर दक्षिण पश्चिम सागर तट से काले मेघ पूरा देश पार करके उत्तरी सीमाओं तक पहुँच गए.यह एक अजूबी घटना है और अब मौसम वैज्ञानिकों ने इसका विस्तृत अध्ययन करने की घोषणा की है.
 
  अचानक आई इस बाढ़ से हुए नुकसानों के बचे हुए अवशेष ये बताते हैं कि ध्वस्त होने वाले घरों कि बनावट में कोई कमी रही हो ऐसा नहीं है -- लेह बाजार के पास अच्छी सामग्री और डिज़ाइन से बने  टेलीफोन  एक्सचेंज और बस अड्डे में जिस तरह का नुक्सान अब भी दिखाई देता है,ये इस बात का सबूत  है कि मलबे की विकराल गति ने नए और पुराने या मिट्टी या कंक्रीट से बने घरों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया.यूँ साल में तीन सौ से ज्यादा धूप वाले दिनों के अभ्यस्त लोग  लदाख क्षेत्र में पारंपरिक ढंग से मकान मिट्टी की बिन पकाई इंटों से बनाते हैं, नींव भले ही पत्थरों को जोड़ कर बना दिया जाए.इलाके की सर्दी को देखते हुए दीवारें मोटी बनायीं जाती हैं और मिट्टी बाहर की सर्दी को इसमें आसानी से प्रवेश नहीं करने देता.छत सपाट और स्थानीय लकड़ियों, घास और मिट्टी की परतों से बनायीं जाती हैं.अब कई भवन टिन की झुकी हुई छतों से लैस दिखाई  देते हैं पर स्थानीय लोग इनको सरकार के दुराग्रह और दिल्ली और चंडीगढ़ में बैठे वास्तुकारों की ढिठाई का प्रतीक मानते हैं.हाँ, चुन चुन कर पत्थर की ऊँची पहाड़ियों के ऊपर किले की तरह बनाये गए किसी बौद्ध मठ को कोई क्षति नहीं हुई.जब साल दर साल बढ़ रही  बरसात के सन्दर्भ में लोगों से बात की गयी तो छतों के ऊपर किसी ऐसी परत(जैसे तिरपाल) को मिट्टी की परत के अन्दर बिछाने की जरुरत महसूस की गयी जिस से बरसात का पानी अन्दर न प्रवेश कर पाए.हमें लेह में ढूंढने  पर भी स्थानीय स्तर पर कम करने वाले वास्तुकार नहीं मिले,जिनसे और गहन विचार विमर्श किया जा सकता.
 
अब भी मलबे हटाने का कम चल रहा है पर सबसे अचरज वाली बात ये लगी कि इनमें स्थानीय जनता की कोई भागीदारी नहीं है...विभीषिका की काली रात में तो सेना के जवान अपनी बैरकों  से निकल कर आ गए,बाद में सीमा सड़क संगठन के लोग खूब मुस्तैदी से ये काम कर रहे हैं-- बिछुड़े हुए परिजनों और खोये हुए सामान को दूर से निहायत निरपेक्ष भाव से लोग खड़े खड़े निहारते दिखते हैं,पर पास आकर न तो कोई हाथ लगाता दिखता है और न ही बिछुड़ी हुई   वस्तुओं को प्राप्त कर लेने का कुतूहल किसी के चेहरे पर दिखाई देता है.लोगों से बार बार इसका कारण पूछने पर लोगों ने बौद्ध जीवन शैली में जीवन और मृत्यु की अवधारणा के गहरे रूप में दैनिक क्रिया कलाप और व्यवहार में  लोगों के अन्दर तक समा जाने की ओर इशारा किया.                           



-यादवेन्द्र
                            

Wednesday, September 29, 2010

कइयों को पसंद है मसखरी


आज के उफनते और तलवार भांजते माहौल में मुझे 1928 में जनमी  प्रख्यात अश्वेत अमेरिकी कवियित्री माया एंजेलू की ये मशहूर कविता अनायास याद हो आई...एक पिद्दी से कोर्ट के फैसले को इतना दानवी बनाया जा रहा है कि जैसे पूरी मानव जाति इस से निकली घृणा के अन्दर भस्म हो जाएगी . मुझे लगता  है कि इस कविता की चेतना  समझदार  लोगों  को छू  कर  जरुर  शांत  और आश्वस्त  कर  पायेगी .यहाँ कविता का सम्पादित अंश दिया जा रहा है...प्रस्तुति यादवेन्द्र की है:


 मानव परिवार  
मैं देखती हूँ कि विविधताएँ बहुत  हैं
मानव परिवार  में
हम में से कई धीर गंभीर लोग हैं
और कइयों को पसंद  है मसखरी...
कुछ लोग दावा करते हैं
उन्होंने पूरा जीवन जिया खूब गहरे डूब कर
कइयों को लगता है
सिर्फ वे ही हैं जो छू पाए हैं
जीवन की सच्चाइयों को सच में...
* * * * * *
मैं छान आया सातों समंदर
और ठहरा भी हर जगह
देखे दुनिया भर के अजूबे
पर नहीं मिले तो नहीं ही मिले
एक जैसे मिलते जुलते लोग...
* * * * * *
जुड़वां हमशक्ल हुए तो भी
उनके नाक नक्श एक दूसरे पर कसते हैं ताने
प्रेमी जोड़े  चाहे कितने निकट लेटे हों
सोचते होते हैं अलग अलग ही...
* * * * * 
अलग अलग स्थान और काल में
हम दिखते तो  हैं एक दूसरे से बिलकुल जुदा
पर मेरे दोस्त,अपने  अलगावों  के मुकाबले
हम एक दूसरे के समान ज्यादा हैं.... 
पर मेरे दोस्त,अपने अलगावों के मुकाबले
हम एक दूसरे के समान ज्यादा हैं....
पर मेरे दोस्त,अपने अलगावों के मुकाबले
हम एक दूसरे के समान ज्यादा हैं...
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Monday, September 20, 2010

बारिश

उत्तराखण्ड में बारिश की भीषड़ मार को झेलते हुए एक दौर में लिखी गई यह कविता आज फिर याद आ रही है। 


सब कह रहे हैं
बारिश बन्द हो चुकी है
मैं भी देख रहा हूं
बाहर नहीं पड़ रहा है पानी
पर घर के भीतर तो
पानी का तल
अब भी ज्यों का त्यों है;

सड़क पर भी है पानी
आंगन में भी है पानी
र के पिछवाड़े भी है पानी
फिर मैं कैसे मान लूं
बारिश बन्द हो चुकी है

Sunday, September 19, 2010

"सरकार" क्या होती है!




डॉ. शोभाराम शर्मा

    'सरकार, आपको बडे सरकार ने सलाम बोला है।" सुबह-सुबह कालेज का चपरासी संदेश दे गया और मुझे अपने बंटी के सवाल का जवाब सूझ गया। अपनी पुस्तक के पन्ने पलटते हुए उसने पिछली रात सवाल दागा था- ''पापा सरकार क्या होती है?"  और मैं अकचकाकर बोेला था- ''जो सर करती है यानि दूसरों पर अध्किार करती है, वही सरकार है।"   परिभाषा का पुरानापन और अव्याप्ति दोष ध्यान में आया तो मैंने पिंड छुडाने के लिए कह दिया था- ''वह आजकल कारों में सर छुपाकर चलती है, इसलिए सरकार कहलाती है।"
    चपरासी ने सरकार, बडे सरकार और सलाम, इन तीन शब्दों में सरकार का बाहर-भीतर खोलकर रख दिया। सरकार भी छोटी होती है, बडी भी होती है। और उसको सलाम भी करना पडता है। आकार से बात वर्ण पर आती है तो सरकार बाहर से गोरी और भीतर से काली भी होती है। इसका विलोम भी होता है और पीली से लेकर लाल सरकारें भी आज दुनिया में विराजमान हैं। उन्हें आकार-प्रकार और वर्ण के अनुसार छोटा-बडा, काला-पीला और लाल सलाम भी करना पडता है।

    सलाम में तो हर सरकार के प्राण बसते हैं। हैसियत के अनुसार उसे घुटना-टेकु से लेकर फर्जी सलाम तक ठोकने पडते हैं। हर जगह का अपना रिवाज है। कहीं दण्डवत लेट लगा दी, कहीं हें-हें कहकर हाथ जोड दिए तो कहीं बूट पर बूट चढाकर हाथ से माथा पीट लिया और सरकार खुश कि वह जिन्दा तो है। यह सब ठीक है, लेकिन सरकार का स्वरूप भौतिक है या आध्यात्मिक, यह विवाद का विषय है। जब थानेदार का डंडा सिर पर बजता है तो लगता है कि डंडा ही सरकार है लेकिन एक निर्जीव डंडे में करामाती सरकार कहां पर स्थित है, वह डंडे में है या डंडे के आघात से होने वाले मीठे-मीठे दर्द में, यह अभी तक समझ में नहीं आया। हां सारी साक्षियां यही बताती है कि डंडे से सरकार का संबंध् है जरूर।
    सरकारों के सरकार खुदा ताला, ने जब आदम-हौवा के लिए जन्नत के दरवाजे पर ताला डाल दिया तो लगता है कि उन बेचारों के पास कोई डंडा नहीं था और वे बेचारे ना नुकुर किए बैगर चुपचाप ध्रती पर चले आए। आदेश का डंडा खुदा के पास जन्नत में छूट गया और इध्र ध्रती पर आदम-हौवा की औलाद बढती गई। करामाती डंडे की जरूरत पडी तो कुछ जबर जन्नत से चुरा लाए और खुदा की जगह खुद दुनिया को हांकने लगे। चोरी तो चोरी है। सिर उफंचा रखने के लिए उन्होंने घ्ाोषित किया कि परम पिता परमात्मा ने ही उन्हें करामाती राजदण्ड स्वेच्छा से प्रदान किया है। पेट की मार और जबर की लाठी से विवश होकर अल्ला-ताला से सीध सम्पर्क बताने वाले पण्डित-मुल्ला और पादरियों ने भी स्वीकार कर लिया तो सरकार चल निकली और उसका सीध संबंध् नेति-नेति से हो गया। कुछ विचारकों का मत है कि सरकार मानव समाज के सामूहिक विवेक का परिणाम है। कुछ का मत है कि वह राज्य या राष्ट्र की आत्मा है।  दैवीय-इच्छा सामूहिक विवेक या आत्मा का आकार-प्रकार अभी तक तो कोई स्पष्ट नहीं कर पाया, लेकिन डंडा अपनी जगह है। आप चाहें तो उसे इनका प्रतीक मान सकते हैं। दूसरे शब्दों में डंडा निराकार का साकार रूप है, जो काम करता है।
   बाबा तुलसीदास ने निराकार ब्रह्म के विषय में लिखा है कि वह बिना कानों के ही सुनता है, बिना पैरों के ही चलता है, बिना जीभ के ही नाना स्वाद लेता है और बिना हाथों के ही सारे कार्य करता है। वही निराकार ब्रह्म ब्राह्मणों और साधुओं की रक्षा के लिए साकार भी हो जाता है। मेरा विश्वास है कि बाबा की नजर में परम पिता का वही डंडा रहा होगा, जो आज तक बडे लोगों की रक्षा की पुनीत दायित्व निभाता रहा है। उनका कथन इस सरकार बनाम करामाती डंडे पर ही सटीक बैठता है। उसकी मार, उसके होने की साक्षी देता है और तलवार की नोंक या बंदूक की नली के रूप में सीधे हमारी आंखों में घूरता है। हां, एक बात में बाबा भी चूक गए। वे यह लिखना भूल गए कि वह बिना दिमाग के ही सोचता है, क्योंकि डंडा चलता अधिक है और सोचता कम है।
   कुछ पहले तक सरकार अपने करामाती डंडे से तीन काम लेती थी। वह भीतर को ठीक-ठाक रखती थी, इसलिए कि उसका आसन बरकरार रहे, वह बाहर वालों पर झपटती थी, इसलिए कि उसके आसन पर कोई खतरा न आए और वह कर वसूल करती थी, इसलिए कि उसके होने का अहसास बना रहे। प्रजा की जेब हल्की करने से उसका रौब-दाब बढता था। खजाना भरा होने पर बिना जीभ के भी नाना स्वाद लेती और 'राज्ञ: प्रजारंजनात" का खेल भी बखूबी खेल सकती थी। उसका आसन सिंहासन कहलाता था, जो सोने से मढा होता और कोई नर-शार्दूल हाथ में राजदण्ड लिए सर पर रत्न-जडित मुकुट धरण किए, जब अकडकर उस पर बैठता जो प्रजा तमाशा देखकर प्रसन्न होती और जय-जयकार करने लगती। वह सचमुच का शेर होता या माना हुआ शेर होता, लेकिन राज्य में जो कुछ भी अच्छा या सुंदर होता उस पर उसीका अधिकार होता। उसकी रानी स्वर्ग की अप्सरा होती। एक नहीं कई-कई होतीं, जिनकी सुरक्षा के लिए वह अपने राजमहल में जनखे रखता। जनखे भी तब धंधे में लगे रहते और रनिवास की कहानियों से जनता का अच्छा मनोरंजन होता। कहीं किसी की बेटी या बहू सुंदर हुई तो उसका राजा के रनिवास तक पहुंचना प्राय: आवश्यक हो जाता, क्योंकि सबसे सुंदर पर सबसे बडे का ही अधिकार हो सकता था। राजा ने छुई और पारस हुई, तब नारी जीवन की सार्थकता इसी में थी। इसमें भी बडे-बडे उलट पफेर होते, रानी दासी बन जाती और दासी रानी। कवि लोग इस पर सुंदर-सुंदर नाटक और काव्य रचते। राजा लोग अपनी रानियों से सौ-सौ राजकुमार और राजकुमारियां पैदा करते, जिनकी शान-शौकत और छीना-झपटी में महाभारत रचे जाते ओर प्रजा तमाशा देखकर भौचक रह जाती। अश्वमेध् से नरमेध् तक कई प्रकार के मेध् होते। सब से बडी सरकार के सगे ब्राह्मण-पुरोहितों को इतना खिलाया जाता कि उन्हें पेट की अपच ही नहीं, दिमागी अपच भी हो जाती थी। पेट की अपच से चरक और सुश्रुत जैसे धन्वन्तरियों का धंधा चमकता और दिमागी अपच के मारे हमारी मेध वहां पहुंच जाती, जहां से कोई रास्ता कहीं नहीं जाता।
    सिंहासन की सुरक्षा के लिए डंडा विशाल दुर्गों का निर्माण करवाता, परलोक बनाने के लिए बडे-बडे मठ-मंदिर बनते, विहार और स्तूप बनते, जहां महंतों व पुजारियों के मुफत रोटी तोडने का प्रबंध् हो जाता। चटटानों पर भित्ति-चित्र खुदवाए जाते, शिलाओं पर अपनी प्रशंसा उत्कीर्ण की जाती और राजा इहलोक तथा परलोक के बीच दलालों द्वारा उफपर वाले का प्रतिनिध् घ्ाोषित कर दिया जाता। कभी कोई सडक बन जाती, ध्मशालाएं खुल जातीं या सडकों के किनारे छायादार वृक्ष लग जाते तो प्रजा समझती कि उफपरवाली सरकार ही छोटी सरकार के रूप में धरती पर उतर आयी है। कुछ ऐसे भी आए जो तलवार के बल पर अपने भोंडे विश्वासों को जनता के मन मस्तिष्क में ठूंसना अपना सबसे पाक कारनामा मानते थे और जन्नात तथा जमीन के बीच के दलाल उन्हें गाजी घोषित करते। उनके उत्तराधिकारियों ने लाजबाब कबरें बनवाई और ताजमहल खडे किए। और ये तमाशे उस करामती डंडे की देन है, जिस पर हम आज भी अभिमान करते हैं।
    सुदूर पश्चिम में एक तमाशा और हुआ। भोक्ता और निर्माता के बीच दलाली पर जीने वाले की आंखों में इतनी चर्बी आ गई कि उसने प्रजा के नाम पर डंडा हथिया लिया। ईश्वर के पुराने प्रतिनिधियों की जगह नये प्रतिनि्धियों ने ले ली और उन्हें दुनिया को आपस में बांटना आरंभ कर दिया। अपने तैयार माल की खपत और कच्चे माल की उपलब्ध् के लिए उन्होंने दो-दो महायु्द्ध लडे और वे सभी ईसा मसीह की प्यारी भेडें थीं। कानून और शासन की पोथी में पैसे का नाग न जाने कहां से घुस आया, जिसने डंडे को स्टर्लिंग और डालर में बदल दिया। डंडे का यह नया रूप लोगों की जेब से लेकर चूल्हे तक निसंकोच घुस जाता है और भाड में जाए या चूल्हे में, हर जगह से कुछ-न-कुछ वसूल कर ही लेता है। लोग कहते हैं कि यह एक बहुत बडा परिवर्तन है। मुझे तो वही 'ढाक के तीन पात" दिखाई देते हैं। सामूहिक विवेक को पैसे की दीमक चाट रही है और राज्य की आत्मा नए-नए हिटलरों के रूप में यहां-वहां पफौजी बूट बजाती नजर आती है। सिंहासन की जगह कुर्सी ने भले ही ले ली हो, लेकिन छिन जाने का डर आज भी नए-नए तमाशे खडे करता है और वह भी राष्ट्रीय सम्मान के नाम पर बडी बेरहमी के साथ। पहले राजसूय-अश्वमेघ यज्ञ होते थे। आजकल बडे-बडे राष्ट्रीय और अर्न्तराष्ट्रीय जमावडे होते हैं। जनतंत्रों के नये बादशाह "अहो रूपं अहो ध्वनि" के अंदाज में उछलते कूदते हैं, दावतें उडाते हैं और बदले में भाषण पिलाकर, प्रस्तावों की मीठी नींद की गोलियां खिलाते हैं।
    पहले राजकुमार महलों में पैदा होते थे, आजकल वे गलियों में पैदा होते है और आवारा कुत्तों से राजनीति का पहला पाठ पढते हैं। पक्ष हो या विपक्ष, काट खाना उनका स्वभाव होता है और तिकडम के बल पर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचकर वे देश के हृदय-सम्राट बन जाते हैं। पहले ध्म के दलालों का पैदा किया गया कुहासा उनका प्रभा-मंडल होता था और आज अंध-धुंध् प्रचार व आंकडो की धुंध् उनके असली चेहरों को छिपाए रखती है। डंडा पहले बाहर-बाहर से नियंत्रण रखता था। आज वह जीवन के हर क्षेत्रा को अपनी चपेट में ले चुका है। जान वह पहले भी लेता था, आज भी लेता है। मौत का भय आज भी उसका सबसे बडा सहारा है।
    जनखे पहले रनिवास तक सीमित थे। आज सारा राज-काज जनखों के बल पर चलता है। राज-सेवा में आने से पहले अच्छे-खासे आदमी को जनखा बना दिया जाता है। उफपर वाले ने जिन्हें जनखा पैदा किया उनका धंधा चौपट है, क्योंकि जनतंत्रा के बादशाह रनिवास रखते ही नहीं।
   हां, जनखों को छेडने का खेल बदस्तूर चालू है। शोहदे आज भी गलियों में शिखण्डियों को छेडते हैं और कहीं सत्ता के रथ पर पहुंच गए तो बने हुए शिखण्डियों की आड में, चाहे जिस पर बाण छोड देते हैं। गली में जो शोहदापन माना जाता है, सरकारी डंडे के बल पर वही कूटनीति कहलाता है।
    इसी डंडे के मारे बेचारे मार्क्स ने एक देश से दूसरे देश भागते हुए लिख दिया कि एक दिन शासन का यह डंडा स्वत: हवा में विलीन हो जाएगा। कुछ लोग हैं जो उसी के शब्दों को घोलुआ घोलते रहते हैं किंतु आज जो स्थिति है, वह पुकार-पुकार कर कहती है कि आवरण भले ही बदलते रहें, डंडा अपनी जगह रहेगा।
    राजा हो या बादशाह, तानाशाह हो या जन-नेता, ये सभी उसी करामाती डंडे के डंडे हैं, जिसे लोग बडी अदब से "सरकार" कहते हैं। जो व्यक्त भी है और अव्यक्त भी, साकार भी है और निराकार भी, जो रूहानी भी है और जिस्मानी भी। इस डंडे को तोडने के लिए किसी और बडे डंडे की आवश्यकता होगी, लेकिन क्या उस डंडे को और भी बडा सलाम नहीं ठोकना पडेगा? जड ही पकड में नहीं आती तो खोदेगें क्या? इधर-उधर खोदेगें तो थानेदार का डंडा मुठभेड भी दिखा सकता है और पिफर कोई दूसरा ही होगा, जिससे उसका बंटी पूछता पिफरेगा- पापा सरकार क्या होती है?

Friday, September 10, 2010

पहाडी खानाबदोशों का गीत

अजेय की कविता

अलविदा ओ पतझड़!
बांध लिया है अपना डेरा डफेरा
हांक दिया है अपना रेवड़
हमने पथरीले फाटों पर
यह तुम्हारी आखिरी ठंडी रात है
इसे जल्दी से बीत जाने दे
आज हम पहाड़ लांघेंगे
उस पार की दुनिया देखेंगे!

विदा ओ खामोश बूढी सराय!
तेरी केतलियां भरी हुई हैं
लबालब हमारे गीतों से
हमारी जेबों में भरी हुई हैं
ठसाठस तेरी कविताएं
मिल कार समेट लें भोर होने से पहले
अंधेरी रातों की तमाम यादें
आज हम पहाड़ लांघेंगे
उस पार की हलचल सुनेंगे!

विदा ओ गबरू जवान कारिन्दों!
हमारी पिट्ठुओं में
ठूंस दिये हैं तुमने
अपनी संवेदनाओं के गीले रूमाल
सुलगा दिया है तुमने
हमारी छातियों में
अपनी अंगीठियों का दहकता जुनून
उमड़ने लगा है एक लाल बदल
आकाश के उस एक कोने में
आज हम पहाड़ लांघेंगे
उस पार की हवाएं सूंघेंगे!

सोई रहो बरफ में
ओ कमजोर नदियों!
बीते मौसम में घूंट-घूंट पिया है
तुम्हें बदले में
कुछ भी नहीं दिया है
तैरती है हमारी देहों में
तुम्हारी ही नमी
तुम्हारी ही लहरें मचलती हैं
हमारे पांवों में
सूरज उतर आया है आधी ढलान तक
आज हम पहाड़ लांघेंगे
उस पार की धूप तापेंगे

विदा ओ अच्छी ब्यूंस की टहनियां
लहलहाते स्वप्न हैं
हमारे आंखों में तुम्हारी हरियाली के
मजबूत लाठियां है
हमारे हाथों में
तुम्हारे भरोसे की

तुम अपनी झरती पत्तियों के आंचल में
सहेज लेना चुपके से
थोडी सी मिट्टी और कुछ नायाब बीज

अगले बसंत में हम फिर लौटेंगे!
(अकार २७ से साभार)