Thursday, June 12, 2008

नदी को बहता पानी दो

(आज ज्यादा कुशलता से जल, जंगल और जमीन पर कब्जा करती व्यवस्था का चक्र बड़ी तेजी के साथ घूम रहा है। प्रतिरोध की कार्यवाहियों में जुटी जनता के संघर्षों का दौर भी हमारे सामने है। एक समय पर चिपको आंदोलन की पृष्ठभूमि में जंगलो को बचाने की लड़ाई लड़ने वाला उत्तराखण्ड का जनमानस आज नदी बचाओ आंदोलन की आवाज को बुलन्द कर रहा है। अशोक कबाड़िये ने जिस अतुल शर्मा को अपने कबाड़ में से ढूंढ निकाला था वही अतुल शर्मा नदियों के बचाव के इस आंदोलन में अपने गीतों के साथ है। अतुल शर्मा के मार्फत ही नदी बचाओ आंदोलन की उस छोटी सी, लेकिन महत्वपूर्ण कोशिश को हम जान सकते है। अतुल मूलत: कवि है। जो कुछ यहां है, वह कविता नहीं है पर कविता की सी संवेदनाओं से भरे इस आलेख को रिपोर्ट भी तो नहीं कहा जा सकता।



अतुल शर्मा 09719077032


अब नदियों पर संकट है, सारे गांव इक्ट्ठा हों


नदियों पर बांध बनेगें ---! छोटे-छोटे बांध। उससे बिजली उत्पादन होगा। बिजली सबके लिए जरुरी है। तो फिर क्यों हुआ इन बांधों को लेकर विरोध ? विरोध भी ऐसा कि गांव का गांव इक्टठा हो गया। पुरुषों से ज्यादा महिलायें थी मार्चों पर। गांव को बचाने के लिए उनके सब्र का बांध टूट गया और वे सभी सड़कों, पगडंडियों और घरों से बाहर आ गये। खुले आकश के नीचे। क्या उन्हें बिजली नहीं चाहिए ? यह सवाल पिछले आठ साल से मेरे साथ रहा। पर उसके उत्तर भी मुझे मिलते रहे। विरोध करने वालों से ।

एक लघु जल विद्युत परियोजना में पूरी नदी को सुरंग में डाला जाता है और मिलों दूर से आने वाली नदी सूख जाती है। बिजली बनाने के लिए जितना प्रवाह चाहिए, उससे ज्यादा लिया जाता है। अब नदी के आस-पास के गांव सूख जाते हैं। सुरंग बनाने के लिए होने वाले धमाकों से स्रोत भी सूखने लगे। नदी के आस-पास के दस गांव जल संकट और खेतों और मकानों पर पड़ी दरारों के साथ जैसे-तैसे जीते रहे।

दरारों वाला जीवन जीते हुए उन्होंने बहुत सहा भी और कहा भी। पर क्योंकि बिजली जरुरी थी इसलिए नदी को सुरंग में डालना जरुरी था। गांवों को विस्थापन का जहर पीना था। विस्थापन के लिए कोई ठोस नीति पर बात नहीं हो रही थी। टिहरी बांध जैसे बड़े बांधों में आज भी विस्थापन की समस्या, समाधान के लिए भटक रहे हैं लोग।

कुमाऊ से लेकर गढ़वाल तक कई बांधों का काम निजि कम्पनियों को सोंप दिया गया। मुनाफे के लिए और बिजली उत्पादन के लिए काम शुरु हुआ ही था कि अपनी बुनियादी समस्याओं को लेकर लोग सामने आ गये।

यह आठ साल पुरानी बात है। टिहरी के फलेण्डा गांव में बांध बनना था। गांव और प्रशासन आमने-सामने थे। लोग भाषणों से अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे थे। प्रशासन चुपचाप सुन रहा था। फिलहाल। भाषणों का सिलसिला कितना चलता ? वहीं के लोगें के साथ नुड़ नाटक जत्था तैयार किया गया। दिल्ली से आये राजेन्द्र धस्माना (पूर्व समाचार सम्पादक दूर दर्शन दिल्ली) ने बताया कि जब नाटक एक सुदूर गांव में जन-मानस को उद्वेलित कर रहा था, तो मैंने पूछा, "तुम अतुल को जानते हो ? अतुल शर्मा।" उन्होंने बताया कि उन्होंने ही तो हमें यह नुक्कड़ नाटक तैयार कराया है। नाटक का नाम था, क्या नदी बिकी। उन्होने ने ही बताया था कि इस आंदोलन का पहला गीत अतुल ने ही लिखा, "अब नदियों पर संकट है, सारे गांव इक्टठा हो ---। "

यह "सारे गांव इक्टठा हों" एक जिजीविषा से भरे आंदोलन का सार्थक नारा बन गया।

नदी बिकी भई नदी बिकी

अब "नदी बचाओ आंदोलन" के तहत व्यापक रणनीति बननी शुरु हुई। नदियों में "कोसी", अलखनन्दा, जमुना, भिलंगना, भागीरथी पर बनने वाले दर्जनों बांध सवालों के घेरे में खड़े कर दिये गये। यह गांव के लोगों की ही ताकत थी।

जो तकलीफ में होता है - अगर वही बोलेगा तो निश्चित उसका सार्थक और व्यवहारिक असर होगा।

अगर नदियों के आस पास संसकृतियां पलती थी तो आज नदियों के आस-पास सूखा पड़ा है। कुछ लोगों ने तो यह तक कहा कि ऐसा ही रहा तो गंगा दिखेगी नहीं।

जंगलों, वन्य जीवों और नदी के भीतरी संसार को तहस नहस करने वाली भागेवादी सभ्यता को व्यवहारिक स्वरूप् मिलेगा - ऐसा नदी के किनारे रहने वाले लोगों का कहना है। उन्हें छोटे बांध से आपत्ति नहीं है। पर उनकी कार्यशैली और उनकी भागीदारी पर सवाल जरुर है।

नदी को बेचकर, जंगलों, पहाड़ों और श्रम और श्रमिक को खरीदकर पूरे वर्तमान को परेशानियों में डालना कुछ लोगों के लिए ठीक होगा, पर भविष्य के लिए यह खतरे की घन्टी है।

कहते हैं अगला विश्व युद्ध पानी की समस्या को लेकर हो सकता है ---। ऐसा न हो, ऐसा चाहते हैं लोग। बहुत से लोग। बोलने वाले लोग। आवाज उठाने वाले लोग।

पर इस सबके लिए "बीच तूफानों" में जाना होगा। "नदी बचाओ आंदोलन" में गांव की ही प्रमुख भूमिका है। वे अपनी जीवन रेखा, "नदियों" , को बचाना चाहते हैं। स्वंय को बचाना चाहते हैं और भविष्य को भी बचाना चाहते हैं। इनके साथ राधा भटट, सुरेश, राजेन्द्र सिंह, रवि चोपड़ा, शमशेर सिंह, गिर्दा, नरेन्द्र नेगी, शेखर पाठक, अनुपम मिश्र भी मजबूती के साथ खड़े हैं।

गांव और नदी के साथ मेरे आठ साल के संस्मरण हैं। जिन्हें नदी दर नदी और गांव दर गांव पहुंचकर लिखा है और वहीं सौंप दिया है। यह उसका परिचय भर है।

---आज गांव के लोगों के लोक जलनीति को मसैदा तैयार किया और शासन प्रशासन को सौंपना चाहा। उन्हें सबको गिरफ्तार किया गया।

"यहां कोई जलनीति नहीं है ।।।।"

इसीलिए मेरा एक जनगीत लोगों के काम आता है -

नदी को बहता पानी दो
हर कबीर को वाणी दो
सिसकी वाली रोतों को
सूरज भरी कहानी दो।
अब शब्दों पर संकट है
सारे गांव इक्टठा हों
आवाजों पर संकट है
सारे गांव इक्टठा हों

गांवों के घरों की छोटी बड़ी दीवारों पर आंदोलनी परम्पराओं से लिखा यह गीत सिपाही की तरह काम कर रहा है।

इस जत्थे को लेकर, हम खटीमा, नैनीताल, अल्मोड़ा, कौसानी, बागेश्वर होते हुए श्रीनगर, नई टिहरी, देहरादून, फलेण्डा, बूढ़ा केदार, घनसाली, झाम, चिन्याली सौड़, रुड़की, धरासू, उत्तरकाशी, बड़कोट, नौगांव, मोरी, पुरोला और फिर प्रभावित गांवों में गये। इसकी पुस्तकें-पोस्टर बटे। अब यह जत्था अपने नये तेवर के साथ स्वंय आवाज उठा रहा - नदियों के मार्फत जीवन के समर्थन में ---।

3 comments:

Arun Aditya said...

सार्थक और प्रेरक लेख। बधाई।

DR.ANURAG said...

इन गंभीर मुद्दों पर विस्तार से बात करने के लिए आपका प्रयास सराहनीय है

अजित वडनेरकर said...

सार्थक चर्चा के लिए धन्यवाद विजयभाई। अतुलजी के लिए आपके धाम से ही कबाड़खाना गया और फिर इधर लौटा हूं।