Monday, August 4, 2008

अलबर्ट आइंस्टाइन का सिगमंड फ्रॉयड को लिखा एक महत्वपूर्ण पत्र

एक दौर में दिनमान, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, कादम्बनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में अपने विज्ञान विषयक आलेखों के कारण जाने जाने वाले यादवेन्द्र एक प्रतिबद्ध रचनाकार हैं। पिछले एक लम्बे समय से उनकी खोमोशी जिन स्थितियों पर मनन करती रही है, उसकी आवाज को हम उनके हाल ही में इधर नया ज्ञानोदय में प्रकाशित हुए नेल्सन मंडेला के पत्रों का अनुवाद एवं जनसत्ता, समयांतर, कथादेश और अहा जिन्दगी में अनेकों प्रकाशित साहित्यिक अनुवादों के रुप में देख सकते हैं। आज वैश्विक पूंजी का जो रुप सामने आया है उसने दुनिया के बाजारों पर कब्जा करने की जिस हिंसक कार्रवाई को जन्म दिया उसके खिलाफ जारी वे छोटे प्रतिरोध के बिन्दु जो इधर उधर बिखरे पड़े हैं, यादवेन्द्र पूरी शिद्दत से उन्हें एक जगह इकक्टठा करते जा रहे हैं। विज्ञान के अध्येता यादवेन्द्र इस बात को बखूबी जान रहे हैं कि विज्ञान को भी बंधक बनाकर अपने तरह से इस्तेमाल करने वाला यह तंत्र न सिर्फ सामूहिकता से भरी मानवीयता के खिलाफ है बल्कि वह एक ऐसा सांस्कृतिक वातावरण भी रच रहा है जिसमें उसकी आमानवीय कार्रवाइयां जायज ठहराई जा सके।

यादवेन्द्र जी ने हमारे आग्रह को स्वीकार करते हुए अलबर्ट आइंस्टाइन का सिगमंड फ्रॉयड को लिखा एक महत्वपूर्ण पत्र हमें अनुवाद कर मुहैया कराया है। उनके इस अनुवाद को यहां प्रकाशित करते हुए हम उनका स्वागत भी कर रहे हैं और आभार भी। आगे भी ऐसी सामाग्री, जो समय समय पर हमें उनसे प्राप्त होती रहेगी, जैसा कि उन्होंने वायदा किया है, हम प्रकाशित करते रहेगें।


आधुनिक काल के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में से एक अलबर्ट आइंस्टाइन सजग नागरिक व चिंतक भी थे। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद और द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरु होने से पहले "लीग ऑव नेशंस" (संयुक्त राष्ट्रसंघ का पूर्ववर्ती) द्वारा गठित विश्व भर के बुद्धिजीवियों के एक दल के नेता के तोर पर उन्होंने युद्ध के कारणों ओर मानव मन की गुत्थियों को समझने की कोशिशें कीं - उसी क्रम में विज्ञान के इस शिखर पुरुष ने मनाविज्ञान के तत्कालीन शिखर पुरुष सिगमंड फ्रॉयड को पत्र लिखकर उनकी विशेष राय जाननी चाही। दुर्भाग्य से आइंस्टाइन और फ्रॉयड का यह पत्र-व्यवहार हिटलर के सत्तासीन होने के कारण उनके जर्मनी छोड़कर चले जाने के बाद नाजी शासन द्वारा जब्त/नष्ट कर दिया गया।


अनेक दशकों बाद यह दस्तावेज जब मिला तो इसको धरोहर के तौर पर प्रतिष्ठा प्रदान की गई। यहां आज के दौर में बेहद प्रासंगिक आइंस्टाइन के इस पत्र का अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है। यह पत्र ऑटो/नाथन एवं हींज नार्डेन द्वारा संपादित पुस्तक "आइंस्टाइन ऑन पीस" (शाकेन बुक्स, न्यूयार्क/1960 से उद्धृत है। ) - यादवेन्द्र

09997642661



प्रिय श्री फ्रॉयड

सत्य की तह तक जाने की आपकी ललक का मैं बड़ा प्रशंसक रहा हूं और यही ललक आपकी सोच को दिशा प्रदान करती है। आपने अदभुत बोधगम्यता के साथ हमें समझाया है कि मानव मन अनिवार्यत: जैसे प्रेम और जीवन की लालसा से संचालित होता है, वैसे ही आक्रामक और विध्वंसक प्रवृत्ति भी इसी का अविच्छिन अंग है। साथ ही साथ आपके युक्तिपूर्ण तर्क युद्ध की विभीषिका से मानव की आंतरिक और बाहरी मुक्ति के प्रति आपकी गहरी निष्ठा भी साबित करते हैं। जीसस से लेकर गोथे और कांट तक नैतिक और धार्मिक नेताओं की ऐसी अटूट परम्परा रही है जो अपने काल और स्थान की सीमा का अतिक्रमण कर ऐसी ही गहरी आस्था की धारा प्रवाहित करते रहे हैं। यह बात कितनी महत्वपूर्ण है कि पूरी दुनिया ने ऐसे सभी व्यक्तियों को अपना नेता स्वीकार किया जबकि मानव इतिहास की धारा बदल देने की उनकी कामना असरहीन ही रही। हमारे चारों ओर ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहां राष्ट्रों का भाग्य निर्धारित करने वाले सभी कामकाजी औजार पूरी तरह से गैर जिम्मेदार राजनैतिक नेताओं के हाथें में अनिवार्य तौर पर निहित हैं।


राजनैतिक नेता और सरकारें बल प्रयोग से या आम चुनाव के जरिए शक्ति प्राप्त करते हैं पर राष्ट्र के नैतिक या बौद्धिक स्वरूप में इस शक्ति को श्रेष्ठता का प्रतीक नहीं माना जा सकता। हमारे समय में बुद्धिजीवी वर्ग विश्व के इतिहास पर किसी तरह को प्रत्यक्ष प्रभाव डालने की स्थिति में नहीं है - ये इतने अलग-अलग हिस्सों में बंटे हुए हैं कि आज की समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए भी इनमें आपसी सहयोग मुमकिन नहीं। आप मेरी इस बात से सहमत होगें कि दुनिया के अलग भागों में काम और उपलब्धियों के तौर पर अपनी योग्यता और विश्वसनीयता प्रमाणित कर चुके लोगों का एक खुला मंच बनाकर परिवर्तन की मुहिम शुरु की जानी चाहिए। इस अंतराष्ट्रीय समूह के बीच विचारों का आदान-प्रदान निरंतर चलता रहेगा जो राजनैतिक समस्याओं पर निर्णायक प्रभाव डाल सकता है। बशर्ते सभी सदस्यों के हस्ताक्षरयुक्त वक्तव्य अखबारों में प्रकाशित किये जाऐं। मुमकिन है ऐसे मंच में वे तमाम कमियां हो जो अब तक प्रबुद्ध समाजों के अध:पतन का कारण बनती रही हैं और मानव प्रकृति की अपूर्णता (imperfection) के मद्देनजर पतन की गति की और बढ़ जाए। पर क्या इन खतरों का हवाला देकर हम ऐसे मंच के गठन की कोशिश छोड़ दें और हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाएं ? मुझे तो यह अपना अनिवार्य दायित्व लगता है।


वास्तव में ऊंचे कद के बुद्धिजीवियों का ऐसा मंच एक बार अस्तित्व में आ जाए तो अगले कदम के रूप में धार्मिक समूहों को साथ में जोड़ने की जोरदार कोशिशें शुरु की जा सकती हैं जिससे सब मिलजुल कर युद्ध के विरुद्ध संघर्ष छेड़ सकें। ऐसे मंच के गठन से उन अनेक व्यक्तियों को नैतिक बल मिलेगा जिनके इरादे तो नेक हैं पर उन्हें नैराश्यपूर्ण समर्पण का फालिज मार गया है - इतना ही नहीं इससे लीग ऑव नेशंस को घोषित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भी महत्वपूर्ण नैतिक समर्थन मिल सकेगा।


इस मौके पर मैं अपना निजी हार्दिक सम्मान प्रेषित कर रहा हूं और आपके लेखन को पढ़ने में व्यतीत किए गए आनन्दपूर्ण समय के लिए आपको धन्यवाद दे रहा हूं। यह बात मुझे बहुत चकित करती है कि आपके सिद्धांतों से असहमति रखने वाले लोग भी अक्सर अचेतन तौर पर अपने विचारों और भाषाओं में आप ही की शब्दावली का प्रयोग करते पाए जाते हैं।



आपका

अलबर्ट आइंस्टाइन


अनुवाद - यादवेन्द्र

1 comment:

मीत said...

Thanks for the post Sir.