Saturday, December 5, 2009

सामूहिक प्रतिरोध जरूरी है

29 नवम्बर 2009 के जनसत्ता में प्रकाशित विष्णु खरे जी के आलेख पर बहुत सख्ती से न भी कहा जाए तो भी यह तो देखा ही जा सकता है कि एक गैर जनतांत्रिक शासकीय (साहित्य अकादमी एक स्वायत संस्था है, बावजूद इसके ) प्रक्रिया के खिलाफ उनकी टिप्पणी आत्मरक चिंताओं से घिरी है जिसमें उस प्रक्रिया की जो साहित्य संस्कृति को भी बाजार का हिस्सा बना रही है, मुखालफत कम और खुद की आत्मतुष्टी कहीं ज्यादा है। विरोध के नाम पर जो कुछ है उसमें विरोध की संभावना को जन्म देने वाली चिंताओं की बजाय एक ताल ठोकू और ललकार भरी चुनौति के साथ खुद मामले से पल्ला झाड़ लेने की कवायद भी। व्यक्तियों को निशाना की बनाने की यह ऐसी प्रवृत्ति है जो खुद को ही चर्चा के केन्द्र में देखने की खराब मंशाओं भरी मनौवैज्ञानिक बिमारी है। एक वरिष्ठ एवं जिम्मेदार आलोचक और नागरिक की इस प्रवृत्ति पर आखिर सवाल क्यों नहीं उठना चाहिए जो किसी भी घटनाक्रम में सनसनी पैदा करने वाली एक बाजारू मानसिकता का परिचय बनकर सामने आ रही है। मामला देश की सर्वोच्च संस्था साहित्य अकादमी द्वारा एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी के साहित्यिक, सांस्कृतिक चेहरे को चमकाने वाली बेहद गैर जनतांत्रिक प्रक्रिया का है। जनता के द्वारा चुनी हुई एक सरकार का बहुराष्ट्रीय पूंजी की वाहक सैमसुंग कम्पनी के तिजारती मंसूबों को सांस्कृतिक चेहरा प्रदान करने वाली घृणित मानसिकता का है। उसकी मुखालफत होनी ही चाहिए और सामूहिक रूप से होनी चाहिए। ऐसी किसी भी जनतंत्र विरोधी कार्रवाई की मुखालफत ताल ठोकू वक्तव्यों से संभव नहीं, यह बात विष्णु जी की समझ नहीं आती क्या ? विष्णु जी ही क्यों अन्य उनकी जैसी ही समझदारी रखने वालों को भी भली प्रकार से मालूम होगा कि एकल प्रतिरोध का कोई मायने नहीं। फिर इतने मजबूत तंत्र के सामने तो कोई नहीं। बावजूद इसके विष्णु जी साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त चंद कवियों के नाम ही इसके प्रतिरोध का ठेका क्यों छोड़ देना चाहते हैं फिर ? सामूहिक कार्रवाई की किसी ठोस पहल की शुरूआत करने की बात विष्णु जी क्यों नहीं करना चाहते, जनपक्षधर लेखकों के संगठनों के सामने वे इस सवाल को क्यों नहीं रखना चाहते ? ऐसी किसी भी नीति के विरोध में किसी अकेले व्यक्ति के विरोध का क्या मायने ? लेखक संगठनों को चाहिए कि ऐसे सवालों पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर एक राय तैयार करें और किसी ठोस कार्यनीति की शुरूआत हो। जिसमें साहित्य अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कारों का मामला ही नहीं, दूसरे, अन्य घरानों द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार और लेखकीय नैतिकताओं से जुड़े अन्य सवालों पर भी एक सर्वानुमति कायम हो। ठीक वैसे ही जैसे दलित शोषित आम जन के बारे में और साम्प्रदायिकता के मामले में एक सामाजिक स्वीकृति बनी हुई है, वैसा ही, अमुक अमुक पुरस्कार के बारे में भी स्पष्ट हो। वरना तो किसी रचनाकार द्वारा किसी पुरस्कार को ग्रहण कर लेना और किसी का छोड़ देना व्यक्ति की निजी नैतिकता का मामला हो जाएगा, जो कि आज भी ऐसा ही बना हुआ है। पुरस्कारों को रचनाकारों का निजी मामाला जैसा मानने की समझदारी पर लेखक संगठनों को विचार करना चाहिए और उसे सार्वजनिक मसला बनाना चाहिए। कौन सा पुरस्कार किस घराने और किस संस्था द्वारा किस मंशा के लिए दिया जा रहा है, इसे वक्त बेवक्त के हिसाब से परिभाषित करने के गैर जनतांतत्रिक रवैये पर भी होने वाली थुक्का-फजिहत से भी बचा जाना चाहिए। सिर्फ छिछालेदारी करना ही यदि रचनात्मक अलोचना है तो विष्णु जी के वक्तव्य पर खूब ताली पीटी जा सकती है। आखिर वरिष्ठ अलोचक ही तो पहले व्यक्ति है न जो हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा सैमसुंग के सहयोग से दिए जाने वाले रवीन्द्र पुरस्कार की मुखालफत कर रहे हैं !!!!     

-विजय गौड़

5 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

मुझे अभी एक दोस्त ने अकादमी के सूत्रों के हवाले से बताया कि यह पुरस्कार दक्षिण कोरियाई सरकार का है और सैमसंग या किसी और कंपनी से इसका कोई लेना देना नहीं. चूंकि कवि रवींद्र वहाँ गए थे इसलिए वहाँ की सरकार इसे उनके नाम पर चाहती है. इसके मानपत्र और स्मृति चिन्ह पर भी कोरियाई सरकार का आधिकारिक निशान होगा, किसी कंपनी का नहीं. यह पूरी तरह सरकारी आयोजन होगा, जिसके लिए सरकारी मसौदा भी तैयार किया जा रहा है या शायद किया जा चुका है. खरे जी के लेख के आलोक में सोच रहा हूँ कि सूचना अधिकार के तहत अकादमी से इसके बारे में दरियाफ़्त करुँ ताकि हक़ीक़त जान सकूं.

गिरिराज किराड़ू said...

दस बरस तक अकादमी के उपसचिव रहे और सचिव न बन पाये विष्णु जी यह समझते हैं अकादमी 25 बरसों से पतन की राह पर है यानि ठीक तभी से जब वे उससे बाहर हुए। अब इस अदा पर क्या कहा जाये। उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार नहीं मिला इसलिये प्रतिरोध करने का काम उनका कैसे हुआ, क्या विजयजी आप इतना भी नहीं समझे।

और अब मिलने के कोई आसार नहीं, ऐसे में बड़ा सेफ प्रतिरोध है एक लेख लिखना और सबको लताड़ना।

Bhim Singh said...

Mr. Vijay, I dont think you know how to "read". First take a lesson in proper and correct "reading". You should not rush to post your illogical utterings just to feed this nonsense blog.

You have ridiculed Mr. Khare for his 'solitary resistance' and said that his article is just to glorify himself and keep himself in limelight, it has no real worry or concern. Is this the way to read the things ? Merely because you have a blog, you have a right to say anything, abuse others and issue chargesheets ? Who are you to issue chargesheets ? Wherefrom you have earned this right ? What you have done in your life which gives you a right to say such things ? Isn't your comment also just an attempt to ridicule Mr. Khare and settle some old score ? Where is the 'joint resistance' in your comment which you have advocated so vociferously in the style of a crusader ?

The purpose of Mr. Khare's article was just to inform about the clandestine handshake of Sahitya Academy and Samsung. He has not claimed anything more than this. Instead of reading it in proper and correct perspective, you have hastily posted your nonsense utterings on your silly blog. But there is a limit of idiocy.


Bhim Singh

अशोक कुमार पाण्डेय said...

शिरीष और गिरिराज को पढने के बाद तुरंत कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं।

well mr bhim singh (?) i always wonder why all the 'saints' always come as anonymous! why shoud we give you any damn importance ? just because you have a silly expertise to defend someone by posting a comment in english?

who r u? vijay is a known writer and this blog has participated positively in many impotant arguments. and you? someone who doesn't have dare enough to show his real face? who are you? this is limit of hippocracy...dare to say brave things hiding ones identity.

अजेय said...

# विजय,शिरीष. भाड़ मे डालिए इन पुरस्कारों को. भाई , अपन लिखें और लिखते रहें बस.

# भीम सींग, आप डरा क्यों रहे हो भाई अंग्रेज़ी में?

# अशोक , तुम ने से सही जवाब दिया. वर्ना लोग अंग्रेज़ी मार कर दबका देते हैं हम हिन्दी वालों को.