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Saturday, May 16, 2026

विजय गौड़ की वैचारिकी -अरविंद शेखर

(  विजय गौड़ की सामाजिक/ सांस्कृतिक गतिविधियों का क्षेत्र बहुत व्यापक है। विजय गौड़ के जन्म दिवस के अवसर पर उनके लेखन की वैचारिकी पर आधारित अरविन्द शेखर का आलेख प्रस्तुत है)
 

  

मुक्तिबोध अक्सर पूछते थे- “पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? ”

 जब हम विचारधारा की बात करते हैं तो क्या हमें व्यक्ति के रचनाकर्म और उसके सार्वजनिक व निजी जीवन के अंतर्द्वंद्व पर एक नजर नहीं डालनी चाहिए।

अक्सर हमने देखा है कि कोई रचनाकार अपनी रचना में जिन मूल्यों का पैरोकार होता है अपने जीवन में उसके ठीक उलट। ऐसे में उसकी रचनाएं अपना ताप ही खो देती हैं और रचनाकार सम्मान। मगर विजय गौड़ ऐसे नहीं थे। उन्होंने जिन मूल्यों को ठीक माना ठीक जाना। जीवन और रचनाओं उन्हीं मूल्यों की दृष्टि से देखा।

करीब तीन दशक के व्यक्तिगत संबंधो के कारण जीवन पर बोलने को बहुत है। मगर यहां मैं उनके रचना कर्म पर ही बात रखूंगा। उनके रचना कर्म में उनकी कविताएं हैं। कहानियां हैं। उपन्यास हैं, आलोचनात्मक लेख हैं और रंगकर्म भी। यह सब उनके गैर-बराबरी की दुनिया को देखने और उसे बदल डालने की उनकी बेचैनी जानने का जरिया है। उनके पहले कविता संग्रह का नाम है। ‘सबसे ठीक नदी का रास्ता’। उसमें एक कविता है –‘नीचे साहब की गाड़ी खड़ी है ’। यह कविता साफ करती है कि कैसे ताकतवर लोगों का वर्चस्व कायम है। वह कहते हैं-

मत हिलाओ हवा में

इस तरह अपने को पेड़

कि तुम्हारे पत्ते

साहब की गाड़ी पर गिरें

पेड़ यदि रहना चाहते हो जीवित

तो ध्यान रखो नीचे साहब की गाड़ी खड़ी है।

विजय गौड़ ट्रेड यूनियन आंदोलन में भी बहुत सक्रिय रहे। 90 के दशक में नई आर्थिक नीतियों की सरपरस्ती में कॉर्पोरेट पूंजी ने स्थानीय छोटे उद्योगों और मजदूरों पर जो कहर ढाया। उसी ने उन्हें अपना पहला उपन्यास ‘फांस’ लिखने को प्रेरित किया।

मध्यम वर्ग के साफ स्टैंड न ले पाने के ढुलमुलपन से उन्हें सख्त चिढ़ थी । यह खिन्नता उनकी रचनाओं में खासी तादाद में व्यक्त हुई है। मध्य वर्गीय कर्मचारी आंदोलनों की लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन की न बन पाने और महज निजी फायदों की लड़ाई बन जाने से खिन्न वह ‘कर्मचारी‘ कविता में तल्ख टिप्पणी करते हैं-

बस बची रहे मेरी पेंशन

ग्रेच्युटी

मेरा प्रोविडेंट फंड

फिर चाहे घर बेचो, दुकान बेचो, खेत बेचो,

खदान बेचो बांसुरी की तान बेचो

बेचो बेचो निकम्मे हिंदुस्तान को बेचो

बस बची रहे मेरी पेंशन

ग्रेच्युटी

मेरा प्रोविडेंट फंड

उनकी दृष्टि स्थानीय ही पर नहीं वैश्विक बदलावों पर भी थी। उसके देश में होते बदलावों से अंतरसंबंधो पर भी। -‘डॉलर’ कहानी में वह मदारी से कहलाते हैं- रुपया डॉलर में कनवर्ट हो गया तो बुश महाराज के पास पहुंच जाएंगे। और बुश महाराज दौड़ते चले आएंगे कि मदारी नहीं सद्दाम है। ...खतरनाक हथियारों का जखीरा है इसके पास। सोच जमूरे क्या हाल होगा तब। अगर बुश महाराज न आए तो भी विश्व समुदाय की अपील पर अपने प्रधानमंत्री तो सेना भेज देंगे ।

इसी दौर में देश में सांप्रदायिकता और पोंगापंथ का उठान शुरु हुआ तो उसके प्रतिरोध में उन्होंने ‘दिसंबर-1992’ कविता लिखी ।

आस्थाओं का जनेऊ

कान पर लटका

चौराहे पर मूतने का वर्ष

 बीत रहा है

बीत रहा है

प्रतिभूति घोटालों का वर्ष

सरकारों के गिरने

और प्रतीकों के ढहने का वर्ष

अपनी अविराम गति के साथ

बीत रहा है

सोमालिया की भीषण त्रासदी का वर्ष

हड़ताल, चक्काजाम

और गृह युद्धों का वर्ष

अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का वर्ष

हर बार जीतने की उम्मीद के साथ

हारने का वर्ष

साप्रदांयिकता की विषबेल के प्रतिवाद में उनकी कहानी ‘डॉ. जेड़ ए अंसारी होम्योपैथ’ है।  इसी तरह ‘देशद्रोही’ कहानी समाज में सांप्रदायिकता की बच्चों के मन में पैठा देने की कुछ संगठनों की निरंतर कोशिशों पर उनकी पैनी निगाह की बानगी है । 

समाज में गहरे पैठे हुए ब्राह्मणवाद के सांप्रदायिकता, परंपरा और संस्कृति का चोला पहनकर वैधता हासिल करने की कोशिशों के प्रति वह बहुत सतर्क थे। इसीलिए इसके नाम पर पाखंड के प्रश्रय के घनघोर विरोधी थे। कवि व लेखक बोधिसत्व की कविता ‘अब जबकि जान गया हूं’  की उन्होंने ‘आदत हो चुके ढकोसले’ शीर्षक से लेख लिख तीखी आलोचना की । वह कहते हैं- “रचनाकार का भौतिक जीवन और सांस्कृतिक जीवन क्यों एक नहीं होना चाहिए ? रचनाकार के जीवन की संपूर्ण पदचाप क्यों उसकी रचनाओं में सुनाई नहीं देनी चाहिए ? व्यवहार ज्ञान से बढ़कर है ।”

परिवार संस्था में पितृसत्ता किस तरह वर्चस्व बनाए रखती है और समानता पर आधारित समाज चाहने वाले भी किस तरह उसके जाल में फंसे होते हैं। इसी छटपटाहट पर उनकी कविता है-

संग-साथ इक्कीस साल

सबसे ज्यादा गुस्साया सिर्फ पत्नी पर

डरते-डरते काट दिए उसने इक्कीस साल

चाहा नहीं कभी मैंने पर, डरे वह

हरदम गुस्साया यूँ , आज तक जितना

काश, गुस्सा पाया होता, एक हिस्सा भी

गोली, लाठी और बौछारों से बेदम कर देने वाले

समाजद्रोहियों पर

अहंकार की मुँह चिढ़ाती मुस्कान पर

बना रहा शांत, कहलाया -भला

डराने भर को भी

गुस्सा न पाया हरामियों पर

इन इक्कीस सालों में ।

 

वह बहुत सारे मामलों में मध्यवर्गीय झिझक छोड़ जरूरी हस्तक्षेप करते थे। जैसे जब सुनील कैंथोला के नाटक ‘मुखजात्रा’ के मंचन में सरकार के कोपभाजन से बचने के लिए वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के राजनैतिक विचारों की बेदखली की गई तो विजय गौड़ ने विरोध जताते हुए, पूरे आग्रह के साथ रंगमंच के लिजलिजेपन पर तल्ख टिप्पणी की ।

विजय गौड़ की रंगकर्म की यात्रा बचपन में रामलीला से शुरू हुई तो उनके रंगकर्म ने 1994 में दृष्टि समूह के साथ ‘केन्द्र से छुड़ाना है उत्तराखंड लाना है’ जैसे नुक्कड़ नाटकों के जरिए उत्तराखंड आंदोलन में सांस्कृतिक दखल दिया। इसी दौर ने उन्हें उत्पीड़तों के साथ खड़े होने की अपनी विचारदृष्टि दी। 

ट्रैकिंग भी उनका प्यार था । तमाम दुरुह ट्रैक के बाद उन्होंने यात्रा संस्मरण भी लिखे। मगर उनमें केवल वहां का दुरुह भूगोल नहीं था। वहां के लोग थे उनका जीवन था और जीवन के द्वंद्व । शतरंज का भी उन्हें बहुत घना शौक था इसीलिए उनकी रचनाएं शतरंज के मोहरों की तरह व्यवस्था को चेकमेट करने की कोशिश करती हैं।

यह विडंबना है कि आज उन्हें उस दून लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर में याद किया जा रहा है, जिससे उन्होंने किनारा कर लिया था। यह बात और है कि दून लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर की ही मदद से उन्होने दयानंद अनंत की कहानी ‘कनाट सर्कस के कव्वे’ का एकल मंचन किया था मगर बाद में दून लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर में होने वाले कार्यक्रमों से इस तर्क के साथ किनारा कर लिया कि उसे स्थानीय संस्कृति कर्मियों के लिए निशुल्क उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उनका विरोध इस पर भी था कि दून लाइब्रेरी आंदोलनकारियों के धरनास्थल को बेदखल कर पाई गई जमीन पर खड़ा है। यह उनकी सच कहने की हिम्मत ही थी। ऐसे टकराव लेना और अपनी बात पर अड़ना उनकी फितरत में था। कई बार बहुत से राजनीतिक आंदोलन व्यवहारिकता तो देखते हुए अपने तौर तरीके बदलते हैं। सच कहने से होने वाले तात्कालिक असर से बचते हैं। वह बहस के दौरान पूरी मजबूती से लड़ते मतभिन्नता को स्वीकर करते लेकिन अपनी निश्चल हंसी के साथ लंबे समय तक मनभेद नहीं होने देते थे।

विजय गौड़ जो सच जानते थे कह देते थे। एक बार संभवतः रमेश बेदी ने अंग्रेजों और गोरखा सेना के बीच हुए खलंगा युद्ध पर एक नाटक लिखा था जिसमें किले में बंदी बनाकर रखे गए गढ़वालियों को गोरखा सेना के साथ अंग्रेजी साम्राज्यवाद से टक्कर लेते दिखाया गया था तो विजय गौड़ ने इसका इसलिए विरोध किया कि यह गोर्ख्याणी या गोर्ख्योल के आंतककारी सत्य से परे अवधारणा थी। सत्य के प्रति इसी आग्रह ने उन्हें आलोकुठि उपन्यास रचने को प्रेरित किया होगा। इस उपन्यास की कथावस्तु सुनने के बाद मुझे लगा था कि इसका कथ्य वर्तमान हालात में यह सर्वसत्तावादी सांप्रदायिक ताकतों को ही ताकत देगा। हालांकि जब उपन्यास आया तो वह इस तरह लिखा गया कि गलत हाथों का औजार न बन सके।  

आलोचनात्मक लेखन करते हुए उन्होंने ‘गंवई आधुनिकता’ का एक पद भी आविष्कृत किया। जो यह पड़ताल करता है कि समाज चाहे आधुनिक दिखता हो मगर उसमें सामंती अवशेष भरपूर बचे हैं।

नए -नए युवा होते विजय गौड़ ने शुरुआती दिनों में एक साहित्यिक फोल्डर ‘फिलहाल’ भी निकाला। इसी में आज के बहुत से नामचीन लेखकों की शुरुआती रचनाएं आईं। 1989 में ओमप्रकाश वाल्मीकि की पहली कविता पुस्तिका ‘सदियों का संताप’ विजय गौड़ के प्रयासों से ही प्रकाशित हुई थी।

संभवतःइसी दौरान उनमें दलित प्रश्न को समानुभूति से समझने की दृष्टि भी विकसित हुई। बंगाल के धर्म के नाम पर विभाजन, नमोशूद्रों का सुंदरबन तक विस्थापन, सवर्ण वर्चस्व मारीचझांपा के नरसंहार उनके उपन्यास ‘आलोकुठि’ का समर्पण ओमप्रकाश वाल्मीकि को भी इसीलिए है।

वर्ष 2008 से विजय गौड़ ने अपना साहित्यिक ब्लॉग ‘ लिखो यहां वहां ’ शुरू किया और उसके जरिए साहित्यिक जगत में सक्रिय हस्तक्षेप किया। उनके लेखन व व्यवहार में उत्तराखण्ड में मौजूद जातीय विभेद व सवर्ण वर्चस्व , ब्राह्मणवादी रूढ़ियों का विरोध स्पष्ट था। इसीलिए उन्होंने पहले खुद अपना विवाह और फिर अपनी बेटी पवि का विवाह बिना ढकोसले के किया।

यह एक विडंबना है कि जब उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद उसकी बेटी और पत्नी सदमें में थे तो उनके भाइयों और भतीजों को विरोध के बावजूद ब्राह्मणी कर्मकांड को थोपने का अवसर मिल गया। तो उनके दूसरे उपन्यास ‘भेटकी’ याद आ गया। भेटकी उन्होंने ‘फांस’ उपन्यास के बाद रचा था। यह नई आर्थिक नीतियों से उपज रहे ,समाज के हर क्षेत्र पर कब्जा कर रहे एक दलाल वर्ग और मनुष्य की बेहतर जिंदगी का सपना देखते, हालात बदलने के आंदोलनों के कमजोर पड़ने के क्षोभ की कथा है। उन पुरानी और नई बेड़ियों की पड़ताल है जो मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देती।

जब विजय गौड़ का देहांत हुआ तो लगा कि क्या भेटकी के उस पात्र की कथा दोहराई जाने वाली है। जिसने जीवनपर्यंत कर्मकांड पाखंड का विरोध किया मगर मृत्यु होते ही वह फिर हावी हो जाता है। लेकिन अगले दिन ही विजय गौड़ की बेटी पवि और पत्नी पूर्ति ने विजय गौड़ को सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए परिवार की झूठी धमकियों से विचलित हुए बगैर किसी भी किस्म का अनुष्ठान नहीं करने का ऐलान कर दिया। यह विजय गौड़ के विचारों की जीत ही थी और इस बात का भरोसा कि उनकी देह न रही हो मगर उनके विचारों को तिलांजलि नहीं दी गई है। 

हर व्यक्ति की तरह अपनी जड़ों से लगाव स्वाभाविक है। मौजूदा समय में पहाड़ में जिस तरह की सांप्रदायिक नफरत की राजनीति परवान चढ़ रही है। उससे वह उद्वेलित थे। पहाड़ से उनका लगाव पहाड़ के भूगोल से ज्यादा लोगों से था। वह इसी जमीन पर एक उपन्यास भी रच रहे थे जो अधूरा रह गया है। वह देवभूमि के आवरण में पहाड़ी जीवन की मुश्किलों को ढांपने की कोशिशों को बेपरदा करते हुए अपनी ‘भेड़ चरवाहे’ कविता में कहते हैं-

ऊंचे पहाड़ पर देवता नहीं

चरवाहे रहते हैं

-ये जानते हुए भी कि रुतबेदार लोग

उन्हें वहां से बेदखल करने पर आमादा हैं

वे नए से नए रास्ते बनाते

चले जाते हैं वहां तक

जहां जिंदगी की उम्मीद जगाती घास है

और है फूलों का जंगल

वह खराब हो चुकी चीजों को पैबंद लगाकर ठीक करने के हामी नहीं थे। उन्हें मुकम्मल तौर पर बदल देने की इंकलाबी सोच रखते थे- तभी उनके कविता संग्रह का नाम है ‘मरम्मत से काम नहीं बनता’

उसी की चंद पंक्तियां देखिए-

मैं तो एक साधारण दस्तकार हूँ

आप चाहेंगे जैसा, कर दूँगा

 

पर तजुर्बे की बात है यह,

पुरानी-धुरानी, जो

बेहद बेकार हो जाती हैं चीजें

मरम्मत भर से भी,

कुछ काम बनता नहीं।

 

वह नियतिवाद पर भरोसा नहीं करते। बुरे हालात से उदास नहीं होते। मनुष्य के बेहतर दुनिया बनाने के सपने और उसके आत्मबल पर भरोसा रखते थे। उम्मीद रखते थे कि अन्यायी व्यवस्था बदलेगी

वह ‘मेरी बच्ची ’ कविता में कहते हैं-

घट चुकी घटना

भाग्य का लेखा जोखा है।

ऐसा समझने वाले बेवकूफों की पांत में बैठकर

हताश और निराश नहीं होना

मेरी बच्ची

कुल मिलाकर विजय गौड़ ने अपने आस-पास अपने समय़ की पड़ताल करते हुए उससे टकराते हुए अपनी दृष्टि विकसित की। इसी दृष्टि से नई पीढ़ी से न्यायपूर्ण समाज की उम्मीद बनाए रखते हैं-

इसी लिए अपनी ‘बच्चों के लिए’ कविता में कहते हैं-

1-

बच्चों की खुशी में ही छुपा है

 बच्चों का दुख

 बच्चों के समर्पण में ही छुपा है

बच्चों का विरोध

बच्चे ही कर सकते हैं

जुल्म के खिलाफ जंग

बच्चे ही करेंगे विश्व में अमन

बच्चे ही चाहेंगे

बच्चों के लिए जीने की सही व्यवस्था

2-

बच्चे ही चुराएंगे समय

बच्चों की जिन्दगी से इस सबके लिए ।

3-

बच्चे चाहते हैं समता,

 न्याय देश में उचित व्यवस्था हो जाए

-आढ़ती का कहीं काम न हो

जमींदार की जमींदारी छिन जाए

और इस देश के नक्शे में

छब्बीस तरह के जूते बनाने वाली

एक भी फैक्ट्री न रह पाए।