(विजय गौड़ निरन्तर रचना-कर्म में तल्लीन रहते थे। वे एक साथ कई मोर्चों पर डटे रहते।सामाजिक-राजनैतिक गतिविधियों के अलावा साहित्य की बहुत सारी विधाओं में उनका दखल था। वे एक साथ बहुत सारी राचनाओं पर काम कर रहे होते।उनकी अप्रकाशित रचनाओं को सिलसिलेवार रखने में बहुत वक्त लगेगा। फिलहाल उनके द्वारा लिखे जा रहे उपन्यास के कुछ अंश प्राप्त हुए हैं जिन्हें यहाँ सिलसिलेवार प्रस्तुत किया जायेगा। प्रस्तुत है पहला अंश)
एप्रैंटिस लड़का
एप्रैंटिस लड़का कैंटीन से चाय पीकर लौटा था। लेबर ने आकर सूचना दी, सुपरवाईजर थापा ने स्टॉफरूम में बुलाया है। सूचना पाकर एप्रैंटिस लड़का स्टॉफ की ओर जा रहा था कि सामने पड़ गए ‘गैंग लीडर’ लाहौरी ने एक कुटिल-सी मुस्कान फेंकी। एप्रैंटिस लड़के को गैंग लीडर का इस तरह पेश आना भीतर से छलनी कर गया। दो दिन पहले ही एप्रैंटिस लड़के ने गैंग लीडर को बोल दिया था कि यदि चाय पीने के लिए कैंटीन जाने से गैंगलीडर को एतराज है, तो चाहे जहां रिपोर्ट करनी है, कर दो, चाय पीने तो जाऊंगा ही कैंटीन। लाहौरी उस्ताद को लड़के से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। गुस्से से दांत किटकिटा कर रह गया, लेकिन कुछ कर नहीं पाया। लड़के का तर्क था कि मैं एप्रैंटिस हूं, कोई वर्कर नहीं, जिसके लिए उसकी धौंस पट्टी सुनते हुए काम पर जुटे रहना मजबूरी हो। गैंग लीडर जिस तरह से गैंग के दूसरे कारीगरों पर धौंस पटटी जमाता था, लड़का उससे वाकिफ था।
यह बात गैंगलीडर भी जानता था, इसीलिए उसने लड़के के जवाब पर कोई प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा। एप्रैंटिस लड़का लाहौरी उस्ताद के गैंग में काम करना ही नहीं चाहता था। सुपरवाइजर थापा से याराना होने के कारण ही लाहौरी ने जबरदस्ती लड़के को अपने गैंग में पोस्ट करवा लिया था। उससे पहले लड़का उप्रेती उस्ताद के गैंग में काम करता था। उप्रेती उस्ताद भला आदमी था। उसे एप्रैंटिस के कहीं भी आने-जाने से कोई एतराज नहीं था। वह सच में उस्ताद ही था। रिफरेंस कैसे तैयार करना है और रिफरेंस से दूसरे एंगल्स को कैसे चैक करना है और कैसे एक मुकमिल प्रिज्म बनाना है, एप्रैंटिस लड़कों को वह सब कुछ सलीके से सिखाता था, उस वक्त बेशक उसके भीतर भी चाहे यही बात विशेष होती हो कि लड़का यदि सारे ऑपरेशन ठीक से करने सीख गया तो गैंग का काम खींचने में मददगार ही होगा। उसके सिखाये एप्रैंटिस एक कुशल कारीगर की तरह दिन में कम से कम पांच से सात प्रिज्म की रफिंग कर सकने में सक्षम हो जाते थे, वह भी बिना किसी टोकाटाकी के। उप्रेती उस्ताद को अपने गैंग के साथियों से ज्यादा एप्रैंटिस लड़के द्वारा बनाये गये प्रिज्मों पर ज्यादा भरोसा रहता था कि एक्जामिनर उन्हें पास करने में कोई हुज्जत नहीं करेगा।
लाहौरी पिछले कई दिनों से एप्रैंटिस लड़के को उप्रेती उस्ताद के गैग में काम करते देख रहा था। उसके मन में लड़के की मेहनत पर डाका डालने की नियत बलवती होती जा रही थी। एप्रैंटिस लड़कों को काम सिखाने के नाम पर उनसे गैंग का काम करवाने की प्रवृत्ति उसमें दूसरे लोगों से कुछ ज्यादा ही थी। ऐसे काम जिनमें मेहनत ज्यादा हो, या ऊबाऊ हो और गैंग का कोई भी वर्कर जिन्हे करने में अनाकानी करता हो, वैसे ही कामों में एप्रैंटिस लड़कों को जोत दिया जाता था। ऐसे कामों के लिए ही एप्रैंटिस लड़कों को गैंग में लेने की एक होड़ गैंगलीडरों के बीच चलती रहती थी। लेकिन उदंड लड़कों की डिमाण्ड कम रहती। गैंगलीडर ताक में रहते कि किस लड़के को अपने गैग में मांगे। सुपरवाइजर थापा काम करने में जुटे रहने वाले एप्रैंटिस को गैग में पोस्ट करने की एवज में गैग लीडर पर एहसान का बोझ लादे रहता था। लाहौरी तो हर वक्त ही सुपरवाइजर की चीरौरी करता रहता था ताकि अपनी पसंद के लड़के को वह अपने गैंग में पोस्ट करवा सके।
सुपरवाइजर थापा के बुलावे की सूचना पर एप्रैंटिस लड़का स्टॉफ रूम में पहुंच गया। सुपरवाइजर अकेला ही था, लड़के को डांट पिलाने लगा, ‘’मिस्टर तुम दो दिन से कहां-कहां हो, तुम्हारी रिपोर्ट है कि दिन भर कैंटीन में अड्डेबाजी कर रहे हो। देखो, यह चलेगा नहीं, ऐसा न हो कि मुझे तुम्हारी रिपोर्ट ऊपर करनी पड़े। चायवाला शॉप में चाय लाता है, यदि चाय पीने का इतना ही शौक है तो आज शाम से तुम यहीं चाय पिओगे।‘’ एप्रैंटिस लड़के ने कोई जवाब नहीं दिया, शांत ही खड़ा रहा। चाय तो लड़के ने पी नहीं थी फिर भी देर ही वापिस लौटा था, इस बात का उसे भान था। यदि अपराधबोध से घिरा न होता तो लड़का यह भी कह सकता था कि चाय के समय तो चाय पीने कैंटीन ही जायेगा। क्योंकि कैंटीन जाने की मनाही तो ट्रैनिंग-फोरमेन की ओर से भी नहीं थी। ट्रेनिंग सेक्शन में एप्रैंटिसों के लिए बोर्ड पर लगायी गयी सूचना में सुबह 9.30 से 10.00 बजे एवं दोपहर के भोजन के बाद 3.30 से 4.00 बजे का समय, दिन में दो वक्त, कैंटीन जाकर चाय पी सकने की छूट की तरह निर्धारित था। चाय का समय ही ऐसा होता जब ट्रेड के हिसाब से अलग-अलग शॉप में पोस्टिंग किये गये वे सभी एप्रैंटिस कैंटीन पहुंचते थे और दोस्तों के साथ होने का लुत्फ उठाते थे। जरूरी नहीं कि चाय पी ही जाए, लेकिन पहुंचते जरूर थे। चाय पीने-पिलाने के दौर तो महीने के शुरु में ही, स्टाइपेंड मिलने के कुछ दिन बाद, खत्म हो जाते थे, लेकिन कैंटीन तब भी उनकी गपबाजी का अड्डा बनी रहती थी। कैंटीन का समय उन्हें सामूहिक तरह से दिखने की वैधता प्रदान करता था। बिना चाय पीते हुए भी उनकी उपस्थिति से हो जाने वाली गहमागहमी, कैंटीन मैनेजर की आंखों भी चुभती थी। कुर्सियों को घेर कर बैठे हुए ग्रुप को वह घूम-घूम कर घूरता रहता था, लेकिन निर्धारित समय से पहले वह उन्हें उठ जाने को कह नहीं सकता था। उसका किलश्ना जारी रहता। ऊपर के अधिकारियों से रिपोर्ट करने के लिए वह तरह-तरह के झूठ बोलता। लेकिन सबूतों के अभाव में एप्रैंटिस लड़कों को कैंटीन आना जाने से रोक नहीं पाता था। उसकी रिपोर्ट का मान रखते हुए अधिकारी गण बीच-बीच में टैनिंग फोरमेन को आदेश देते रहते कि वह खुद देखे कि क्या मामला है कैंटीन में। फोरमेन को कुछ समझ नहीं आता तो वह सभी लड़कों को एकजुट करके डांट पिला देता, ‘’देखो यदि अब कोई रिपोर्ट मिली तो आप लोगों के लिए चाय की व्यवस्था कैंटीन की बजाय यहां ट्रेनिंग शॉप में ही करवा दी जाएगी। अभी सिर्फ सजा के तौर पर यह है कि जब तक कोई नया आदेश न दिया जाए, अस्थायी तौर पर आप लोगों के लिए कैंटीन फेसीलिटी बंद कर दी जा रही है। कोई भी कैंटीन नहीं जाएगा। आप लोगों के आगे के आचरण के बाद ही आर्डर को रिव्यू किया जाएगा।‘’ इस तरह से दो एक दिन के लिए एक अस्थायी सी रोक जरूर लग जाती थी। ट्रेनिंग-फोरमेन को बीच-बीच में खुद से भी हिदायत देनी पड़ती कि, ‘’कोई भी एप्रैटिंस तय समय के पहले या बाद में कांटीन में न दिखे, वरना मुझसे बुरा कोई नहीं।‘’ उसकी हिदायतें बार-बार सुन-सुन कर लड़के इस नतीजें पर पहुंच चुके थे कि अगले दो एक रोज कैंटीन जाते हुए इस बात की सावधानी बरती जाए कि एक तो समय से उठ लिया जाए और दूसरा यह भी कि कुछ कुर्सियां दूसरे लोगों के लिए भी खाली छोड़ दी जाए। ऐसे आपात समय में कैंटीन में बड़ी शान्ति नजर आने लगती थी। धीरे-धीरे फिर से आवाजों के शौर बढ़ने लगते और कैंटीन मैनेजर का किलशना भी।
सुपरवाइजर थापा की डांट खाकर एप्रैंटिस लड़का स्टॉफ रूम से बाहर आ गया और सीधे गैंग में ही लौटा। गैगलीडर के चेहरे पर शातिर मुस्कान थी। कुछ देर खामोशी में बिताने के बाद एप्रैंटिस लड़के ने ही सवाल किया, ‘’क्या काम करना है ।‘’
सवाल उसने गैंगलीडर से ही किया था, लेकिन सीधे संबोधित नहीं किया। गैगलीडर ने इसे अपनी जीत ही समझा। वह माने बैठा था कि सुपरवाइजर से रिपोर्ट करके उसने कायदे का काम किया और अब यह लड़का रास्ते पर आ जायेगा। मशीन के पास मिलिंग किये जा चुके प्रिज्मों के मोल्ड से भरी ट्रे रखी थी। उन सेमी फिनिस्ड प्रिज्मों की ओर इशारा करते हुए गैगलीडर ने लड़के को आदेश दिया, ‘’लंच तक इन्हें घिस देना है।‘’ उसकी भाषा में प्रिज्म बनाना इतना मामूली काम था कि वह जब भी किसी दूसरे को काम सौंपता तो घिसना ही कहता था। जबकि घिसने का मतलब सिर्फ घिसना भर नहीं होता। रिफरेंस सरफेश से लेकर दूसरी और तीसरी तरफ के एंगल एवं पिरामिड को भी ड्राइंगि के मुताबिक दुरूस्त करने से ही प्रिज्म का रफिंग ऑपरेशन पूरा होता है। वहां कुल चार ट्रे रखी थी जिनमें मिलिंग आपरेशन के बाद रफिंग करने के लिए रखे गये टैंक के अपर प्रिज्म के मोल्ड थे। एक ट्रे में चार प्रिज्म, यानी बारह प्रिज्मों को वह लंच तक घिसने के लिए कह रहा था। जबकि वह खुद जानता था कि एक कुशल पीस वर्क वर्कर के लिए भी पूरे दिन लगकर काम करने पर दस-बारह से ज्यादा प्रिज्म बनाना आसान नहीं। एप्रैंटिस लड़के ने कोई जवाब नहीं दिया। प्रिज्म घिसने के वक्त छिटक कर कपड़ो पर चिपक जाने वाली गीली एम्ब्री से कपड़ों को बचाने के लिए पहने जाने वाले लॉग कोट को चढ़ाया, मशीन ऑन की और चक पर गीले एम्ब्री पाऊडर को लगाकर पानी के कुछ छींटे मारे। छींटों के साथ घूमते हुए चक से अतिरिक्त एम्ब्री बाहर को छिटकी और मशीन के ड्रम की अंदुरुनी सतह पर चिपक गयी। एप्रैंटिस लड़के ने सबसे पहले प्रिज्म की मिलिंग की जा चुकी सतह घिसकर रिफरेंस बनाया और अब दूसरी सतह को दुरुस्त करने लगा। एंगल प्रोटेक्टर से एंगल को चैक करता और फिर जिधर घिसने की जरूरत होती उधर से प्रिज्म को दबाकर घिसता रहा। एप्रैंटिस लड़के को समझ नहीं आया कि दबाव कभी जरूरत से ज्यादा और कभी कम क्यों हो जा रहा था, चैक करने पर उसे प्रिज्म दुबारा-दुबारा घिसना पड़ रहा था। बगल की मशीन पर काम कर रहा गैंगलीडर एप्रैंटिस लड़के को ताड़ता जा रहा था। वह टैंक के लोअर प्रिज्म घिस रहा था और दो प्रिज्म घिस चुका था। यह ठीक है कि एक लोअर प्रिज्म बनाने में मेहनत और कारीगरी का अनुपात अपर प्रिज्म की अपेक्षा कम होता है, लेकिन दो लोअर प्रिज्म बन जायें और अपर प्रिज्म की दूसरी सतह भी फिनिश न हुई हो तो साफ कहा जा सकता था कि या तो कारीगर अनजान है या उसने काम ही नहीं किया। लाहौरी उस्ताद ने एप्रैंटिस लड़के को उप्रेती उस्ताद के गैंग में काम करते हुए देखा हुआ था। उसे लड़के की क्षमताओं का मालूम था, इसलिए यह मान लेना स्वाभाविक था कि लड़का जानबूझ कर समय जाया कर रहा है। उसकी आंखे क्रोध से जलने लगी थी, लेकिन सीधे कुछ कहा नही। अबकी बार एप्रैंटिस लड़के ने प्रिज्म चैक किया तो पाया कि एंगल ‘ओ के’ है। गैंगलीडर के लगातार घूरते रहने से कम होता गया उसका आत्मविश्वास फिर से वापिस लौटने लगा। अब वह तीसरी सतह को ठीक करने में जुट गया। तीसरी सतह को फिनिश करना थोड़ा पेचीदा था। पहले की दो फिनिश सतह तीसरी सतह के लिए दो रिफरेंश हो गये थे। दोनों सतह से एंगल चैक करना फिर जरूरत के मुताबिक घिसना। प्रक्रिया की पुर्नावृत्तियों पर प्रिज्म तैयार हो सकता था। लेकिन, तीसरी सतह फिनिश होने से पहले ही एंगल प्रोटेक्टर न जाने कैसे उसके हाथ से झूटा कि प्रिज्म के कार्नर से टकराया और उस कौने पर इतना गहरा चिप उखड़ गया कि दुरुस्त करना संभव ही नहीं था। लाहौरी अब खामोश नहीं रह सकता था। फेफड़ो में भरी हुई हवा को पूरे दम से बाहर फेंकते हुए वह लड़के पर चिल्लाया। गलती के कारण लड़की की बोलती नहीं फूटी। गैगलीडर की आवाज सुनकर सुपरवाइजर भी स्टॉफ रूम से निकल आया था। लाहौरी के साथ वह भी लड़के को डॉंटने लगा, ‘’मिस्टर, नींद में काम कर रहे हो क्या ? मालूम है-यह लापरवाही महंगी पड़ सकती है। ट्रेनिंग में हो अभी, इसका मतलब यह नहीं लापरवाही के साथ काम करते हुए मैटेरियल लॉस करो।‘’ सुपरवाइजर की डांट में प्रशासनिक अहंकार था।
‘’लापरवाही से नहीं, जानबूझकर तोड़ा है इसने ... घंटे भर से देख रहा मैं तो... एक ही प्रिज्म को कभी ऐसे और कभी वैसे घिस रहा... पूछो जरा थापा साहब इससे, एक प्रिज्म कितनी देर में फिनिश होना चाहिए।‘’
लाहौरी की शिकायत में मैटेरियल की चिंता उतनी नहीं थी जितनी काम न होने की।
‘’चलो छोड़ो लहोरी... चैक करो तो डाइमेंशन... लोअर प्रिजम निकल सकता है इससे या नहीं। ठीक से काम करो मिस्टर। और सुनो लंच में जाने से पहले मुझको रिपोर्ट करना कितने प्रिज्म फिनिश किये तुमने।‘’
गैंगलीडर किलशते हुए वर्नियर से प्रिज्म की माप चैक करने लगा। सुपरवाइजर चला गया। एप्रैंटिस लड़के ने दूसरा सेमी फिनिस्ड प्रिज्म उठाया और उसे तैयार करने लगा। मानो डांट खाकर उसका कौशल वापिस लौट आया था। कुछ ही मिनटों में प्रिज्म की तीनों सतह फिनिश हो गई। एप्रैंटिस लड़के ने तैयार हो चुके प्रिज्म को फिनिश ट्रे में रख दिया। अगला मोल्ड उठाता कि गैगलीडर ने पहले वाले प्रिज्म को चैक कर लेना चाहा। प्रिज्म गैंगलीडर की निगाह में ठीक से फिनिश नहीं हुआ था। पिरामिड मामुली-सा आऊट दिखा रहा था, लेकिन अंडर टालरेंस ही था। डांटने का बहाना ढूढ़ंते हुए उसने जलती हुई निगाहों के साथ प्रिज्म को दुरुस्त करने को कहा और साथ में हिदायत भी दी कि प्रिज्म फिनिश ट्रे में रखने से पहले उससे चैक करवाए।
एप्रैंटिस लड़के ने मशीन ऑन की। घूमते हुए चक पर एम्ब्री लगायी। पानी के छींटे मारे और प्रिज्म को चक पर रखने से पहले बगल की मशीन पर काम करते हुए गैगलीडर को घूरते हुए देखा। गैंगलीडर की निगाहें भी लड़के की हरकतों पर टिकी थीं। नजर मिलते ही एप्रैंटिस लड़का हड़बड़ा गया और हड़बड़ाहट के साथ ही लड़के ने प्रिज्म चक पर रख दिया। प्रिज्म उसके हाथों की पकड़ से निकल गया, घूमते हुए चक के साथ बाहर को छिटका और मशीन के ड्रम से टकराया। एक्सीडेंट के कारण आवाज इतनी ज्यादा तेज थी कि हॉल में दूर तक काम करने वाले कामगारों ने अपनी अपनी मशीन के स्विच ऑफ कर दिये। प्रिज्म दो तीन जगह से टूट चुका था। मशीनों का शौर थम जाने की वजह से वातावरण में गहरी खामोशी ठहर गयी थी।
