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Friday, April 3, 2026

उपन्यास अंश: मरिचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी (दो)

 

 


(आजादी के साथ विभाजन की त्रासदी पर  हिंदी में लिखे गये कथा साहित्य में बंगाल के ऊपर बहुत कम लिखा गया है। पिछली सदी के आठवें दशक के उत्तरार्ध में सुंदरबन के द्वीप मरिचझाँपि में हुई घटनाओं को केन्द्र में रखकर इधर दो महत्वपूर्ण उपन्यास सामने आये हैं।  विजय गौड़ के उपन्यास ‘आलोकुठी’  के बाद नीलकमल का उपन्यास ‘मरीचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी’ गत वर्ष ही प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास किसी बड़े प्रकाशन से प्रकाशित नहीं है। इसके वितरण के लिये किसी ऑन-लाइन  प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं किया  गया है।प्रकाशन के  एक वर्ष बाद  पहले  संस्करण के बिक जाने की खबर यह बात भी साबित करती है कि अच्छी किताबें  बिना शोर-शराबे के भी पाठकों तक पहुँच जाती है।पिछली पोस्ट में हमने  इस उपन्यास का एक अंश प्रकाशित किया था। इस बार प्रस्तुत हैं  इस उपन्यास के कुछ और अंश ।)

 

 

 


सत्तर का उथल पुथल भरा साल

बादल को अपना गाँव बहुत याद आ रहा है। कोरानखाली के तट पर पसीने से तरबतर वह अपने लड़कपन के दिनों की स्मृतियों में खोया है। बीत गए दिनों की यादें दृश्य रूप में सामने उभरने लगती हैं। स्मृतियों में दूर तक चला जाता है बादल ।

खुलना के बटियाघाटा क्षेत्र के नारायणपुर गाँव में कोई स्कूल नहीं। बादल को तीन कोस दूर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता है। पाँव में चप्पल नहीं। लाल सालू कपड़े के टुकड़े में बाँध कर रखी कुछ किताबें, कलम, दावात लेकर वह स्कूल जाता है। स्कूल दूर तो अवश्य है किन्तु स्कूल का पथ बड़ा ही मनोरम है। दूरी का एहसास कभी नहीं हुआ। कितना कुछ है देखने के लिए। दृष्टि को विस्तार देते धान खेत यहाँ से वहाँ तक फैले हुए। धान खेतों के बीच से नर्म घास वाले आल यानि मेंड़। कई बार मेंड़ पर घोंघे अपनी गति से चलते हुए मिलते तो वह ठहर कर देखने लगता। घोंघा कितना विचित्र प्राणी है। धान खेत से निकल कर वह आल के किनारे किनारे अपनी मस्ती में चलता तो उसकी सूंड़ दिखाई देती। ज़रा सी आहट पाते ही वह अपनी खोल में छुप जाता। इतने सख्त खोल में कैसी मुलायम जान बसती है। वह आश्चर्य करता। धान की हरी पत्तियों पर शिशिर की बूंदें बादल  को अपनी तरफ खींचती हैं। वह अपनी अंगुलियों से शिशिर की हर बूंद को स्पर्श कर लेना चाहता। कभी कोई छोटी सी चिड़िया कुछ गाती हुई ऊपर से उड़कर निकल जाया करती। खेतों से निकलते ही एक बागान उसे मिलता जिसमें आम, जामुन, कटहल और न जाने कितने पेड़ हैं। जामुन के मौसम में वह मीठे जामुन के लोभ में अक्सर स्कूल का ध्यान ही भूल जाता है।

यह गिरींद्र किशोर चैधरी का बागान है। बागान के भीतर एक कुआँ है। बरसात के दिनों में कुआँ कैसे मुँह तक भर आया करता है। मेंढक की टर्राहट खेतों से ही सुनाई देने लगती। बागान से निकल कर वह कुछ दूर चलता है कि फिर एक बड़ा माठ आ जाता है। एकदम खुला हुआ बड़ा सा माठ। इस माठ में लेकिन गाँव के लड़के खेलने नहीं आते हैं क्योंकि यहाँ एक पीर की मजार है। माठ के आगे फिर धान खेत दूर दूर तक दिखाई देते। धान खेतों के आल से होता हुआ वह सीधे अगले गाँव में आ जाता। यह कुम्हारों का गाँव है। वे आँव में मिट्टी के बर्तन पकाते हैं। उनके बनाए बर्तन अच्छे मौसम में अक्सर ही धूप में सूखते रहते हैं। इस गाँव के घरों में मुर्गियाँ और बकरियाँ पालते हैं सभी लोग। बकरी के नन्हें पोना फुदकते हुए बादल  के रास्ते में आ जाते तो वह उन्हें सहला कर आगे बढ़ जाता। इस गाँव के बाद उसका स्कूल दिखाई देने लगता। स्कूल जाते हुए कई बार धान खेतों में उसे मछलियों की सरसराहट सुनाई देती। ऐसा तब होता जब धान खेतों का पानी कम हो जाता और खेत में बीच-बीच में गड्ढों में पानी एकत्रित हो जाता। ऐसा भी हुआ कई बार कि सामने मछली दिख गई तो बादल से आगे चला नहीं गया। वह खेत में उतर कर बड़ी चतुराई से मछली को पकड़ लेता और वहीं किसी गड्ढे को पहचान कर उसमें उन्हें छोड़ देता ताकि स्कूल से लौटते हुए वह इन मछलियों को वहीं से फिर पकड़ सके। माँ उसकी इस छेलेमानुषी के लिए बहुत डांटती है। 

जिन लड़कों के पास साइकिलें हैं वे दूसरे रास्ते से आते हैं। बादल  को स्कूल के दिनों में दो चीज़ों का बड़ा शौक रहा है। एक तो साइकिल और दूसरा रेडियो। दोनों ही उसके पास नहीं हैं। बादल  कभी-कभी दोस्तों से उनकी साइकिल माँग कर चलाने का अभ्यास किया करता। उसे साइकिल चलाने में बहुत मज़ा आता है। रेडियो का शौक तो ऐसा कि उसे अक्सर रेडियो के सपने आते। एकदिन जब वह पढ़ लिख कर चाकरी करेगा, पैसे कमाने लगेगा तब अपने लिए एक साइकिल और एक रेडियो ज़रूर खरीदेगा, वह ऐसा सोचा करता। स्कूल काफी बड़ा है। उससे भी बड़ा है स्कूल से लगा खेला का माठ। स्कूल के अंदर एक कृष्णचूड़ा का पेड़ है। गर्मियों के दिन में वह चटक लाल रंग वाले फूलों से भर जाता। माठ के एक कोने में तेंतुल यानि इमली का पेड़ है। इमली पर फल लगते ही बच्चों की शरारतें बढ़नी शुरू हो जातीं। आते जाते वे ढेला फेंकते। कच्ची और खट्टी इमली का स्वाद बच्चों को बहुत भाता है। और जब इमली पक जाती तब तो कहना ही क्या। पकी इमली के लिए तो कई बार बच्चे माठ में देर तक पड़े रहते। वे इमली के बीज इकट्ठा करते और उससे खेलते। स्कूल के बाहर एक मिष्टि दुकान है। वहाँ की मिठाइयाँ बादल  को बहुत लुभाती हैं लेकिन उसके पास मिठाइयों के लिए पैसे नहीं होते हैं। एकदिन जब वह बड़ा होकर कमाने लगेगा तब खूब मिठाइयाँ खरीदेगा, वह ऐसा सोचा करता है।

बहुत थोड़े से खेत हैं बादल के पिता के हिस्से में। धान के लिए बीज डाले जाते खेत में। खेत के इस छोटे हिस्से को बीजतला कहते हैं। बीजतला की तैयारी बड़े जतन से की जाती। खेत को जोतकर उसमें पानी भर दिया जाता। माटी नर्म और मुलायम हो जाती तो उसे बराबर किया जाता। पानी जब बहुत कम रह जाता तब बीजतला में धान के बीज डाले जाते। बीज का धान अलग से बचा कर रखा जाता है। कुछ हफ्तों में बीजतला में माटी की सतह पर हरीतिमा उगने लगती। वर्षा आते-आते ये बीज पूरी तरह तैयार होते। तब तक बाकी के खेत तैयार हो चुके होते। बीजतला से धान के ताज़े उगे बीज की आँटी यानि बंडल बना कर उन्हें बड़े खेतों में रोपने के लिए ले जाया जाता। धान के चार छह पौधों का एक गुच्छा एक जगह रोप दिया जाता और इसी तरह छोटे छोटे गुच्छे थोड़ी थोड़ी दूर पर रोप देने के बाद पूरे खेत हरे हरे दिखाई देने लगते। कुछ ही दिनों में ये बीज नई जमीन में अपनी जड़ें जमा लेते और झूमने लहराने लगते। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली होती। धान के पौधे जैसे जैसे बढ़ते चासी की आशाएँ वैसे वैसे बड़ी होतीं। समय बीतता और फिर धान के पौधे में शीश यानि बालियाँ आने लगतीं। ऐसे समय में खेतों में निराई का काम होता जिसमें खर पतवार जैसे पौधों को खेत से चुनकर निकाल दिया जाता। जब धान की बालियों में दूध आने लगता तब खेतों से एक मादक गंध चारों दिशाओं में फैल जाती।

धान के पकने की आस धीरे धीरे सबकी आँखों में दिखाई देने लगती। धान की बालियों का रंग सुनहरा हो उठता। धान के पौधे भी सुनहरे पीले हो जाते। खेत का पानी सूखने लगता। यह धान की कटाई का समय होता। सारा परिवार हँसिया लेकर खेतों में चला जाता और

धान की कटाई होती। धान के गट्ठर बनते और सब उसे उठाकर घर ले आते। घर की लक्ष्मी घर आती। धान की झड़ाई में बादल को भी लगना पड़ता। घर के बाहर एक तरफ बाँस गाड़ कर ज़मीन से चार फुट ऊंचा एक डेस्क जैसा बना लिया जाता। ऊपर काठ का कोई पटरा हो तो और अच्छा। धान जितना दोनों हाथों में समा सके उठाकर उसे इस बेंच के पटरे पर पीछे से घुमाकर सिर के ऊपर से सामने की तरफ पीटा जाता। इससे धान पौधे से अलग होकर नीचे जमा हो जाता और बिचाली अलग कर ली जाती। धान को अभी

धूप में सुखाने की जरूरत है। धान में अभी नमी है। अभी चावल निकाले जाएंगे तो टूट जाएंगे। सूखे हुए धान को ढेकी में कूट कर चावल निकाल लिया जाता। नए धान से कितना कुछ पकवान घर घर में बनाया जाता है। वह एक युग है बादल के जीवन का। सबसे सुनहरा युग। अनवर बादल का बढ़िया दोस्त है। उसके घर वाले परम्परा से ही पाट का चास करते हैं। पाट से जूट तैयार होता जिसका अच्छा बाजार है । पाट की फसल के लिए पानी की आवश्यकता होती है और नारायणपुर में पानी की कोई कमी नहीं है। नदी नालों का विस्तीर्ण जाल है। पाट की फसल जब तैयार हो जाती तो उसे काट कर खाल में सड़ने के लिए छोड़ देते। पाट जब सड़ने लगता तब उससे एक अजीब सी गंध फैलती । इसे दुर्गंध कहना ज्यादा सही होगा। पाट की पत्तियाँ सड़ जातीं। पाट के तनों की छाल जब सड़ कर अलग होने की स्थिति में आती ऐसे समय में अनवर के परिवार के सारे पुरुष खाल में जाते। खाल में उतरकर वे पाट को पीटते हैं। पीटने से पाट के तने से रेशे अलग हो जाते और बच जाती पाटकाठी। रेशों को बड़े कायदे से लपेटकर अलग कर लिया जाता और पाटकाठी के बंडल अलग बांध लिए जाते। पाट का बाकी हिस्सा खाल में ही छोड़ दिया जाता। पाटकाठी से वे खेलते हैं। अनवर के घर इसे चूल्हे में भी जलाती है उसकी माँ। पाट के रेशे बाज़ार में बिकने के लिए जाते हैं। जूट के सामान तैयार करने वाली फैक्टरियाँ जिनकी हैं वे इसे खरीद लिया करते। इन रेशों से खाट बुनने की मज़बूत रस्सियाँ भी बनाई जातीं।

अनवर के पिता रसूलपुर के मदरसे में पढ़ाते हैं। पाँच वक़्त के नमाज़ी हैं और हज भी कर आए हैं। नियम कायदे के मामले में कट्टर। घर में औरतें पर्दा करती हैं और हिज़ाब पहनती हैं। ईद के त्यौहार पर इनके यहाँ बड़ी रौनक होती। सबके लिए नए नए कपड़े बनते। बड़ी मस्ज़िद के पास ईद का मेला लगता। अनवर सिर पर टोपी पहनता। अनवर खेल कूद में अव्वल है। खेलने कूदने में रुचि के कारण ही अनवर से बादल की दोस्ती बनी हुई है। अनवर मदरसा में पढ़ने जाया करता। उसे हर खेल में महारत हासिल है। लम्बी छलाँग हो या ऊँची छलाँग, दौड़ हो या कुश्ती, अनवर के आगे कोई टिकता न था। कबड्डी में वह बादल को अपने दल में रखता है क्योंकि बादल  लम्बा और फुर्तीला है। अनवर के साथ ही बादल ने तैराकी सीखी। वे केले के तने लेकर नदी पोखर में उतर जाया करते तो बाहर निकलने का होश नहीं रहता। अक्सर घर से जब कोई बुलाने आ जाता और बहुत गुस्सा करने लगता तब वे पोखर से निकल कर चुपचाप लौट जाते। आरंभ में तो एकदिन बादल डूबते डूबते बचा। केले के तने के सहारे तैरते हुए वह पोखर के बीच तक चला गया। जाने क्या हुआ कि केला गाछ उससे छूट गया और बहकर दूर चला गया। वह डूबने उतराने लगा। उससे अब साँस नहीं लिया जाता है। ढेर सारा पोखर का पानी इसबीच वह पी चुका। तभी अनवर का

ध्यान उसकी तरफ गया तो वह तेज़ी से उस तक पहुंचा और बीच पोखर से उसे किनारे ले आया।

नारायणपुर में बाँस वन की कमी नहीं है। बाँस की झड़ियों में तरह तरह के पक्षी छुपे होते। बाँस की जब नई पत्तियाँ आतीं तो उनमें हरापन उतना नहीं होता। वे हल्का पीलापन लिए बिलकुल लिपटी हुई सी और बेहद नर्म और मुलायम होतीं तब। ये पत्तियाँ बादल  को बेहद प्रिय हैं। बाँस वन में पत्तियों से ज्यादा रुचि बादल की इस बात में रहती कि इनमें से कौन लाठी के लिए सबसे उपयुक्त है। उसे लाठियाँ बहुत पसंद हैं। लाठी खेला उसे पसंद है। बरसात के दिनों में जब नावें चलने लगती हैं तब लाठी के बिना वह घर से बाहर नहीं निकलता है। यहाँ वहाँ साँप निकलते हैं । लाठी से साहस रहता है। साँप के काटने से गाँव में कितने ही लोगों की मौत हो जाती है। उसने देखा है कि साँप के काटने से उसके दोस्त अनवर की एक बहन कैसे प्राण खो बैठी थी। वह कनेर के पेड़ से फूल तोड़ रही थी जब उसे साँप ने डस लिया। पूरे गाँव में खबर फैल गई। वह भी देखने गया। उसके मुँह से सफेद झाग आ रहा है। उसका चेहरा कैसा तो नीला पड़ता जा रहा है। ओझा और गुनी उसको बचा नहीं सके। कोई साँप का मंत्र काम न आया। बेहद ज़हरीला साँप था वह। साँप को पकड़ा नहीं जा सका।

सत्तर का उथल पुथल भरा साल। एक तरफ मुक्ति का संघर्ष तो दूसरी तरफ धार्मिक उन्माद की दिल दहला देने वाली खबरें। एक तरफ मुक्ति योद्धाओं की सक्रियता बढ़ रही है तो दूसरी और पूर्वी पाकिस्तान की खान सेना के वफादार रजाकार मुक्ति की चाह रखने वालों के दमन पीड़न में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वैशाख की ऐसी ही एक उदास शाम आई उस दिन। सूरज अभी अभी डूबा है पश्चिम में। रोज़ की तरह बाबा ने बादल को आवाज़ लगाई -ओरे खोका, दरवाजा ठीक से बंद करके तुमसब सो जाओ अब। मैं पहरा देने जा रहा हूँ ।

पिछले कुछ महीनों से यह रोज़मर्रा का काम हो गया है। रात के खाने के बाद पाड़ा-प्रतिवेशी सारे पुरुष मानुष नियम से मोहल्ले की हिफाज़त के लिए रातभर जागकर पहरा देते। लूटपाट और आगजनी की घटनायें बढ़ती जा रही हैं। बादल  के लिए यह सब एक पहेली जैसा है। वह सोच नहीं पाता कि अपने ही लोगों से आखिर हमें खतरा क्यों है। वे हमें क्यों मार देना चाहते हैं। क्या बिगाड़ा है हमने उनका।

नारायणपुर के माहौल में तनाव बढ़ता ही जाता है। बादल देख रहा है कि लम्बे समय से अनवर उसके साथ खेलने नहीं आता। ठीक से बात भी नहीं करता है वह बादल से। उसदिन बादल उसे खाने के लिए कुछ देने लगा तो उसने बड़े रूखेपन से जवाब देते हुए कहा -मुझे भूख नहीं है रे बादल, तू खा ले।

बादल ने निश्चय किया कि आज संध्या वह फुटबाल खेलने के लिए अनवर को बुलाने उसके घर जायेगा। गोधूलि वेला में जब वह उसके घर पहुँचा तो दरवाज़े पर ही ढेर सारे लोगों को देखकर ठिठक गया। एक मौलवी के साथ पंद्रह बीस लोग आँगन के बाहर आमगाछ के नीचे खाट पर बैठे हैं। वह केले के मोटे तने की ओट में छुप गया । अनवर कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा है।

मौलवी ने अपनी टोपी ठीक करते हुए कहा -बेशी मेलजोल की एकदम ज़रूरत नहीं है। जैसा मैंने समझाया वैसा ही करना है सबको, समझे न ? सबने आज्ञाकारी बालक की तरह अपने सिर हिलाए। मौलवी ने उठते हुए कहा -तो फिर चलता हूँ। सब उठ खड़े हुए। अनवर के पिता मौलवी के पीछे पीछे घर के बाहर तक आये। वह इन लोगों को देखकर थोड़ा घबरा गया और घबराहट में केले के झोंप से बाहर निकलने को हुआ। अनवर के पिता ने केले के झोंप की तरफ से पत्तों की सरसराहट की आवाज़ सुनी तो उधर नजर घुमाते हुए पुकारा -कौन है, कौन है वहाँ झोंप के पीछे छुपा हुआ! बादल  तबतक बाहर आ चुका है।  वह सकुचाते हुए बोला -चाचा, मैं बादल, अनवर घर पर नहीं है ?

दौड़ता हुआ बादल आँगन की तरफ गया। तब तक वे लोग घर से बाहर की ओर निकल चुके हैं। अनवर भीतर कमरे में लेटा कोई किताब पढ़ रहा है।

-क्या रे, क्या हुआ है तुझे ? इतने दिन खेलने क्यों नहीं आया ?

-मेरी तबीयत ठीक नहीं रे, बुखार-बुखार जैसा है।

बादल ने अनवर के माथे पर हाथ रखकर देखा। कपाल एकदम ठंडा है। उसे आश्चर्य हुआ कि वह इस तरह झूठ क्यों बोल रहा है।

-कहाँ है बुखार, कुछ भी तो नहीं। बहाना क्यों करता है रे पगले!

-अच्छा, अभी तू घर जा, कल आता हूँ माठ में खेलने, अनवर ने पीछा छुड़ाने की गरज से कहा। बादल उछल कर दालान से बाहर निकल आया । जाते जाते ज़ोर की आवाज लगाई उसने, कल आना जरूर!

अँधेरा घिर रहा है। अब खेलने का समय भी निकल चुका। माठ पार कर वह खाल के किनारे किनारे ऊँचे बाँध को पकड़कर चलने लगा। सहसा आसमान में धुंए का गुबार देखकर वह आश्चर्य से भर उठा। इतना बड़ा गुबार चूल्हों के धुंए से संभव नहीं है। धुँआ मंडलपाड़ा की ओर से उठ रहा है। कहीं आग लगी हो जैसे। वह तेज़ी से धुँए की दिशा में भागा।

पूरा मंडलपाड़ा धू-धू कर जल रहा है। उसका घर भी आग की चपेट में है। सबलोग बाहर से आग बुझाने में लगे हुए हैं। एक अजीब सी चीख पुकार का शोर चतुर्दिक व्याप्त है। सबकुछ जल रहा है। सारे लोग मिलकर भी आग पर काबू नहीं पा रहे हैं। पोखर से दौड़-दौड़ कर वे पानी लाते हैं और जलते घरों पर उलीच देते हैं। बाँस, मिट्टी और फूस के घर दहक रहे हैं। जबतक आग कुछ मद्धम पड़ती सबकुछ नष्ट हो चुका था। अगली सुबह वे राख के ढेर के बीच से अपने बचे खुचे सामान निकाल रहे हैं। उनके सिर पर कोई छत नहीं है।

अकेले मंडलपाड़ा ही नहीं खुलना ज़िले के इस अंचल के गाँवों में इस तरह की वारदातें अब आम होने लगी हैं। देखते देखते पलायन आरंभ हो गया है। बचे खुचे माल असबाब को लेकर ये लोग अपनी जान की हिफाज़त के लिए सीमांत की तरफ निकलने लगे हैं, सीमा पार जाने के लक्ष्य से। यह ज्येष्ठ मास है।

नारायणपुर में पिछले कई महीनों से तनाव की स्थिति है। नदी पर

बाँध की मरम्मत का काम चल रहा है जिसमें मंडलपाड़ा से काफी लोग काम पर लगे हुए हैं। ठेकेदार बड़ी मस्जिद के मौलवी का निकट संबंधी है। ठेकेदार नशे में था। एक लड़के के ऊपर साइकिल समेत गिर पड़ा। थोड़ी कहा सुनी हुई। वह गालियाँ देने लगा। लड़का भी अड़ियल स्वभाव का। और गलती तो ठेकेदार की ही है। वह क्योंकर दबता उससे। आवेश में हाथ का फरसा चला दिया ठेकेदार पर। ठेकेदार वहीं ढेर हो गया। नशे में तो वह है ही। उठकर घर जाने लायक भी उसकी स्थिति नहीं है। अगले दिन मस्ज़िदपाड़ा से एकदल लोग पंचायत के लिए बैठे गाँव में।

मस्ज़िदपाड़ा की पंचायत का मानना है कि यह आक्रमण छोटी जात वाले नमःशूद्र हिन्दुओं की तरफ से है और उन्हें इस देश में ही रहने का कोई हक नहीं। तनाव देखते देखते दंगे में बदल गया। बादल   के परिवार में माँ बाबा के आलावा एक बहन है। थोड़ी सी ज़मीन है उनके पास जिससे किसी तरह गुज़ारा हो जाया करता है। अब वह भी उनसे छिन रहा है। अपने बचे खुचे माल असबाब के साथ वे कालीबाड़ी के मंडप में शरण लेने को बाध्य हैं। बाबा अपनी जान पहचान के लोगों से संपर्क में हैं जो उनको इस मुसीबत से बाहर निकाल सकें। लेकिन कहीं से कोई मदद भी नहीं आती है। घर में अनाज के दाने तक नहीं हैं।

बादल का स्कूल जाना बंद हो गया। वह इसी साल नवीं क्लास में गया है। पढ़ाई लिखाई की कौन कहे अब तो जान के लाले पड़े हैं। शाक के पत्ते उबालकर पेट जिलाते हुए जैसे तैसे ज़िंदा होने का एहसास है। वह भी कितने दिनतक चलता जब अपने आस पास के लोग उनका देश छुड़ाने पर ही आमादा हों। पूर्णिमा की रात है यह जब वे, अपने समय के शरणार्थी, कालीबाड़ी मंडप में रात के बीत जाने की प्रतीक्षा में हैं और नींद है कि आँखों में समाती नहीं है। बाबा ने बादल की माँ को धीमे स्वर में बताया, एक दलाल के साथ बात हुई है मेरी। वह हमें उसपार ले जाने का बंदोबस्त कर देगा। टाका माँग रहा है। कलशी बाटी बिक्री करके हो या जैसे भी हो, कुछ न कुछ तो करना ही होगा। इस तरह कितने दिन बच सकते हैं हम। देश छोड़ कर जाना ही होगा अब, यहाँ गुज़ारा संभव नहीं दिखता।

कलशी बाटी बेचकर भला कितने पैसे आते। माँ के कुछ गहने हैं जिन्हें अब बेचने की नौबत आन पड़ी है। स्त्री धन ऐसे ही दुस्समय में पुरुषों को बचाता आया है। माँ के गहने इस तरह जाते देखकर बादल को भारी कष्ट हो रहा है। वह सोचता है एकदिन वह माँ के लिए ढेर सारे गहने बनवायेगा। जब वह बड़ा होकर कमाने लगेगा। बाबा का चेहरा इनदिनों कैसा तो कठोर सा हो गया है। कम बोलते हैं। कम खाते हैं। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ।

दलाल के कहे अनुसार वे मय सामान घाट पर एकदम काकभोर में ही जा पहुँचे। दलाल का कहीं अता पता नहीं है। घाट पर उस

अँधेरे में भी निरुपाय असहाय असंख्य मानुषजन अलग अलग दिशाओं से आ रहे हैं। मुँहमाँगी कीमत देकर डिंगी लेना जिनके बस में है वे उसपार जाने के लिए निकल जा रहे हैं। किसिम-किसिम के दलालों को घेरे लोग अपनी अपनी गुहार लगाते हैं। बादल ने अधीर होकर पूछा, बाबा, वो आदमी कब आएगा ? बाबा ने आश्वस्त करते हुए कहा, आयेगा, आयेगा, ज़बान दी है उसने हमें। दलाल ने अपना नाम गुलाम मोहम्मद बताया है और आश्वस्त किया है कि वह उनके लिए डिंगी का इंतजाम तो करेगा ही, वह उनके साथ साथ भी चलेगा और सीमांत पार करा देगा।

गुलाम मोहम्मद जब घाट पर पहुँचा तबतक काफी देर हो चुकी है। एक ही डिंगी घाट के किनारे लगी हुई है, वह भी लगभग लोगों से भरी हुई। बादल का किशोर मन उस डिंगी की प्रतीक्षा करते करते ऊब चुका है जो उन्हें लेकर जाने वाली है। वह एक क्षण के लिए बाबा के चेहरे को देखता तो दूसरे ही क्षण नदी घाट की ओर। इस संकट के आगे उन्हें भूख प्यास का अनुभव भी नहीं हो रहा है। गुलाम मोहम्मद को दूर से आता हुआ देख बाबा की आँखों में चमक आ गई। वे उठ खड़े हुए और लम्बी साँस छोड़ते हुए बोले, आ गया देखो। अब कुछ न कुछ बंदोबस्त ज़रूर हो जायेगा।

-अच्छा, हमारे लिए कौन सी नौका की व्यवस्था है ?

-आज तो नहीं हो पायेगा। आज मेरे घर में रह जाइए कष्ट करके। आज की रात ही आप सबको पार करा दूँगा। चिंता न करें।

गुलाम मोहम्मद उन्हें तफसील से समझाता रहा कि डिंगी के लिए भारी छीना झपटी चल रही है। एक माझी उन्हें आज की रात ही पार करा देगा। तब तक वे उसके घर पर आराम कर सकते हैं। गुलाम मोहम्मद सातक्षीरा का रहने वाला है। एक नाव से वे गुलाम मोहम्मद के गाँव तक आए। यहाँ से आगे सीमांत पार कराने का जिम्मा गुलाम मोहम्मद का है। लेकिन उससे पहले आज रात इन्हें एक और नदी को पार करना है। गुलाम मोहम्मद इन्हें अपनी नाव में पार करायेगा जहाँ से आगे इच्छामती तक फिर पैदल चलना होगा।

गुलाम मोहम्मद का घर साधारण सा एक कच्चा मकान है। साग भात का इंतजाम गुलाम मोहम्मद की बीवी ने कर दिया। भूख से बेहाल चार जन का यह परिवार आज गुलाम मोहम्मद के घर शरणार्थी है। रात जब थोड़ी गहराने लगी तब एकबार फिर वे घाट पर आये। गुलाम मोहम्मद आगे आगे चल रहा है। एक डिंगी घाट पर लगी है जिसमें कुछ परिवार पहले से ही अपनी गठरियाँ और अन्य सामान लेकर बैठे हुए हैं। गुलाम मोहम्मद ने उनसे डिंगी में बैठ जाने को कहा। उसने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि कुछ देर बाद एक दूसरी डिंगी में वह भी उस पार आ जायेगा और उनसे मिलेगा। रूपए पैसे वह पहले ही ले चुका है। उसके कहे पर विश्वास करने के अलावा इन लोगों के पास कोई उपाय भी नहीं है। वे उसपार उतरने के बाद घंटों गुलाम मोहम्मद की प्रतीक्षा करते रहे।

गुलाम मोहम्मद नहीं आया।