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Tuesday, May 19, 2026

‘डोडी, मोनी और भीतर की सच्चाइयाँ’ (हिन्दी साहित्य की उपेक्षितायेँ) : रश्मि रावत

 

 

 

 

 


 

 

(सुप्रसिद्ध आलोचक रश्मि रावत के लेखन में समता-मूलक समाज की स्थापना में बाधक जेंडर-आधारित विषमता के सवालों से टकराने की बेचैनी निरन्तर दिखायी देती हैं. हाल ही में हिन्दवी के आयोजन ‘अनंता’ में बोलते हुए उन्होंने हिंदी साहित्य में मौजूद जेंडर चेतना के सवालों पर कुछ महत्वपूर्ण बातें की हैं. यहाँ हम उनके वक्तव्य को लिपिबद्ध रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. )

 

 

डोडी, मोनी और भीतर की सच्चाइयाँ

(हिन्दी साहित्य की उपेक्षितायेँ)

धन्यवाद, शोभा जी। हिंदवी-रेख्ता की पूरी टीम, अनुराधा जी और अविनाश जी का भी आभार - हमें इस विषय पर बोलने का अवसर देने के लिए, और साथ ही इस बात के लिए भी कि इस बातचीत के विषय में ‘उपेक्षिता’ और ‘अनंता’ को एक साथ लिखा हुआ है।

मुझे तो ‘अनंता’ ही दिख रहा है, क्योंकि ‘उपेक्षिता’ तो उपेक्षा से गढ़ी जाती है। आज उपेक्षा की उपेक्षा ही की जाए। तय यह हुआ था कि मैं कथा-साहित्य पर दूसरे दौर में बात करूँगी और शुरुआत में कुछ ओपन रिमार्क्स दूँगी। लेकिन यहाँ कथा-साहित्य का ज़िक्र आ गया है, तो मैं उसे बस हल्के से छूते हुए आगे बढ़ना चाहूँगी। क्योंकि इस विषय को लेकर मेरी जो समझ है, उससे जो एक दायरा बनता है, उसका फ़ायदा मैं अपने कथा-साहित्य संबंधी विचारों को भी देना चाहती हूँ।

पहली बात तो यह है कि इस वक्त हम एक बहुत गहरे संकट के दौर से गुजर रहे हैं। पूरी दुनिया में हिंसा की एक ऐसी लहर फैली हुई है, जिसका कोई साफ हल हमें दिखाई नहीं देता। सभ्यता के सामने जो सवाल और मुश्किलें खड़ी हैं, उनका कोई ठोस जवाब अभी हमारे पास नहीं है। ऐसे युग संकट के समय अगर मैं ‘उपेक्षिताओं’ को पहचानने की कोशिश करूँ, तो... अगर हम मानते हैं कि जेंडर विषमता मौजूद है, और एक जेंडर को विशेष अधिकार मिले हुए हैं जबकि दूसरे को कमतर समझा जाता है - तो यह कहा जा सकता है कि सारी स्त्रियाँ किसी न किसी रूप में उपेक्षिता हैं।

हमारा अनुपात बोध ऐसा बिगड़ चुका है कि हम बहुत अजीब तरह से तुलना करने लगते हैं। किसी एक असाधारण स्त्री (या पुरुष) को बहुत ऊँचा स्थान देकर उसकी तुलना किसी साधारण पुरुष (या स्त्री) से करने लगते हैं। मैं अभी उस विस्तार में नहीं जाना चाहूँगी। अहम बात यह है कि अगर हम आज यहाँ तक पहुँचे हैं, तो इसका मतलब है कि उपेक्षिताओं के जिस बड़े परिदृश्य की बात थी, उसका काफी हिस्सा अब पार किया जा चुका है। कभी साहित्य के इतिहास में स्त्री एक छोटी-सी कोठरी में सिमटी हुई थी। फिर सुमन राजे का ‘आधा इतिहास’ आया, स्फुरणा देवी की लेखनी से विधवाओं की दुर्दशा सामने आईं........इतिहास के बहुत से गड्ढे इस बीच पार किए जा चुके हैं। जिन रास्तों पर चल कर वर्तमान में रोहिणी अग्रवाल, सुधा सिंह, गरिमा श्रीवास्तव, नीरजा माधव आदि अनेक लेखिकाएँ साहित्य और इतिहास को स्त्री-दृष्टि से खँगाल रही हैं, रच रही हैं। इन कोशिशों से मध्यकाल और नवजागरण के जो अँधेरे कोने, यानी ‘डार्क स्पॉट्स’, थे, उन पर काफी हद तक रोशनी पड़ी। वसुधा डालमिया के काम से हम यह समझ सके कि मल्लिका हिंदी की पहली उपन्यासकार थीं।

मैं चाहूँगी कि हम ज़रा कल्पना करें कि तथ्यों को खुली आँखों से देखने पर हमारे सामने कितना व्यापक परिदृश्य उभर सकता था। मगर हिंदी की संवेदना लंबे समय तक बहुत संकुचित रही। चाहे अल्पसंख्यक समुदाय हों, स्त्रियाँ हों, इतरलिंगी हों या हाशिये के अन्य समूह - हिंदी संवेदना का दायरा उनके लिए बहुत देर से खुला। जेंडर स्टडीज़ के केंद्र खुलने के बाद नई संवेदनाएँ सामने आई हैं। यह 80-90 के दशक के बाद का परिदृश्य है जब जेंडर की उपेक्षा असंभव हो गई। रेखा सेठी ने भी कहा कि हम महादेवी वर्मा को बस ‘नीर भरी दुख की बदली’ तक सीमित करते रहे। ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ पर ध्यान तब गया, जब जेंडर से जुड़े सवालों पर गंभीरता से सोचना अपरिहार्य हो गया। अब इस परिदृश्य में असली सवाल यह है कि उपेक्षिता आखिर है क्या? किन लेखकों-कवियों की उपेक्षा हुई। उनका नाम गिनाना तो वर्तमान के संकटग्रस्त दौर में बेमानी ही होगा, उसे जाने दीजिए। सबसे बड़ी उपेक्षा तो सत्य अर्थात यथार्थ की हुई। हमने आधी आबादी के सत्य को अपने भीतर शामिल ही नहीं किया। स्त्रियाँ आज़ादी के आंदोलन से लेकर समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय थीं - घर के भीतर भी और बाहर भी। वे नागरिकों को जन्म दे रही थीं, उनका निर्माण कर रही थीं, समाज को गढ़ रही थीं, और गांधी जी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका भी निभा रही थीं। इसके बावजूद उन्हें इतिहास और समाज में वह जगह नहीं मिली, जिसकी वे हकदार थीं। इस उपेक्षा की वजह से हमारा पूरा सामाजिक और सांस्कृतिक नक्शा इतना कुरूप, अधूरा और दृष्टिहीन बना। सबसे पहले अगर किसी चीज़ की हत्या हुई, तो वह सच्चाई थी। इसलिए मैं मानती हूँ कि सबसे बड़ी उपेक्षिता खुद ‘सच्चाई’ है। अगर हिंदी की रचनाशीलता में उन आवाज़ों को बराबर जगह मिली होती, तो हमारी संवेदना का दायरा कितना बड़ा हो सकता था। शायद हम सचमुच एक गहरा यथार्थ-बोध और इतिहास-बोध हासिल कर चुके होते। हिन्दी की समूची रचनाशीलता ही इससे कमतर हुई । तो दूसरी उपेक्षिता यह है ।

अगली ‘उपेक्षिता’ वह पूँजी या अनुभव-संपदा है जिसके बल पर क्लासिक रचे जाते हैं। इतनी सीमित पूँजी के सहारे हम विशाल साहित्य कैसे रच सकते थे? रैल्फ फॉक्स के अनुसार उपन्यास लिखने के लिए ऐतिहासिक दृष्टि, मानव-दर्शन और विश्व-दृष्टि - इन तीनों का होना ज़रूरी है। हालाँकि स्त्रियों ने काफी उपन्यास लिखे, और अब उनकी खोज भी हो चुकी है, लेकिन पहले ऐसा नहीं था। सिर्फ राजकमल प्रकाशन से ही एक साल में नौ उपन्यास प्रकाशित हुए । इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि कुल मिलाकर यह संख्या कितनी अधिक होगी। स्त्रियाँ उस मुक़ाम तक तो पहुँचीं, जहाँ उनकी आवाज़ सुनी जाने लगी; मगर उनके विश्व-दर्शन का पूरा आसमान अब भी खुलना बाक़ी है। यह वैसा ही है जैसे किसी नदी ने समुद्र की झलक पा ली हो, पर अभी उसकी समूची गहराई में उतरना अभी शेष हो। स्त्रियों को जहाँ तक पहुँचना था, वहाँ तक वे अभी पूरी तरह नहीं पहुँच सकी हैं। आख़िर उनकी सभी संभावनाओं का पूरा विकास क्यों नहीं हो सका? इसलिए कि हिंदी के ज्ञान-विज्ञान और उसके पूरे साहित्यिक संसार की पूँजी ही बहुत सीमित रही। यह संभाव्यता भी तो उपेक्षिता है।

हमें उस इतिहास की विरासत बहुत कम मिली है, जिसे हमारी माँओं और पिछली पीढ़ियों की स्त्रियों ने रचा था। मैं खुद हिंदी साहित्य में ‘स्त्री-लेखन’ तक पहुँचते-पहुँचते अपनी ज़िंदगी के दो-तीन दशक पार कर चुकी थी। घर में तो चार भाइयों की अकेली बहन थी ही। अकादमिक-बौद्धिक माहौल भी पुरुष-निर्मित रहा। उन्हें किसी स्त्री-रचना पर गंभीरता से बात करते देखना मेरे अनुभव का हिस्सा नहीं रहा। लिहाजा मैंने भी ज़्यादातर पुरुष लेखकों को ही पढ़ा, और चेतना के स्तर पर मैं खुद लगभग पुरुष जैसी हो गई थी। स्त्री-चेतना तक पहुँचने में मुझे बहुत लंबा समय लगा। इसलिए मैं कहती हूँ कि जेंडर-चेतना उपेक्षित रही, स्त्री-अनुभव उपेक्षित रहे, और हिंदी की आधी रचनाशीलता भी उपेक्षित रही। बाकी की आधी को इससे क्या क्षति पहुँची, उसकी मुँह दिखाई होना अभी बाकी है। इसके लिए आत्मालोचना की जरूरत है।

आज सबसे बड़ा अभाव जिस चीज़ का है, वह है आलोचनात्मक विवेक। सबसे ज़्यादा उपेक्षा ‘आत्मालोचना’ की हो रही है। आत्मालोचना के बिना न कोई अच्छा लेखक बन सकता है, न एक जागरूक और जिम्मेदार इंसान। मेरा मानना है कि हमारे ‘स्व’ की जो पहचान है, उसमें बहुसंख्यक आबादी की अभी तक ठीक से मौजूदगी ही नहीं हुई। उसकी पहचान अभी भी अधूरी है। क्योंकि जब तक हम अपने भीतर और बाहर की दुनिया से नए तरह के रिश्ते नहीं बनाएँगे, अंतरंगता के नए दायरे नहीं रचेंगे, तब तक व्यक्ति और समाज तथा स्त्री और पुरुष के संबंधों की भीतरी दुनिया का रसायन नहीं बदलेगा। और जब तक यह रसायन नहीं बदलेगा, तब तक हम नई चेतना और बनती हुई नई दुनिया से कैसे जुड़ पाएँगे?

अगर स्त्री की आवाज़ और उसकी अभिव्यक्ति को ‘रिडक्शनिज़्म’ में न ढाला गया होता - जैसा प्रियंका जी की मुख्य शिकायत है कि हमें बहुत सीमित और संकुचित तरीके से पढ़ा जाता है - तो शायद तस्वीर कुछ और होती। हमें अक्सर सिर्फ़ ‘बॉक्स टिक’ करके पढ़ा जाता है। अगर ऐसा न होता, तो शायद ये शिकायतें भी पैदा न होतीं। स्त्रियाँ अपने साथ जो अनूठी आवाज़ें और अनुभव लेकर आई हैं, उनसे एक अलग और विशिष्ट दुनिया बनती दिखाई देती है। अगर वह दुनिया पहले बन पाती, तो शायद हमारे पास युद्धों और विषमताओं से निपटने के लिए भी कुछ बेहतर समाधान होते।

मैं यहाँ एक और बात जोड़ना चाहूँगी। हिंदी की बड़ी दुनिया में ‘मानवीय दृष्टि’ - मुक्तिबोध की भाषा में कहें तो ‘अंतःकरण का आयतन’ - बहुत सीमित रहा है। उसकी संवेदना के दायरे में स्त्री, आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक पूरी तरह शामिल ही नहीं हो पाए। जब वे स्पेस पाते भी हैं तो तो अक्सर वर्चस्व संपन्न वर्ग के भाव इस तरह के होतो हैं जैसे कोई मसीहा अपने अनुग्रह का एहसास दिला रहा हो; या फिर जैसे वह महज एक किस्म की ‘रिप्रेसिव टॉलरेंस’ – एक दबाव से भरी हुई मेहरबानी – भर हो। दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों ने जब अपनी आवाज़ खुद उठाई, तभी वे मजबूती से सामने आ सके। अगर जेंडर-संवेदना के सवाल शुरू से इतने उलझे हुए न होते, तो दलित स्त्रियों को उपेक्षा का एक और चक्र लंबे समय तक झेलकर ‘दलित-स्त्रीवाद’ के लिए अतिरिक्त संघर्ष कर के अपनी जगह बनाने की ज़रूरत न पड़ती।

मुझे लगता है कि हाशियाकरण के बाद लगातार नया हाशियाकरण होता गया, क्योंकि शुरू से ही स्त्रियों को सिर्फ़ ‘उपेक्षिता’ मानकर देखा गया; उनके भीतर छिपी अनंत संभावनाओं को पहचाना ही नहीं गया। स्त्री-लेखन की भी उपेक्षा हुई और स्त्रियों की भी। लेकिन क्या कथा-साहित्य में स्त्रियों से जुड़े कथानकों, विषय-वस्तु और स्त्री-पात्रों के साथ भी वही व्यवहार नहीं हुआ? क्या उन्हें भी उपेक्षा और विस्मरण के कुएँ में लगातार नहीं धकेला जाता रहा?

मैं प्रियंका जी की बात में एक चीज़ और जोड़ना चाहूँगी। अगर गीतांजलि श्री के लिए पूरी तरह प्रशंसा का माहौल भी होता, तब भी शायद सिर्फ़ बधाइयाँ और तारीफ़ें ही होतीं। आलोचना के सही औज़ार और स्त्री को संजीदगी से सुनने की मंशा तब भी हमारे पास न होते। हम सिर्फ़ बुराई से ही नहीं, बल्कि लगातार की जाने वाली खोखली तारीफ़ से भी ऊबते हैं, क्योंकि तारीफ़ करने वाले भी अक्सर यह नहीं बताते कि कोई रचना अच्छी क्यों है। यह एक तरह का गहरा बौद्धिक आलस्य भी है।

एक समय था जब लिखना बहुत कठिन और श्रमसाध्य माना जाता था। अच्छा लिखना आज भी उतना ही मुश्किल है, और सही तरीके से पढ़ना भी। लेकिन आज अगर सिर्फ़ ‘कुछ लिख भर देना’ हो, तो वह बहुत मुश्किल नहीं रह गया है। लोग अपेक्षाकृत आसानी से लिख लेते हैं। मगर पढ़ना अब भी मेहनत माँगता है, भीतर की ताकत और धैर्य माँगता है।

कथा-साहित्य में आप कोई भी उदाहरण ले लीजिए। जिन कथाकारों को ‘ओवररेटेड’ माना जाता है, मेरे हिसाब से वे भी कई बार ‘अंडररेटेड’ हैं - यानी उन्हें भी ठीक तरह से पढ़ा नहीं गया। बाद में कहीं नाम छूट न जाए, इसलिए मुझे एक-दो नाम लेने हों, तो मैं मेहरून्निसा परवेज का नाम लेना चाहूँगी। वे इतने वर्षों तक लिखती रहीं, लेकिन उनकी रचनाशीलता को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वे सचमुच हकदार थीं। अगर अल्पसंख्यकों के भीतर बेहद अल्पसंख्यक स्वर की बात करूँ, तो मैं शीला रोहेकर का नाम लेना चाहूँगी। उनकी कृति मिस सेमुअलसन : एक यहूदी गाथा में उन्होंने न सिर्फ़ हिंदी साहित्य में एक ऐसे अनुभव को दर्ज किया, जो लगभग अनुपस्थित था, बल्कि संवेदना का एक नया आयाम भी जोड़ा। उसमें पहचान और विस्थापन के ऐसे सवाल हैं, जो वैश्विक स्तर तक पहुँचते हैं। फिर भी उन्हें बहुत कम पढ़ा गया।

केवल स्त्री कथाकार ही नहीं, बहुत-से पुरुष कथाकार भी ठीक तरह से नहीं पढ़े गए। यहाँ तक कि सर्वाधिक लोकप्रिय प्रेमचंद की भी वे कहानियाँ कम चर्चा में रहीं, जो शायद रशीद जहाँ जैसी जागृत और विलक्षण स्त्रियों के संपर्क में आने के बाद लिखी गई थीं। ऐसी स्त्रियों को जानने और समझने के बाद ही वे यह देख सके कि स्त्री के भीतर कितनी संभावनाएँ हैं, वह क्या-क्या सोच और रच सकती है। वे एक ईमानदार लेखक थे; जैसे-जैसे उनकी संवेदना का दायरा बढ़ता गया, उनकी जेंडर-चेतना विकसित होती गई। उस दौर की उनकी कई कहानियाँ बेहद प्रखर हैं। लेकिन हम उन कहानियों तक भी तब पहुँच सके, जब डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान की दुनिया को कुछ हद तक लोकतांत्रिक बनाया। रास्ते की कई रुकावटें हटाईं। ज्ञान पर कब्जा जमाने और नियंत्रित करने वाले ‘प्रहरियों’ का असर कम हुआ, तब जाकर हम उन कहानियों तक पहुँच पाए। हिंदी की दुनिया में जेंडर चेतना सबसे उपेक्षित चीज रही चली आई है।

इसलिए स्त्रियों की उपेक्षा केवल समाज में ही नहीं, साहित्य में भी हुई है। मैं रांगेय राघव की कहानी गदल के बहाने एक बात कहना चाहती हूँ। इस कहानी में गदल अपने देवर डोडी से प्रेम करती है। डोडी भी उससे प्रेम करता है, लेकिन वह कभी अपने प्रेम को खुलकर व्यक्त नहीं करता, कोई संकेत तक नहीं देता। लंबे इंतज़ार के बाद गदल मोनी नाम के एक लुहार से शादी कर लेती है। लेकिन डोडी के मरते ही वह लौट आती है और ऐसा कुछ कहती है कि मैंने तो उससे शादी सिर्फ़ डोडी को महसूस कराने के लिए की थी। जब वह ही नहीं रहा तो अब मैं किसी पराए के घर क्यों रहूँ।  मैं कहना चाहती हूँ कि आज भले ही लिखने वाली स्त्रियों की संख्या बहुत बढ़ गई हो, लेकिन हमारी सबसे बड़ी शिकायत अब भी यही है कि हमें समग्रता में नहीं पढ़ा जाता। गीतांजलि श्री के उपन्यास तिरोहित में एक पंक्ति आती है कि एक औरत को एक तयशुदा आकार दे दिया गया है, और जैसे ही वह उस आकार से बाहर निकलती है, लोगों को समझ में नहीं आता कि उससे प्रेम कैसे करें, उसके साथ हँसें कैसे, रोएँ कैसे, या उसके साथ कोई संबंध कैसे बनाएँ।

हम उस तयशुदा ‘औरत के आकार’ से अब बाहर आ चुके हैं। हिंदी पट्टी के पास जो बना-बनाया साँचा है, उसमें अब हमें समेटा नहीं जा सकता। अब ज़रूरत इस बात की है कि मिलकर एक नया आकार बनाया जाए। जब तक यह समग्रता-बोध नहीं आएगा, जब तक हम हिंदी साहित्य और उसकी आलोचना के इतिहास को उसकी पूरी जटिलता और व्यापकता में नहीं देखेंगे, तब तक हम सचमुच आगे नहीं बढ़ पाएँगे।

मैं फिर रांगेय राघव की कहानी के हवाले से कहना चाहती हूँ कि हिंदी का अकादमिक संसार आज भी लोकतांत्रिक या आधुनिक नहीं बन पाया है। यहाँ लंबे समय तक  सामंती मिजाज कायम रहा। इसी वजह से पूरे जेंडर का एक विशाल परिदृश्य उपेक्षित रहा और उसकी संभावनाएँ कुचल दी गई। बाद में जब स्त्रियों ने लिखना शुरू भी किया, तब भी उन्हें उस स्तर तक पहुँचने में बहुत समय लगा। उनकी कतार बहुत बाद में शुरू हुई। हिंदी पट्टी के सामूहिक बौद्धिक मन को जिन लोगों ने लंबे समय तक नियंत्रित किया, उनके मुताबिक़ खुद को ढालने का दबाव स्त्रियों पर भी बना रहा। उससे आज भी वह मुक्त नहीं हैं।

कृष्णा सोबती की इतनी महत्वपूर्ण रचनाओं के साथ भी यही हुआ। उनके उपन्यास सूरजमुखी अँधेरे के की रतिका को राजेंद्र यादव ने ‘काम-कुंठित’ कहा और विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘आत्मकेंद्रित’। चूँकि आलोचना के भीतर गहरा बौद्धिक आलस्य था और जेंडर अंधता है, इसलिए स्त्रियाँ भी अपने शोध और लेखन में वही बातें दोहराती रहीं। लेकिन जब तक रेखा कस्तवार, निर्मला जैन और हमारे जैसी अनेक स्त्रियाँ सामने नहीं आईं, तब तक रतिका की उस assertive शक्ति को ठीक से पढ़ा ही नहीं गया। किस तरह वह नहीं की अपनी टेक पूरी मजबूती से बनाए रखती है जब तक प्रेम की पात्रता धारण करने वाला कोई न मिले। इसमें काम-कुंठा कहाँ है? अगर सामने वाला प्रेम की कोमलता, समझ और शऊर से ही अनजान है, तो किसी लड़की का ‘न’ कहना स्वाभाविक ही है।

पहले के दौर में उपेक्षा का मतलब था - मिट्टी के नीचे दबा दिया जाना, जैसे हमारा कोई अस्तित्व ही न हो। लेकिन आज उपेक्षा का अर्थ बदल गया है। अब इतनी चकाचौंध और शोर है कि उस रोशनी के पीछे वास्तविक लेखक उपेक्षित हो जाते हैं। चयन की एक बड़ी समस्या पैदा हो गई है। इतना अधिक साहित्य लगातार प्रवाह में डाला जा रहा है कि जो सच्चा लेखक शोर-शराबे से दूर चुपचाप और एकाग्र होकर काम कर रहा है, कई बार हम उसकी ओर पहुँच ही नहीं पाते। हालाँकि जिसे मैं ‘चकाचौंध’ कह रही हूँ, यह भी हो सकता है कि उसके भीतर कहीं कोई सच्चा अंतःकरण मौजूद हो, जिसे हम अभी ठीक से पढ़ नहीं पा रहे। इसी वजह से मैंने गदल का उदाहरण दिया था। पितृसत्ता अब बहुत सूक्ष्म और गहरे रूपों में काम करती है। संभव है कि उसके अनुकूलन में खुद को ढालने में बाध्य स्त्रियाँ ऊपर से ‘मोनी’ लिख रही हों, लेकिन उनके भीतर कहीं ‘डोडी’ छिपा हो। ‘डोडी’ अर्थात वास्तविकता।

आज अगर हमें मंच और स्वीकृति मिल भी रही है, तो कई बार हम अपनी अभिव्यक्ति को ‘सर्वानुमति’ के साँचे में ढाल लेते हैं। लेकिन शब्दों की भीतरी तहों में कहीं न कहीं राजी सेठ की की कहानी जैसे ‘खाली लिफाफे’ भी मौजूद होंगे, जिनमें असली आशय छिपे हुए हैं। जब हम आज के साहित्य को उसकी समग्रता में पढ़ेंगे और आलोचना के नए औज़ार विकसित करेंगे, तभी वह वास्तविक यथार्थ हमारे सामने आएगा। और जब राजी सेठ का नाम आया है, तो मैं यह भी जोड़ना चाहूँगी कि इतनी स्मृति-सभाओं और चर्चाओं के बावजूद उनका नाम अक्सर या तो भुला दिया जाता रहा, या कम महत्व के साथ लिया जाता रहा। यह भी उपेक्षा का ही एक रूप है।

अब मैं समझ पा रही हूँ कि इस परिचर्चा का नाम ‘अनंता’ क्यों रखा गया - क्योंकि उपेक्षाओं के सिलसिले भी अनंत रहे हैं, एक पर्त हटती है, तो उसके नीचे एक और ख़ामोशी दबी हुई मिलती है – इसलिए इन पर शायद अनंत समय तक बात करने की ज़रूरत है।