Wednesday, October 12, 2011

हमलावर संस्कृति का विरोध करो

देहरादून

कानून के भीतर बेशक अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता वर्णित हो लेकिन देख रहे हैं कि हमलावर संस्कृति की लगातार बढ़ रही कार्रवाइयों के जरिये एक अराजक किस्म का माहौल बनता जा रहा है। दबंगई और गुंडई का बोलबाला बहुत खुलेआम और बेखौफ है। सत्ता पर कब्जे की राजनीति उसे शरण देती हुई है।
अभी हाल ही में, स्त्री अधिकारों और धर्म की आड़ भ्रष्टता के खेले जा रहे खेल के प्रतिकार को अपने लेखन और सीधी कार्रवाइयों का हिस्सा बनाने वाली रचनाकार शीबा असलम फहमी के घर पर हुआ हमला और आज ही दिल्ली में घटी वह ताजा घटना जिसमें प्रशांत भूषण पर हमले की सूचनायें हैं, ऐसी ही राजनीति की सीधी कार्रवाइयां हैं। उधर गुजरात में संजीव भट्ट की गिरफ्तारी ।
11 अक्टूबर को देहरादून के रचनाकारों की संस्था संवेदना ने रचनाकार शीबा असलम फहमी पर हुए हमले की चर्चा करते हुए हमलावर संस्कुति की मुखालफत की है। अपराधियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई और शीबा असलम फहमी के साथ एकजुटता को प्रदर्शित करने के लिए आयेजित चर्चा में मुख्यतौर पर कथाकार सुरेश उनियाल, मनमोहन चडढा, डॉ जितेन्द्र भारती, अनिता दिघे, गीता गैरोला, रश्मि रावत, जावेद अख्तर, प्रवीण भट्ट, कमल जोशी, प्रतिमान उनियाल आदि उपस्थित थे।   

7 comments:

मोहन श्रोत्रिय said...

दोनों घटनाएं अलग-सी दिखती हुई भी,'एक ही सिक्के के दो पहलू'हैं. पहली में मुस्लिम कठमुल्लापन, तो दूसरी में हिंदुत्ववादी संकीर्णता, का समान रूप से घृणित खेल देखने को मिला है. दोनों घटनाएँ समान रूप से निंदनीय हैं, और अपराधियों को सख्त सज़ा मिलनी ही चाहिए. आज की प्रशांत भूषण वाली घटना से एक बात साफ़ हो जाति है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक हिस्सा ऐसा है जो प्रशांत भूषण के तो खिलाफ़ है, पर किरण, अन्ना और सिसोदिया के साथ है. इस घटना से यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि संघ अन्ना के साथ नहीं है. श्री श्री रवि शंकर के साथ एक हमलावर कि तस्वीर दिलचस्प कहानी बयान करती है.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

'संवेदना' की इस आवाज़ में मैं भी अपनी आवाज़ मिलाता हूँ.

आशुतोष कुमार said...

पूरी तरह सहमत

आशुतोष कुमार said...
This comment has been removed by the author.
अनूप सेठी said...

मैं भी आपके साथ हूं

Anonymous said...

हमलावरों के लिए सभ्यता और संस्कृति शब्द का प्रयोग करना भी गलत है.
इसकी जितनी भी निंदा की जाये कम है, हर किसी को दूसरों के दृष्टिकोण से असहमति रखने का उतना ही अधिकार है जितना सहमती रखने का अधिकार. परन्तु मार-पीट, डराना-धमकाना अपराध है. ऐसे हर हिंसक संगठन पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है. वर्ना संविधान, कानून और लोकतंत्र कुछ भी नहीं बचेगा.

Mahesh Chandra Punetha said...

sheeba vali ghatana ho ya fir prashant bhooshan vali inako sunate hi jo pahala saval paida hota hai wah hai -kahna hai lokatantra ? kahna hai vichar abhivyakti ki swatantra? kya wahi vichar abhivyakta karane ki swatantrata hogi jo unhne pasand hai....kaisa lokatrant hai bhai.......! !!wakt aa gaya sachche loktantra ki ladai ka.in ghatanaon ki har star par ninda or doshiyon ke khilaf karvahi ki mang ki jani chahiye. sath hi is par chintan bhi ki is fasista mansikata ko kaun log paida kar rahe hain unake khilaf hamari ladai ka tarika kya ho?