(जयप्रकाश ‘नवेन्दु’ ने विपुल लेखन किया है। देहरादून की सड़कों ने सवेरे उगते हुए सूरज के साथ उन्हें विचारलीन घूमते हुए देखा है। एक वक्त था जब वे पूरी तरह कविता में डूबे हुए थे।फिर वे कविता से बाहर निकल कर अलौकिक अनुभवों की राह पर चल निकले। लेकिन कविता उन्हें बार-बार इस दुनिया में ले आती है।उनकी इस यात्रा पर कवि राजेश सकलानी एक नज़र डाल रहे हैं। साथ में उनकी कुछ कविताएं भी हैं)
मई 25 , 2026 की दोपहर को जब तापमान 38 डीग्री था
कवि नवेन्दु ने अपने मित्रों को बीच शहर के तिराहे पर स्थित एक छोटे से पार्क में अपनी 130 वीं पुस्तक जारी करने के लिए आमंत्रित किया । गैर साहित्यिक ये मित्र भिन्न राजनीतिक विचारों को मानने वाले हैं और कंडवाल जी की टी शाप पर " चौपाल " लगाते हैं। मौसम चाहे अच्छा हो या ख़राब बहस मुबाहिसा दिन भर जारी रहता है।
फ़कीर तबियत के नवेन्दु की प्रकाशित 130 पुस्तकों में 75 काव्य संकलन हैं। अक्सर 3 ,4 या 5 संकलन एक साथ प्रकाशित होते रहें हैं। कविता ही उनका जीवन है। आठ सितंबर 1955 में जन्मे नवेन्दु गांधी इंटर कालेज से अवकाश प्राप्त हैं।
उन्होने अपने लिए कुछ भी जमा नहीं किया। न विवाह किया और न घर ही बनाया। जैसे वैन गाग के साथ लियो का नाम जुड़ा है। ठीक इसी तरह नवेन्दु के साथ उनके एम ए पास छोटे भाई विक्रम सिंह हैं। शायद ही उनके जैसा कोई दूसरा उदाहरण होगा। अपने भाई की देखरेख करते हैं। न विवाह किया और न नौकरी। अपने बाल्यकाल से बड़े भाई के सहयोगी की तरह जीवन बिताया है।यह सब वे निर्द्वन्द और सन्तुष्ट हो कर करते हैं। घर-बार चलाना और साहित्य पढ़ना। उन्हे घूमते फिरते भी कभी नहीं देखा। विनम्र और प्रसन्नचित्त हैं।
" बंद होठों में ज़हर " पुस्तक में उनकी श्रंखला -बद्ध पांच आत्मकथाओं का समवेत है। बाकर नंगला, जिला बिजनौर (तत्कालीन) उनका जन्मस्थान है। नगीना धामपुर मिलाकर इस पूरे इलाके का जनजीवन बेहतरीन तरीके से इसमें व्यक्त हुआ है। आपके पिता साधारण किस्म का काम करते थे। छोटी उम्र में एक दुर्घटना में मां की मृत्य हो गई। वे मूलत: प्रेम के कवि हैं। उच्च पढ़ाई करने देहरादून आए। वर्ष 1980 में पक्की नौकरी लगने से पहले छुटपुट शिक्षण कार्य किया। कामना (1980),एकांत वीणा (1981) और घनी धूप के दिन (1985) की कविताओं पर छायावाद और अज्ञेय का प्रभाव है। कोर्स की कविताओं के ज़रिए यह प्रभाव आया था। फ़िर वाम साहित्य से परिचय हुआ तो
" कविताएं 1991" प्रकाशित हुई।
पत्र पत्रिकाओं में कुछ कविताएं छपीं।
" ख़ामोशी बुन रही खतरा " वर्ष 2000 संकलन का ब्लर्ब लीलाधर जगूड़ी जी द्वारा और " गंगा वाले देश का दुखांत "वर्ष 2001
का ब्लर्ब मंगलेश डबराल जी द्वारा लिखा गया था।
तब तक नवेन्दु की पहचान दलित कवि के रूप में नहीं थी। बाद के संकलनों में वर्ण व्यवस्था के प्रति गहरा क्षोभ देखा जा सकता है।
वे साहित्यिक गोष्ठियों से दूर रहते हैं लेकिन पूरा दिन आमजनों के बीच विशेषकर चाय की दुकानों पर समय बिताते रहे। बिना कुछ कहे अपने चिंतन में लीन रहते। कभी अपने दिव्य अनुभवों का ज़िक्र करते। " महर्षि " उपनाम धारण किया। एक पंथ की परिकल्पना की। समाज ऐसा हो कि कोई भेदभाव न रहे। सिर्फ सौहार्द दुनिया में रहे। प्रेम और मान के अलावा नवेन्दु को और कुछ भी नहीं चाहिए। वह भी पूरी दुनिया के लिए।
अपने लिए तो उन्होने कोई सामान नहीं जुटाया है। किराए के घर में रहतें हैं। देहरादून से उन्हे गहरा इश्क है।
नवेन्दु जी की जीवन चर्या बहुत अलग तरह की रही है। वे खूब पैदल चलते हैं बिना दाएं बाएं देखे। वे हमेशा किसी चिंतन मुद्रा में उन्हे देखा जाता। सुबह सात बजे बिना चाय नाश्ता के लिए डी एल रोड स्थित घर से चार किलोमीटर दूर गांधी स्कूल के लिए निकल पड़ते। दोपहर दो तीन बजे टिप टाप रेस्त्रां में दिन की पहली चाय पीते। कुछ खाने पीने की बात उनके दिमाग में नहीं। किसी को पता नहीं होता कि उन्हे आज कहीं जाना है। कोई न कोई दोस्त उन्हे पैदल चलते देख लेता। देर शाम को घर पर पहुंचते। फ़िर भाई विक्रम खाना बनाता।तो उनका पहला भोजन रात को ही संभव हो पाता। वह मांसाहार
के बेहद शौकीन हैं।
उनके खुद के कथनानुसार वे सुबह उठते ही किसी संत कवि या दार्शनिक के विचारों पर सोचना शुरू करते हैं। पूरा दिन इसी में निकल जाता है। सुकरात, गुरुनानक जैसे महापुरुषों की बीसिंयों जीवनी पढ़ चुकें हैं। उन्होने शंकराचार्य की जीवनी भी पढ़ी है।कहते हैं मुझे जातिवादी मानवता घृणा नापसंद है।मनुष्य के उत्थान का कोई भी साहित्य उन्हे प्रिय है। यही उनके दिमाग में चलता रहता है।
वे विशेष तौर पर इंटर कक्षा के कोर्स की कविता का उल्लेख करते हैं जिसे वे हमेशा याद रखते हैं।
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से,
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की,
धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से
जलते जग में
इतना शीतल बहो
कि जितना मलय पवन है,
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है
नए हाथ से वर्तमान का रूप संवारो
नई तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नए राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नई मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है॥
(द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)
नवेन्दु की पारिवारिक और सामाजिक पृषठभूमि ग्रामीण थी। स्त्री-पुरुष हाथ का काम करते थे। जीवन के साधन काम चलाऊ थे लेकिन आपसी जीवन परस्पर गुथा हुआ था। पिता मजदूरी करते थे। ऐसी जगहों में परस्परता और कलह सघन रूप में बनी रहती है। युवजनों के लिए प्रकृति का खुला मैदान उपलब्ध होता है। मातृविहीन बालक के लिए ये कठिन समय था। छोटी मोटी ज़रूरतों के लिए परेशान होना पड़ता है। पढ़ने लिखने में कुशल,सक्षम और संवेदनशील युवा के लिए ये संकल्प के दिन थे। इसी दौर में एक साहित्यकार का उदय हो रहा था।
देहरादून में एम ए,, बी एड करना और फ़िर अध्यापककी नौकरी पाना एक बड़ी राहत थी। अवधेश कुमार, हरजीत, अरविंद शर्मा, नवीन नैथानी, राजेश सेमवाल, सुभाष पंत, ओमप्रकाश वाल्मीकि, राजेश सकलानी, सुखवीर विश्वकर्मा, जितेन ठाकुर, राजेन्द्र गुप्ता, सूरज प्रकाश, सुरेश उनियाल, मनमोहन चढ्ढा व अन्य बहुत सारे साहित्यिक मित्र साथ थे। लेकिन प्राय: बहसों में सिर्फ़ हल्के से मुस्करा कर रह जाते।
शहर की भिन्न सड़कों पर उन्हे विचरते हुए देखा जाता। कभी किसी व्यस्त जगह पर लोगों को सिर्फ़ देखते रहते। रोल किया हुआ जनसत्ता अख़बार उनकी हथेली सें कसमसाता रहता। (वह पसीने से काला पड़ जाता )
दुनिया के अंतर्विरोधों और भुगती हुई उपेक्षाओं से गुज़र कर फ़िर प्रेम की आंकाक्षाओं को दीप्त करने की कोशिशें जारी रहतीं।
तो मई माह की इस तपती धूप में वे अपनी 130 वीं पुस्तक को लोकार्पित करते हैं। इसका शीर्षक है
"अनहद पंथ " । सार रूप में इसके सोलह बिन्दु हैं।
यही कि पूरी दुनिया में प्यार और सम्मान का राज कायम हो।
-राजेश सकलानी
जयप्रकाश ‘नवेन्दु’ की कुछ कविताएं
उदासी के बिना.
उदासी के बिना रहना बहुत चाहता हूँ लेकिन
बाहरी और भीतरी कुछ ऐसा दबाव जी पर रहता है कि
उदासी के बिना जिसे सहते नहीं बनता
कितनी हँसी के बीच फूटते ठहाके कितनी सभाओं में परिचित अपरिचित
कितनी बार रोज की दोहराई जाती निरर्थक बहसें
जिन्हें सुनते जो जी में उठता है उसे कहने की कोशिश करता हूँ।
पर कहते नहीं बनता.
कल
कल तुम्हारे लिए
यह एक कविता होगी
जबकि मैं शब्दों को चीर कर
अर्थ की जगह
अपने को भर रहा हूँ
कल जीने की कोशिश में
आज मर रहा हूँ.
उछाल.
उछाल दिया गया हूँ
समय और शब्दों के हाथों
ऊपर आकाश में
डाल दिया गया हूँ
पृथ्वी अब मेरा परदेश है
शरीर अब मेरा परदेश है
मेरा मैं अब मेरा परदेश है
जिन के बाहर अब मैं
सदा के लिए निकाल दिया गया हूँ.
घर
जी हाँ
मेरा यह घर है
न कोई छत
न कोई दीवार
न कोई दर है
जिसके भीतर
हवा निर्बाध बहती
पंछी दिन भर
मुक्त स्वर में चहचहाते हैं
और चन्द्रमा
रात को अपनी शीतल
चाँदनी बिखेरता
और जिसको
तूफान में टूटने और
न उड़ने का डर है
यह मेरा घर है.
शब्द.
मन जिस पल
शब्द छोड़ता है
सबसे पहले मुझे तोड़ता है
मेरे टूटते ही
नीले आलोक का
फव्वारा छूट जाता
जो दूर तक फैला अन्धकार फोड़ता है
क्षणभर का
मेरा विध्वंस ही
मुझे नई शक्ति दे जाता
कण कण मेरा
वह फिर-फिर
जोड़ता है.
अंगार.
जितनी बार भी हवा का हमला हुआ यह अंगार कुछ अधिक ही दहका
जिजीविषा इसकी उम्र के साथ घटी नहीं और बढ़ती ही गई।
एक नई कविता.
सामने से चली आती
वह दिखती रही देर तक
सहसा आहट पा चौंकी
और बीच राह से
मुड़कर भाग गई
लाज से सिहरती सी.
