( दिनेश चन्द्र जोशी उन विरल लेखकों में हैं जिन्होंने एक साथ बहुत सारी विधाओं को साधा है - कहानी, कविता, निबन्ध,रिपोर्ताज , संस्मरण और व्यंग्य - सभी में उनकी कलम एक जैसी रवानी के साथ चली है. कविताओं में विशेष रूप से वे अपने समय की चिन्ताओं को स्वर देते रहे हैं. प्रस्तुत हैं उनकी ताजा कविताएँ )
(एक)
हथियारों के जखीरे
तैयार हैं करतब दिखाने को
बारूद का विस्फोटक
रसायन क्रियाशील होने को बेताब है
उनके निर्माता गदगद हैं
सौदागर गौरवान्वित
राष्ट्राध्यक्ष पगलाये हैं
युद्धोन्माद से।
(दो)
उन्नत होती बहुमंजिला इमारतें
आधुनिक शहर लकदक बाजार
शानो-शौकत के हजार साधनों
से चिढ़ते हैं हथियार
वे घात लगाकर बैठे रहते हैं
किसी विक्षिप्त तानाशाह का
आदेश जारी हो और निकल पड़ें
विध्वंस को
लाशों के ढेर लगा दें
शहरों को कर दें नेस्तनाबूद,
आग,राख,कालिख,धुआं धुआं।
(तीन)
हो सभी मुल्कों में अपनी
मर्जी की सरकार
उनके खनिज संसाधनों
पर बना रहे अपना अधिकार
कठपुतली की तरह नाचें
हमारे इशारों पर
बार-बार
युद्ध की जड़ है फकत
ताकतवर मुल्क के
सनकी शासकों का
अत्याचारी अहंकार।
(चार)
युद्ध के मैदान में
झुकता नहीं कोई
हार मानने को
होता नहीं तैयार
हार को स्वीकार न कर
मर मिटने की जिद को
महिमामंडित करता है
हथियारों का कारोबार।
(पांच)
तबाही के दृश्यों से भी उत्पन्न
होती है हलचल,उत्सुकता,
सनसनी,उत्तेजना,जोश
संहार की दमित आकांक्षा
मनोरंजन व्यवसाय के
मुनाफे की प्रेरणा पुंज है
सटीक निशाने पर प्रहार
करती मिसाइलों
के दृश्यों से चकित होते
दर्शक,चाहते हैं,चलता रहे ये तांडव
हमारे उबाऊ नीरस जीवन का
कुछ समय ऐसे ही कटे
हिंसा के रोमांच से।
(छह)
सबसे खतरनाक महाविनाशक गुप्त
शस्त्रागारों के तहखाने खोल दिये गये हैं
टूट रहे जालों से मकड़ियां भाग रही
हैं,चीटियों की कतार बेचैन है,
बांबियों से निकल कर भाग रहे हैं,
कृमि,सरीसृप।
खतरनाक शस्त्रों को अपने रहवास से
बाधित किये हुए कीट पतिंगो को हो
गया है अपसगुन का पूर्वाभास
मानव सभ्यता के अंत का समय
आ चुका है निकट।

1 comment:
भाईसाब आपकी ये कविता पढ़कर एक अजीब बेचैनी हुई, और यही इसकी ताकत है। आपने युद्ध की चमक के पीछे छिपी सच्चाई को बहुत साफ दिखाया। मुझे खासकर वो हिस्सा लगा जहाँ आपने हथियारों को जैसे इंतज़ार करते हुए दिखाया, वो इमेज दिमाग में बैठ जाती है।
Post a Comment