(आजादी के साथ विभाजन की त्रासदी पर हिंदी में लिखे गये कथा साहित्य में बंगाल के ऊपर बहुत कम लिखा गया है। पिछली सदी के आठवें दशक के उत्तरार्ध में सुंदरबन के द्वीप मरीचझाँपि में हुई घटनाओं को केन्द्र में रखकर इधर दो महत्वपूर्ण उपन्यास सामने आये हैं। विजय गौड़ के उपन्यास ‘आलोकुठी’ के बाद नीलकमल का उपन्यास ‘मरीचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी’ गत वर्ष ही प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास किसी बड़े प्रकाशन से प्रकाशित नहीं है। इसके वितरण के लिये किसी ऑन-लाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं किया गया है।प्रकाशन के एक वर्ष बाद पहले संस्करण के बिक जाने की खबर यह बात भी साबित करती है कि अच्छी किताबें बिना शोर-शराबे के भी पाठकों तक पहुँच जाती हैं.। इस उपन्यास के कुछ अंश साभार प्रकाशित कर रहे हैं)
(एक)
देवताओं की नींद वहाँ ज़रूर टूट गई है
दिन चढ़ रहा है। कोरानखाली के साँवले जल में मध्य आकाश का सूर्य अपनी स्वर्ण किरणें बिखेरता झिलमिल कर रहा है। कुमिरमारी के बुधवार बाज़ार वाले घाट की सीढ़ियों पर बैठा अमलेंदु उस पार के निर्जन द्वीप को निहार रहा है। मरिचझाँपि द्वीप, एक जनशून्य भूखण्ड जिसके एक छोर पर बशीरहाट फॉरेस्ट रेंज का निर्माणाधीन बीट ऑफिस ऐन बागना फॉरेस्ट ऑफिस के विपरीत है। देखने में कहीं से कुछ भी खास नहीं।
इसपार मध्यवय का एक आदमी जाल फेंकने की तैयारी कर रहा है। अभी वह अपने जाल को सुलझा रहा है। देखकर ऐसा लगता है कि जाल का वज़न कम नहीं है। यह मछलियाँ पकड़ने वाला जाल है। पेशेवर मछुआरों वाला जाल। आदमी ने कमर से लुंगी बाँधी हुई है। दोनों टांगों के बीच से लुंगी के छोर को पीछे की तरफ खींचकर उसने कमर के पीछे खोंस रखा है। जाल सुलझ जाने के बाद उसका कुछ भार कंधे पर लेते हुए और दोनों हाथों का इस्तेमाल करते हुए वह उसे घुमाकर नदी में फेंकता है। जाल हवा में लहराती हुई खुलती है और छल्ला बनाती हुई नदी की सतह पर गिरती है। हवा में जिस समय जाल लहराकर खुलती है उस समय दृश्य ऐसा उपस्थित होता है जैसे कोई अजाना फूल खिल उठा हो। जाल का फेंकना और उसका खुलना एक छंद में और लय में घटित होता है। जाल के निचले वृत्त में धातु के गुटके लगे हैं जिससे जाल क्रमशः जल में नीचे गहरे उतरने लगती है। अब आदमी धीरे धीरे जाल को समेट रहा है। कैसा अद्भुत कौशल है उसके जाल समेटने में। जाल समेटते हुए वह किसी जादूगर सा दिखता है। जाल के साथ अब वह थोड़ी सूखी जगह पर आ गया है और इस बात की तसदीक कर ले रहा है कि जाल में कोई मछली फँसी या नहीं। पहली बार में उसका प्रयास व्यर्थ हो गया है। लेकिन उसके उत्साह में तो कोई कमी नहीं है। वह नदी के उस हिस्से में है जहाँ से भाटा के बाद पानी उतर चुका है। यह दलदली ज़मीन है। उसके पाँव गहरे धँस रहे हैं। वह अपनी जगह बदल कर थोड़ा आगे जाता है। नई जगह से एक बार फिर वह उसी ढंग से जाल फेंकता है। उसी ढंग से इसबार भी जाल समेटता है। इस बार उसे कुछ मछलियाँ मिली हैं। बहुत ज़्यादा नहीं हैं मछलियाँ लेकिन उसके चेहरे पर ज़रा भी संताप नहीं है। असीम धैर्य चाहिए मछलियाँ पकड़ने के लिए। वह उसी उत्साह से अपने काम में एकबार फिर जुट जाता है। अमलेंदु उसे बड़े ध्यान से देख रहा है। उस आदमी ने मछलियों के लिए एक बड़ी सी देगची अपने साथ ली हुई है। उस बड़ी सी देगची में वह मछलियों को जिला कर रखेगा। खाने की ज़रूरत से ज़्यादा जो भी मछली उसे मिलेगी उसे वह बाज़ार में दे देगा। यह उसका रोज़ का संघर्ष है।
उसपार जो निर्जन द्वीप है, जिसे अमलेंदु बड़े ध्यान से निहार रहा है, इतिहास के पन्नों में वह देशच्युत शरणार्थियों के कभी न भुलाये जाने वाले संघर्ष की गाथा अपने भीतर छुपाये हुए है। कुल तेरह महीने का प्रवास रहा यहाँ छिन्नमूल अभागों का। मरिचझाँपि में फिर से जंगल उग आये हैं। लेकिन मरिचझाँपि के जंगलों में तेरह महीने अपना पसीना और खून बहाने वाले शरणार्थियों की आवाज़ें यहीं कहीं बिखरी हुई हैं। आज भी जब पूर्णिमा का चाँद आकाश पर खिलता है कुमिरमारी के बुजुर्गों के कानों में मरिचझाँपि के शरणार्थियों की चीखें सुनाई देती हैं। शिशुओं और स्त्रियों का करुण रुदन सुनाई देता है।
कथा बीसवीं सदी के आठवें दशक में घटित होती है। बीसवीं सदी के आठवें दशक का उत्तरार्द्ध। सन अठहत्तर का वैशाख मास है। दण्डकारण्य से हासनाबाद के रास्ते शरणार्थियों का मरिचझाँपि अभियान आरंभ हो गया है। वे पहले कुमिरमारी द्वीप आ पहुँचते हैं और वहाँ से कोरानखाली नदी पार करके मरिचझाँपि द्वीप पर कदम रखते हैं। वही कोरानखाली, जो मरिचझाँपि को छूकर बहती है। समवेत उलूध्वनि का स्वर आकाश में दूर तक गूँज रहा है। सातवाँ आसमान अगर कोई होता होगा तो स्त्रियों के कोमल कंठ से पृथ्वी के सबसे मधुर संगीत के उठान का यह स्वर वहाँ पहुँच रहा है और देवताओं की नींद वहाँ ज़रूर टूट गई है। सामने कोई दो सौ गज चैड़ी यह नदी है जिसे कोरानखाली कहते हैं। जैसे कोई सेना चढ़ाई के लिए तैयार खड़ी है और उसे इस नदी को पार करना है। यह किसी राम की सेना नहीं फिर भी चुनौती तो इसकी भी समुद्र पार करने जितनी ही है। इस सेना में हनुमान की कमी नहीं है, कमी है तो उसकी शक्ति के बारे में याद दिलाने वाले जाम्बवंत की जो इस कथा से कहीं फरार है। शंख बज रहे हैं। उलूध्वनि तीव्र से तीव्रतर हो रहा है। उसपार कोई सेना नहीं जिसपर विजय पाने की चुनौती आज सामने है। बल्कि सामने एक निर्जन वन प्रदेश है जहाँ सृष्टि के आदिम युग से लेकर आजतक किसी मानव के पाँव नहीं पड़े। कई हज़ार परिवार इस वन्य भूमि को अपना घर बनाने के इरादे से आज यहाँ जान की बाजी खेलने के लिए आ खड़े हुए हैं।
किराए पर नौका मिल गई है। पहला दल उस पार उतर रहा है। आह, यह कैसा ऐतिहासिक क्षण है। ईश्वर के बागान में आदम और हव्वा की संतानें पैर रख रही हैं। वे कृतज्ञ हैं इस माटी के और अपने कृतज्ञता ज्ञापन में कहीं से भी कृपण नहीं। वे नदीतट की माटी को माथे से लगा रहे हैं। एक अनिर्वचनीय सुख इस समय आँखों में नमी बनकर उन्हें सजल किये देता है। रोम रोम इनकी देह का इस समय कितना पुलकित है इसे सिर्फ वे ही बता सकते हैं। इस समय सूर्य अभी ऊपर चढ़ ही रहा है। आलोक से पृथ्वी का कण कण जगमग है। दूसरा दल इसी तरह नदी पार करता है और फिर तीसरा दल। दोपहर होने को आती है। जैसे कोई उत्सवलीला घटित हो रही है आँखों के सामने। कुमिरमारी के नागरिक इस उत्सवलीला के साक्षी बन रहे हैं।
इस पार जंगल है। कल तक बाघ, भालू, हिरण और न जाने कितने वन्य प्राणी इसमें विचरण करते थे। न जाने कितने प्रकार के पक्षियों का कलरव यहाँ गुंजरित होता रहता था। जिस नदीतट पर दोपहर की धूप सेंकने कभी घड़ियाल और मगरमच्छ आते थे वहाँ हमेशा हमेशा के लिए घर बाँधने के लिए असंख्य उद्बास्तुजन आये हैं। आज इस निर्जन प्रदेश में शिशु की हँसी की खिलखिल है। पाजेब की रुनझुन है, चूड़ियों की खनखन है यहाँ। यहाँ पुरूषों के कंठ से फूटते लोकगीत की स्वरलहरी है। आज प्रकृति का मातृरूप इतनी संततियों के आगमन से पुलकित है। नदी की लहरों में आने वाला बल आज पहले से ज्यादा है। यह वैशाख की एक चढ़ती हुई दोपहर है। दण्डकारण्य का दुख पीछे, बहुत पीछे छूट गया है। आज एक नई बस्ती का जन्म हो रहा है।
कहाँ से शुरू करें, यह एक बड़ा प्रश्न होता है जब आदमी को एक जंगल में उतार दिया जाये और कहा जाये कि अब उसे बाकी का जीवन यहीं बिताना है। यह सवाल तब दो चार दिन के साहसिक पर्यटन अभियान से भिन्न जीवन की एक बड़ी लड़ाई बन जाता है। समझदारी तो इसी में है कि सूर्यास्त से पूर्व कम से कम इतनी ज़मीन साफ कर ली जाए कि मानुषजन रात्रि विश्राम कर सकें। इसलिए तय होता है कि बनबीवी को प्रणाम करते हुए जंगल कटाई का काम सबसे पहले शुरू किया जाए। द्वीप के उत्तर दिशा में एक तरफ से काम शुरू होता है। दाँव, कुल्हाड़ी, साबल आदि लोहे के हथियार निकाले जा रहे हैं। शरीर से मज़बूत पुरुषों का एक दल इस काम में तैनात कर दिया जाता है। एक दल कटे हुए डाल, लकड़ी वगैरह को एक तरफ हटा रहा है। स्त्रियों का दल ज़मीन की सतह को समतल और साफ करने में लगाया गया है। एक दूसरा दल भोजन और पानी की व्यवस्था में लगा है। पहली बार इस भूमि पर आग जलाई जा रही है। यह पवित्र आग है जिसपर अन्न सींझ रहे हैं। धुआँ उठ रहा है। भाप निकल रही है। हाँड़ी में भात के खदबदाने का संगीत आज देवलोक के वाद्यों से होड़ ले रहा है।
कुमिरमारी, बुधवार बाज़ार के विपरीत मरिचझाँपि नदीतट पर जहाँ से शरणार्थी दल का प्रवेश हुआ है उसे अस्थायी घाट के रूप में तैयार किया जा रहा है। जगह को इस तरह से समतल किया जा रहा है कि नौका से उतर कर नदीतट पर जाने में दिक्कत न हो। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक है कि आने वालों में महिलाओं और वृद्धजन की अच्छी संख्या है। कई स्त्रियों की गोद में शिशु हैं जिनके साथ ही इन्हें नौका से उतरकर ऊपर चढ़ना है। समिति के पास मरिचझाँपि के भविष्य की इस कॉलोनी की योजनाएँ हैं और बहुत सारा काम कागज़ पर भी तैयार है। कहाँ समिति का कार्यालय होगा, कहाँ बनबीवी का थान (स्थान) होगा, कहाँ बाज़ार बनेगा, किस जगह पर स्कूल होगा, पोखर किस जगह पर काटा जाएगा, भेरी किस ओर बनाई जायेगी, घर किस माप के और किस क्रम में होंगे, घरों के बीच आने जाने का मार्ग कितना चैड़ा रहेगा, नौका निर्माण और बेकरी यूनिट के लिए जगह किस तरफ दी जाएगी इन सभी बातों की एक परिकल्पना समिति के पास तैयार है और उसी अनुरूप काम भी किया जा रहा है। काम की मज़दूरी किसी को नहीं दी जा रही है क्योंकि यह सबका साझा उपक्रम है।
वर्षा में अभी तीन चार महीने का समय है। उससे पहले रहने लायक तैयारी यदि न कर ली गई तो वर्षा के दिनों में रहना बहुत ही कष्टकर हो जाएगा इस बात का एहसास सभी को है। इसलिए काम में चपलता और तत्परता स्वतःस्फूर्त दिखाई देती है। आशा और आकांक्षा ने तात्कालिक दुखों को वैसे ही ढक लिया है जैसे आषाढ़ का मेघ सूर्य को ढक लेता है। हर तरफ एक अदम्य उत्साह है। भूख, प्यास, थकान, रोग-शोक सब अभी गौण हो गए हैं। सबसे ऊपर है बचने और बचाने का संघर्ष।
पहले दिन का सूर्य डूब गया। यह पहली रात है मरिचझाँपि की धरती पर। दिन भर कठोर परिश्रम के बाद देह पर वश नहीं रहा है। छोटे छोटे दल में परिवार के साथ विश्राम के लिए ज़मीन ही शय्या है। छत के नाम पर खुला आकाश है। पाश्र्व में है नदी की कलकल। तीन तरफ से नदियों से घिरे भूखण्ड के इस छोर के भीतर क्या ज़रा भी सिहरन नहीं हो रही होगी इतनी पीठों का स्पर्श पाकर ? कुछ लोगों को रात भर जागकर पहरा देना है। कहीं कहीं आग जल रही है जिससे कि वन्य पशु नज़दीक न आने पायें। समिति के नेताओं की आँखों में आज नींद नहीं है।
-एक अजाना भविष्य का पीछा करते हुए अंततः इतने मानुष आ गये (गहरी साँस छोड़ते हुए)।
-सच में सबकुछ एक स्वप्न के जैसा लगता है। कितनी आशा है सबके मन में (चेहरे पर सुख और संतोष की छाया स्पष्ट है)।
इनके संवादों में भविष्य की चिंता है और ढेरों आशंकाएँ भी हैं। बातचीत चल रही है। कहने सुनने का क्रम आगे बढ़ता है।
-सच कहता हूँ, दण्डकारण्य में कोई सुखी नहीं रह सकता था। वह भूमि कितनी अलग है। यहाँ कितनी शांति है। कैसी शीतलता है यहाँ की हवा में। मुझे भूखा रहना पड़े तब भी यहाँ से कहीं जाने का मन नहीं करेगा।
-यह तो सच है। नदी की गोद के लिए प्राण छटपट करता है हमारा (दृढ़ता है बात में, बोलने वाले के जबड़े सख्त हो जाते हैं)।
-नदी का कलकल स्वर सुन रहे हो, कान तरस गये थे। कितना
मधुर, कानों में जैसे मधु घुल रहा है। आहा, हृदय को कितनी ठंडक पहुँच रही है। तृप्ति का यह सुख अनिर्वचनीय है।
-कष्ट सहकर भी इस भूमि को स्वर्ग बनाना है। खून पसीना एक कर देंगे इसके लिए (बीड़ी सुलगाता है। दूसरे साथी को भी देता है। दोनों बीड़ी पीते हैं और नदी के किनारे टहलने लगते हैंै)। बच्चे के रोने की आवाज़ आती है। एक स्त्री उसे लोरी गाकर चुप कराने की कोशिश कर रही है। एक वृद्ध के खाँसने की आवाज़ आ रही है दूसरी ओर से। किसी को भरपेट खाना नहीं मिला है। कुछ तो खाली पेट पानी पीकर सो रहे हैं। उसपार बुधवार बाज़ार के पास एक झोपड़ी से क्षीण सी रोशनी आ रही है। शायद कोई जाग रहा है। उस पार इस जगह कुछ आदिवासी परिवार रहते हैं।
-कितने दिन में जंगल सफाई का काम हो जाने की आशा है ?
-मेरा मन कहता है एक महीना का समय लग जाएगा। वैसे उत्साह यदि ऐसा ही रहा तो कौन जानता है, बीस दिन में भी हो सकता है।
-उत्साह तो किसी भी तरह से कम नहीं था आज। उत्साह देते रहना होगा। कल कुछ राशन का इंतजाम करना होगा किसी भी प्रकार से। पेट में अन्न नहीं होगा तो उत्साह के जोर पर कहाँ तक शरीर चलेगा।
-काठ बेचकर कुछ टाका-पैसा का बंदोबस्त नहीं हो जाएगा ?
-काठ बाज़ार तक कैसे जाएगा, सब इतना आसान कहाँ है ? उसके लिए अपनी नौका चाहिए। अभी तो एक भी नौका नहीं है अपने पास। कुमिरमारी से सहायता मिल रही है अभी। जल्दी ही अपना कारखाना आरंभ करना होगा हमको।
-आज कितने परिवार हैं मरिचझाँपि में, कुछ अंदाज़ा है ?
-सौ से ऊपर परिवार हैं। अभी बहुत से परिवार उस पार कुमिरमारी में हैं जो आज आ नहीं पाये। बहुत से परिवार अभी रास्ते में हैं जो धीरे धीरे आयेंगे। हज़ार परिवार तो दंडक से साथ ही निकले थे, सभी आयेंगे आगे पीछे।
-कितना जम जमाट हो जायेगा जब सब आ जायेंगे।
-आज एक खाता में सबका नाम धाम लिखना शुरू हुआ है। कल से तुम खाता का दायित्व देखो। मैं एकबार पंचायत ऑफिस जाऊँगा। उन लोगों से सहायता की आशा है।
बातों में रात बीत रही है। नींद नाम की चिड़िया आज न जाने किस जंगल में गुम है। भोर होने को है। सारे लोग सो रहे हैं थोड़ी सी दूरी पर। दो जोड़ी आँखें इस भोर की प्रतीक्षा कितने वर्षों से करती रही हैं। आज वह भोर आई है। आकाश लाल है। धीरे धीरे उजाला बढ़ता है। रात की काली छाया पराजित योद्धा सी भागने की जल्दी में है। पक्षियों की डाक कानों को कितने दिन बाद सुनाई दे रही है। नदी का कलकल छलछल शब्द संगीत सा बजता है। क्या यही स्वाधीनता है ? क्या यह जो हृदय को इतना अच्छा लगता है वह स्वाधीनता का भाव है ? दण्डकारण्य के जंगल में यह सुख क्यों नहीं अनुभव हुआ कभी ? यह मरिचझाँपि की पहली सुबह है।
अलग अलग मार्ग से परिवारों के आने का क्रम इसी भाँति जारी है। यह क्रम अगले कई दिनों तक, कई सप्ताह तक चलता है। हज़ारों परिवार मरिचझाँपि पर अपने पैरों की छाप छोड़ रहे हैं। हज़ार बाहों वाली कोई शक्ति जैसे काम में जुट गई है। जंगल साफ हो रहे हैं। रास्ते तैयार हो रहे हैं। ज़मीन समतल की जा रही है। समिति के कार्यकर्ता दिन भर सबके हालचाल ले रहे हैं। खाता में सबके नाम धाम दर्ज हो रहे हैं। कितने स्त्री पुरुष, कितने शिशु, कितने वृद्ध सबकी गणना की जा रही है। समिति का दायित्व बढ़ता जा रहा है।
सबसे पहले बनबीवी का थान (स्थान) तैयार किया गया है। समिति का दफ्तर भी एक तरफ जैसे तैसे खड़ा हो गया है। कठिन संघर्ष का पहला महीना जैसे पंख लगा कर उड़ गया। बादल समिति से बार बार आग्रह कर रहा है कि स्कूल का काम जितना शीघ्र हो सके आरंभ कर देना चाहिए। बीस बाईस साल का उत्साही युवक बादल स्कूल के लिए कुर्सी, टेबल, बेंच आदि बनवाने में खुद नेतृत्व दे रहा है। उसने तो स्कूल का नाम भी सोच रखा है। समिति का अनुमोदन मिल जाए तो स्कूल का काम आरंभ किया जा सकता है। इस बीच वह घूम घूम कर लोगों से चंदा इकट्ठा करता रहा है। चार आना, आठ आना, रुपए दो रुपए भी जहाँ से मिले उसने हाथ फैला कर लिया है। बच्चों के लिए कुछ प्रारम्भिक शिक्षा की पुस्तकें खरीदनी होंगी।

No comments:
Post a Comment