Thursday, June 11, 2026

अवधेश कुमार स्मरण

 

 

 


 

 (अवधेश कुमार पर केन्द्रित  विशेष शृँखला के क्रम में    कथाकार अरुण कुमार ‘असफल’ अवधेश को याद करते हुए उस वक्त के देहरादून को भी जी  रहे हैं )

 

                                     मैं अब भी उनके निशान ढूढ़ता हूँ                      

                                         अरुण कुमार  ‘असफल’ 

 

अपने शहर देहरादून में कला और संस्कृति से जुड़ी युवा पीढ़ी को शायद ही यह बात मालूम हो कि उनके शहर में कभी ऐसी बहुमुखी  प्रतिभा रहा करती थी, जिसकी कविताएं सन 1979 में अज्ञेय द्वारा संपादित ’ चौथा सप्तक’ में संकलित हो चुकी थी, जिसकी कहानियां सारिका, हँस जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होतीं थीं, जिसके बनाए चित्रों से उस दौर के प्रायः सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं के बाहरी और भीतरी भाग सुसज्जित हुआ करते थे और जिसके लिखे नाटक ’ सूखी धरती, प्यासा मन’ को लोगों ने मुक्त कंठ से सराहा था। कहानी, कविता, नाटक और कला के बाद बचता ही क्या था, गीत और संगीत ही न! इस विधा में यह प्रतिभा कितनी समृद्ध थी, यह तो नहीं मालूम, लेकिन मैं ने इस प्रतिभा को गीत संगीत की बारीकियां बखान करते सुना था। इतना कुछ बता देने के पश्चात भी मुझे शंका है कि कुछ लोगों की ज़ेहन में उस प्रतिभा का नाम कौंधा होगा। लीजिए मैं ही बता देता हूँ कि उस प्रतिभा का नाम था, अवधेश कुमार, जो कि मात्र सैंतालिस वर्ष की अल्पायु में कला से विमुख होते जाते इस समाज को अलविदा कह गया। मुझे इस बात का आज तक मलाल है कि उस जीनियस के साथ मुझे बहुत कम समय तक रहने का अवसर मिल पाया था। तारीख़ तो मुझे याद नही, पर वर्ष 1995 और मौसम बरसात का था जब देहरादून के हिन्दी भवन में कथाकार जितेन ठाकुर के कथा संकलन ‘अजनबी शहर में’ का लोकार्पण हुआ था और मुझे देहरादून में और इसके आसपास रहकर सृजनरत कई रचनाकरों से एक साथ मिलने का पहला अवसर मिला था। इनमें ’ टिहरी की कहानियां’ के लेखक विद्यासागर नौटियाल, ‘चढाई’ के कहानीकार नवीन कुमार नैथानी, ‘जबड़े’ और ‘वैक्यूम’ जैसी सशक्त कहानियों के रचनाकार विजय प्रताप आदि से मिलने का सौभाग्य मिला था। अवधेश जी से पहली मुलाकात  भी उसी गोष्ठी में हुई थी। छोटा कद, मासूम चेहरा और उस पर बाल सुलभ मुस्कान। ये सारी खूबियां उनकी उम्र को कम कर देती थी। उनका जन्म 7 जून 1951 को हुआ था। उस हिसाब से उस वक्त उनकी वास्तविक उम्र 44 वर्ष थी लेकिन वे तीस बत्तीस के ऊपर शायद ही लगते थे। उनकी इस कुदरती गुण की वजह से मुझ जैसे अपेक्षाकृत कम उम्र के लोगों को उनसे दोस्ती गांठने की पहल करने में संकोच नहीं होता था। उस दिन मैंने उन्हें पहली बार देखा था, संपर्क भले ही न कर सका था लेकिन आगे इस बात की पहल करने की इच्छा तो जाग्रत हो गई थी। जब जनवरी 1996 में संवेदना संस्था की वार्षिक गोष्ठी हुई तो यह इच्छा पूर्ण होने का अवसर आ ही गया । वह गोष्ठी दून स्कूल के कैम्पस में संपन्न हुई थी। इस गोष्ठी में अवधेश जी द्वारा तैयार किए गए कुछ कविता पोस्टर तथा कोलॉज भी प्रदर्शित थे। मैं उन चित्रों को देखते हुए उनमें निहितार्थ समझने की कोशिश करने लगा। एक तो उनका निश्चल व्यक्तित्व, दूसरा संवेदना का अनौपचारिक माहौल, मुझे उनके नजदीक जाने में कोई संकोच न हुआ। पास जाकर मैंने उनसे चित्रकारी के गुर सिखाने का अनुरोध किया था। मुझे याद है कि उन्होने मेरे अनुरोध के पश्चात मुस्कराया भर नहीं था, अपितु वे ठठाकार हँस दिए थे। यह उनके इंकार करने का तरीका था जो किसी का दिल नहीं दुखाता था। उन्होने उसके बाद मुझे बताया कि उन्होने स्वयं इस कला का कहीं से प्रशिक्षण नही लिया था। यह सत्य था कि अवधेश जी अपनी लगन और कला के प्रति लगाव के चलते ही इसमें इतनी दक्षता प्राप्त कर ली थी कि उनके बनाए चित्र और कोलॉज लोगों का ध्यान खींचने में सफल होते थे। कोलॉज तो उस वक्त भारत में अपने आंरभिक दौर में था और अभी इतना प्रचलित नहीं हुआ था। इसकी नींव ही बीसवीं शताब्दी की शुरूआत में पेरिस में दो महान चित्रकारों पाब्लो पिकासो और जार्ज ब्रेक द्वारा हुई थी और भारत के कला महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में इसे शामिल हुए काफी समय नहीं हुआ था। ऐसे वक्त में अवधेश जी इस कला में स्व प्रशिक्षण द्वारा पारंगत हो गए थे और शायद यही अपेक्षा औरों से करतें थे। वास्तव में दृश्य और सौन्दर्य के विभिन्न टुकड़ो को मिलाकर बनाए हुए उनके कोलॉज काफी आकर्षक और अर्थपूर्ण होतें थें। यही कारण था कि उस दौर की कई प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं के मुख्यपृष्ठ उनके कोलॉज द्वारा सुसज्जित होते थे। जिंदगी की दुश्वारियों, असमानताओं और शोषण को व्यक्त करने के लिए उन्हें  कोलॉज ही सबसे मुफीद माध्यम लगता था और उनकी रचनाओं विशेषकर कविताओं में भी उसके निशान दिख जातें हैं। उदाहरणर्थ उनकी  ‘ फूल, काँच, मुर्गा वगैरह’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां हैं - 

  

       

चुपचाप मैं कोशिश करने लगा बनने की फूल

 कांच, मुर्गा और शब्द वगैरहः कोई मरी हुई

 चीज ताजी; आजाद रहे बहुत देर तक


रहे बहुत देर तक जिंदा, मरने के बाद भी।


इन चार पंक्तियों में पूरी कविता का भाव तो है ही साथ ही इस में यह भी संकेत है कि प्रकृति के विभिन्न अवयव मिल कर  एक नया जीवन्त और अर्थपूर्ण दृश्य की रचना करतें हैं, और कोलॉज कला का यही मूल तत्व होता है। कोलॉज में माहिर इस कलाकर ने संवेदना की उस गोष्ठी में मेरे आग्रह को इसलिए भी ठुकरा दिया था क्योंकि उनकी जिन्दगी में गुरू शिष्य जैसे गैर बराबरी के रिश्ते का कोई महत्व नहीं था। वास्तव में मैंने उन्हे कई लोगों को मजाक के तौर पर ‘गुरू जी’ कह कर संबोधित करते सुना था। उनके लिए दोस्ती से बड़ा कोई रिश्ता नहीं था और इसी रिश्ते की डोरी से मुझे बाँध लिया था। एक तरह से, संवेदना की उस गोष्ठी में उन्होने शिष्य के लिए ‘न’ कहा था पर दोस्ती के लिए हाँ कहा था । भले ही अंतरंगता के स्तर पर न हो, पर यह भी मेरे लिए कम गौरव की बात नहीं थी कि ‘ चौथा सप्तक ’ का कवि और दून घाटी का सांस्कृतिक नायक मेरा मित्र बन गया था। वे अक्सर शाम को, दफ्तर छूटने के समय दफ्तर के बाहर आ जाते थे और मेरे साथ स्कूटर पर मेरे घर आ जाते थे। तब मैं सहस्त्रधारा क्रासिंग के पास किराए पर एक कमरा लेकर रहा करता था। शादी हुई नही थी, सो साहित्यिक गपशप के लिए वह जगह बहुत मुफीद थी। थोड़ी ही देर में वहाँ कोई तीसरा जैसे नवीन नैथानी, हरजीत या राजेंश सकलानी या एक एक करके सभी आ जाते थे। योगेन्द्र आहूजा की उस समय ‘ गलत ’ कहानी पहल पत्रिका में छप कर चर्चित हुई थी। उनकी उपस्थिति भी कभी कभी उस कमरे में हो जाती थी। जब कमरे में केवल अवधेश जी ही रहते थे तो वे मेरी तुरन्त लिखी हुई कहानी जरूर पढ़ने को मांगते थे। इस तरह से मेरी कहानियों के पहले पाठक अवधेश जी थे। वे हर रचना पर  ईमानदारीपूर्वक प्रतिक्रिया देते थे और यदि उस विषय पर किसी अन्य की रचना उनके ज़ेहन में होती तो ज़रूर उसे पढ़ने की सलाह देते। जब तीन या उससे ज्यादा लोग होते थे तो मेरे लिए मानों उत्सव का अवसर होता था। तब साहित्य और कला की विविध विषयों पर खूब चर्चाएं हुआ करतीं थीं। एक रचनाकार के लिए इन बहस मुबाहिसों का बहुत महत्व होता हैं। इनसे साहित्य को जांचने परखने की दृष्टि विकसित होती है। साहित्यिक गपशप करते हुए, मिलजुल कर सभी खाना बनाते थे। कोई सब्ज़ियां काटता था, कोई आटा गूँथता था तो कोई रोटी बनाने की ज़िम्मेदारी लेता था। गोश्त मछली भी खूब बनता था। सभी के घरों की रसोईयां निरामिषी थीं, अतः मेरा घर कई अतृप्त आत्माओं को तुष्टि प्रदान करता था। सचमुच वह मेरी रचनात्मक यात्रा का अविस्मरणीय पड़ाव था। भोजन बनानेे से लेकर भोजन करने तक बतकही होती रहती।  अक्सर, देर रात होते होते, सकलानी, आहूजा और हरजीत चले जाते थे। लेकिन अवधेश एवं नैथानी जी टिके रहते थे। बारह बाई बारह के उस कमरे में चार बाई छः का दीवान सदैव बिछा रहता था जिस पर मैं सोता था। लेकिन जब नैथानी और अवधेश जी को रुकना होता था तो यह दीवान उनके लिए ’ रिज़र्व’ हो जाता था और मैं उनके बगल में फोल्डिंग चारपाई डाल कर पसर जाता था। खा पीकर लेटने के पश्चात विमर्श का दूसरा चरण आरम्भ होता था। इसमें सर्वाधिक भूमिका अवधेश जी की ही होती थी। उनके पास बताने को बहुत कुछ होता था जिसे हम दोनों सुनने को व्याकुल रहते थे। हमारे लिए सुकून की बात यह थी कि घर का मकान मालिक उस मकान में नही रहता था और उसने घर के मुख्य भाग को भी किराए पर चढ़ा दिया था जिसमें एक ईसाई परिवार रहता था जो मेरी फ़िक्र तो करता था पर मेरे मामले में दखल नही देता था। एक और बात थी, अवधेश जी, बड़बोले प्रवृत्ति के न थे। वे बहुत मद्धिम स्वर में बड़ी बड़ी बातें करते थे। कहीं गोष्ठी वगैरह में शान्तिपूर्वक बैठे रहते और बोलने की बारी आने पर थोड़ा बोल कर ज्यादा बोलने वालों पर भारी पड़ जाते थे। मुझे संवेदना की एक और गोष्ठी भी याद है जो सन 1997 में पीडब्ल्यू गेस्ट हाउस में हुई थी। यह एक विशेष गोष्ठी थी जिसमें चर्चा का विषय था ‘ वर्चस्व की राजनीति’ और मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ साहित्यकार - विष्णु चंद्र शर्मा। उस गोष्ठी में अधिकांश ने  अपनी बात रखी थी, लेकिन अवधेश जी शान्तिपूर्वक बैठे रहे थे। तब विष्णु चन्द्र शर्मा का ध्यान उन पर गया और उन्होने उनसे भी कुछ बोलने का अनुरोध किया। तब अवधेश जी ने विषयानुकूल एक कविता सुनाकर सबको लाजवाब कर दिया था। अवधेश जी की तुलना किसी साहित्यकार से की जा सकती है तो वे थे, भुवनेश्वर। भुवनेश्वर भी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे और उनकी मृत्यु भी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में कम उम्र में ही हो गई थी। भुवनेश्वर की जो एक मात्र तस्वीर साहित्य की दुनिया में उपलब्ध है, उसे अगर सरसरी तौर पर देखें तो अवधेश जी के होने का भ्रम हो जाता है। भुवनेश्वर के बारे में भी कहा जाता था कि साहित्यिक आयोजनों में वे चुपचाप बैठे रहतें थे फिर कुछ ऐसा सारगर्भित व्यक्त करते थे कि लोग अवाक रह जाते थे। परन्तु अंतरंग मित्रों में काफी वाचाल हो जाते थे, मानो जो कुछ भीतर दबा था उसे अपने घनिष्ठों के बीच ही उद्घाटित करना चाहतें हों। अवधेश जी के साथ भी ऐसी ही स्थिति थी। जहाँ तक उनके घनिष्ठ मित्रों की बात थी, तो यह उनकी बातचीत से ही ज़ाहिर होता था कि देहरादून में एक समय चर्चित रहे कवि देशबन्धु उनके घनिष्ठतम मित्र थे। लेकिन उनकी मृत्यु अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में युवावस्था में ही अस्सी के दशक में हो गई थी। उसके बाद गजलकार हरजीत उनके सबसे करीबी दोस्त बन गए थे। देहरादून में एक समय यह जोड़ी काफी प्रसिद्ध हो गई थी। मयख़ाना से लेकर छापाख़ाना तक दोनो साथ ही साथ दिखते। फिर नब्बे का दशक बीतते बीतते इस जोड़ी में नवीन नैथानी ने प्रवेश करके तिकड़ी का रूप दे दिया। जब भी यह तिकड़ी मेरे घर होती, मेरा दिल बल्लियों उछला हुआ होता। वास्तव में इस तिकड़ी के गपशप में मुझे अपनी बात रखने का अवसर कम मिलता था। सच बात तो यह थी कि मुझे इस बात की इच्छा ही नही होती थी। मैं तो जिज्ञासु भाव से उनकी, विशेषकर अवधेश जी के बातों का आनन्द लेता था। क्योंकि यही दुर्लभ अवसर होता था जब कोई उन्हे दिल खोल कर बोलते हुए सुन सकता था। मानों एनसाइक्लोपीडिया उनकी वाणी में घुल कर बहती थी। साहित्य सिनेमा, संगीत, चित्रकला आदि कोई ऐसा विषय नहीं था जिनमे उनकी पकड़ न हो। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह सब उनके स्वाध्याय का प्रतिफलन था। इसलिए उनका अन्दाजे बयां, अलग और रोचक हुआ करता था। एक बार यह तिकड़ी मेरे घर पर जमी हुई थी। भोजनोपरांत हरजीत चले गए और उसके बाद अवधेश जी और नवीन नैथानी दीवान पर पसर गए। मैं भी बगल में चारपाई डालकर लेट गया था। मुझे याद नही कि कौन सा प्रसंग आया था कि अवधेश जी साहित्य और कला से विषयांतर करके मुद्रण तकनीक की बारीकियां बखान करने में लग गए थे। अवधेश जी रात भर बताते रहे कि किस प्रकार से एक एक अक्षर जोड़ कर शब्द बनाए जाते थे, उसके बाद पंक्तियां बनतीं थी, किस प्रकार से रंगों का संयोजन होता था आदि आदि। मुद्रण और प्रकाशन से संबंधित जितनी बारीकियां थीं उनका इतना यथार्थपरक वर्णन, मानों कोई डाक्यूमेंटरी फिल्म चल रही हो। दरअसल, अवधेश जी पूर्णकालिक सांस्कृतिककर्मी थे। साहित्य और कला उनके शौक भी थे और रोजी रोटी का साधन भी। अब तो देहरादून में मुद्रण-प्रकाशन की बहुत सारी संस्थाएं हैं, लेकिन आज से पच्चीस तीस साल पहले देहरादून इस लिहाज से विपन्न था। तब हिंदी क्षेत्र में मुद्रण और प्रकाशन के लिए तीन शहर सर्वाधिक प्रसिद्ध थे- दिल्ली, मेरठ और इलाहाबाद। मेरठ में ज्यादातर पाठ्य पुस्तकों का काम होता था। वहाँ अवधेश जी जैसे कल्पनाशील कलाकार के लिए कोई जगह नही थी। अन्ततः उन्हे काम के लिए दिल्ली जाना पड़ता था। वे संपादकों और प्रकाशकों से काम इकठ्ठा करके देहरादून आ जाते थे और घर पर इत्मीनान से डिज़ाइन बनाया करते थे। क्योंकि दिल्ली में लंबे समय तक रुकने का मतलब था होटल या मकान किराए का अतिरिक्त व्यय। लेकिन कभी कभी काम के सिलसिले में उन्हे दिल्ली रुकना आवश्यक हो जाता था तो वे उन्ही मुद्रण या प्रकाशन संस्थानों में रुक जाते थे। उन्होने मुद्रण सबंधी बारीकियां अपने इन्हीं पड़ावों के दौरान जानी थी। यह उनका जीवन के हर क्षण और आयाम में इनवाल्वमेंट का प्रमाण था। उनकी यह इनवाल्वमेंट या रम जाने की प्रवृत्ति हर रचनात्मक कर्म में दिखती थी। जिसका एक उदाहरण उनका लिख नाटक ‘ सूखी धरती, प्यासा मन’ है। उन्होने यह नाटक सन 1987 में लिखा था। यह नाटक उनकी कल्पना की उपज मात्र न था। इसके लिए उन्होने अच्छा खासा होमवर्क किया था। काफी समय तो उन्होनेे अपने रंगकर्मी दोस्तों के साथ ‘सूखा’ पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रिपोर्टों और आंकडों का संकलन किया था। उसके बाद सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जाकर स्थिति की भयावहता को करीब से देखा था। तब जाकर इतना उम्दा नाटक लिखा कि देश की प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में इस पर प्रंशसात्मक टिप्पणियां प्रकाशित हुईं थीं। अपने काम में रमना उनका स्वाभाव हो सकता था लेकिन यह बात उनके आर्थिक हितों के विरुद्ध जाती थी। वे अपने काम का वर्गीकरण पेशेवर ढंग से नही कर पाते थे। जिन कामों में कम पैसे मिलने होते थे उसमें भी वे खूब मन लगाकर काम करते थे। जिससे बहुत से काम समय पर पूरा नही हो पाते थे। एक बार घोसी गली स्थित जब मैं उनके घर गया तो उनके एक पुराने ग्राहक को बैठा पाया था। उससे मैं भी थोड़ा थोड़ा परिचित हो गया था। उसनेे अवधेश जी को एक सेमिनार हेतु पोस्टर बनाने को दिया था। सेमिनार होने में दो एक दिन ही रह गए थे और पोस्टर अभी तैयार नही हुआ था। इसीलिए वह वहीं बैठकर ( दूसरे शब्दों में, सर पर सवार होकर) काम करवा रहा था और अवधेश जी पास में हीं बैठकर, एक जेनुइन कलाकार की तरह, रंग और ब्रुश से तल्लीनता से काम किए जा रहे थे। मानो किसी प्रतिष्ठित कलादीर्घा में लटकाने हेतु कोई मास्टरपीस तैयार कर रहें हों। उनका वह परिचित ग्राहक मेरे कान में फुसफुसाते हुए दुखड़ा रोने लगा था कि अवधेश जी उसके साथ हर बार ऐसा ही करते थे और उसेे हर बार धरना देकर काम कराना पड़ता था। दुख की बात यह थी कि हर ग्राहक उनका दोस्त या परिचित नही होता था। फलतः उन्हे काम मिलना बन्द हो गया। धीरे धीरे एक बोहेमियन प्रवृत्ति उनके अन्दर पनपने लगी थी, अर्थात दीन दुनिया से बेख़बर रहना, काम पर ध्यान न देना, अपनी बात पर पक्के न रहना आदि आदि। हम यार दोस्त उनकी इस प्रवृत्ति से कम, उनके पीने की लत से ज्यादा चिंतित थे। यूँ तो शौकिया तौर पर वे तो पीते ही थे। दिल्ली में जब रहते थे तो साहित्यिक महफ़िलों में बेगिलास तो वे बैठतें न होगें। लेकिन तब यह उनका शौक था, ज़रूरत नहीं। जो उनके पुराने दोस्त थे वे बताते थे कि अवधेश जी  पीने के लिए इस कदर पहले कभी बेचैन नही होते थे। सन 1996 के बाद से उनके अन्दर आश्चर्यजनक बदलाव देखा जा रहा था। उन्हे कोई गम न था न ही कोई हताशा थी, लेकिन उनका उच्छृंृंखल स्वाभाव जरूर था, जो किसी भी चीज को गंभीरता से नही ले रहा था, पीने को भी नही। अपने इसी उच्छृंखल स्वाभाव के कारण वे किसी नौकरी से नहीं बंध पाए थे। अगर कोई नौकरी कर रहे होते तो उनकी एक अनुशाषनबद्ध जिन्दगी होती और पीने पिलाने की ओर ध्यान कम जा पाता। नौकरी  नही थी और काम मिलना भी बन्द हो गया था। उनके पास समय ही समय था। जबकि यार दोस्त काम धन्धें में फंसे रहते थे और अवधेशजी को अक्सर दिन का समय अकेले में व्यतीत करना होता था। उन्हे इस समय को काटने के लिए मद्यपान ही सर्वाधिक उपयुक्त लगा होगा। फिर ऐसी स्थिति आ गई कि सारे यार दोस्तों पर शराब ही सबसे भारी पड़ गई और फिर उनका भी वही हाल हुआ जो भुवनेश्वर का हुआ था। उसके बाद यह शहर एक बहुमुखी प्रतिभा की पतन का गवाह बना। लंबे समय तक अवधेश जी को किसी ने न कुछ रंगते देखा न लिखते। एक लंबे अन्तराल के बाद सन 1998 की सर्दियों में उन्होने एक लंबी कहानी ‘ टाँड़’ आरंभ की थी। उन्होने उसके प्रारिंभक अंश मुझे सुनाए थे और मुझे यह एक अच्छी कहानी की शुरूआत लगी थी। देहरादून के सभी रचनाकारों को खुशी हुई थी कि उनका दोस्त रचनात्मक रूप से फिर से सक्रिय हो रहा था। हालांकि अनियंत्रित रूप से पीने के कारण उनका शरीर काफी कमजोर हो गया था लेकिन इस लंबी रचना को रचते हुए, एक जिजीविषापूर्ण चमक उनके चेहरे पर ज़रूर आ गई थी।  वर्ष 1998 के समाप्त होते होते मैं अल्प समय के लिए देहरादून से बाहर चला गया था। मुझे जरा भी अंदेशा नही था कि जब वापस लौटूंगा तो अवधेश जी को नहीं पाऊंगा। दरअसल अत्याधिक मद्यपान से उनकी आंतों का इतना नुकसान हो गया था कि बिल्कुल छोड़े बिना बचना मुश्किल था। अवधेशजी ने पीना कम तो कर दिया था, लेकिन छोड़ा नही था। अब वे सगे संबंधियों और यार दोस्तों से छुपा कर पीने लगे थे। लेकिन मृत्यु चोरी छुपे नही आई। 19 जनवरी 1999 के दिन में ही देहरादून शहर ने एक प्रतिभाशाली और संभावनाशील कलाकार को खो दिया। सैंतालिस वर्ष की अल्पायु में ही उनका एक कहानी संग्रह ‘ उसकी भूमिका’, एक कविता संग्रह ‘ जिप्सी लड़की’ तथा एक चर्चित नाटक ’ सूखी धरती, प्यासा मन’ प्रकाशित हो चुके थे। उनकी और भी रचनाएं रही होंगी जो संकलित और प्रकाशित होने से रह गईं होगीं। लेकिन वे प्राप्त नही हो सके। मुझे किसी से पता चला था कि अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उन्होन बहुत सारे कागज पत्रों को जला दिया था। शायद उसमें उनकी कहानी ‘ टाँड़ ’ भी रही हो, अपूर्ण ही सही। अवधेश जी को दुनिया छोड़े बीस वर्ष हो गए हैं। आज भी जब मैं घोसी गली के पास से गुजरता हूँ तो उनकी कविता ‘ चीते का प्यार’ की निम्न पंक्तियां ध्यान में आतीं हैं -

 

तुम्हारे भीगे हुए शरीर की उनींदीं पगडंडियों पर

एक किशोर की तरह चलता हुआ मैं छोड़ता हूँ

अपने पंजों की छाप , बादलों से भरी इस चाँदनी रात में ’

 

और मैं अब भी ढूढ़ता हूँ उनके निशान, जो मिटने से रह गए हों।

 

 

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