Saturday, June 6, 2026

अवधेश कुमार की कविताएँ

 

 

 


 

अवधेश कुमार(7     - 

 

(सात जून अवधेश कुमार का जन्मदिन है।उन्होंने सृजन के लिये  बहुत सारे कला-रुपों को अपनाया ।  आज से  हम उन्हें याद करते हुए एक विशेष श्रृंखला शुरु करने जा रहे हैं। पहली कड़ी मे  1980 मे प्रकाशित उनके एकमात्र कविता-संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ से कुछ  कविताएँ राजेश सकलानी की टिप्पणी के साथ दे रहे हैं।)

 

अवधेश का पहला और अकेला काव्य संग्रह " जिप्सी लड़की " वर्ष 1980 में प्रकाशित हुआ। तब वे मात्र 29 वर्ष के थे और अज्ञेय के चौथा सप्तक का हिस्सा बन चुके थे। देहरादून जैसे छोटे शहर के युवा रचनाकार के लिए यह बड़ी बात थी। दिल्ली के मशहूर साहित्यकारों के बीच उनकी अच्छी पहचान बन चुकी थी। धीर गंभीर संपादक अज्ञेय से वे बेझिझक मिलते थे। संग्रह की भूमिका में विष्णु खरे लिखते हैं कि हिन्दी का युवा कवि देश की सामाजिक राजनीतिक स्थितियों के कारण प्रौढ़ कविता लिखने को बाध्य होता है। छटे दशक से युवावस्था का लोप कैसे हुआ ?
यह अवधेश की  विशिष्टता है कि युवा सुलभ स्वतन्त्रता, चंचलता, जीवंतता, निश्चिंतता, आत्म निर्भरता और जोख़िम उठाने की साहसिकता जैसी प्रवृतियां  साहित्य में अपनी जगह बनातीं हैं। 
 पहली कविता " फूल, कांच, मुर्गे वगैरह " में मृत्यु सामान्य घटना बन जाती है। वे कामना करते हैं कि
 

‘ कोई मरी हुई चीज़, ताजी;
आज़ाद रहे बहुत देर तक 

रहे बहुत देर तक ज़िन्दा, 
मरने के बाद भी. ’

              यह मानवीय आकांक्षा और यह शिल्प एक जीवंत युवा ही ले कर आ सकता है। भौतिक और भावनात्मक दुनिया के बीच संतुलन , ऐंद्रिकता और सौन्दर्य दृष्टि हिन्दी कविता को एक आधुनिक और नया अनुभव देती है। इनमें किसी बड़े बदलाव की घोषणा नहीं है लेकिन  संयत उल्लास और सामाजिक लगाव का बर्ताव है। फूल, कांच और मुर्गा, ये संज्ञाएं एक जगह पर आधुनिक कला के संवेदन से रचना में मौज़ूद हैं। यह चित्रकला सदृश काव्य सौन्दर्य है।अपने दौर की कविताओं से यह भिन्नता सुखद है।
         जिप्सी लड़की काव्य संग्रह में तत्कालीन राजनीतिक आंदोलनों का सीधा प्रभाव नहीं दिखता है लेकिन ये कविताएं अपने  समाज के चरित्र और उसकी असफलताओं - निराशाओं से स्वाभाविक और गतिशील संबंध बनाए रखतीं हैं। ‘ चिरे हुए आदमी की गंध ’ या ‘चिंता की जमुहाई ’ जैसी रचनाएं इसका उदाहरण हैं। ‘चौथा सप्तक’ में प्रकाशित अपनी कविताओं से वे आगे बढ़ चुके थे। कई बार कहने के बावज़ूद उन्होने पुस्तक नहीं दिखाई जो तब बाज़ार में भी उपलब्ध नहीं थी। ( अभी हाल ही  में उसका पुन: प्रकाशन हुआ है। )

          एक कलाकार की तरह अवधेश अपने कथ्य को शान्त और सौम्य तरह से रखते हैं। वे सपना देखते हैं ('कुछ नहीं तो ')


 कुछ नहीं तो बस यही कि उस सपने में सबको 
सबके सब दिखाई दिये हों 

अपने अपने एक जैसे सपनों के साथ। 
 

‘भूख की सीमा से बाहर ’  कविता लघु फ़िल्म की तरह लगती है। इसकी गतिशील चित्रात्मकता और नाटकीयता की पृष्ठभूमि में सामाजिक विट का कलात्मक संयोजन  है। इस तरह की कविताएं (और लघु कथाएं) लिखने वाले अवधेश संभवत हिन्दी के अकेले रचनाकार हैं। उनकी लघु कथाएं और कविताएं अपनी बनावट और आंतरिक अनुशासन में एक समान लगतीं हैं। चित्रकला जैसी दृश्यात्मकता और प्रभाव अंतरधारा में महसूस होता है।
           ‘ बैलाडीला (बस्तर) : 5 अप्रेल 1978 ’ शीर्षक  कविता चौथा सप्तक के पूर्व लिखी गई थी। पहली पंक्ति ‘ तू थी अबला पर नहीं थी बलात्कार के लिए ’ से शुरू हो कर यहां समाप्त होती है 

  तेरी ताक़त तेरे बेइन्तिहा जुनून में है, 
तेरा बदला तेरे दुश्मन के ख़ून में है  


          संग्रह की   शीर्षक कविता ‘ जिप्सी लड़की ’ और  अन्य कई कविताएं युवोचित उत्साह और सौन्दर्यपरकता के  बेहतरीन उदाहरण हैं जिनमें उन्होंने नए मोटिफ और मानवीय प्रयोजन सलीके से पिरोए हैं। ‘जिप्सी’ शब्द भारतीय नहीं है। लेकिन कवि इस भेद के आधीन नहीं है। यह रूमानियत और सार्वजनीनता का विस्तार करता है ।यह दिलचस्प रचना है।‘ मैने तुझे देखा ओ खूबसूरत जिप्सी लड़की ’ से शुरू होती रचना नाटकीय तरह से एक सान्द्र और ऐन्द्रिक अनुभव पर ख़त्म होती है -


   खुशनसीब है तू  
   ओ जिप्सी लड़की 
   तुझे मिला प्यार 
   दोनों तरह के जंगलीपन का 
              
इस एकमात्र संकलन की सभी कविताएं भाषा और शिल्प के  नएपन के कारण उल्लेखनीय हैं। आधुनिक कला का प्रभाव लिए ये कविताएं संभवत भविष्य में भी याद की जाएंगी।‘ जिप्सी लड़की’ अवधेश कुमार का एकमात्र प्रकाशित काव्य संग्रह है।दूसरे संग्रह के लिए तैयार की गई पांडुलिपि को उन्होने किन्ही निराश क्षणों में आग के हवाले कर दिया था ।यह हादसा चौदह जनवरी 1999 को उनके निधन से कुछ माह पूर्व  हुआ । उनकी बहुत सारी रचनाएं और रेखाचित्र  नष्ट हो गए। अन्य पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाएं फ़िलहाल उपलब्ध नहीं हैं।  ‘जनसत्ता’ के साहित्यिक परिशिष्ट में दिल्ली पर लिखी गज़ल शायद किसी शायर दोस्त को जबाव देने के लिए लिखी थी।
       इस संकलन में प्रकाशित 51 कविताएं संयत आवेग ,लयात्मक भाषा और अन्वेषणात्मक शिल्प के कारण ध्यान आकर्षित करतीं हैं। एक युवा कलाकार का  धैर्य ,स्पष्टता  और परिवेश से रागात्मक लगाव कविता के तत्व के रूप में इनमें मौज़ूद है। 
      ' फूल, कांच ,मुर्गा वगैरह ' के साथ चाकू, टेबल क्लाथ ,छुरी, पेड़, आदि भी सजीव पात्र हैं। अपने सजीव व्यवहार के साथ।मनुष्य के जीवन को प्रकाशित करने के लिए। - राजेश सकलानी  

 

 

  • मुक्ति एक आद्योपांत 

 

जिस तरह नदी किनारे उगी घास झुक कर 

देखती है अपना चेहरा बहते जल में।



जिस तरह यह नन्हा पक्षी अपने

 पंखों पर आसमान को तौलता है।



जिस तरह कोई फूल पंखड़ियों के ओठों से

 अपना मुंह खोलता है।



और जिस तरह इन्द्रधनुष का बोझ उतारने

 के लिए वह बदहवास तितली 

इधर उधर डोलती अपने पंख फड़फड़ाती है।



कालधारा में कौंधते हर संभव स्मृति-क्षण के भीतर

 आद्योपांत, जहां तक पहुंच सकता हूं मैं 

लौकिक-अलौकिक संदर्भों में और तब तक

 प्रयत्नपूर्वक भी कि जब तक प्रेम का यह अनुभव

 संस्कार नहीं बन जाता ।



उन सब की तरह मैं भी जल में, आकाश में

 सुगंध में और रंग में तुम्हारी स्वतन्त्रता के प्रति

 अपनी मुक्ति को खोजता हूं । 

 

 

 

 

बैलाडीला (बस्तर) : ५ अप्रैल १९७८



तू थी अबला पर नहीं थी बलात्कार के लिए 

तू था अशक्त पर नहीं था अत्याचार के लिए

               अखबारों में जैसी तेरी ख़बर है 

            नहीं मानता वो ही असली खबर है



तू हुई लोकसभा के लिए, तू हुआ विधानसभा के लिए

 तुम्हारी मौत की संवेदना हुई सिर्फ आमसभा के लिए 

            हर सभा में हरेक कोई तेरी तरफ है 

           असल क्या पता किसकी मंशा किधर है



तू था बदले के लिए, तू थी वासना के लिए 

तुम दोनों थे किसी की हित-साधना के लिए

           उसकी मुट्ठी में पैसा है सारी पुलिस है 

          उसकी नजरों में तू असहाय मुफलिस है

उठ कि तू है मर्द, है हथियार के लिए 

उठ कि तू है औरत, नये संसार के लिए

       तेरी ताकत तेरे बेइन्तिहा जुनून में है

       तेरा बदला तेरे दुश्मन के खून में है 

 

 

मिलो दोस्त, जल्दी मिलो

 

 

सुबह-एक हल्की-सी चीख की तरह

 बहुत पीली और उदास  धरती की करवट में

 पूरब की तरफ एक जमुहाई की तरह 

मनहूस दिन की शुरुआत में खिल पड़ी।



मैं गरीब, मेरी जेब गरीब पर इरादे गरम 

लू के थपेड़ों से झुलसती हुई आंखों में

 दावानल की तरह सुलगती उम्मीद ।



गुमशुदा होकर इस शहर की भीड़ को 

ठेंगा दिखाते हुए न जाने कितने नौजवान 

कब कहां चड़े बसों में और कहां उतरे

 जाकर : यह कोई नहीं जानता।



कल मेरे पास कुछ पैसे होंगे 

बसों में भीड़ कम होगी 

संसद की छुट्टी रहेगी

 सप्ताह भर के हादसों का निपटारा हो चुकेगा 

हो चुकेगा सुबह-सुबह 

अखबारों की भगोड़ी पीठ पर लिखा हुआ।



सड़कें खाली होने की हद तक बहुत कम

 भरी होंगी: पूरी तरह भरी होगी दोपहर

 जलाती हुई इस शहर का कलेजा।



और किस-किस का कलेजा नहीं जलाती हुई।

 यह दोपहर आदमी को नाकामयाब करने की

 हद तक डराती हुई उसके शरीर के चारों तरफ।



मिलो दोस्त, जल्दी मिलो

 मैं गरीब, तुम गरीब

 पर हमारे इरादे गरम । 

 

 

 प्यार

 

बहुत बार न जाने कितनी बार 

टूट कर चीत्कार के होने से पहले ही 

बिना किसी प्रार्थना के बिना किसी मूकता और

 बिना किसी संवाद के

 बिना किसी सरलता बिना किसी अवसाद के

 उड़ते हुए आकाश में ठहरते हुए अपनी उड़ान में

 एकाएक सोच में ठिठकते हुए बार-बार ।



बहुत बार : न जाने कितनी बार 

जब-जब ठहरा मैं अपनी उड़ान में 

मुझे थामे रहा शून्य आकाश में - वही प्यार ।



जब-जब अटका मैं अपनी चीत्कार में 

दम साधे खड़ा रहा वह मेरे रोने के क़रीब-करीब । 

 

 

 

जिप्सी लड़की : एक

 

मैंने तुझे देखा ओ खूबसूरत जिप्सी लड़की

 पेड़ों के जंगल में 

और आदमियों के जंगल में भी !



लेकिन तू बनी रही हम सब की इच्छा ही 

और उलझ पड़ी यह इच्छा

 आदमियों के जंगल से कभी और कभी 

पेड़ों के जंगल से ।



तूने फेंका अपना लाल रुमाल 

दूसरे जंगल में जब कभी : मैंने लोक लिया 

उसे अपने जंगलीपन में।



मैंने देखा तुझे कभी दूसरे के जंगल में 

और अपने जंगल में कभी ।



खुशनसीब है तू 

ओ खूबसूरत जिप्सी लड़की 

तुझे मिला प्यार

 दोनों तरह के जंगलीपन का । 

 

 

असंभव वापसी

चीन से लौट कर कहा विदेश मंत्री ने 

अपने देश में: कि-

 'जल्दी से जल्दी लौटे चीन वापस बीएतनाम से ।'



गांव से घबरा कर शहर भागे 

गिरधर गोपाल से गांव की माटी ने

 कहा पुकार के-कि वह एकदम से लौट आए अपने गांव ।



फूल की टूटी हुई पंखुरियों से कहा

 बचे हुए फूल ने तड़प कर 

कि लौट आएं वे उसके पास उड़कर सुदूर से ।



लेकिन पंखुरियां नहीं लौटीं वीएतनाम से

 शहर से चीन 

पतझर से गिरधर गोपाल । 

 

 

भूख की सीमा से बाहर



जब तक लोहा काम करता रहता है उसमें जंग नहीं लगता।

 जब तक मछली पानी में है उसे कोई नहीं खरीद सकता।

दिल-टेबल-क्लॉथ नहीं है-

जो तुम उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो ।



यह कहते हुए मेरे दुनियादार और अनुभवी मेजबान ने 

खाने की मेज पर छुरी के साथ

 एक बहुत बड़ी मछली ला कर रख दी और बोला- कि 

आइए, इसे खाते हैं और भूल जाते हैं 

थोड़ी देर के लिए उन शब्दों को 

जो भूख की सीमा में नहीं आते । 

 

 

चिरे हुए आदमी की गंध

 

एक दुःस्वप्न आरे की तरह चीर गया मुझे 

चिरे हुए आदमी की गंध फैल गई गली में 

अनदिखे बसन्त की तरह।



चीर गया एक पूरा दिन मेरी गली को

 चिरी हुई गली की शक्ल का हुलिया

 कल फिर दुरस्त होगा दुनियादारी में। 

सवारी में, तिजोरी में, बोरी में, व्यापार में 

भावताव में, बचाव में, वार में।

नोट कर लेने लायक नहीं थे : इतने बड़े नहीं

 थे दुःस्वप्न-लिख लेने लायक नहीं थे। 

छोटे-छोटे ही थे याद रहने लायक 

दो पैसे-चार पैसे के लाला के उधार की तरह।



बड़े व्यापार की तरह छोटे-छोटे दुःस्वप्नों की चिंता

 नहीं करनी चाहिए थी मुझे 

जब कि गली में अनदिखा बसन्त आया हो ।



पर जो एक चिरी हुई गंध 

गली के पूरे हुलिये पर छाई है 

बच पाना मुश्किल है उससे-

दिखते हुए बसत में भी पहुंचकर ।

 

 

फूल, कांच, मुर्गा वगैरह

 
डाली से टूटने के बाद यह फूल 

इतने दिन तक खिला रहा।



टूटने के बाद जरा भी नहीं खिला मैं।



कांच के ऊपर इतनी धूल जमने के बाद भी 

चमक ज्यों की त्यों बनी रही कांच पर



अपनी धूल झाड़ने के बाद भी मैं रद्दी हो गया।



गरदन कट जाने के बाद भी मुर्गा दौड़ता रहा 

अकड़ के साथ - खून के फौव्वारे छोड़ता हुआ

 इस बंद कमरे में।



लिखे जाने से पहले शब्द कितने स्वतंत्र थे

 लिखे जाने के तुरंत बाद वे मेरी बाती मृत्यु हो गए।



चुपचाप मैं कोशिश करने लगा बनने की फूल

 कांच, मुर्गा और शब्द वगैरहः कोई मरी हुई

 चीज ताजी; आजाद रहे बहुत देर तक



रहे बहुत देर तक जिंदा, मरने के बाद भी।




 

 

 

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