Showing posts with label वक्तव्य. आत्मक. Show all posts
Showing posts with label वक्तव्य. आत्मक. Show all posts

Monday, June 29, 2026

संवेदना साहित्य में हमेशा साहित्य के बाहर से आती है : अवधेश कुमार


 

 

   ( अवधेश कुमार को याद करते हुए आज चौथा सप्तक में कविताओं के साथ दिये गये उनके वक्तव्य को प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछली पोस्ट में विष्णु खरे उनके कविता संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ के लिये लिखी गयी भूमिका दी गयी थी। अवधेश का यह वक्तव्य  उनके वैचारिक पर्यावरण के बारे में बहुत कुछ कहता है )

  

जब कभी मैं अपनी कविताएँ इस तरह से पढ़ता हूँ कि जैसे वे किसी दूसरे आदमी की लिखी हुई हों, तो वे मुझे इस तरह से प्रभावित करती हैं कि उन से भी बेहतर कविताएँ लिखने की इच्छा बढ़ जाती है। अपनी किसी चीज़ को दूसरे की मान लेना; या ऐसा अनुभव कर लेना अव्यावहारिक व कठिन है, किन्तु मेरा इस का अभ्यास है। शब्द के अलावा रंग, शिल्प, अभिनय, पूरे रंगकर्म और उतना ही खामोश रहने में भी मेरा पूरा विश्वास है; क्यों कि मैं मानता हूँ कि सभी अभिव्यक्ति-रूपों में परस्पर सामंजस्य के साथ यदि उन की एक पूर्ण आन्तरिक इकाई किसी एक व्यक्ति में बन जाती है तो उसे कुछ कहने के अवसर स्वतः ही मिलते रहते हैं। इसी लिए कविता लिखना अब तक मेरे लिए बड़ा सहज रहा है।

 

जब मैं लाख चाहते हुए भी बड़े-बड़े कैनवस पेंट नहीं कर पाता, थियेटर नहीं कर पाता, दूर-दूर के देशों की पहाड़ों, जंगलों और समुद्र की यात्रा नहीं कर पाता; लोगों को और उन से अपने रिश्तों को समझने की कोशिश करता हूँ, प्यार या तनाव में होता हूँ तो कविता करता हूँ।

 

इंटरमीडिएट में एक पेपर देते हुए जब मैं बोर हो गया तो मेरे पास कविता करने के सिवा और कोई चारा नहीं था। आँखों के सामने पसरी सुबह, जाड़े की ताजी धूप और परीक्षा-भवन के उस एकान्त घुन्नेपन में परीक्षा के तनाव को स्थगितताज्ञा धूप और परीक्षा-भवन के उस एकान्त घुन्नेपन में परीक्षा के तनाव को स्थगित करते हुए कविता रचने का वह अब तक का मेरा सब से विचित्र अनुभव है। उसी दौरान मुझे लगा कि परीक्षा देने से ज़रूरी कविता करना है; क्योंकि वह स्वतःस्फूर्त  हैं: और मैं ने तीन छन्दों का न केवल एक गीत लिख डाला, बल्कि बाहर निकलने तक मैं उस की धुन भी बना चुका था, और यह कहने की ज़रूरत नहीं कि उस साल उसी पर्चे में मैं फेल हो गया; जिस का मुझे कोई अफ़सोस नहीं था।

 

मैं पेड़, चिड़िया, पहाड़, नदी, समुद्र, सूरज, आदमी, समय और अपने पर लाखों कविताएँ लिख सकता हूँ, और यह भी कि मुझे बहुत सारे पाठक भी नहीं चाहिए। यह इस तरह से है कि मैं तो दूसरों की लिखी हुई सभी कविताएँ खोज-खोज कर पढ़ता हूँ किन्तु मेरी कविता भी उसी रुचि और लगाव के साथ पढ़ी जाये, ऐसा कोई आग्रह या प्रश्न मन में कभी नहीं रहा।

 

मेरी कविता एकसाथ बहुत सारी चीजों से प्रभावित है और एक सम्पूर्ण शब्द में वह जीवन है। शायद जीवन के प्रति मेरा गहरा लगाव व आस्था ही है, जिसे मैं अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।

मैं इस शताब्दी के मध्य में पैदा हुआ और देहरादून जैसे शान्त, निर्द्वन्द्व और खूबसूरत शहर में; तो इस देश और काल में जीते हुए जैसी कविता मुझसे सम्भव हो सकी, मैं ने की है।

 

अपनी कविता का आधुनिक होना भी मैं उतना ही महत्त्वपूर्ण मानता हूँ, जितना कि उस का भारतीय भी होना: उस की संवेदनशीलता के आयाम भी बहुत मुखर, सचेत और सामयिक होने चाहिए ताकि उस की निरन्तरता और स्थानीयता एकसाथ बनी रहे-वह एक-एक व्यक्ति से होती हुई पूरे समाज से जुड़े और कई शिल्प-रूपों और माध्यमों को अपनाये; क्यों कि ऐसा है कि शब्द में संवेदना के विकास या अवरोध को एक क्रम में लक्ष्य कर पाना कठिन होता है जब कि पेंटिंग, मूर्तिकला, स्थापत्य और फ़िल्म जैसे माध्यमों में उस की चाक्षुष उपस्थिति रहती है। मैं कोशिश करता हूँ कि मेरी कविता पेंटिंग की तरह रंगों और उन की रंगतों जैसी कोई शाब्दिक संरचना हो और फ़िल्म की तरह सवाक् और गतिशील हो। आधुनिक और भारतीय होने की यह रचनात्मक सोच मुझे साहित्य से बाहर पेंटिंग-स्कल्पचर और फ़िल्म जैसे कला-माध्यमों में ज़्यादा सक्रिय और सार्थक महसूस होती है। इस लिए मैं कविता को उन माध्यमों में से गुज़रते हुए सोचता हूँ; यह कि मैं अपनी कविताओं को उन के लिखे जाने के तुरन्त बाद और साथ ही साथ पेंटिंग व फ़िल्म माध्यमों में रुपान्तरित कर सकता हूँ।

शब्द को साहित्य में यथासम्भव चुप तथा अनुशासित और अन्य माध्यमों  में वाचाल और उद्दंड होना चाहिए; ऐसा इस लिए कि संवेदना साहित्य में हमेशा साहित्य के बाहर से आती है। साहित्य शब्द के जड़ हो जाने, मर जाने की जगह है; इस लिए साहित्य में आने से पहले उसे साहित्य से बाहर जीवन में इधर-उधर ज़िम्मेदाराना ढंग से आवारागर्दी कर लेना चाहिए ताकि न केवल वह अर्थवान हो सके, बल्कि उस के पास अर्थ के ऐसे सामाजिक और सांस्कृति आयाम भी हों जो दो भिन्न मानसिकता, स्थान और समय में रहने वाले आदमियों के बीच के अपरिचय को समाप्त कर सकें। I

 

और अन्त में यही कि मैं रंगों और कविताओं से लदा हुआ एक वृक्ष हूँ जिसकी की जड़ें अपनी जमीन में बहुत गहरी गडी हैं, पर वह सचमुच के पेड़ की तरह एक जगह जड़ नहीं हैं ,चल सकता है, बोल सकता है। उस के दो वास्तविक हाथ है विरोध के लिए कि कोई जंगल में आरा ले कर घुसने की हिम्मत न कर सके, इसी तरह से मैं समझता हूँ कि मेरी कविता मेरे साथ एक संघर्षशील सामाजिक यात्रा में शामिल है। जीवन में एक ऐसे परिवर्तन के लिए जिस के लिए अपनी-अपनी तरह से हम सब प्रयत्नशील हैं।

 

 ( ‘ चौथा सप्तक ’ में प्रकाशित कवि का वक्तव्य)