Friday, July 3, 2026

दस्तावेज: समकालीन कला पर अवधेश कुमार

 

 

 ( अवधेश कुमार के लेखन और वैचारिक पहलुओं के बारे में जानने के लिये उनके पत्र-पत्रिकाओं  में बिखरे हुए लेखों से महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है.  ‘हंस’में उन्होंने कई कलाकारों के कला-कर्म पर टिप्पणियाँ की हैं. यहाँ हम ‘हंस’के अगस्त 1995 अंक में कलाकार आशीष स्वामी पर लिखी गयी टिप्पणी को साभार दे रहे हैं) 

 

 



 

 आशीष स्वामी : स्याही से रंगों का काम 

अवधेश कुमार  

 

 

भारत में रेखांकन अब तक स्वतंत्र विधा है. उसे व्यावसायिक स्वीकृति और बाजार भी उपलब्ध है. हालाकि अभी भी कला जगत में तैलीय माध्यम से रचे गए कैनवस का प्रभुत्व एवं एकाधिकार निर्विवाद है किंतु पूरे परिदृश्य में अब मिश्रित कला सामग्रियों से निर्मित कलाकृतियां भी छाती जा रही हैं.

मिली-जुली कला सामग्रियों से निर्मित म्यूरल और इंस्टालेशन्स भी सामाजिक स्वीकृति पा  चुके हैं. दिल्ली स्थित ब्रिटिश उच्चायोग के भवन में गुलाबी और काले संगमरमर का अद्भुत संयोजन अब एक कलाकृति का दर्जा पा चुका है. यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि पश्चिम के प्रभाव से आई ये नई कलाविधाएं सदियों से हमारे जनजीवन का हिस्सा रही है.  वेदों ,उपनिषदों, पुराणों और महाकाव्यों में पाये जानेवाले 'जादुई यथार्थवाद’ की तरह आज की उत्तरआधु‌निकतावादी कलासंरचनाएं तो हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता के शैशवकाल से ही हमारी कलात्मक अभिरुचियों और संस्कारों का एक अटूट हिस्सा रही है. भारतीय जीवन में सभी पारिवारिक, वैवाहिक और धार्मिक अनुष्ठान आदि इसी तरह के कला आयोजन हैं- विवाह मंडप और माँदरों की साज-सज्जा आदि. यहां तक कि मृत्यु के समय सजाई जानेवाली चिता भी एक तरह का इंस्टालेशन ही है. होली दहन के अवसर पर जिस प्रकार पीली या लाल ध्वजावाले बांस के बारों ओर लकड़ियां चिनी जाती है ,उन्हें उपलों, फलों, मिठाइयों आदि से सजाया जाता है; वह सब क्या है?
बात रेखांकन की हो रही थी पश्चिम में तो रेखाकन विधा की तकरीबन तीन सौ साल परानी परंपरा रही है हमारे यहां प्रागैतिहासिक कालखंड में बनाए गए गुफा रेखाजता के बाद की फा और उसके एक लंबे अंतराल चातु मनल और राजपूत शैली के चित्रों में ही रेखा जी एक अलग पहचान की जा सकती है दरअसल रेखा किसी वस्तु,व्यक्ति, दृश्य, वनस्पति, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि की आकृतियों के अध्ययन के लिए किए जाते रहे हैं और किसी भी चित्र का आधार बनाते रहे हैं उसके पश्चात् रंगों के भर जाने से जैसे चित्र में वे 'छप' जाते हैं.

मुगल और राजपूत काल तक यदि कछ रेखांकन स्वंतत्र रूप से बच पाए हैं तो इस कारण कि वे चित्रांकित नहीं हो पाए, अधूरे छूट गए या किन्हीं कारणों से उन्हें पूरा नहीं किया गया. उसके बाद देखें तो बंगाल स्कूल से ही रेखांकन विधा की एक अटूट श्रृंखला हमें दिखलाई पड़ती है.

इसका कारण शायद यह रहा कि बंगाल स्कूल पर चीनी और जापानी चित्रकला का गहरा प्रभाव रहा. ब्रश और इंक से रेखांकन करना चीनी और जापानी चित्रकला का सर्वोपरि अंग रहा है. यह जानना दिलचस्प होगा कि चीनी जापानी शैली में भारतीय कलाकारों ने अथवा चीन-जापान से आए कलाकारों ने हमारे प्रमुख राजनेताओं, लेखको, बुद्धिजीवियों तथा कलाकारों के इसी शैली में व्यक्ति रेखांकन (स्केच) बनाए हैं-रवीन्द्रनाथ ठाकर और प्रेमचंद की ये शबीहें (पोर्ट्रेट्स) पुस्तकों आदि में प्रकाशित भी हुई हैं. जामिनी राय के रेखांकन भी उनकी कलाकृतियों में अपना एक अलग स्थान रखते हैं. इसलिए भी कि जामिती राय ने लोककला की जिस कालीघाट शैली से प्रेरणा प्राप्त की उसमें शक्तिशाली, सुनिश्चित और सक्षिप्त रेखांकनों की एक सुदृढ़ आधारभूमि रहती है. इसके बाद तो धीरे-धीरे जैसे रेखांकन की स्वायत्तता का मार्ग पुष्ट होता चला गया.
इस अंक में प्रकाशित आशीष स्वामी के रेखांकनों में आप पाएंगे कि वह पेंसिल, स्केच पेन, पेन आदि का इस्तेमाल न करके सीधे ब्रश से ही स्याही द्वारा रेखांकन करते हैं. किंतु इन रेखांकनों का झुकाव जरा पेंटिंग की तरफ ही दिखाई पड़ता है. इसका कारण है ब्रश इस्तेमाल करने के कारण उसके बालों के फैलाव के कारण कागज पर पड़नेवाली स्याही का छितराव और एक तरह का अधूरापन जोकि निश्चित रेखाओं के खींचने से प्राप्त नहीं किया जा सकता. आशीष स्वामी अपने रेखांकन में आकृक्तियां भी अधूरी छोड़ देते हैं जिससे देखनेवाले को उन्हें स्वयं ही पूरा करने की कल्पना कर सकने की छूट भी मिल जाती है. रंगों द्वारा बनाए गए चित्रों में भी आशीष स्वामी अपनी इसी परिचित तकनीक और शैली का इस्तेमाल करते हैं. ब्रश को एक खास तरह से बरतने के कारण आशीष स्वामी काली स्याही से भी रंग का काम लेना जानते हैं.

 




 
( ‘हंस’ अगस्त 1995 )