Monday, April 6, 2026

बोर्खेस और मैं : अनुवाद - योगेन्द्र आहूजा



 

 

इस रचना (दार्शनिक गद्य) में बोर्खेस अपने दो रूपों—एक “सार्वजनिक लेखक बोर्गेस” और दूसरा “निजी ‘मैं’”—के बीच के संबंध और तनाव पर विचार करते हैं। इसमें कोई कथानक या घटनाक्रम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, एक लेखक के ‘स्व’ और सार्वजनिक पहचान पर, उनके आपसी रिश्ते पर दार्शनिक विमर्श है।-  योगेन्द्र आहूजा 

 

 बोर्खेस और मैं

(बोर्खेस)

वह जो ‘दूसरा’ है, बोर्खेस, वह है जिसके साथ चीज़ें घटती हैं। मैं ब्यूनस आयर्स की गलियों में यूँ ही भटकता रहता हूँ; आजकल कभी-कभी बेख़याली में ठहरकर किसी दरवाज़े की मेहराब और उसके लोहे के फाटक को देख लेता हूँ। बोर्खेस के बारे में मुझे ख़तों में ख़बर मिलती है; उसका नाम प्रोफ़ेसरों की सूची में दिखता है, और बायोग्राफिकल गजट्स में भी। मुझे रेत-घड़ियाँ पसंद हैं, नक़्शे, अठारहवीं सदी के फ़ॉन्ट, कॉफ़ी का ज़ायका, और स्टीवेंसन की गद्य-शैली। दूसरे को भी यही सब भाता है, मगर उसकी ख़ुदपरस्ती इन्हें एक तरह की नाटकीय सजावट बना देती है। यह कहना कि हमारा रिश्ता दुश्मनी का है, कुछ ज़्यादा हो जाएगा। मैं जीता हूँ, ज़िंदा रहता हूँ, ताकि बोर्खेस अपना साहित्य रच सके — और वही साहित्य मेरे होने का औचित्य भी है। मैं आसानी से मान लेता हूँ कि उसकी कुछ पंक्तियाँ सार्थक हैं, लेकिन वे पंक्तियाँ मेरी मुक्ति नहीं हैं। शायद इसलिए कि अच्छा लेखन किसी एक व्यक्ति का नहीं होता — उस दूसरे का भी नहीं — बल्कि भाषा और परंपरा का होता है। बाक़ी जो कुछ है, मेरी तक़दीर में तो पूरी तरह गुम हो जाना लिखा है; मुमकिन है मेरा बस एक छोटा-सा हिस्सा उस दूसरे में ज़िंदा रह जाए। मैं धीरे-धीरे सब कुछ उसके हवाले करता जा रहा हूँ, यह जानते हुए भी कि उसमें चीज़ों को विकृत करने और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की एक खराब आदत है। स्पिनोजा जानता था कि हर वस्तु अपने वजूद का स्थायित्व चाहती है — पत्थर पत्थर बने रहना चाहता है और बाघ बाघ, सदा के लिए। मुझे बोर्खेस में बने रहना है, ख़ुद अपने भीतर नहीं (अगर सचमुच मेरा कोई “मैं” है भी), फिर भी मैं अपने आपको उसकी किताबों में उतना नहीं पहचानता जितना कई अन्य किताबों में, या फिर गिटार की गहरी झंकार में। कुछ बरस पहले मैंने उससे बच निकलने की कोशिश की थी — उपनगरों की कथाओं से निकलकर काल और अनंत के खेलों में जा पहुँचा था। मगर अब वे खेल भी बोर्खेस के हो चुके हैं — मुझे कुछ और सोचना होगा। इस तरह मेरा जीवन एक पलायन है। मैं सब कुछ खो दूँगा, और सब कुछ या तो विस्मृति में चला जाएगा, या उस दूसरे के पास।

मुझे नहीं मालूम कि हम दोनों में से किसने यह लिखा है।

2 comments:

reena said...

Nice Post.
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Admin said...

यह अंश पढ़ते ही दिमाग थोड़ा उलझता भी है और मज़ा भी आता है। मुझे लगता है राइटर अपने ही दो रूपों से बात करता है, एक जो जीता है और दूसरा जो लिखता है। हम भी अक्सर ऐसा महसूस करते हैं कि दुनिया हमें अलग तरह से देखती है और हम खुद को अलग तरह से समझते हैं।