Thursday, April 23, 2026

उषा नौडियाल के कविता अनुवाद 
 
उषा नौडियाल ने विश्व की कुछ शानदार कविताओं का अनुवाद किया है। इसे हम पहली बार यहां पेश कर रहे हैं।

बीते कुछ वर्षों में उषा नौडियाल ने कई महत्वपूर्ण विश्वकृतियों को अनुवाद के जरिए हिंदी समाज के सामने रखा है। हाल में अमेरिकी रेड इंडियनों के आजादी के संघर्ष पर हॉवर्ड फास्ट का उपन्यास लास्ट फ्रंटियर 'आखिरी मोर्चा' शीर्षक से गार्गी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। उनके खाते में हॉवर्ड फास्ट का अमेरिका के मैकार्थीवाद के आतंक पर आधारित उपन्यास 'सिलास टिम्बरमैन', प्रसिद्ध गायक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता पॉल रॉबसन के एक संगीत कार्यक्रम के दौरान नस्लवादी व फासीवादियों द्वारा भड़काए गए दंगों पर आधारित हॉवर्ड फास्ट का उपन्यास 'पीकस्किल अमरीका' ,नाजी जर्मनी के हालात पर हॉवर्ड फास्ट के उपन्यास 'द ब्रिज बिल्डर्स स्टोरी' 'पुल बनाने वाले की कहानी' शीर्षक से प्रकाशित हुए हैं। गुरिल्ला फिल्म निर्देशक मिगेल लिटिन पर गैब्रियल गार्सिया मार्खेज की पुस्तक 'चिली में गुप्तवास' (क्लैंडस्टाइन इन चिली)  और चीनी कथात्मक लेख संग्रह 'बीज और अन्य कहानियाँ' का भी उन्होंने अनुवाद किया है। उषा नौडियाल ने विश्व के चार क्लासिक उपन्यासों को किशोरों के लिए पुनर्प्रस्तुत किया है। एचजी वेल्स  का 'दुनिया की जंग' (The War of The Worlds) , विक्टर ह्यूगो का 'नात्रेदम का कुबड़ा' (The Hunchback of Notre Dame), चार्ल्स डिकेन्स का उपन्यास 'डेविड कॉपर फील्ड' और मिगुएल डी सर्वांतीस का उपन्यास, 'डॉन क्विकजोट' (Don Quixote)। कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर से गढ़वाल विवि से उन्होंने अंग्रेजी में परास्नातक व गढ़वाल विवि से हिंदी में एमए व बीएड किया है।  







बंदी (असीर)

-फ़रोग़ फ़रोख़ज़ाद


फ़रोग़ फ़रोख़ज़ाद (1934-1967) :  ईरान की एक नारीवादी सबसे प्रभावशाली आधुनिक कवयित्री और फ़िल्म निर्देशक, जिन्हें उनकी विद्रोही और बेबाक तेवरों के लिए जाना जाता है।

 

मैं तुम्हें चाहती हूँ, पर जानती हूँ कि कभी भी

तुम्हें दिल भर कर गले नहीं लगा सकूँगी

तुम हो चमकते उजले आसमान

और मैं, पिंजरे के एक कोने में कैद एक चिड़िया।


ठंडी और काली सलाख़ों के पीछे से

देखती हूँ तुम्हें, पछतावे भरी उदास नजरों से

सोचती हूँ, काश कोई हाथ बढ़े मेरी ओर

और अचानक मैं पंख फैला दूँ

आने को तुम्हारी ओर


सोचती हूँ, कभी तो कोई पल होगा

लापरवाही का,

जब नजर बचाकर उड़ जाऊँ मैं इस सुनसान जेल से

हँसू अपने जेलर की आँखों में देखते हुए और

एक नया जीवन शुरू करूँ तुम्हारे साथ

ये सब सोचती हूँ मैं, पर जानती हूँ

कि नहीं कर सकती हिम्मत

छोड़ने की इस कैदखाने को

जेलर अगर चाहे भी मुझे आजाद करना

पर अब न साँसे बची हैं, न ताजी हवा,

मेरे उड़ने के लिए।


सलाख़ों के पीछे से हर उजली सुबह

मेरे चेहरे पर पड़ती है एक बच्चे कि मुस्कान

ख़ुशी का गीत गुनगुनाती हूँ मैं, जब

उसके होंठ आते हैं चुम्बन के लिए मेरी ओर

ओ आसमान, अगर एक दिन मैं चाहूँ उड़ना

इस ख़ामोश कैदखाने से

तो रोते हुए बच्चे की आँखों से क्या कहूँ?

मुझे भूल जाओ,

क्योंकि मैं एक कैदी चिड़िया हूँ।


मैं वो चिराग हूँ जो अपने दिल की

जलती हुई लौ से, रोशन करता है खंडहरों को।

अगर मैं खामोश अँधेरा चुनना चाहूँ

तो बरबाद कर दूँगी घरौंदें को।

 

 

मेरी फिक्र

— मैरी ओलिवर


बहुत फिक्रमंद थी मैं, क्या फलेगा-फूलेगा बगीचा,

क्या नदी बहेगी सही छोर में

क्या धरती उसी तरह घूमेगी,

जैसा पढ़ाया गया था हमें,

और अगर नहीं तो

मैं इसे कैसे ठीक करूंगी?

क्या मैं सही थी, या गलत थी मैं,

क्या माफ़ किया जाएगा मुझे?

क्या बेहतर कर कर सकती हूँ, मैं?

क्या कभी गा पाऊँगी मैं?

गौरैया तक भी गा सकती हैं,

और मैं तो ख़ैर, बिल्कुल ही बेकार हूँ।

क्या कम हो रही है मेरी नजर।

या यह बस सोचना है मेरा?

या कहीं गठिया तो नहीं हो जाएगा मुझे,

या शायद अटक जाए जबड़ा,

कहीं स्मृतिलोप तो नहीं होने वाला मुझे?


आख़िरकार,  सोचा मैंने

फायदा कोई नहीं, इस तरह बिसूरने से।

छोड़ ही दिया फिर,

और अपने इस बूढ़े होते शरीर को

लेकर, निकली बाहर, सुबह के उजाले में

 गाने लगी गीत।

           

उसका सिर

            

जो मरे

(अगस्त-1945) अमेरिकी कवि ,लेखक,नाटककार और संपादक


इकुबुकेनी के पास नताल दक्षिणी अफ़्रीका में,

एक औरत ढो रही है पानी अपने सिर पर

एक साल के सूखे के बाद,

जब उसके तीन बच्चों में से

एक है मौत के पंजे में,

वह दूर के किसी कुएँ से

पानी लेकर लौट रही है, अपने सिर पर।

सूख चुकी हैं कद्दू की बेलें,

मुरझा चुके हैं टमाटर

फिर भी वह औरत

ढो रही है पानी अपने सिर पर..


ख़ाल हैं बाड़े मवेशियों के,

भुखमरी की शिकार हैं बकरियाँ,

बच्चों के लिए दूध नहीं

लेकिन वह ढो रही है पानी, अपने सिर पर।

इंजीनियरों ने रुख़ मोड़ कर नदी का

बाँध दिया है नदी को

ताकि ताकतवर, सत्ताधारी लोग

कर सकें उपभोग, बिजली की शक्ति का।

लेकिन वह औरत ढो रही है पानी

अपने सिर पर।

होमलैंड में जहाँ धूल से लथपथ भीड़

ख़ाली सड़क पर,

करती है इन्तज़ार पानी के टैंकरों का,

लेकिन वह औरत करती है विश्वास तो बस खुद पर,

और उस खजाने पर, जिसे ढोती है वह

अपने सिर पर।

सूरज भी उसे नहीं रोक पाता,

न ही तोड़ सकती, सूखी और तपती हुई धरती,

वह ढोती है पानी अपने सिर पर

मैली सी एक टूटे हैंडल वाली बाल्टी

जो टिकी है एक पतले से पतरे पर।

ढो रही है पानी वह औरत, अपने सिर पर।

 वह औरत, जिसके गले में है, सेफ़्टी पिनों की एक माला

ढोती है पानी अपने सिर पर

अपने परिवार, अपने लोगों के लिए

ज़िन्दगी और मौत के बीच  जो भी ज़रूरी है

उसे लाने के लिए

करती है भरोसा, सिर्फ़ अपने सिर पर।

ढो रही है पानी उनके लिए

वह अपने सिर पर।

 


चेतावनी 


- सिल्विया पाथ

सिल्विया पाथ (1932-1963) : बीसवीं सदी की सबसे प्रभावशाली अमेरिकी कवियत्रियों में, उनकी रचनाएँ उनकी गहरी भावनाओं और व्यक्तिगत जीवन के मानसिक संघर्षों को दर्शाती हैं।

 

अगर तुम काट कर किसी चिड़िया को

अलग-अलग हिस्सों में,

 बनाते हो उसकी जीभ का आरेख

तो काट दोगे उसके स्वर यंत्र को भी

जहाँ से निसृत होते हैं गीत

अगर खाल उतार कर किसी

किसी जानवर की

मुग्ध होते रहोगे उसके अयाल पर


तो परवाह क्या करोगे तुम, उसके पूरे वजूद की

जहाँ से वह फर शुरू हुआ था,


अगर यह जानने के लिए

कि धड़कता है कैसे, आख़िर दिल,

निकाल दोगे इस दिल को ही तो

तुम रोक दोगे उस घड़ी को

जिससे मिलती है लय हमारे प्रेम को।

 

 

 

एल्म

-सिल्विया पाथ

 

मैं जानती हूँ उसकी गहराई को, कहती है वह,

अपनी लम्बी जड़ों से उसे  छूकर जाना है मैंने,

जिससे डरते हो तुम, मुझे इससे डर नहीं लगता,

क्योंकि मैं वहाँ रह चुकी हूँ।


क्या सुनाई दे रहा है तुम्हें,

समंदर का शोर मेरे अन्दर

 उसकी अतृप्त लहरों की बेचैनी?

या फिर उस शून्य की गूँज,

जो तुम्हारा पागलपन थी?


प्रेम एक छाया है,

जिसके पीछे तुम भागते हो,

झूठ बोलते हो और रोते हो,

सुनो, ये इसके खुर हैं, वह तो

घोड़े कि तरह की भाग चुका है।


सूर्यास्तों के अत्याचार सहे हैं मैंने,

जड़ों तक झुलस चुकी हूँ

जल कर लाल हो चुकी हैं मेरी तनी हुई नसें,

किसी तारों के गुच्छे की तरह।


अब मैं बिखर चुकी हूँ टुकड़ों में, उड़ते हैं जो

लाठियों की तरह चारों ओर,

ऐसी हिंसक हवा

नहीं सहूँगी मैं, कोई भी और तमाशा

मुझे चीखना ही होगा।


मेरे भीतर गूँजती है एक चीख, हर रात

वो फड़फड़ाती है, अपने काँटों से तलाशती है किसी ऐसी चीज को

जिसे वह प्यार कर सके।


 मैं डरती हूँ

अपने भीतर सो रही इस अंधेरी चीज से-

दिनभर महसूस होती है मुझे  पंखों सी कोमल हलचल

मानो पाला हो कोई बैर।

बादल आते-जाते बिखर जाते हैं

क्या ये प्रेम के चेहरे हैं, वे धुंधले अधूरे से भाव?

क्या  इन्हीं के लिये करती हूँ व्याकुल मैं अपने दिल को?


इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं जानती

क्या है यह, यह चेहरा

जकड़ा हुआ है जो शाखाओं से, इतना घातक…


 

फिर भी मैं उठ खड़ी होऊँगी


-माया एंजेलो


माया एंजेलो ( 4 अप्रैल 1928–28 मई  2014 )- एक अमेरिकी लेखिका, कवि संस्मरणकार, निबंधकार, कलाकार, निर्माता, निर्देशक और एक्टिविस्ट थीं। वे अपनी अनूठी नवोन्मेषी आत्मकथात्मक लेखन शैली के लिए जानी जाती थीं।)

 

तुम मुझे अपने कड़वे, घिनौने झूठों से

इतिहास में मिटा सकते हो,

तुम मुझे धूल में रौंद सकते हो,

लेकिन फिर भी, धूल की तरह

मैं उठ खड़ी होऊँगी।


क्या मेरी अकड़ परेशान करती है तुम्हें,

इतने उदास क्यों हो तुम? क्योंकि

मैं ऐसे चलती हूँ, जैसे मेरे लिविंग रूम में तेल के कुँवे निकल रहे हों।


चाँद और सूरज की तरह,

ज्वार-भाटे की अनवरत लय के साथ,

उम्मीदों की बुलंदियों की तरह, मैं

फिर भी उठूँगी।

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे?

सिर झुका हुआ, नजरें नीची किए हुए

मेरी कराहों से होकर कमजोर

आँसुओं की बूँदो की तरह ढलकते हुए कंधे।

क्या मेरे अहंकार ने पहुँचाई है ठेस तुम्हें ?

इसे इतना भी दिल पर मत लो, क्योंकि मैं

ऐसे हँसती हूँ जैसे सोने की खान हो मेरे पास

और अपने पिछवाड़े में खुदाई कर रही हूँ मैं।

तुम मुझे अपने शब्दों से घायल कर सकते हो

मुझे चोट पहुँचा सकते हो अपनी नज़रों से

तुम अपनी नफ़रत से मार सकते हो मुझे

लेकिन, फिर भी मैं उठ खड़ी होऊँगी।

क्या मेरी कामुकता तुम्हें परेशान करती है?

क्या यह कोई हैरत वाली बात है?

मैं तो ऐसे नाचती हूँ जैसे मुझ पर जड़े हों हीरे,

ठीक मेरी जाँघों के मिलन बिंदु पर।


इतिहास की शर्मनाक झोपड़ियों से

मैं उठी

एक बेपनाह दर्द भरे अतीत से निकलकर,

मैं उठी

मैं एक काला सागर हूँ, उछलता-कूदता, उमड़ता-घुमड़ता

उसकी बढ़ती लहरों में समाहित हूँ मैं।

 डर और वहशत की रातों के पीछे

एक हैरतज़दा शफ़्फ़ाक़ सवेरा लेकर

मैं उठती हूँ

अपने पुरखों के दिए हुए उन उपहारों को लेकर

मैं गुलामों की उम्मीद और उनका सपना हूँ।

मैं उठती हूँ

मैं उठती हूँ

मैं उठती हूँ


2 comments:

Anonymous said...

सभी कविताओं के अनुवाद बेहद अच्छे हैं। बहुत अच्छे। पर प्रूफ़ की ग़लतियाँ भी छूट गई हैं। लगता है, सम्पादक ने ध्यान से नहीं पढ़ी ये कविताएँ।
-- अनिल जनविजय

Admin said...

आपने अपनी कविता में अलग-अलग देशों और आवाज़ों को एक जगह लाकर बड़ा असरदार काम किया। मुझे अच्छा लगा कि हर कविता अपने ढंग से संघर्ष, दर्द और उम्मीद दिखाती है। फ़रोग़ की बेबसी हो या माया एंजेलो की ताकत, हर रचना दिल में उतरती है।