Wednesday, July 8, 2026

अवधेश कुमार की दो प्रेम कविताएं

  

  

 

( अवधेश कुमार पर केन्द्रित इस विशेष सीरीज का समापन हम उनकी दो प्रेम कविताओं के साथ कर रहे हैं। ये कविताएं 1980 में प्रकाशित उनके कविता संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ से ली गयी हैं)

 

 

 

 

 

 चीते का प्यार

 

 

 तुम्हारे भीगे हुए शरीर की उनींदी पगडंडी पर

 एक किशोर चीते की तरह चलता हुआ : मैं छोड़ता हूं 

अपने पंजों की छाप बादलों से भरी इस चांदनी रात में ।



बिजली-सी चमकती हुई तुम्हारी इस क्वांरी मांग में दीप्त 

तारों की एक मद्धम लौ से 

सुलगाता हूं मैं अपने भीतर की एक महीन आग ।

 

कि तुम्हारे चेहरे के सूरज से सुनहरा मीठा शहद

 टपकता है और तुम्हारे समुचे शरीर में

 एक सुबह जागती है।



मै भालू के बच्चे की तरह मुग्ध-भाव ताकता हूं उधर 

जहां तुम्हारा चेहरा शहद के छत्ते में बदल गया है।



मेरी नन्ही दोस्त, मैं इतना प्यार करता हूं तुम्हें कि

 तुम्हारी तरफ ताकते-ताकते किसी नैसर्गिक फुर्ती में आते हुए

 गोल-मोल कुलांच भरता हूं और ऊन के गोले की तरह 

झट-से तुम्हारी गोद में जा गिरता हूं।


शरद की इस चांदनी रात में

 तुम्हारे शरीर के अलाव की आंच तापते हुए धीरे-धीरे

 बादल घिर रहे हैं किशोर चीते के गद्दीदार पंजों की तरह ।


और तुम : उन पंजों को अपनी हथेलियों से गर्माते हुए 

उस ऊन के गोले को खोलती हो, 

और मुझे अपने बदन की नाप में बुनने लगती हो। 

 

 

रेखांकन: अवधेश कुमार

 

 

एक शब्द

 

कुछ शब्द हैं जो सबके लिए हैं 

कुछ शब्द हैं जो दो के लिए हैं

 एक शब्द है जो कि है केवल एक ही कंठ के लिए

 प्यार - अपनी तरह का प्यार !


कुछ शब्द हैं जो कंठ को मूक करते हैं और उसके नीचे

उस मौन के अंधेरे में जुगनू की तरह उतर जाते हैं।

प्यार - अपनी तरह के प्यार !


 ये ही शब्द देता हूं मैं तुम्हें दिन के उजाले में

 तुम्हारी व्यस्तता को, तुम्हारी सम्पन्नता और तुम्हारे

 उत्साह को । तुम्हारे साथी को, तुम्हारे उत्सव को

 तुम्हारे स्वप्नों और तुम्हारे संकल्पों को ।



देखो, कभी दिखे दुःख कहीं और अनुभव हो दर्द

 पीड़ा उठे सूखी आंखों में । एकदम खाली-सा दिखे अन्तर 

  और लगे कि समय गुजर गया अनचिन्हा ; और

 बहुत कुछ अब नहीं लौटाया जा सकता ।


तो किसी एक जुगनू को पकड़ना और उसके सहारे

 मेरे मौन के अंधेरे में उतर आना ।


तुम मिलोगी सुरक्षित अपने आप से 

पाओगी अपने आप को वहां शब्दों की रूपांतरित काया में।


कुछ शब्द हैं जो केवल तुम हो सकती हो

 पर तुम नहीं हो अभी कोई एक शब्द

 

अपनी यातना में पुनः  घडूंगा मैं तुम्हें दर्द की चट्टान से 

 

 

No comments: