( कवियों का गद्य पढ़ना एक अलग तरह का अनुभव है। आज हम पाठकों के लिये विशेष रुप से राजेश सकलानी की कुछ लघुकथाएं प्रस्तुत कर रहे हैं । लिखे जाने के चार दशक बाद भी इनकी आभा मन्द नहीं पड़ी है।)
चिड़िया
उस आदमी को मैं एकदम पहचान गया। मैंने उसे आवाज दी। यह सरासर फिजूल था। वह मुझे भूल चुका था। कीमती कपडों में वह शानदार लग रहा था। मैंने उसे एक सफेद कागज और पैन दिया और उससे कहा कि वह एक चिड़िया इस पर बना दे।
"चिड़िया!" वह चौंककर बोला। उसका चेहरा क्रूर लगने लगा। कुछ क्षण पहले वह बहुत ही विनम्र लग रहा था।
"मैं चिड़िया नहीं बना सकता।" अपनी क्रूरता को कम करने की कोशिश करते हुए उसने कहा।
"मेरा मतलब यह नहीं कि तुम हू-ब-हू चिड़िया बनाओ। चिड़िया जैसा कुछ भी बना सकते हो। आखिर बच्चे भी चिड़िया बना लेते हैं। तुम क्यों नहीं बना सकते?" मैंने उसे प्रेरित करने का प्रयास किया।
"मैं चिड़िया नहीं बनाऊँगा!" परेशानी और क्रोध में उसने अपना निर्णय सुनाया। वह अपने कोट के बटन खोलने लगा। अंदर की एक जेब में पिस्तौल झाँक रही थी। दूसरी जेब में छोटे आकार की एक बोतल थी।
"वह डिब्बे. जैसा क्या है?" मैंने उसके कोट के बाहरी जेब की ओर इशारा करते हुए पूछा।
"यह ब्लू फिल्म है।" उसने डिब्बे को बाहर से छूते हुए कहा। उसका आत्म-विश्वास फिर लौट आया था।
"तुम गोली चलाने का साहस रखते हो?" मैंने पूछा। वह समझ गया कि मैंने उसे जाल में फंसा लिया है।
``देखो, ये सब बातें तुम नहीं समझ सकते।" यह उसने ऐसे कहा जैसे किसी बच्चे पर तरस खा रहा हो। कुछ ही क्षणों में समीकरण बदल गया था। वह अपनी संपन्नता की ओर इशारा करना चाह रहा था। यह उसका नहीं हथियार भी था।
ढाल ही "अच्छा तो बताओ, तुम चिडिया क्यों नहीं बना सकते?" मेरे यह कहते ही उसका चेहरा तन गया।
"नहीं बनाता... जाओ।" वह लगभग चीखने लगा। कोई सही कारण नहीं बता पाने पर उसे चुप हो जाना पडा जबकि वह और चीखना चाहता वा धमकाने की असफल कोशिश के बाद वह दूसरा रास्ता ढूँढना चाहता था। लेकिन रास्ते में चिड़िया दाना चुग रही थी।
“देखो, चिड़िया तो तुम्हें बनानी ही होगी। तुम बना सकते हो। सचमना।" मैंने उसे पुचकारते हुए कहा।
"देखो, ऐसा है..." उसने अपना स्वर धीमा कर दिया, जैसे कोई रहस्य खोल रहा हो।
"मुझे डर है!” यह कहते हुए उसकी आँखों में प्रस्तुत भेट को छिपाए रखने का आग्रह करने लगा- "कि मैं चिड़िया बनाने की कोशिश करूंगा कोई खतरनाक चीज़ बन जाएगी।" भयभीत आवाज़ में वह यह सब कह गया।
"कुछ नहीं होगा।" मैंने कहा और एक दूसरा कागज दिया जिसम चिड़िया बनी हुई थी- "यह चिड़िया बचपन में तुमने ही बनाई है।
वह आश्चर्य से उस कागज़ को देखे जा रहा था। वह मिर एकक जमीन पर बैठ गया और बोला- "हे भगवान!"
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| चित्र: राजेश सकलानी |
जूते
वे शानदार किस्म के जूते थे। इस तरह के जूते शहर मैं अभी कुछ ही लोगों के पास थे। सब लोगों का कहना था कि कुछ ही दिनों में बहुत सारे लोगों के पास इस तरह के जूते हो जायेंगे। उनके दाम के बारे में अभी लोग इतना ही जानते थे कि वे बहुत ही मंहगे हैं। क्या बच्चे, क्या बूढ़े सब अपनी ही दृष्टि से कहते थे कि इन जूतों की चाल बहुत ही शानदार है।
उन जूतों में वास्तव में गजब की चमक थी। उनका सबसे बड़ा गुण यह था कि वे शक्ल तक ढांप लेते थे और उनको पहनने वाला कोई दूसरों के समझ न आने वाली चाल चल सकता था। उनके बारे में कई तरह की अफवाहें सुनाई पड़ रही थीं। लोग अरुमंजस में थे। अक्सर अफवाहें सच सिद्ध होती थीं और सच अफवाह की तरह लगता था ।
ताजातरीन अफवाह या सच यह था कि सड़क पर चलता हुआा हर जूता उठनी हुई बहस को अपनी ओर खींच लेता है। कुछ लोगों का कहना था कि फुसलाये में आकर बहस खुद ही उनकी गोद में चली जाती है। लोग यह तो अनुभव करते थे कि हर मुद्दा कील की तरह चुभता है। वे अपनी तकलीफ में व्यस्त रहते हैं और बहस गायव हो जाती है। कुछ बहसें गायब होने के बाद दुबारा दिखलाई देनी शुरू हुई, लेकिन वे बिल्कुल बदली हुई थीं। बहुत सारे भले लोग अपने परिचितों को इन बहसों में नहीं पड़ने देने की सलाह देने लगे। सचमुच बहसों की बन आई थी। उनके चेहरों पर मनमानी करने का भाव था। उन्होंने लोगों के भय को पहचान लिया था। लोग कहने लगे जिसका जूता उसकी बहस ।
वे जूते चलते हुए अपनी आवाज से भी पहचाने जाने लगे। उनको आते देख सूखे पत्ते जमीन के कान में फुस-फुसाने लगते। वे आपस में टकराते तो सारा शहर उसकी झंकार को सुनने के लिए अपने काम काज छोड़कर बैठ जाता। नंगे पैर लोग तो जूते की चमक से इतने प्रभावित थे कि जो भी जूता सामने मिलता उसके पीछे हो लेते थे। जूतों की अपनी-अपनी प्रतिष्ठा थी । अपने पीछे की भीड़ देखकर वे गर्व करते थे।
और शानदार चाल चलते थे।
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| चित्र : राजेश सकलानी |
पुराना कोट
जाड़े का मौसम शुरू हुआ तो उसे पिछले जाड़ों की याद आई। हमेशा ऐसा ही होता है कि किसी विशेष दिन अचानक पता लगता है कि मौसम बदल गया है और उसे पिछले वर्ष के इन्हीं दिनों की याद आती है। लड़की गुनगुनाने लगी । हल्का जाड़ा उसके बदन में उंगलियाँ चुभा रहा था। पिछले जाड़ों की याद में बह उजली धूप में स्वेटर बुनती हुई अपने को देख रही थी। यह एक सम्पूर्ण घटना थी- स्वेटर बुनती हुई लड़की पर धूप झुकी हुई और लड़की धूप को पाते हुए बदन को गर्म होता हुआ अनुभव कर रही थी।
यह स्वप्न आदमी ने तोड़ा। वह नल के पास बैठा कुल्ला कर रहा था । ठंडा पानी उसके दाँतो में लग रहा था। उसने सोचा कल से वह गुनगुने पानी से कुल्ला करेगा। तौलिये से मुँह पोंछते हुए उसने आवाज दी। लड़की भागकर आई। आदमी ने कहा उसका कोट निकाल देना । सुबह साईकिल से काम पर जाते समय ठंड लगती है।
कोट सबसे नीचे वाले लकड़ी के बक्से में था। उसके ऊपर तीन बक्से और एक टोकरी रखी थी। लड़की बारी-बारी से सबको उतारने लगी । दूसरा बक्सा अभी हाथ में ही था कि सब्जी जलने की गन्ध रसोई से आने लगी। लड़की ने हल्के से चीख कर बक्सा पटक दिया। वह रसोई की तरफ भागी। गुसलखाने से औरत की आवाज आ रही थी। सब्जी जलने की गन्ध उस तक पहुंच गई थी। उसने नल बन्द कर दिया था। लड़की ने चूल्हे से सब्जी उतारते हुए जोर से कहा कि सब्जी अधिक नहीं जली है।
कल से नहाने के लिए पानी गर्म किया करेगी। औरत ने सोचा ।
लड़की बड़ी उत्सुकता से बक्से में झाँक रही थी। वह बक्सा महीनों बाद खुल रहा था। उसे आशा थी कि बक्से में कुछ ऐसी चीज मिल जायेगीे जिसे वह भूल चुकी है और जिसे पाकर उसे सुखद आश्वर्यं होगा। उसने हल्की सर्दी भी अनुभव की और उत्तेजना भी। अचानक उसके हाथ एक पुराना स्कार्फ पड़ गया । वह बिल्कुल गुजमुज हो गया था। उसने उसे फैलाकर थोड़ा तान दिया। आसमानी स्कार्फ में मुर्झाया हुआ लाल फून अचानक खिल गया। सलवटों के बावजूद पत्तियां हरी और चमकदार लग रही थी। वह एक पुराना स्कार्फ था। उसे देखकर वह अपना बचपन याद करने लगी ।
आदमी का कोट सबसे नीचे दबा हुआ था, नीम की पुरानी पत्तियों की तह के ऊपर। लड़की ने उसे खींचकर बाहर निकाल लिया। सूखी हुई पत्तियाँ जो कोट से चिपकी हुई थी बाहर बिखर गई। लड़की ने कोट को फैलाकर देखा । कोट का कॉलर और जेवें फिर फटे हुए नजर आने लगे। पिछले वर्ष उसने बड़ी बारीकी से उन्हें सिला था। अगले जाड़ों तक वह यहां नहीं होगी। कुछ ही दिनों में उसका विवाह होने वाला है। अगले वर्ष इस कोट को वह ठीक नहीं कर पायेगी। उसे भक से रोना फूटने लगा ।
उसको गले में कुछ अनुभव हुआ । कोट कमरे की मैली दीवार पर छाया की तरह लटका हुम्रा था। लड़की ने अलमारी से सूई धागा का डिब्बा निकाला और सुई में धागा पिरोने लगी ।
विरोध का एक दिन
मैं प्रार्थना में शामिल नहीं हुआ। ईश्वर कोई थानेदार तो नहीं है जो मेरे घर की छत पर लट्ठ बजायेगा। इतना अधिकार तो मैं रखता है कि चाहूं तो अपने इरादों को छिपा कर रखूं। अपने इरादों को सामने रखने का मेरा कोई इरादा नहीं है।
शहर के बीच चहल-पहल के इलाके में आज एक शक्तिशाली बम विस्फोट हुआ । लोग डरे हुए हैं और कुछ न समझ पाने की उलझन में हैं। हवा में ऐसी अफवाह है कि कभी भी कुछ अप्रिय घटित हो सकता है। मैं डबल रोटी खरीदने मौहल्ले की दुकान में गया। चौराहे पर पुलिस वाला खड़ा था। मैंने पूछा," भाई साहब, आप बता सकते हैं कि क्या हो रहा है?" घबराहट में उसने मेरे ही सवाल को दोहराया "क्या हो रहा है?" उसको परेशानी से बचाने के लिए मैंने उससे अपना ध्यान हटा लिया। दुकान पर एक आदमी दूसरे से पूछ रहा है कि कुल कितनेआदमी मरे ? आप जानते हैं ?
मेरे इरादों की हद के अन्दर जो साँस भर रहा है वह बम नहीं है। वह बम से कहीं अधिक शक्तिशाली है। आदमी से बदला लेने के लिए उसे जान से मार देना सबसे घटिया तरीका है। यह उस बीमार आदमी का तरीका है जो जल्दी-जल्दी लगने वाली अपनी पेशाब को नहीं रोक सकता।
आज सभी लोग प्रार्थना में गए, सिर्फ मुझे छोड़कर। वे सिर्फ उसे ढूँढते हैं जो प्रार्थना में शरीक नहीं होते । वे शिकारियों की तरह निकल पड़ते हैं। लोग या तो डर रहे हैं या हत्याएं कर रहे हैं।लोग इस तरह दो तरह के लोगों में बंट गये हैं। जो हत्याएं कर रहे हैं ,क्या वे भी डरे हुए है? लोगअपनी-अपनी जगहों पर अपने-अपने तरीके से हत्या कर रहे हैं।



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