Tuesday, July 14, 2026

स्मृति : कांतिमोहन

 

 

 


 


(  कान्तिमोहन जी पर कथाकार अरुण कुमार‘असफल’ का  यह आलेख प्रकाशित करते हुए  हम उनके काम और मिशन को याद करते हैं)

 

 पर कथा है शेष

अरुण कुमार ‘असफल’ 



                      मुझे कांतिमोहन जी की जन्मतिथि 14 जुलाई हमेशा याद रहती है क्योंकि चार दिन बाद ही मेरा जन्मदिन पड़ता है। इस कारण से पिछले चार पांच सालो ंसे फेसबुक पर अपने टाइमलाइन पर उनके जन्मदिन के अवसर पर एक पोस्ट लगाना याद रहता था। 14 जुलाई वर्ष 2024 में वह 88 वर्ष के हो गए थे और कुछ दिन पहले मुझे उनके अस्पताल में भर्ती होने की भी सूचना थी। मैंने उस दिन सुबह सुबह फेसबुक पर जन्मदिन की बधाई देते हुए उनके शीघ्र स्वथ होने की कामना की थी। लेकिन पोस्ट डालने के आधे घंटे बाद ही उनके न रहने की ख़बर मिली। इस तरह से जन्म की तारीख़ में ही उनका देहावसान हुआ।

                     कांतिमोहन मूलतः हलद्वानी के थे। उनकी स्नातक तक की पढ़ाई रामनगर और मुरादाबाद के विभिन्न स्कूलों और कालेजों में हुई थी। आगे की पढ़ाई के लिए वह दिल्ली आ गए थे। सन 1958 में एम ए की थीसिस के रूप में उन्होने दिनकर की ‘कुरुक्षेत्र’ पर ‘ कुरुक्षेत्र मीमांसा’ लिखी जो कई सालों तक कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल रही। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए करते ही वह नौकरी की तलाश में लग गए थे।  हिंदी और उर्दू साहित्य के वह गंभीर अध्येयता थे। दोनों ही भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। इसलिए संपादन और लेखन का छुटपुट काम मिलने में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई थी। उस दौरान पत्रकारिता और अनुवाद का काम किया था। कुछ समय तक राजपाल एंड संस में बतौर संपादक नौकरी की। बेरांेजगारी के दिनों में वह इंदिरा गांधी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ’वुमैन आन मार्च’ के हिंदी संस्करण ’ महिला प्रगति के पथ पर’ के कार्यकारी संपादक के रूप में काम किया जबकि मुख्य संपादक इंदिरा गांधी ही थीं। उनके संपादक कौशल को देखते हुए कई पत्र पत्रिकाओं के संपादकों ने अपने वहां नौकरी का प्रस्ताव दिया पर उन्होने अस्वीकार कर दिया था।

                   दर असल वह दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कालेज में बतौर प्राध्यापक काम करना चाहते थे और उनकी तमाम कोशिशों और योग्यताओं के बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय का एक प्रभावशाली व्यक्ति उनकी राह में रोड़ा बन रहा था। उस व्यक्ति ने हिंदी भाषा, साहित्य और आलोचना पर बहुत सारी किताबें लिखीं थीं। परन्तु दिल्ली शिक्षण अकादमी के दायरे में उसके कुकृत्यों की भी खूब चर्चे हुआ करते थे। खीझ कर कांतिमोहन ने उनके उन्हीं कुकृत्यों को आधार बना कर एक लघु उपन्यास लिखा ’ पर कथा है शेष...’, और दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक को छपने को दे दिया। परंतु उस प्रकाशक के माध्यम से उस व्यक्ति तक यह ख़बर पहुंच गयी। उसने तत्काल कांतिमोहन को अपने पास बुलवाया और वह उपन्यास उस प्रकाशक से वापस लेने का अनुरोध किया। कांतिमोहन ने ऐसा करने मना कर दिया। तब दिल्ली विश्वविद्यालय के उस प्रोफेसर ने कांतिमोहन से उक्त पांडुलिपि अपने मरणोपरांत छपवाने का अनुरोध किया। कांतिमोहन मान गए और कुछ दिनों बाद सन 1963 में दिल्ली के सत्यवती कालेज में उनकी नौकरी लग गयी।

                   कांतिमोहन को गीत और गज़ल लिखने का बहुत शौक था। वह ’सोज़’ उपनाम से गज़ल लिखा करते थे। सन 1970 में प्राध्यापक की नौकरी अस्थायी रूप से छोड़ कर फि़ल्मी गीतकार बनने बंबई चले गये थे। जब वहां सफलता नहीं मिली तो वापस पुरानी नौकरी पर आ गए। पर गीत और गज़ल लिखना जीवनपर्यन्त जारी रहा था और और सोशल मीडिया पर अक्सर अपनी गज़लें डाला करते थे। उनके गीत और गज़ल  ’कदम मिला कर चलो’, ’गुनाहे सुख़न’ और ’रात गए’ किताबों में संकलित हैं। ’ गुनाहे सुख़न’ उर्दू में लिखी गयी है और सन सन 1990 में यह उर्दू अकादमी दिल्ली से पुरस्कृत हुई थी। इसके अतिरिक्त फि़ल्मों के प्रति उनके मोह को प्रमाणित करती हुई ’ आजादी के पहले के गीतकार और फि़ल्मी गीत’ शीर्षक से एक किताब है।

                        कांतिमोहन  की रुचि खेलों में भी थी। सन 1963 से 1972 तक धर्मयुग पत्रिका में इनके छद्म नाम से ’ श्रीदामा की चिठ़ठी’ स्तंभ नियमित छपता था। जिसमें खेल संबंधी जानकारियां और सूचनाएं रहतीं थीं। इसी दौरान साप्ताहिक हिंदुस्तान में खेल विषयक इनका स्तंभ ’ खिलाड़ी की डायरी’ छपता था। मजे की बात यह थी कि उन दिनों शंकर वीकली-हिंदी में भी ’ खेल देखो खेल की धार देखो’ नाम से इनका स्तंभ छपता था। एक ही समय देश के तीन प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में नियमित लेखन! वास्तव में केवल प्रतिभा और जागरुकता के बल पर नहीं, बल्कि सामयिक विषयों पर सदैव जागरुक रहने के कारण ही संभव हो सकता था।

                   कांतिमोहन ने सत्रह वर्षों तक माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ’लोक लहर’ का संपादन किया था। वह इस मुखपत्र के संस्थापक सदस्यों में से थे।  वह जनवादी लेखक संघ और जन नाट्य मंच के भी संस्थापक सदस्यों में से एक थे। मुरली प्रसाद सिंह, चंचल चैहान और सुधीश पचैरी के साथ मिल कर चार वर्षों तक ’उत्तरगाथा’ पत्रिका निकाली। उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानियां ‘ दद्दू तिवारी जनगणनाधिकारी’, ’ हीरालाल का भूत’ तथा ’ रामसजीवन की प्रेमकथा’ सबसे पहले उत्तरगाथा पत्रिका में ही प्रकाशित हुई थी। परन्तु इस पत्रिका का प्रसार सीमित होने के कारण ये कहानियां विशाल पाठक वर्ग का ध्यान खींचने में विफल रहीं थीं। बाद में यही कहानियां हंस में पुनप्र्रकाशित हुई थीं और उदय प्रकाश बड़े कथाकार के रूप में स्थापित हुए।

                 कांतिमोहन वाम विचार की संवाहक पत्रिकाएं जैसे नया पथ, उत्तरार्द्ध आदि के संपादन, प्रकाशन और प्रसार में सहयोग करते थे। वह प्रसिद्ध माक्र्सवादी चिंतकों सव्यसाची, कुंवरपाल सिंह, रेखा अवस्थी, मुरली बाबू आदि के करीबी लोगों में रहे। कई जन आंदोलनों में इनकी सक्रिय भूमिका रही और उन्होने कई जन आंदोलनों के लिए गीत भी लिखे थे। जिनमें से एक जनगीत हल्ला बोल बहुत लोकप्रिय हुआ था।  इस गीत की कुछ पंक्तियां हैं-

 

             बोल मजूरे हल्ला बोल

             बोल मजूरे हल्ला बोल

             कांप रही सरमायेदारी

             खुल के रहेगी इसकी पोल

             बोल मजूरे हल्ला बोल

 

            कंतिमोहन बहुत संवाद प्रेमी थे, जिन्हें मिलना जुलना बहुत पसंद था। वह साहित्यिक अड्डेबाजी के शौकीन थे और अपनी इच्छापूर्ति के लिए वह दिल्ली के रीगल टी हाउस और मोहन सिंह काफी हाउस में नियमित जाते थे। उनकी कहानी ’ दूसरा पहलू’ में इस काफी हाउस का उल्लेख हुआ है। एम ए करने के लगभग पच्चीस साल बाद सन 1982 में उन्होने ’प्रेमचंद और अछूत समस्या’ पर डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वास्तव में यह एक विद्यार्थी द्वारा अपनी कच्ची या अपरिपक्व दृष्टि द्वारा तैयार एक औपचारिक शोध न होकर एक अनुभवी माक्र्सचादी प्राध्यापक द्वारा किया गया वास्तविक शोध है। इसलिए लंबे समय तक इसका अकादमिक महत्व बना रहा था। उनके शोध के केन्द्र में प्रेमचंद की दलित विषयक कहानियां तो हैं ही, साथ ही साथ इस विषय पर गांधी जी के विचारों और व्यक्तव्यों की पड़ताल की गयी है।  प्रेमचंद की दलित चेतना को लेकर दलित साहित्यकारों द्वारा जो सवाल उठाये जाते रहे हैं उनका स्पष्टीकरण इस शोधग्रंथ में मिल जाता है। उनका मानना था कि यद्यपि कि प्रेमचंद की दृष्टि माक्र्सवादी थी पर राष्ट्रीय आंदोलनों के मद्देनज़र उनका झुकाव गांधी जी की ओर हो गया था। उदाहरणार्थ, अंग्रेज़ों द्वारा पृथक निर्वाचन लागू करने के विरोध में गांधी जी ने इसे हिंदू धर्म के लिए घातक बताते हुए यरवदा जेल में अनशन आंरभ कर दिया था। तब प्रेमचंद ने ‘ जागरण’ के अपने संपादकीय में गांधी जी के पक्ष में खूब तो लिखा था लेकिन उनके ’हिंदू’ शब्द को ‘राष्ट्र’ से प्रतिस्थापित कर दिया था।  उनकी (कांतिमोहन) धारणा थी कि ऐसा लिखते समय प्रेमचंद भारत की मुक्तिगामी जनता की संघर्षशील भावना का ही प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इसलिए उनकी दलित विषयक कहानियों में अंबेडकरवादी दृष्टि कम, गांधीवादी दृष्टि अधिक स्पष्ट होती है। इस तरह से आज के दलित साहित्यकारों की शंकाओं का जवाब  कांतिमोहन की सन 1982 में प्रकाशित शोध पुस्तक में मिल जाती है। यह पुस्तक कुछ संशोधनों एवं संपादन के पश्चात सन 2010 में ‘ प्रेमचंद और दलित विमर्श’ शीर्षक से पुनप्र्रकाशित हुई थी।

          कांतिमोहन की पहली कहानी सन 1961 में प्रकाशित हुई थी। उससे पहले उन्होने लघु उपन्यास पर कथा है शेष भी लिख लिया था। लेकिन फिर लंबे समय तक कथा लेखन से दूर रहे थे। क्योंकि अध्यापन और राजनैतिक सक्रियता के साथ साथ वह गीत, गज़ल और स्तंभ लेखन कर रहे थे। इन व्यस्तताओं के बीच में वह किसी तरह का कथा लेखन करते भी तो शायद वह इनकी संपादकीय दृष्टि को पसंद नहीं आती। सन 1996 में जब वह अध्यापन सेवा से स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त हुए तब उन्होने दुबारा कथा लेखन करने का निर्णय लिया। सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होने देहरादून में रहने का निर्णय लिया था। देहरादून के रचनाकारों से उनका प्रथम परिचय ’संवेदना’ की गोष्ठी में हुआ था। यह गोष्ठी जनवरी 1997 में शहँशाही आश्रम में हुई थी। उस गोष्ठी में मैं भी था। उस गोष्ठी में बड़े उत्साहपूर्वक उन्होने कहा था कि वह अब कहानियां भी लिखना चाहते हैं। उसके बाद वह लगातार कहानियां लिखने लगे थे। इसके लिए उन्होने एक कंप्यूटर और प्रिंटर ले लिया था। मैं जब भी दून विहार वाले उनके घर जाता तो उन्हें हमेंशा कहानियां टाइप करते पाता। ’ संवेदना’ की गोष्ठी में वह उन कहानियों का पाठ करते थे। वह अन्य की कहानियों को गंभीरतापूर्वक सुनते और उस पर अपनी बेबाक टिप्पणियां करते।

 

मैं एक गोष्ठी की स्मृति साझा करना चाहता हूं।

उस गोष्ठी में कांतिमोहन ने एक कहानी का पाठ किया था। उस कहानी में एक व्यक्ति द्वारा मरणोपरांत नेत्रदान की गयी दोनों आंखें  एक ही व्यक्ति को लगाए जाने का उल्लेख था। उस गोष्ठी में कथाकार योगेन्द्र आहूजा भी उपस्थित थे। उन्होने फौरन हस्तक्षेप किया और बताया कि नेत्रदान में मिली दो आंखें दो अलग अलग नेत्रहीन व्यक्तियों को लगायी जाती हैं ताकि दो अलग अलग व्यक्ति इस दुनिया को देख सके। कांतिमोहन ने योगेन्द्र आहूजा का विनम्रतापूर्वक आभर व्यक्त किया और बाद में अपनी कहानी का पुनर्लेखन किया।  

 

              लेकिन यह एक तथ्यात्मक त्रुटि थी। किसी की क्या मजाल कि उनकी रचनाओं में कोई व्याकरण या भाषाई दोष निकाल सके। उनकी गज़लों का स्तर बहुत ऊंचा है- काफि़या, रदीफ आदि के हिसाब से बिल्कुल परफ़ेक्ट। गज़ल में उन्होने दुष्यंत कुमार की हिंदी गज़ल की परंपरा का अनुसरण नहीं किया है। बल्कि उनकी गज़लें विशुद्व उर्दू की क्लासिक गज़लों के समकक्ष हैं।

 

             भाषा के मामले में वह मास्टर थे ही और संपादन का भी अच्छा ख़ासा अनुभव था। एक बार मैंने अपनी एक कहानी उन्हें पढ़ने को दी। उन्होने शुरुआत में ही एक भाषाई त्रुटि पकड़ ली और आगे पढ़े बगैर वह कहानी मुझे लौटा दी। मुझे याद है कि उन्होने कहा था कि खाने के पहले कौर में ही कंकड़ आ जाए तो खाने का मजा ही किरकिरा हो जाता है। इसके बाद से मैं भाषा के मामले में सजग हो गया था। ‘संवेदना’ की गोष्ठियों में वह वरिष्ठ कथाकारों विद्यासागर नौटियाल और सुभाष पंत की रचनाओं की बेबाकी से आलोचना करते थे और वे दोनों कथाकार उनकी आलोचना को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते थे।  

 

           कांतिमोहन ने अपनी ओर से पहल करते हुए देहरादून में भी मिलने जुलने का एक ठिकाना बनाने का प्रयास किया था। मसूरी के रास्ते में इस उद्देश्य से एक कमरा भी किराये पर लिया था और एक कर्मचारी को नौकरी पर भी लगाया था। वहाँ वह रोज़ शाम को बैठा करते थे और दूसरे से भी आने की अपेक्षा करते थे। परंतु उन्हे बहुत जल्द ही दिल्ली और एक छोटे शहर के मिज़ाज में फ़र्क का पता चल गया। उन्होने एक कहानी लिखी ‘कुत्ते’, जिसमें इस शहर के मिज़ाज का कटाक्ष किया है।

 

          कांतिमोहन घोषित तौर पर वामपंथी थे। जीवन पर्यन्त उनकी इस विचारधारा पर आस्था बनी रही। उनकी रचनाओं में वामपंथी और सेकुलर दृष्टि दिखती है। उनकी एक कहानी  बेअंत का अंत 1984 के दंगे पर एक महत्वपूर्ण रचना है। लेकिन गूंगी गुडि़या अपनी मासूमियत कम कर लो’,‘दूसरा पहलू’, ‘कुत्ते’ आदि कुछ कहानियों में उनकी यौन शुचितावादी दृष्टि ही अधिक उजागर होती है। कहानी कुत्ते में देहरादून के किसी रेस्तरां का जि़क्र है जिसमें एक युवा जोड़ा प्रेम में डूबा है।  अपनी इस कहानी में उनके इस कृत्य का वह माॅरल पुलिस की दृष्टि से वर्णन करते हैं। बेरोजगारी के दिनों में जो उन्होने लघु उपन्यास  पर कथा है शेष लिखा था वह सन 2010 में प्रकाशित हुआ। अपने इस उपन्यास में भी उन्होने प्रोफेसर के अन्य कुकृत्यों के बजाए उसे यौन शोषण के कारनामों को ही केन्द्र में रखा था।

                  उनकी भाषा इतनी सुगठित है कि कोई भी वाक्य या शब्द अतिरिक्त नहीं लगता। कभी कभी भाषा की इस कसाव से अन्तर्वस्तु की जीवन्तता प्रभावित होती है। फिर भी उनका गद्य पढ़ कर बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उन्होने कम समयान्तराल में बहुत कहानियां लिख दीं। इसलिए एक साथ पढ़ने पर वे किसी महागाथा या उपन्यास का हिस्सा होने का आभास देती हैं। लघु उपन्यास पर कथा है शेष के अलावा दो कथा संग्रह दूसरा पहलू, बे अंत का अंत, गज़ल एवं गीत संग्रह  कदम मिला कर चलो, रात गए, गुनाहे सुखन तथा आजादी के पहले के गीतकार और फि़ल्मी गीत प्रकाशित हैं। कांतिमोहन ने बहुत अधिक नहीं लिखा तो बहुत कम भी नहीं लिखा। अभी उनके साहित्य का मूल्यांकन होना शेष है। उन पर बहुत सारी स्मृति कथाएं आनी शेष हैं।

 

  और अंत में उनकी एक गज़ल-

 

यां तलक जान पर बन आई बहुत रात गए।

हमने जीने की कसम खायी बहुत रात गए।।

 

कैसे कह दूँ कि मेरे कान में रस घोल गई।

दूर बजती थी जो शहनाई बहुत रात गए।।

 

हम थे नादां हंसे तो इक बार हंसते ही गए।

दिन की करनी पड़ी भरपाई बहुत रात गए।।

 

कल समुंदर में मचा होगा घमासान बहुत

दर्द लेता रहा अंगड़ाई बहुत रात गए।।

 

चीख निकली ही नहीं लाख जतन कर देखे

‘सोज़’ को डस गई तनहाई बहुत रात गए।।

 

 


 

      

 

          

 

                  

 

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