Monday, June 29, 2026

संवेदना साहित्य में हमेशा साहित्य के बाहर से आती है : अवधेश कुमार


 

 

   ( अवधेश कुमार को याद करते हुए आज चौथा सप्तक में कविताओं के साथ दिये गये उनके वक्तव्य को प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछली पोस्ट में विष्णु खरे उनके कविता संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ के लिये लिखी गयी भूमिका दी गयी थी। अवधेश का यह वक्तव्य  उनके वैचारिक पर्यावरण के बारे में बहुत कुछ कहता है )

  

जब कभी मैं अपनी कविताएँ इस तरह से पढ़ता हूँ कि जैसे वे किसी दूसरे आदमी की लिखी हुई हों, तो वे मुझे इस तरह से प्रभावित करती हैं कि उन से भी बेहतर कविताएँ लिखने की इच्छा बढ़ जाती है। अपनी किसी चीज़ को दूसरे की मान लेना; या ऐसा अनुभव कर लेना अव्यावहारिक व कठिन है, किन्तु मेरा इस का अभ्यास है। शब्द के अलावा रंग, शिल्प, अभिनय, पूरे रंगकर्म और उतना ही खामोश रहने में भी मेरा पूरा विश्वास है; क्यों कि मैं मानता हूँ कि सभी अभिव्यक्ति-रूपों में परस्पर सामंजस्य के साथ यदि उन की एक पूर्ण आन्तरिक इकाई किसी एक व्यक्ति में बन जाती है तो उसे कुछ कहने के अवसर स्वतः ही मिलते रहते हैं। इसी लिए कविता लिखना अब तक मेरे लिए बड़ा सहज रहा है।

 

जब मैं लाख चाहते हुए भी बड़े-बड़े कैनवस पेंट नहीं कर पाता, थियेटर नहीं कर पाता, दूर-दूर के देशों की पहाड़ों, जंगलों और समुद्र की यात्रा नहीं कर पाता; लोगों को और उन से अपने रिश्तों को समझने की कोशिश करता हूँ, प्यार या तनाव में होता हूँ तो कविता करता हूँ।

 

इंटरमीडिएट में एक पेपर देते हुए जब मैं बोर हो गया तो मेरे पास कविता करने के सिवा और कोई चारा नहीं था। आँखों के सामने पसरी सुबह, जाड़े की ताजी धूप और परीक्षा-भवन के उस एकान्त घुन्नेपन में परीक्षा के तनाव को स्थगितताज्ञा धूप और परीक्षा-भवन के उस एकान्त घुन्नेपन में परीक्षा के तनाव को स्थगित करते हुए कविता रचने का वह अब तक का मेरा सब से विचित्र अनुभव है। उसी दौरान मुझे लगा कि परीक्षा देने से ज़रूरी कविता करना है; क्योंकि वह स्वतःस्फूर्त  हैं: और मैं ने तीन छन्दों का न केवल एक गीत लिख डाला, बल्कि बाहर निकलने तक मैं उस की धुन भी बना चुका था, और यह कहने की ज़रूरत नहीं कि उस साल उसी पर्चे में मैं फेल हो गया; जिस का मुझे कोई अफ़सोस नहीं था।

 

मैं पेड़, चिड़िया, पहाड़, नदी, समुद्र, सूरज, आदमी, समय और अपने पर लाखों कविताएँ लिख सकता हूँ, और यह भी कि मुझे बहुत सारे पाठक भी नहीं चाहिए। यह इस तरह से है कि मैं तो दूसरों की लिखी हुई सभी कविताएँ खोज-खोज कर पढ़ता हूँ किन्तु मेरी कविता भी उसी रुचि और लगाव के साथ पढ़ी जाये, ऐसा कोई आग्रह या प्रश्न मन में कभी नहीं रहा।

 

मेरी कविता एकसाथ बहुत सारी चीजों से प्रभावित है और एक सम्पूर्ण शब्द में वह जीवन है। शायद जीवन के प्रति मेरा गहरा लगाव व आस्था ही है, जिसे मैं अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।

मैं इस शताब्दी के मध्य में पैदा हुआ और देहरादून जैसे शान्त, निर्द्वन्द्व और खूबसूरत शहर में; तो इस देश और काल में जीते हुए जैसी कविता मुझसे सम्भव हो सकी, मैं ने की है।

 

अपनी कविता का आधुनिक होना भी मैं उतना ही महत्त्वपूर्ण मानता हूँ, जितना कि उस का भारतीय भी होना: उस की संवेदनशीलता के आयाम भी बहुत मुखर, सचेत और सामयिक होने चाहिए ताकि उस की निरन्तरता और स्थानीयता एकसाथ बनी रहे-वह एक-एक व्यक्ति से होती हुई पूरे समाज से जुड़े और कई शिल्प-रूपों और माध्यमों को अपनाये; क्यों कि ऐसा है कि शब्द में संवेदना के विकास या अवरोध को एक क्रम में लक्ष्य कर पाना कठिन होता है जब कि पेंटिंग, मूर्तिकला, स्थापत्य और फ़िल्म जैसे माध्यमों में उस की चाक्षुष उपस्थिति रहती है। मैं कोशिश करता हूँ कि मेरी कविता पेंटिंग की तरह रंगों और उन की रंगतों जैसी कोई शाब्दिक संरचना हो और फ़िल्म की तरह सवाक् और गतिशील हो। आधुनिक और भारतीय होने की यह रचनात्मक सोच मुझे साहित्य से बाहर पेंटिंग-स्कल्पचर और फ़िल्म जैसे कला-माध्यमों में ज़्यादा सक्रिय और सार्थक महसूस होती है। इस लिए मैं कविता को उन माध्यमों में से गुज़रते हुए सोचता हूँ; यह कि मैं अपनी कविताओं को उन के लिखे जाने के तुरन्त बाद और साथ ही साथ पेंटिंग व फ़िल्म माध्यमों में रुपान्तरित कर सकता हूँ।

शब्द को साहित्य में यथासम्भव चुप तथा अनुशासित और अन्य माध्यमों  में वाचाल और उद्दंड होना चाहिए; ऐसा इस लिए कि संवेदना साहित्य में हमेशा साहित्य के बाहर से आती है। साहित्य शब्द के जड़ हो जाने, मर जाने की जगह है; इस लिए साहित्य में आने से पहले उसे साहित्य से बाहर जीवन में इधर-उधर ज़िम्मेदाराना ढंग से आवारागर्दी कर लेना चाहिए ताकि न केवल वह अर्थवान हो सके, बल्कि उस के पास अर्थ के ऐसे सामाजिक और सांस्कृति आयाम भी हों जो दो भिन्न मानसिकता, स्थान और समय में रहने वाले आदमियों के बीच के अपरिचय को समाप्त कर सकें। I

 

और अन्त में यही कि मैं रंगों और कविताओं से लदा हुआ एक वृक्ष हूँ जिसकी की जड़ें अपनी जमीन में बहुत गहरी गडी हैं, पर वह सचमुच के पेड़ की तरह एक जगह जड़ नहीं हैं ,चल सकता है, बोल सकता है। उस के दो वास्तविक हाथ है विरोध के लिए कि कोई जंगल में आरा ले कर घुसने की हिम्मत न कर सके, इसी तरह से मैं समझता हूँ कि मेरी कविता मेरे साथ एक संघर्षशील सामाजिक यात्रा में शामिल है। जीवन में एक ऐसे परिवर्तन के लिए जिस के लिए अपनी-अपनी तरह से हम सब प्रयत्नशील हैं।

 

 ( ‘ चौथा सप्तक ’ में प्रकाशित कवि का वक्तव्य)

 

Wednesday, June 24, 2026

अवधेश कुमार की कविताओं के बारे में: विष्णु खरे

 

 

विष्णु खरे
( अवधेश जी को याद करते हुए हम आज उनकी  कविता पर कवि-आलोचक विष्णु खरे के विचार दे रहे हैं। यह महत्वपूर्ण आलेख उन्होंने अवधेश के  कविता-संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ के लिये  भूमिका के रूप में लिखा था।)

  

पिछले कुछ वर्षों से ‘युवा’ और ‘युवा कविता'  शब्द हिन्दी  में सिर्फ युवकों और युवकों द्वारा लिखी जा रही कविता के पर्याय नहीं रहे। कभी वे नयी कविता के बाद वाली पीढ़ी के लिए इस्तेमाल किए गए और कभी वामपंथी तेवर वाली कविता के लिए या सामान्यतः आदमी से लगाव रखने वाली कविता के लिए, किंतु ‘युवा' शब्द कभी भी केवल उन लोगों का परिचायक नहीं रहा जिन पर यौवन आ चुका हो। देखा जाए तो आजादी के बाद जो दो पीढ़ियां जवान हुई है उनमें से सौभाग्यशाली कुछ को छोड़कर युवा होना क्या होता है. यह किसी ने जाना ही नहीं। युवा होने का अर्थ यदि स्वस्थ, चंचल, जोखिमपसंद, आत्मनिर्भर, निश्चिंत,स्वतंत्र होता है तो कहा जा सकता है कि पिछले तीस वर्षों में भारत में बहुत कम लोग ही युवा हो पाए होंगे। भारतीय हालात- सामाजिक, आर्थिक. राजनैतिक -किशोरों को सीधा अधेड़ बना देते हैं। युवा होना इस देश के महान परिवारों का ही हिस्सा है।

 

किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि हमारे बीस से तीस वर्ष के लोगों ने यौवन- उसके सारे या कुछ अर्थों में- देखा और पाया ही नहीं? हिन्दी कविता पर लगातार सैकड़ों वर्षों तक यौवन का राज्य रहा। बूढ़े कवि कुश्ते खाते और खिलाते रहे- किन्तु छठे दशक से युवावस्था का लोप कैसे हुआ? हालात बद से बदतर होते गए हैं इसमें कोई संदेह नहीं और युवकों  का चन्द बरस भी जवान रह पाना मुश्किल होता जा रहा है। देश और संसार की हालात कवियों से बहुत पेचीदा मांग कर रही है। लेकिन सारी भयावहता, संकट और लड़ाई के बावजू क्या यह मान लिया जाए कि गांभीर्य और जुझारु बुजुर्गियत ओढ़ने के सिवा युवकों के लिए हिन्दी कविता में कुछ बचा ही नहीं ?

 

आश्चर्य यह है कि जब आप हिन्दी के अधिकांश युवा कवियों से मिलेंगे तो आप पाएंगे कि वे बेहद जीवंत, खुश, पुरमज़ाक, हल्लेबाज, जीवन की अच्छी चीजों के पारखी, सौंदर्य में  गहरी रुचि रखने वाले,शरारती और नितांत 'अस्वप्निल', 'अगंभीर' है। किंतु कवि-कर्म की कुछ ऐसी दहशत उनमें से अधिकांश पर है कि उनकी कविताएं अधिकतर बेहद रस्मी और नकली और सेल्फ-कॉन्शस हो जाती हैं और जब वे 'निजी' होते हैं तो उनमें एक खासा लिरिकल तत्समी घटाटोप होता है ताकि कोई शक न रह जाए कि हमारा विद्रोही कवि प्रेमी होना भी जानता है। आक्रोश से आलिंगन के बीच के सारे पायदान गायव हैं।

 

इसीलिए अवधेश कुमार की इन कविताओं को जब मैंने पढ़ा तो मुझे एक खुशी हुई कि उनके लिरिकल लगावों में परिश्रम या सायासता बिलकुल नहीं है। पाठक देखेंगे कि उनके इस संकलन का शीर्षक और उस शीर्षक खंड की कविताएं उनके अलग तरह के कवि होने की सूचना देती हैं। 'जिप्सी' शब्द पर कुछ लोगों को एतराज हो सकता है लेकिन 'ईरानी', 'चाकू-छुरी वाली' या 'घुमन्तू' आदि पर्यायों से काम न चलता। 'जिप्सी' शब्द के अंग्रेजी में अनेक प्रतीकार्थ भी होते है- वह उन्मुक्तता, स्वच्छंदता, बेफ़िक्री, रूढ़िमुक्तता का भी पर्याय है। अवधेश कुमार देहरादून में जन्मे और प्रकृति के बहुत नजदीक रहे। इसलिए इसमें कुछ अजब नहीं है कि उनकी कुछ कविताओं में एक ऐसी जीवंतता, स्पंदन, खुलापन, ऐन्द्रिकता है- यहां तक कि कभी-कभी भावुकता भी- जो उनके समवयस्क अनेक कवियों में कम ही है। इधर की प्रेम कविताओं में आप पाएंगे कि कवि सबकुछ के बावजूद भी संयत है- उसने स्वयं को बह जाने नहीं दिया है, जब कि अवधेश कुमार की कविता में कवि कुछ दूर तक तो दिखता है किन्तु जब गति और लय तेज होते हैं तो वह खो जाता है- जिस तरह तेज नाचते हुए लोक-नर्तक एक हो जाते हैं या मेलों में झूलने वाले लोग रंगों और आह्लादित चीत्कारों की एक फिरकनी ही नजर आते हैं और उनमें अपने प्रियजनों को ढूंढना मुश्किल होता है। अपने युवा होने की इस अंतरंग दुनिया को अवधेश कुमार ने कभी बहुत कोमलता से छुआ है जैसे 'मुक्ति एक आद्योपांत' में या 'फड़फड़ाते हुए डूबना' में और कभी बहुत ऐन्द्रिकता से जैसे 'चीते का प्यार' में। 'वर्षा में एक प्रलाप' में और उससे कहीं ज्यादा 'दर्द इतना हल्का और चुपचाप में वे खतरनाक ढंग से भावुकता के नजदीक आ जाते है लेकिन आवेग की तीव्रता शब्दों और शिल्प के जागरूक चुनाव के साथ मिलकर कविता को कविता बनाए रहने में सहायक सिद्ध होती है।

पाठकों का ध्यान विशेष रूप से मैं अवधेश कुमार की कविता 'जिप्सी लड़की : दो' की ओर खींचना चाहूंगा। अव्वल तो किसी उत्सव का, किसी मेले का ऐसा स्पंदित चित्र हिन्दी में कभी देखा हो ऐसा याद नहीं आता। लेकिन यह सिर्फ एक नयनाभिराम चित्र नहीं है, इसमें अभावग्रस्त पूरा गांव भी खड़ा हुआ है। अत्याचार और दमन पहाड़ की ऊंचाइयों तक भी पहुंच गया है, नशे में धुत्त हवलदार के रूप में। पर्यटकों के लिबास में शहरी संस्कृति भी वहां पहुंच गयी है। वहां खलील जिब्रान भी है- जिब्रान का वहां होना जिस कॉमेडी-गांभीर्य ट्रेजडी का प्रतीक है यदि उस पर ही लिखने लगें तो बहुत हो जाएगा। बहरहाल, 'सांप', ‘डफली’ ,'खून' आदि के प्रयोग से कविता में खासी ऐन्द्रिकता और हिंसा का प्रवेश होता है किंतु अंत में खलील जिब्रान के साथ बर्फ़ में दबी जिप्सी लड़की आपको एक विरेचन-भाव में छोड़ती है। इस एक कविता में इतने अलग-अलग और लगभग विरोधी-से तत्व काम कर रहे हैं कि इसे लिखने जाना अवधेश कुमार की संभावनाओं के प्रति आश्वस्त और उत्सुक करता है।

 

अवधेश कुमार यदि जीवन के शुद्ध 'सेलेब्रेशन' के ही कवि होते तो अपर्याप्त नथा क्योंकि अपनी ऐसी कविताओं में यह अपनी पूरी शक्ति में मौजूद हैं और वह सर्जनात्मक ऊर्जा किसी भी तरह की कविता को सार्थक बना ही देती है किन्तु उन्होंने लिखा है: ‘ मेरी कविता एक साथ बहुत सारी चीजों से प्रभावित है और एक संपूर्ण शब्द में वह जीवन है। शायद जीवन के प्रति मेरा गहरा जगाव व आस्था ही है. जिसे मैं अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।’ और चूंकि जीवन एक वैविध्यपूर्ण, संघर्षमय, पेचीदा और परिवर्तनशील विराट है इसलिए स्पष्ट है कि अवधेश कुमार की कविता जहां एक ओर शरीर, अभिलाषा, जय और पराजय के स्तर पर युवा होने की कविता है वहाँ वह एक छोटे रमणीय स्थान और घर को सुरक्षा-वह जैसी भी रही हो- से निकलकर एक दमनकारी, डरावनी, मानव-विरोधी दुनिया के सामने स्वयं को पाने की कविता भी है।

 

उनकी कविता का यह स्वरूप हमें उनकी ‘चिरे हुए आदमी की गंध'  चिंता को जमुहाई', 'रीढ़', 'जीवन की शुरुआत, 'भूख की सीमा से बाहर', 'छत पर धरी लालटेन', 'मां की याद', 'बाप रे इस इतने बड़े देश में’ आदि रचनाओं में मिलेगा। इसमें कोई शक नहीं कि अवधेश कुमार की कविताओं में सीधा संघर्ष, आह्वान, बलवा, क्रांति आदि नहीं हैं। उनके यहां प्रतिबद्धता की आत्ममुग्ध शैली नहीं है। किन्तु 'साइकिल की घंटियों का यही मतलब होता था कि/ उन पर बैठा हुआ हर बाबू जिन्दगी भर अपने बीवी-बच्चों को/ अपने दिनभर के तहखानों के भय से /बचाए रखने का संकल्प लेते हुए लौटता था हर शाम ’(क्लर्क), 'चौतरफा खुली एक आँख / चीजों में खोजबीन करती हुई बारीक / दिमाग़ को जगाए रखने के लिए लगाती हुई हांक / बेहद जागी हुई चुनौतियों में होती शरीक' (चिता की जमुहाई); 'हमने आग जलायी थी सोयी हुई चीजों को जगाया था/और धीरे-धीरे महसूस किया था अपने जीवन की शुरुआत को' (जीवन की शुरुआत); 'वह मणिहीन सांप गर्वित है खुद पर अधिनायक की तरह / कि चिड़िया को मारता भी नहीं और उसे भयमुक्त भी नहीं करता' (छत पर घरी लालटेन); 'मिलो दोस्त, जल्दी मिलो/ मैं ग्ररीब, तुम गरीब / पर हमारे इरादे गरम' (मिलो दोस्त, जल्दी मिलो); 'संबिधान की दुनिया में बचाये रखना है अपने आप को / और एक श्रेष्ठ नागरिक कहलाते रहना है; जब तक / पूरे नहीं होते अद्भुत स्वप्न मुझ गरीब आदमी के' (बाप रे इस इतने बड़े देश में) आदि कविताओं में यह बिलकुल साफ़ है कि अवधेश कुमार कहां से आते हैं और उनकी सहानुभूतियां किस तरफ हैं। और ऐसा नहीं है कि इनमें एक श्रेष्ठतर व्यक्ति की उदारता भरी सहानुभूति है बल्कि आज के जमाने में जो भी कमजोर लोगों पर हो रहा है वह इनके लिखने वाले पर भी या तो हो रहा है या कभी भी हो सकता है।

 

यदि मुझसे पूछा जाए कि आज की कविता में क्या देखा जाना चाहिए तो मैं कहूंगा कि आदमी के अस्तित्व और उसके सामने खड़े सारे संकटों को लेकर चिंता और प्रतिबद्धता, मानव होने के रोमांचक मामले में गहरी दिलचस्पी, जीवन और रिश्तों के अनंत वैविध्य के प्रति उत्सुकता और इस सब को अपनी भाषा और शैली में कह पाने की क्षमता। अवधेश कुमार की ये कविताएं इन सारी शर्तों को पूरा-पूरा निभाती हों यह न तो जरूरी है और न संभव- किन्तु इसमें संदेह नहीं कि इन कविताओं में इन शर्तों का पूरा-पूरा अहसास है। यह नहीं भूलना है कि अवधेश कुमार एक युवा कवि है और उनके सामने देने के लिए एक पूरा काव्य-जीवन पड़ा हुआ है। उनकी प्रारंभिक कविताएं एक ऐसे संकलन में प्रकाशित हुई जिसके संपादक की चयन-शक्ति में हिन्दी साहित्य का भरोसा बहुत पहले उठ चुका था इसलिए उसका कोई नामलेवा न रहा। यह अवधेश कुमार की जीवंतता का ही प्रमाण है कि वह उस प्रारंभिक सदमे को न केवल पचा गए बल्कि उससे मुक्त होकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उनमें अपनी मौलिक प्रतिभा है जो इस तरह की घातक दुर्घटना से भी बचकर उभर सकती है। अवधेश कुमार में इस जीवंतता के कई स्तर हैं। उनकी कविताओं को अपना घर, परिवार, मां, कस्बा, जंगल, शहर, दोस्त सब याद ही नहीं है, उनकी ओर वह बार-बार लौटते हैं और कुछ समृद्ध ही होते हैं। दोस्तों पर लिखी गयी उनकी दो कविताएं इस संग्रह में हैं- एक तो ऐसा मित्र है जो कई मंजिला इमारत में बैठा हुआ है और उनसे फोन कर लेने को कहता है। और दूसरा ऐसा है जो कवि की तरह ही है जिससे कवि तुरन्त मिलना चाहता है। कहने को ये बहुत सामान्य विषय लग सकते हैं लेकिन जो दोस्त और दोस्त में इतना प्रकं कर सकता है वह एक की प्रासदी और कामदी के रूप में मृत्यु भी जान सकता है और दूसरे की इंसानदोस्ती और दोस्तपरस्ती के जीवन को भी। चीजों और व्यक्तियों का यह अहसास अवधेश कुमार को कई कविताओं में मिलेगा- उनकी कविता की दुनिया एक धड़कती, बदलती, विकसती दुनिया है।

आज हिन्दी में जो भी युवा कवि और युवा कविताएं हैं उनमें से वही बचेंगे जिनके पास ऐसी दुनिया, ऐसे लोग और ऐसे अहसास हैं।जाहिर है कि वे युवा कवि अवधेश कुमार के उन्हीं दोस्तों में से होंगे जिनसे वह मिलना चाहते हैं- जिनमें वह मिल चुके हैं।

 

Tuesday, June 16, 2026

अवधेश कुमार की कहानी: पानी में तैरता शलगम

 

 

 
 
(अवधेश कुमार पर केन्द्रित इस सीरीज में आज उनकी कहानी ‘पानी में तैरता शलगम ’ राजेश सकलानी की टिप्पणी के साथ दे रहे हैं ) 

इस कहानी के मूल में दुनिया भर में चल रहे कला-विषयक भावोत्तेजक प्रयोग हैं। औद्योगिकीकरण के प्रभाव से सामाजिक व्यवहार में बड़े बदलाव आए हैं। नए किस्म के दृश्य और ध्वनियों से सामना हुआ। वैश्विक राजनीति ने व्यक्ति को असहज और अस्थिर कर दिया। अच्छे जीवन के स्वप्न की तुलना में आत्मिक सुख कम होता गया। बाज़ार को लुभावने विज्ञापनों की ज़रूरत पड़ी।

इस कहानी में Henri Matisse एक पात्र है, जो सफ़ेद काग़ज़ की कतरनों के साथ सफ़ेद हाथी का दुःस्वप्न चित्रित करेगा। कोलाज विधा ने पेंटिंग की विधा को समूचा बदल दिया। कैनवस की सपाट सतह पर अब कतरनें आदि वास्तविक वस्तुएँ चिपकाई जा सकती थीं। कुछ समय पहले से चली आ रही परंपरा को अब कला-सिद्धांत के तर्क हासिल हो चुके थे। एक अन्य पात्र Pablo Picasso (1881-1973) ने स्वीकारते हुए कहा कि सिर्फ़ रंग लगाना ही नहीं, बल्कि वास्तविक चीज़ों को कैनवस पर चिपकाना भी कला है।इसे papier collé नाम दिया गया। अवधेश स्वयं एक बेहतरीन कोलाज कलाकार थे।

इस कथानक के अनुसार Jim Dine “एन वाल्डमैन के लिए चित्रित संसार”  शीर्षक चित्र में सेब की जगह शलजम चिपका कर  उसके नीचे बड़ी शान से हस्ताक्षर दे मारता है। सेब को अपूर्व ख्याति दिलाने वाले चित्रकारों में Paul Cézanne (France, 1839-1906) प्रमुख हैं। उन्होंने सेब का प्रयोग रंग, रोशनी और स्पेस की अवस्थिति को जानने के लिए किया। इसी तरह बेल्जियम के कलाकारों ने शलजम का खूब प्रयोग किया है। Vincent van Gogh  (Dutch, 1853-1890) की पेंटिंग Still Life of Turnips को याद करते हैं।वे भी कथा-पात्र हैं।

अवधेश दिल्ली की प्रदर्शनियाँ देखते थे और कला-विषयक पुस्तकें पढ़ते थे। उनका काम रेखाचित्र और कोलाज पर आधारित रहा। उन्होंने किसी कला संस्थान से विधिवत शिक्षा नहीं ली।यह कहानी उन्होंने एक पेंटिंग की तरह रची है। यह अपने आप  में जिम डाइन की चर्चित पेंटिंग “एन वाल्डमैन के लिए चित्रित संसार” की विवेचना है। साहित्य के पाठकों को यह बताना इसका उद्देश्य है कि चित्रकला, कला-संवेदन के आधार पर प्रकृति और मनुष्य के अंतर्संबंधों का विवेकसंगत उद्घाटन करती है। इसकी

संभावनाएँ असीमित हैं। अपनी ज्ञानात्मक संवेदना, कला-संवेदना, भावप्रवणता और अन्वेषणात्मक ऊर्जा को घनीभूत करते हुए नई राहें खोजी जा सकती हैं। एक चित्रकार किसी लिखित पाठ के अंतस में प्रवेश कर सकता है। कवयित्री Anne Waldman के रचनात्मक व्यक्तित्व को रूपाकारों में व्यक्त कर देना एक बड़ी बौद्धिक घटना है। अवधेश इस कहानी में यही कह रहे हैं। आधुनिक कला-आविष्कारों से अनुप्रेरित अवधेश रोशनी और स्पेस को दृश्य रूप में जान पाते हैं।इन पंक्तियों पर ध्यान देना रोचक होगा—

“जिम डाइन, एन को ढूँढ़ने एक बार अतीत में गया, दूसरी बार भविष्य में और तीसरी बार वर्तमान में। किन्तु एन फिर कभी उसकी पकड़ में नहीं आई। वह फिसल जाती थी—कभी अतीत में, कभी भविष्य में।”

यानि कला-अनुभव कौंध की तरह अनुभूत होते हैं। उन्हें कठिन साधना और धैर्य से पाया जाता है। आकस्मिकता का पल तभी संभवहोता है।

अवधेश की यह व्याख्या (interpretation) आगे जाकर तभी पूर्ण  होती है, जब वे स्वयं अतियथार्थवादी शैली में अपनी रचना तक  पहुँचने में क़ामयाब होते हैं। Salvador Dalí भी कथानक का पात्र है।

अंत तक पहुँचते हुए पेंटिंग-सदृश यह गद्य एक पेंटिंग की तरह  दृश्यमान होता है—


 ''कहते हैं कि जिम डाइन, टेस्ट ट्यूब की शक्ल के एक पॉलीथीन बैग में पानी भरता है और एन को उसके ऊपर स्टीकर की तरह चिपका देता है।

फिर—

कला की अभिव्यक्ति में परिवर्तन और विकास के ख़ातिर, संशोधित रूप में, उस लुंजपुंज पहलवान की जाँघ के बीच उसे लटका आता है।”


यहाँ पुरुष-लिंग का संदर्भ भी संभवतः किसी महान चित्रकार की पेंटिंग से जुड़ा है। कला की स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं है। महान कला प्रकृति का अन्वेषण करती है। उसकी विराटता का स्पर्श करती

है। केंद्र में मनुष्य की उपस्थिति हर सूरत में अनिवार्य है। महान कला या साहित्य अपने लोक से गहराई से जुड़कर आत्म के विस्तार पर संभव होता है। कलाकार दुनिया के लिए यह ज़िम्मेदारी लेता है।

सच्चाई यह है कि वही प्राकृतिक सौंदर्य को सच्चाई के साथ अनुभव करता है। हिमालय के सौंदर्य की अनुभूति चरवाहों और घसियारियों से ज़्यादा गहन कोई नहीं कर सकता। बस, वे इस अनुभूति के बदले में कोई खास पहचान पाने को उत्सुक नहीं होते।

उच्च हिमालय की एक अधेड़ किसान महिला को अपने एकांत में गाते सुना। किसी श्रोता के लिए नहीं, बल्कि निर्जन जंगल में अपनी उदासी और पीड़ा को व्यक्त करने के लिए। किसी अदृश्य शक्ति को संबोधित करते हुए उसका आलाप किसी भी दक्ष गायक से ज़्यादा मार्मिक और परिपक्व लगा। सामने बर्फ़ से आच्छादित चोटियाँ, विशालकाय चट्टानें और घने जंगल दृश्य में उभरने लगे।

आत्म के विस्तार से कला सामान्य जनों की अनुभूति तक पहुँचसकती है।

अवधेश की यह कहानी ऐसी संभावनाओं की रचना है।

-राजेश सकलानी 

(इस आलेख के साथ यहां प्रदर्शित दो चित्र चित्रकार जिम डाइन के कला शिल्प और अवधेश कुमार की कहानी के आधार पर AI द्वारा तैयार किए गए  हैं।)