हिमवंत कवि के रूप में पहचाने जाने वाले चंन्द्रकुंवर बर्त्वाल के समग्र साहित्य को नए सिरे से परखे जाने की आवश्यकता है। मेघों के कवि या प्रकृति के चितेरे वह अवश्य हैं लेकिन इससे बढ़कर वे सामाजिक मनुष्य और व्यापक विश्व के संगठित स्वरूप को व्यक्त करते हैं।
यह भी याद करना ज़रूरी है कि उनकी
रचनाएं तत्कालीन छायावादी संकुचित सीमाओं का अतिक्रमण करतीं हैं।उनकी दृष्टि में पर्वतीय सौन्दर्य अपने भौतिक स्वरूप
में हृदय को छूने और मथने का काम करता है। उनकी निजी वेदना भी हमारी सामाजिक काल
की अभिव्यक्ति है।
यह
तथ्य भी विस्मित करता है कि मात्र अट्ठाइस वर्ष की उम्र के जीवन में आपने सात सौ
से अधिक कविताएं और गद्य लिखा । उनके जीवन काल (1919 --1947) में सुदूर पहाड़ों
में सड़कों और बिजली जैसे साधनों का अभाव था।
चन्द्र
कुंवर बर्त्वाल की भाषा और शिल्प हिन्दी समाज के नव निर्माण की आकांक्षा से
परिपूर्ण है।उनकी कविता भारतीय समाज की उस धारा का आवेग है जिसे बार बार संकुचित
और प्रतिगामी ताकतों द्वारा क्षत किया जाता रहा है।
"
फैला है सब पर वही गगन, छूता है सबको एक पवन "
प्रस्तुत है नई दृष्टि से उनकी कविताओं का अवलोकन करता अरविंद शेखर का आलेख- राजेश सकलानी
चंद्रकुंवर
बर्त्वाल की सांप्रदायिकता विरोधी धर्मनिरपेक्ष और वर्गीय
चेतना
-अरविंद शेखऱ
चंद्रकुंवर
बर्त्वाल आधुनिक हिंदी काव्य-धारा के उन दुर्लभ और विलक्षण रचनाकारों में से हैं, जिनकी
काव्य-यात्रा को प्रायः हिंदी साहित्य में 'हिंदी का कीट्स' कहकर अलंकृत किया जाता है। मात्र 28 वर्ष
की अत्यंत अल्पायु में क्षय रोग (टीबी) जैसी भयावह बीमारी से असमय कालकवलित हो
जाने वाले चंद्रकुंवर को मुख्यधारा के आलोचनात्मक विमर्शों में केवल
'प्रकृति
का सुकुमार कवि', 'पहाड़ों का चितेरा' या 'विरह
और प्रेम का रोमांटिक गायक' माना गया। परंतु, यह दृष्टिकोण एकांगी और अधूरा है। उनकी
काव्य-दृष्टि केवल हिमालयी घाटियों, बादलों,
फूलों और काफल के सौंदर्य तक सीमित
नहीं थी; अपितु वे अपने युग के प्रखर सामाजिक, राजनीतिक
और वैचारिक आंदोलनों से भी गहराई से जुड़े हुए थे।
चंद्रकुंवर
बर्त्वाल का सक्रिय रचनाकाल 1930 से 1947
के मध्य का रहा—यह
वही दौर था जब भारत एक तरफ ब्रिटिश औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए संघर्षरत था, तो
दूसरी तरफ सामंतवादी शोषण, जातिगत ऊंच-नीच, वर्गीय विषमता और औपनिवेशिक शक्तियों
द्वारा उपजाए गए भीषण सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। यद्यपि उन्होंने
उस दौर के कुछ प्रगतिशील या जनवादी कवियों की भांति सीधे राजनीतिक मंचों से
नारा-लेखन या खोखली बयानबाज़ी नहीं की, लेकिन उनकी संवेदनात्मक गहराई, दार्शनिक
मानवतावाद और तीक्ष्ण व्यंग्यबोध के भीतर एक बेहद प्रखर सांप्रदायिकता
विरोधी चेतना और
क्रांतिकारी वर्गीय चेतना समाहित
थी।
चंद्रकुंवर
बर्त्वाल की कविताओं का वैचारिक धरातल समझने के लिए तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक
परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। 1940 का दशक भारत के इतिहास का वह त्रासदीपूर्ण दौर
था जब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अपने चरम पर था। विभाजन की विभीषिका, दंगे, और 'बांटो
और राज करो' की नीतियां आम जनमानस को लहूलुहान कर रही थीं।
बर्त्वाल जी स्वयं दूरस्थ गढ़वाल (उत्तराखंड) के प्राकृतिक प्रांगण में रहते हुए
भी इन राष्ट्रीय त्रासदियों से अछूते नहीं थे।
उनकी
कविताओं में जो सामाजिकता मिलती है, वह किसी थोपे गए राजनीतिक एजेंडे से नहीं आती, बल्कि
वह उनकी अद्वैतवादी मानवतावादी सोच या
कहें कि गांधीवादी विचार का प्रतिफल है। चंद्रकुंवर बर्त्वाल के लिए मनुष्यता
सर्वोच्च थी। जब मनुष्य को धर्म, जाति या वर्ग के संकीर्ण चौखटों में बाँधकर
उसका शोषण किया गया, तो इस शांत और रोमानी कवि के भीतर का 'विद्रोही' मुखर
हो उठा।
अगर
कोई चंद्रकुंवर बर्त्वाल की कविताओं में केवल 'सांप्रदायिकता' शब्द की प्रत्यक्ष खोज करेगा, तो
शायद उसे निराश होना पड़े। परंतु, धर्म के नाम पर होने वाले द्वेष, हिंसा
और पाखंड पर बर्त्वाल जी ने जो लिखा, वह हिंदी साहित्य में अप्रतिम है। वे
सांप्रदायिकता के मूल कारण—धार्मिक संकीर्णता और अंधभक्ति—पर
सीधा प्रहार करते हैं।
1940
के दशक के दंगों और धर्म के नाम पर
बहते इंसानी खून ने बर्त्वाल के हृदय को बुरी तरह झकझोर दिया था। आमतौर पर
राष्ट्रवादी काव्य में भारत माता का चित्रण 'वैभवशाली',
'सिंहासनारूढ़' या 'विजयी' रूप
में किया जाता है, लेकिन बर्त्वाल ने अपनी कविता "रोई भारत माता" में
भारत माता को एक असहाय, बेबस और पीड़ित माँ के रूप में उकेरा-
"रोई भारत माता उस स्थान पर आकर
एक गाय के लिए जहाँ आपस में लड़कर -
पड़े हुए थे कई आदमी खून से भरे,
वह बैठी थी हाथों में निज मलिन मुख धरे -
वहाँ न था कोई उसका दुख हरने वाला,
वहाँ न था कोई उसको सुख देने वाला!"
इस
कविता में कवि ने 'गाय' और 'मस्जिद'
जैसे उन अत्यंत संवेदनशील प्रतीकों का
बेबाक इस्तेमाल किया है, जो सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने के केंद्र
बिंदु बनाए जाते थे। कवि कहता है-
"देख रही थी शून्य क्षितिज, अस्फुट
वचनों से
कोस रही थी अपनी कोख, दूध
को अपने,
जिसने पुत्र नहीं थे, अपने
चिर शत्रु जने !
बड़ी देर तक बैठी रही वहाँ वह दुखिनी,
और उठी जब सुन सहसा मारो काटो ध्वनि,
देखा मसजिद के आगे छुर्रे लाठी ले -
आँखों के आगे लड़ते उसके सपूत थे !"
यहाँ
बर्त्वाल का आक्रोश और दुःख अपने चरम पर है। जो लोग धर्म के नाम पर 'छुरे
और लाठी' उठाकर एक-दूसरे का खून बहा रहे थे, वे
स्वयं को धर्म या राष्ट्र का रक्षक कहते थे;
परंतु कवि की दृष्टि में वे भारत माता
के 'सपूत' नहीं, बल्कि 'चिर शत्रु'
थे। यह कविता सांप्रदायिकता के छद्म
रूप का पर्दाफाश करती है।
चंद्र कुंवर बर्त्वाल की एक और कविता है "बाँस का लट्ठ" । शीर्षक और कविता के बिंब
सीधे तौर पर यह किस ओर इशारा करती है यह साफ है।
बाँस का लट्ठ
मत लो एटम बम का नाम,
वह हो
चुका बहुत बदनाम,
मैं हूँ फटा बाँस का लट्ठ
जो आता दंगों में काम !
औरत हो या बच्चा हो,
या बूढ़ा, जईफ, लाचार,
जान बख्शना पर दंगे में
है
मेरे लिए हराम !
मेरे बल पर होते हैं
लाखों मुसलमान गाजी,
जन्नत में देते हैं उनको
खुदा कई हूरें इनाम !
मैं अखंड भारत का दूत,
मैं ही देता पाकिस्तान,
हिन्दू और मुसलमानों !
तुम झुककर मुझको करो प्रणाम !
"मैं अखंड भारत का दूत..." और
"तुम झुककर मुझको करो
प्रणाम"
की पंक्तियाँ सीधे तौर
पर सांप्रदायिक शक्तियों के 'अखंड
भारत' के विचार और लाठी को दिए जाने वाले सम्मान या प्रणाम
की संस्कृति पर करारा व्यंग्य करती हैं।यह कविता किसी एक संप्रदाय को कटघरे में
खड़ा नहीं करती।
यह दोनों ओर की
कट्टरपंथी और हिंसक ताकतों पर समान रूप से वार करती है।
कविता की शुरुआत में ही लट्ठ कहता है कि एटम बम का नाम मत लो, क्योंकि वह तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम हो
चुका है। असली तबाही और नफरत फैलाने का काम तो दंगों में 'बाँस का लट्ठ' करता है, जो बिना किसी बड़े हथियार के भी पूरे समाज को लहूलुहान कर देता है।
यह कविता का सबसे मारक और राजनीतिक रूप से प्रखर हिस्सा है।
"मैं अखंड भारत का दूत, मैं ही देता पाकिस्तान,
हिन्दू और मुसलमानों ! तुम झुककर मुझको करो
प्रणाम !"
यहाँ 'बाँस का लट्ठ' उस औपनिवेशिक राजनीति ('बांटो और राज करो') और सांप्रदायिक ताकतों का प्रतीक है, जिन्होंने एक तरफ अखंड भारत के नाम पर नफ़रत
फैलाई तो दूसरी तरफ देश के टुकड़े (पाकिस्तान का निर्माण) कर दिए।
बर्त्वाल
मध्यकालीन संत कबीर के राम-रहीम के ऐक्यवादी दर्शन से गहरे प्रभावित थे। जब
उन्होंने देखा कि आधुनिक भारत कबीर के विचारों को भूलकर फिर से धार्मिक विद्वेष के
गर्त में गिर रहा है, तो उन्होंने "फिर हे कबीर" की
रचना की। इस कविता की शुरुआत ही अत्यंत कठोर और यथार्थवादी प्रतीक से होती है:
"फिर हे कबीर, श्मसान
श्वानों से
हिन्दू और मुसलमान लड़ते,
फिर हे कबीर, धर्म
के नाम पर
निरपराध मनुष्य बलि चढ़ते !"
यहाँ
'श्मशान' और 'श्वान' (कुत्ते)
का प्रतीक देकर बर्त्वाल ने यह दिखाया कि धर्म के नाम पर लड़ने वाले इंसानों का
आचरण कितना गिर चुका है। वे आगे कबीर की साधना के निष्फल होने पर शोक जताते हुए
प्रश्न करते हैं:
"राम रहीम हो गए हैं आपस में बैरी,
मंदिर मसजिद में बजती कराल रणभेरी,
तुमने दीपक सा जलकर जो सत्य दिखाया,
ऐक्यगान जो तुमने गा-गाकर अमर बनाया,
तोड़ दिया भारत ने वह ऐक्य का गाना,
हुई तुम्हारी निष्फल क्या आमरण साधना ?"
कवि
ईश्वर के नाम पर की जाने वाली हिंसा पर सबसे मारक चोट इन पंक्तियों में करता है— "देव हमारे रक्त मानवों का पी जीते!" यह
उस धर्मांधता पर करारा तमाचा है जो यह मानती है कि दूसरे संप्रदाय के व्यक्ति की
हत्या करने से उनका ईश्वर या अल्लाह प्रसन्न होगा।
सांप्रदायिकता
केवल हिंसा तक सीमित नहीं होती, वह भाषाई और सांस्कृतिक श्रेष्ठता के अहंकार से
पैदा होती है। अपनी व्यंग्यात्मक कविता "अल्लाह की जबान" में
बर्त्वाल जी ने पंडित और मुल्ला दोनों के धार्मिक दंभ की धज्जियां उड़ाई हैं:
"पंडित जी बोले स्वर्गलोक में संस्कृत बोली जाती
है,
मुल्ला जी बोले - अल्ला को अरबी जबान ही आती है
!
इस पर मचा भयानक शोर होने लगी लड़ाई घोर
मुल्ला जी ने पकड़ी चोटी पंडित जी की मोटी मोटी
पंडितजी ने खेंची दाढ़ी मुल्ला जी की नोची
झाड़ी"
इस
कविता में आगे चलकर बर्त्वाल डिवाइन आईरनी की रचना करते हैं । जब मुल्ला और पंडित आपस में लड़कर मर जाते हैं और
ईश्वर के सामने पहुँचते हैं, तो ईश्वर पंडित जी से अरबी में बात करते हैं और
मुल्ला जी से संस्कृत में! न पंडित को अरबी समझ आती है, न
मुल्ला को संस्कृत, और अंततः ईश्वर दोनों को ही उनके दंभ के कारण
नरक में फेंक देते हैं:
"फिर वे बोले - दूतों, आओ, इसे
नरक में ले जाओ
-घृणित, म्लेच्छ यह, इसको
रोज, सौ कुत्तों से कटवाओ...
गए इस तरह दोनों जान, अल्ला
की है कौन जबान !"
स्पष्ट
है कि चंद्रकुंवर बर्त्वाल एक अत्यंत तार्किक और विवेकशील कवि थे, जो
धर्म के आवरण में पनपने वाले पाखंड को बहुत गहराई से समझते थे।
सांप्रदायिकता
के विरोध के साथ-साथ बर्त्वाल की लेखनी में 'सर्वहारा'
यानी मजदूर, किसान
और दबे-कुचले वर्ग के प्रति गहरा अनुराग और सामंतवादी-पूंजीवादी शोषण के खिलाफ
स्पष्ट वर्गीय चेतना दिखाई
देती है। उन्हें मार्क्सवादी शब्दावली का राजनीतिक प्रयोक्ता भले न माना जाए, किंतु
शोषक और शोषित के बीच के द्वंद्व को उन्होंने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ पकड़ा है।
बर्त्वाल
ने पहाड़ों के खेतों में पसीना बहाने वाले मजदूरों के श्रम को देवत्व का दर्जा
दिया। उनकी कविता "मजदूर" में
शोषक वर्ग की विलासिता और शोषित वर्ग के श्रम के बीच का अंतर स्पष्ट झलकता है:
"वे पसीने की बूंदें जो / गिरती हैं मिट्टी के
ऊपर !
अरे ओ ओस-कणों से भीगे हुए / मजदूरों के पाँवों
को / धरते ये अपने सिर पर !"
कवि
की दृष्टि में ओस की बूंदों से भी अधिक पवित्र मजदूर के पसीने की बूंदें हैं। वे
समाज के शोषक वर्ग को सचेत करते हैं कि जिस वैभव और महलों पर उन्हें गर्व है, उसकी
नींव में इन्हीं मजदूरों का रक्त और पसीना छुपा है। यह विशुद्ध रूप से एक सर्वहारा
चेतना का प्रस्फुटन है।
बर्त्वाल
यह अच्छी तरह समझते थे कि कैसे समाज का प्रभुत्वशाली वर्ग धर्म, पूजा
और ईश्वर का प्रयोग अपने शोषणकारी कृत्यों को छिपाने और सही ठहराने के लिए करता
है। उनकी प्रतीकात्मक कविता "पूजा" इस
वर्गीय यथार्थ को अत्यंत नग्न रूप में सामने लाती है:
"बिल्ली की माँ तुलसी माला लेकर शिव की पूजा
करती,
चूहे की माँ बिल के भीतर शिव सहस्त्रनाम को है
जपती,
बिल्ली की माँ कहती - हे शिव, मेरे
बच्चों को चूहे दो !
चूहे की माँ कहती - हे शिव, बिल्ली
से तुम हमें बचाओ !"
इस
कविता की पराकाष्ठा तब होती है जब शक्तिशाली (बिल्ली की माँ) की प्रार्थना कमजोर
(चूहे की माँ) की पुकार को निगल जाती है:
"बिल्ली की माँ की विनती ने चूहे की माँ की
विनती को रास्ते में ही कर लिया हजम !
उत्तम भोजन से मोटी हो - जब वह शिव के पास गई,
बोले तथास्तु शिव खुश होकर,
फिर क्या, भक्तिन के बच्चों ने मारे सब पापी इधर, उधर
!"
'चूहों' को पापी घोषित कर देना समाज की उस बर्बर
मानसिकता पर करारा व्यंग्य है, जहाँ शक्तिशाली वर्ग अपने शिकार को ही 'अधर्म' या 'बुरा' बताकर
अपनी हिंसा और वर्गीय शोषण को न्यायसंगत ठहरा लेता है। यह कविता दर्शाती है कि
बर्त्वाल जी यथार्थ की कितनी गहरी और कड़वी परतें उघाड़ सकते थे।
भारतीय
समाज में वर्गीय चेतना केवल आर्थिक गैर-बराबरी तक सीमित नहीं है, वह
जातिगत उत्पीड़न से भी गहराई से जुड़ी है। बर्त्वाल ने अपनी कविता "अछूत" के
माध्यम से छुआछूत और सामाजिक पायदान पर सबसे नीचे धकेले गए दलित समाज के अधिकारों
की बात की:
"मानव को जो मानव न समझे / वह दानव है, वह
पत्थर है!
छूने से जो अपवित्र हो जाए / वह कैसा ईश्वर, कैसा
घर है?"
यहाँ
बर्त्वाल का तर्क अत्यंत सीधा और विद्रोही है—यदि किसी इंसान को छूने से ईश्वर या मंदिर
अपवित्र हो जाता है, तो ऐसा ईश्वर पूजा योग्य नहीं हो सकता। यह
सामाजिक न्याय का अत्यंत प्रखर स्वर
है।
सांप्रदायिकता
और वर्गीय शोषण के इस पूरे ताने-बाने में बर्त्वाल ने केवल समाज और व्यवस्था पर ही
उंगली नहीं उठाई, बल्कि वे साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की
भूमिका को लेकर भी अत्यंत सख्त थे। जब देश गुलामी और दंगों की आग में जल रहा था, तब
कुछ कवि धनिकों, राजा-महाराजाओं और सत्ताधीशों की चाटुकारिता
में लगे थे।
ऐसे
चाटुकार और बिकाऊ साहित्यकारों पर प्रहार करते हुए बर्त्वाल जी ने अपनी प्रसिद्ध
कविता "कवि
पशु" लिखी:
"लानत तुम पर तुमने सरस्वती के सेवक - होकर, गूँथे
सदा हार धनिकों के !
तुमने गान किए उनके जो निंदित पशु थे,
पहुँचा सरस्वती को उनके गंदे महलों तक
तुमने दूतिन बना दिया उसको हा, अब
तक जो माता थी !"
कवि
ने यहाँ ज्ञान की देवी 'सरस्वती'
को महलों की 'दूतिन' बनाने
का जो आरोप लगाया है, वह बौद्धिक बेईमानी पर किया गया सबसे बड़ा आघात
है। वे आगे स्पष्ट रूप से अपनी वर्गीय पक्षधरता की घोषणा करते हैं:
"तुमने दीनों की पवित्रता में / देखी न अरे अपने
जीवन की पवित्रता !
ओ नारकी जीव ! तुमने यह देश रसातल - ले जाने
में दी मदद !"
बर्त्वाल
जी का मानना था कि किसी भी देश या समाज के पतन (रसातल) में उन बुद्धिजीवियों का
सबसे बड़ा हाथ होता है जो सच बोलने के बजाय सत्ता और पूंजी के आगे नतमस्तक हो जाते
हैं। एक सच्चे कवि का दायित्व 'दीनों'
(गरीबों और पीड़ितों) के संघर्ष के साथ
खड़े होना है।
चंद्रकुंवर
बर्त्वाल का मूल्यांकन यदि केवल उनकी प्रकृति-विषयक कविताओं या 'कीट्स' से
उनकी तुलना तक सीमित रखा जाए, तो यह उनके विपुल और विविधायामी काव्य-संसार के
साथ अन्याय होगा।
उनकी
काव्य-यात्रा का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि वे एक रोमांटिक
विद्रोही थे। उनका सौंदर्यबोध केवल फूलों और पर्वतों का भोग नहीं था, बल्कि
वह प्रकृति की समानता और अखंडता से सीख लेकर मानव समाज में व्याप्त असमानता (जाति, धर्म, वर्ग)
को नकारने का एक माध्यम था। उन्होंने जहाँ एक तरफ अद्वैतवादी मानवतावाद से
सांप्रदायिकता को नकारा, वहीं 'रोई भारत माता', 'फिर हे कबीर' और 'अल्लाह
की जबान' जैसी कविताओं से दंगों, धार्मिक
कट्टरता और पाखंड पर प्रत्यक्ष प्रहार किया। 'मजदूर',
'अछूत', 'पूजा' और 'कवि पशु' जैसी रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि उनके
भीतर एक सचेत और सजग सर्वहारा चेतना विद्यमान थी, जो शोषक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का
बिगुल बजाती है।
यदि
चंद्रकुंवर बर्त्वाल को टीबी जैसी अमानवीय बीमारी ने मात्र 28 वर्ष
की आयु में हमसे न छीना होता, तो संभवतःहिंदी साहित्य को वर्गीय संघर्ष, जनवाद
और सांप्रदायिक सद्भाव पर और भी महान कृतियाँ प्राप्त होतीं। इसके बावजूद, अपने
संक्षिप्त जीवनकाल में उन्होंने जो लिखा, वह
उन्हें हिंदी के महानतम प्रगतिशील और मानवतावादी कवियों की पंक्ति में सम्मानजनक
स्थान दिलाने के लिए पर्याप्त है।
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