Monday, March 9, 2026

संकट का हिमालय और हिमालय का संकट : अतुल सती

 

 



 पर्वतीय भू-संकट पर अतुल सती

 (परंपरागत रूप से संवेदना को साहित्य का मूल आधार माना गया है।लेकिन संवेदना के गुण-धर्म भी बाह्य जीवन पर आश्रित होते है।प्रेमचंद ने साहित्य के विकास क्रम में यथार्थ के महत्व को प्रतिष्ठित किया। आत्मचेतस रचनाकार के लिए हर दौर में  जटिल यथार्थ की पड़ताल करनी ज़रूरी है। लेखक एक स्वतन्त्र कार्यकर्ता की तरह संचालित होता है लेकिन अदृश्य रूप से सामाजिक घटनाओं और ब्यवहारों से संवाद जारी रखता है। आधुनिक साहित्य अंतर्विषयक अध्ययन की मांग करता है। यह लोकतांत्रिक लक्ष्यों के लिए ज़रूरी कार्यभार है। विभिन्न कार्यक्षेत्रों की पृष्ठभूमि से आए रचनाकारों से साहित्य समृद्ध हुआ है।
 उत्तरी भारत के पर्वतीय जनपद में, जो भूगर्भीय अस्थिरता का केन्द्र रहा है,  दशकों से सामाजिक, वैज्ञानिक और राजनैतिक रूप से गहरी अंतर्दृष्टि अध्ययन करने वाले जानेमाने कार्यकर्ता अतुल सती से वार्ता करने की पहल  "विदुज बैटन" के मंच पर संभव हुई है  ।

 राजेश सकलानी की इस टिप्पणी के साथ हम 29 अक्टूबर 2025 को  विदुज बेटन के मंच से  विद्योत्तमा व्याख्यानमाला की पांचवी कड़ी में ऑनलाइन दिये गये व्याख्यान को जस का तस प्रस्तुत कर रहे हैं। वे कोई लिखित वक्तव्य नहीं पढ रहे थे - स्वतः स्फूर्त बोल रहे थे । )

 धन्यवाद मुझे यह अवसर देने के लिए और इस व्याख्यान माला  में जिस तरह के लोगों को आपने आमंत्रित किया है मुझसे पूर्व तो वो सब काफी अनुभवी लोग रहे हैं। उनके काफी उपलब्धियां हैं। राष्ट्रीय स्तर पर नाम है। उनका लेखन है। मैं उस स्तर पर उस तरह से कितना अपनी बात कह पाऊंगा नहीं मालूम। लेकिन ये मौका देने के लिए, अवसर देने के लिए, आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद ।और वैसे तो मैंने पूर्व के  वक्ताओं को भी सुना- मेवाड़ी जी को भी इस मंच पर बोलते सुना। तो जिस अंदाज में उन्होंने अपनी बात रखी थी - किस्सागोई के अंदाज में, तो मैं भी कोशिश करूंगा कि  इस तरह से ही बात आए और बहुत फॉर्मल ना हो ।इनफॉर्मली ही बात हो ,औपचारिक ना रहे और क्योंकि ये ऐसा विषय हम लोगों ने चुना कि जिस पर कि पिछले दो-तीन साल में बहुत सारी चर्चा, बहुत सारी बातें हुई हैं और स्वयं मैं ही जो हूं  तो बहुत सारे मंचों पर इस देश के अंदर मुझे बुलाया गया और वहां ये बात दोहराई गई। इस पर बोला गया।

 लेकिन आज हमने विषय को थोड़ा  अलग तरह से समझने जानने के लिए इस  तरह का विषय चुना था।  क्योंकि हम जानते हैं कि हिमालय केवल एक भौतिक इकाई नहीं है बल्कि हिमालय  हमारे साहित्य में, हमारे संस्कृति में एक प्रतीक के बतौर भी इस्तेमाल होता रहा है। वो एक सिंबल भी रहा है। एक है। तो जैसे कि आप भी अपने परिचय में कह रही थी तो हिमालय क्योंकि वो विशालता का भी सिंबल है। बड़े होने का ।उसका विस्तार उसकी विशालता उसकी अडिगता - इस तरह का भी वह एक प्रतीक है।

 इसलिए उस संकट को देखने के लिए कि वो संकट कितना बड़ा है- तो उस संकट को चिन्हित करने के लिए , उसकी गहराई,  उसका जो विस्तार है उसको  समझने समझाने के लिए हमने विषय चुना कि संकट छोटा नहीं है, ये बड़ा है और ये इसलिए संकट का हिमालय है। और हिमालय का संकट तो है ही है। तो इसलिए इस विषय  पर आए और क्योंकि ये सिर्फ हिमालय का संकट नहीं है। एक बात तो ये है।

  अगर हम थोड़ा सा इसको दूर से देखें या जिसको आजकल कहते हैं कि एरियल व्यू  इसका लेकर  ऊपर से देखें तो ये पूरी धरती का संकट है। पूरी पृथ्वी का - हमारी धरती का संकट है और  जैसा कि होता है आमतौर पर कि कोई भी जो संकट है या कोई भी जो बीमारी है वो सबसे पहले वहां प्रकट होती है जो सबसे संवेदनशील जगह होती है । जो सबसे कमजोर जगह होती है। तो इस धरती पर भी क्योंकि हिमालय बहुत संवेदनशील जगह है सबसे  कमजोर जगह है ।हमारी धरती के बनने के क्रम में और हिमालय के बनने के क्रम में तो भूगर्भ विज्ञानियों  जो आकलन है- जो कहते हैं- तो उसके हिसाब से  हिमालय तो अभी बन ही रहे हैं। तो हिमालय कमजोर हैं। फ्रेजाइल है ,संवेदनशील हैं। तो इसलिए जो

धरती का एतिहासिक संकट भी है जिसको कि हम कह रहे हैं संकट का हिमालय। इसीलिए इसके जो लक्षण हैं, जो पहले लक्षण हैं वे हिमालय में प्रकट हो रहे हैं। हिमालय में दिखाई दे रहे हैं और वो क्योंकि कमजोर है तो जल्दी उसमें  वो प्रकट हो गए। लेकिन ये सिर्फ हिमालय का संकट नहीं है।

यह हम जरूर इसमें कहना चाहते हैं। इस विषय के माध्यम से ।तो यह विषय की चुनने की- उसको

रखने की एक बात है। और  बात उसमें क्योंकि मानव सभ्यता जहां से चली है और जहां हम लोग बढ़ रहे हैं उसमें- निरंतर विकास के क्रम में- तो विकास के और जो उसके साथ-साथ विनाश हो रहा है उसके भी अपने आप से द्वंद है । और साथ में, क्योंकि हमको ये भी हम लोग जानते समझते हैं कि इसको अपने विद्यार्थी जीवन से अपने बाकी जीवन से हमने जाना बल्कि मैं अभी याद कर रहा था तो हम लोगों ने बचपन में एक निबंध पढ़ा  तो वो ध र्मवीर भारती जी का निबन्ध है- शायद उन्हीं का था- ठेले पर हिमालय। तो जिसमें हम देखते हैं कि वो एक शहर में ठेली पर हिमालय यानी कि बर्फ की  सिल्ली को जाता हुआ देखते हैं और उससे उनको हिमालय की याद आती है और उसमें  याद करते हुए वह अपने संस्मरण में एक जगह कहते कि जब मैं वहां पहुंचा कौसानी में और कौसानी को उन्होंने देखा उसके प्राकृतिक सौंदर्य को तो उनको लगा कि मैं जो हूं यह जो सौंदर्य मेरे सामने है इसको छुऊं भी कैसे। बल्कि मुझे लगा कि मैं अपने चप्पल जो मैंने पहने हैं, या जूते जो पहने हैं, इनको उतार करके ही इसमें बढ़ा जा सकता है। यानी कि इसको अगर मैं थोड़ा सा भी अगर हम करेंगे तो खराब हो जाएगा। यानी कि ये  हम इसकी पवित्रता को या इसके  सौंदर्य को कोई क्षति पहुंचा देंगे। अगर हम चप्पल

पहने हुए भी जाते हैं। तो वो जो बात वो कहते हैं वो हमारे यहां ये है कि पहले यह बात रही है कि हिमालय के - हिमालयी बुग्याल जिसको हम कहते हैं जो  क्षेत्र है। तो वहां ये परंपरा रही है कि लोग पहले ऐसी मान्यताएं थी कि वहां चप्पल पहन के मत जाइए या ऐसे नहीं जाइए। वो उसका जो  सौंदर्य है या उसका जो वहां की जो अपनी तरह की एक इकोलॉजी है उसकी अपनी एक तरह का जो बना हुआ तारतम्य है उसको हम तोड़ देते हैं। तो ये तो वो संरक्षण वाला जो वो है  वो भी हम अपने बचपन से समझते हुए आए हैं।  पूरा द्वंद है इसका हमारे विकसित  होने का, हिमालय की नाजुकता का और विकास का ।इसको एक ही जगह कैसे हम तो हम इस तरह से इस विषय पर पहुंचते हैं।

और वो संकट है क्या? वो एक तो पूरे धरती का संकट है। तो धरती का संकट यह है कि भाई हम सभी लोग जो यहां मौजूद है विज्ञ लोग हैं और ये जानते हैं कि लगातार धरती के गर्म होते जाने में लगातार वो वो पर्यावरण हमारा या धरती वो गर्म हो रही है। कार्बन का उत्सर्जन होने से उसकी  जो गैसेज हैं उसकी वजह से धरती गर्म हो रही है और उसका असर हमारे मौसम पर भी पड़ रहा है। अभी हम लगातार इसको देख रहे हैं।।बल्कि इस बार तो यह मौसम विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि जैसे इस बार बहुत गर्मी पड़ी है और इस बार सर्दी भी बहुत ज्यादा होने वाली है और हिमालय में बहुत ज्यादा बर्फबारी होने वाली है। और यह सिर्फ इस समय का मामला नहीं है। लगातार पिछले 20- 25 सालों से हम यह देख रहे हैं कि हिमालय में और बाकी भी दुनिया में भी। वर्षा के जो हमारे क्रम थे । हिमपात के जो क्रम थे उनमें व्यतिक्रम आ गया है। यानी कि वह कभी बहुत ज्यादा बारिश हो जा रही है। कभी बिल्कुल नहीं हो रही है और कभी वो बर्फबारी भी। हमारे जहां मैं रहता हूं जोशीमठ में यहीं कभी हम आज से चार साल पहले 20 20 में हमने देखा कि बहुत बर्फ गिर गई और उसके बाद हम देखते हैं कि अगले साल नहीं गिर रही है। तो  है एक लगातार ये वाला व्यतिक्रम मौसम का जो हम लोगों का पहले से ही था कि भाई जून जुलाई में ऐसा होगा। अगस्त में ऐसा होगा बरसात के मौसम में यह स्थिति होगी।  उसी के हिसाब से हमारा फसल चक्र था। हमारे जीवन के तमाम काम उससे जुड़े हुए थे ।मौसम स॥ वो सब भी हो रहे। बल्कि अभी मैं बार-बार स्क्रीन पर नवीन भाई को देख रहा हूं। तो नवीन भाई को याद होगा। की बहुत पहले मतलब आज से

लगभग 20 साल पहले मैंने आपको एक कविता सुनाई थी। और वो कविता मैंने तब लिखी कि

जब हमारे यहां जोशीमठ के पास कहीं बादल फट गया और उसमें बहुत सारी बारिश हो

जाने से एक पूरा गांव उसमें तबाह हो गया। उनके गाय उनके वो और तब मैंने वो कविता लिखी और उस कविता में लिखा कि इस बार फलां गांव में एक गांव में बादल फटने से और ऐसी-ऐसी घटना हो गई। उसको मैं खैर थोड़ा दूसरे अंदाज में लाया और उसमें यह सारी बात हुई थी। यानी कि वो तब आज से 20 साल या 25 साल पहले जब मैंने वो कविता नवीन भाई को सुनाई होगी तब वो कभी कभार होने वाली घटना थी। वो एक आश्चर्यजनक बात थी कि कहीं बादल फट जाए और वहां ऐसी घटना हो जाए। और पिछले 20 सालों में हम देख रहे हैं कि उसका जो फ्रीक्वेंसी है बादल फटने की जो घटना है वो बढ़ती चली गई है। वो लगातार वो बहुत ज्यादा इस बार अगर हम देखें 2025 का जो जून जुलाई अगस्त का महीना है तो उसमें न सिर्फ हमारे उत्तराखंड में उसका पूरा जो दायरा है वो बढ़ गया है। हिमाचल में हमने देखा जम्मू कश्मीर में और वह जो हिमाचल का प्रभाव है वह बाढ़ पंजाब तक उसने प्रभावित किया। तो वो जो मौसम बदलने की परिघटना है- उसकी कारण- यह बादल फटने की घटनाएं हैं। उनकी फ्रीक्वेंसी में उनकी यानी कि उनका जो आवृत्ति है वो आवृत्ति में बढ़ोतरी हो रही है और साथ ही आपदा उससे जो पैदा हो रही है उसका भी विस्तार हो रहा है। और ये लगातार है ।इस बार तो वो बहुत ऐतिहासिक तौर पर बढ़ा है। हिमाचल में जितने लोगों की मृत्यु हुई है या उत्तराखंड में या जम्मू कश्मीर में बहुत सारे। तो हमारे पास आंकड़े भी नहीं पहुंचते। मतलब क्योंकि हम लोग तो इसलिए उन आंकड़ों से थोड़ा सा वो हो जा रहे हैं क्योंकि हमारे साथ हम लोगों ने जब यह जोशीमठ वाला हमारा वो हुआ  और वो आंदोलन क्योंकि बढ़ गया राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चला गया और हमने क्योंकि उसको जोशीमठ का संकट माना भी नहीं। यह भी उसकी एक बात थी कि हमने उस संकट को कि जो जोशीमठ में पैदा हुआ हमने उसको माना नहीं कि सिर्फ जोशीमठ का संकट है बल्कि शुरू में ही जब हमने उसको चिन्हित किया २०२१-२२  में तब पहली बार जब हम अपने हां उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन के सचिव डॉक्टर सिन्हा से मिले तो उस समय भी हमने उनसे कहा कि सिर्फ जोशीमठ की बात नहीं है। ये पूरे उत्तराखंड में बहुत सारी जगहों पर ऐसी चीजें होने वाली है। इसलिए हमको इसको थोड़ा विस्तार से व्यापकता में देखने की जरूरत है। और जोशीमठ में भी जब हम लोग लड़ रहे थे, तो तब भी हम इसको केवल यहां का संकट नहीं मान रहे थे। तो इसीलिए उसमें बहुत सारे हिमालयी राज्यों के लोग जुड़ गए। और फिर उसी क्रम में यह हुआ कि जो हमारे हिमालय राज्यों के प्रतिनिधि हैं हम लोगों ने एक फोरम भी एक मंच भी गठित किया जिसको हम पीपल फॉर हिमालय  उसका नाम है और उसकी वजह से हम तक ये सूचनाएं पहुंचती है कि सिक्किम में क्या हो रहा है? अरुणाचल में क्या हो रहा है? जम्मू कश्मीर में क्या हो रहा है? या हिमाचल में कितना नुकसान हो गया? लेकिन आमतौर पर हमारा जो मुख्यधारा का मीडिया है उस तक ये बात नहीं जाती। जम्मू कश्मीर के ही साथियों का कहना है कि वहां जितने लोग मरे हैं वो मुख्यधारा के मीडिया तक उसकी संख्या भी नहीं पहुंची या हिमाचल में जितने लोगों की हताहत हुई या जितना बड़ा नुकसान हुआ वो हम तक या मुख्यधारा तक नहीं पहुंच रहा है। या सिक्किम में जितनी बड़ी घटना हुई कि वहां पूरा वह तीस्ता नदी का जब बांध टूटा तो उसकी सूचना हम तक नहीं पहुंची। मतलब कितना वहां नुकसान हुआ, क्या हुआ? तो कहने का तात्पर्य यह है कि यह जो संकट है ये लगातार विस्तृत हो रहा है। लगातार विस्तार इसका हो रहा है और उसकी गंभीरता भी बढ़ती चली जा रही है। तो इसलिए हिमालय को समझते हुए हिमालय के संकट को समझते हुए और क्योंकि ये संवेदनशील क्षेत्र है तो यहां इस संकट के लक्षण जल्दी प्रकट हो रहे हैं।  है हिमालय के अध्ययन से या हिमालय के संकट को जानते समझते हुए हम अंदाजा लगा सकते हैं। हम अनुमान लगा सकते हैं कि धरती पर ये संकट कितना बड़ा है और बाकी भी अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देख रहे हैं तो हम तक ये सूचनाएं आ रही है। है ना? कि अमेजन के जंगलों में क्या हो रहा है। या बाकी जगह कितनी ठंड या जहां कभी बर्फ नहीं पड़ती थी। अभी हमने देखा कि वहां आई आइसलैंड में वहां मच्छर पाए गए। है ना? तो यहां इतनी गर्मी बढ़ गई या बाकी अंटार्कटिका की बर्फ से लेकर के उसके पिघलने से लेकर के और हिमालय की बर्फ के

पिघलने तक। है ना? तो लगातार वो सूचनाएं भी हम तक है। तो इसलिए हम केवल हिमालय पर बात करने से हमको दुनिया के संकट का भी पता चले इसलिए इस विषय में हम लोग आए। अच्छा।

अब यह जो संकट है इसकी पहले जो बहुत बड़े स्तर पर जब हम इसको देखते हैं तो वह 2013 की आपदा के तौर पर हमारे सामने यह आता है जो केदारनाथ की आपदा है और केदारनाथ की आपदा का जो वॉल्यूम है उसका जो मतलब दायरा है एक तो वो इस वजह से बड़ी है आपदा क्योंकि उसमें बहुत सारे लोग हताहत हुए है।स्वयं सरकार ने ही इसको माना कि  5400 से ज्यादा लोग यानी 5000 से ज्यादा लोगों की उसमें मृत्यु हुई और यह बड़ी संख्या है। लेकिन क्या यह संख्या हमको डराती है? क्या यह संख्या सरकार को चेतावनी देती है? जबकि यह सरकार के अपने आंकड़े और अगर हम सरकार के आंकड़ों से उतर जाएं तो हम तक जो सूचना पहुंचती है हम तक जो लोग स्थानीय स्तर पर कहते हैं तो वो संख्या तो उससे दुगनी तिगुनी संख्या ज्यादा है। 10 हजार 12000 से ज्यादा लोग उसमें हताहत हो जाते हैं। लेकिन फिर भी हम उससे कोई सबक नहीं लेते। कुछ उससे सीखते नहीं और इसके पीछे की कहानी पर जाएं ।अगर हम केदारनाथ का संकट या केदारनाथ की जो आपदा है वो 2013 में है। 15 16 17 जून लेकिन उस आपदा के आने की जो सूचना है वो सूचना हमको पहले मिल जाती है। यानी कि वहां जो झील फटी और वो मतलब केवल केदारनाथ में नहीं है। वह पूरा एक जो फिनोमिना है यह जो पूरा वो है वह पूरे हिमालय में हो रहा है कि जैसे-जैसे ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं। पीछे की तरफ खिसक रहे हैं- वो अपने पीछे वो ऐसी झील ग्लेशियर की जो झील है बन छोड़ते हुए जा रहे हैं और वो झील जो हैं वो अचानक कभी भी जब बहुत तेज बारिश हो रही है- जिसको कि हम बादल का फटना अतिवृत्ति जो हो रही है जो कि पहले हिमालय में रेयर था यानी कि उच्च हिमालय में 2000 3000 मीटर  से ढाई हजार मीटर से ज्यादा के जो ऊंचाई है वहां ऐसी बारिश कभी नहीं होती थी। वहां अगर होगी तो बर्फबारी होगी। है ना? और अगर कभी बारिश हुई तो बौछार के रूप में वो होती थी। लेकिन अब हम देख रहे हैं क्योंकि धरती के गर्म हो जाने का जो फिनोमिना है यह उसको प्रभावित कर रहा है। और वहां ये बादल फटने की घटना हो जा रही है और वो झील उससे फट रही है और जिसको हम ग्लोफ एक मतलब जो ग्लेशियर लेट आउट बर्स्ट जिसको कह रहे हैं तो उसकी वजह से तो वो चोराबाड़ी वो ताल वहां फट गया और वो लेकिन वो चोराबाड़ी ताल की वहां झील बन रही है। विस्तार पा रही है। यह बात  पहले ही वैज्ञानिक वाडिया के वैज्ञानिक। पहले इस बात को कह देते हैं कि 2004 में एक अखबार बल्कि उसको छापता भी है  कि वहां ऐसा-ऐसा अध्ययन चल रहा है और वहां ये हो रहा है। लेकिन हम उससे कोई चेतावनी को नहीं लेते। और 2013 में ये घटना घट जाती है। लेकिन 2013 में भी जिस दिन 15 16 17 की ये बात है उससे पहले ही एक हमारे यहां जो मौसम विभाग के जो निदेशक थे यहां शर्मा जी तो वो उसकी चेतावनी जारी कर देते हैं- हफ्ता भर पहले कि वहां इतनी बारिश होने वाली है और वहां पर्यटकों को तीर्थ यात्रियों को जाने से रोका जाए। उनको वहां नहीं जाने दिया जाए और अगर उनकी चेतावनी पर ध्यान दे देते वहां अगर सरकार  उसको सीरियसली ले लेती तो इतने लोगों की मृत्यु नहीं हुई होती। इतने लोग हताहत नहीं होते। तो इससे हम ये भी सबक लेते हैं कि हमारी सरकारें वे- वैज्ञानिक जो अध्ययन है या वैज्ञानिक जो चेतावनी देते है उनको भी गंभीरता से नहीं ले रही है।

  

और सिर्फ यही नहीं हम इसको और थोड़ा आगे बढ़ते हैं तो जब ये बहुत बड़ी आपदा आ गई तो एक हाई पावर कमेटी भी बन गई। एक उच्च स्तरीय समिति बनी और उस उच्च स्तरीय उच्च अधिकार प्राप्त समिति ने कुछ अध्ययन किए और उन्होंने यह भी बता दिया कि भाई  अह घटना है या जो इस तरह की आपदाएं हैं ये ज्यादातर ऐसी जगहों पर आ रही हैं जहां जल विद्युत परियोजनाएं या बड़े

विकास के कार्य हो रहे हैं। वो इन आपदाओं की जो विविभीषिका है उसको बढ़ा दे रही है। उसके मैग्नीट्यूड को बढ़ा दे रही है। लिहाजा हमको उच्च हिमालय क्षेत्र में इस तरह की जो विकास की

योजनाएं हैं इनसे बचना चाहिए या इनको नहीं बनाना चाहिए। एक तो यह बात । दूसरी बात उन्होंने यह भी कहा कि अगर हम जहां इस तरह की योजनाएं या परियोजनाएं जल विद्युत परियोजनाएं बन रही हैं वहां पर बचाव के लिए ऐसी आपदाओं से कम से कम नुकसान हो। हमको अर्ली वार्निंग सिस्टम यानी कि पूर्व चेतावनी प्रणालियां कि जो चेतावनी पहले मिल जाए उसकी ऐसी वैज्ञानिक प्रणालियां वहां स्थापित करनी चाहिए। कि लेकिन 2013 के बाद 2021 में एक और आपदा आती है जो जोशी मठ के पास रेनी है ना जो चिपको के लिए प्रसिद्ध है और वहां ऋषि गंगा में इसी तरह की घटना होती है एक बड़ा सा ग्लेशियर उसके साथ मलवा फट करके नीचे आता है और एक पूरी जो परियोजना है जहां 60-70 लोग काम कर रहे हैं उसको वॉश आउट कर देता है। उसको पूरी तरह से तबाह करता हुआ और वहां उन सारे लोगों को बहाता हुआ और उसके बाद वो पहुंचता है 6 किलोमीटर आगे तपोवन में तपोवन में जहां के 150 -140

आदमी काम कर रहे हैं और वहां भी एक जल विद्युत परियोजना का बैराज है। उसको भी बहा ले जाता है और वो 200 से ज्यादा लोग उसमें मर जाते हैं। 2013 में हाई पावर कमेटी ने इस बात को कहा 

कि जल विद्युत परियोजनाएं एक तो उच्च हिमालय क्षेत्र में नहीं बननी चाहिए। और

अगर आप बना रहे हैं तो आपको वहां यह अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना चाहिए। दोनों चीजों को नहीं सुना गया। उसके बाद हम हाई कोर्ट में भी इस बात को लेकर के गए। भले वहां हमारी सुनवाई नहीं हुई। हम पर ही जुर्माना हो गया। तो इसमें मैं इस  दोनों चीजें हैं केदारनाथ में एक आपदा आई और उससे हमने कोई सबक नहीं लिया और 2021 में यह हो गया।

अब ये दोनों हम अपने दिमाग में रखें और थे फिर 1894 को याद करें। 1894 में भी एक आपदा आई। एक बाढ़ आई। और वह बाढ़ जब आई तो उससे पहले यह हुआ कि ऐसी एक झील 1893 में बननी शुरू हुई। गौना एक जगह है चमोली जी जहां है चमोली से आगे अलग से एक सड़क कटी जोशीमट को आती है एक वो उस दूसरी तरफ जाती है वहां गौना एक गधेरा एक जगह गांव भी है। वहीं एक लेक -वहां एक झील बनती है 1893 में 1893 अंग्रेजों के जमाने की बात है। अंग्रेज उस समय यहां शासन कर रहे हैं और वहां एक इंजीनियर को अंग्रेज लोग भेजते हैं और वह वो आता है जो और यह बताता है कि भाई यहां ये झील बन गई है। इतना मलवा इसमें आ गया है ये हो गया है और वो अनुमान लगाता है कि मुझे लग रहा है कि साल भर के अंतर्गत में मतलब कि जुलाई अगस्त में ये पूरी झील भर जाएगी और इसका पानी रिसाव इसमें हो जाएगा फट जाएगा। साल भर इसमें लगेगा लेकिन इसको पानी को भरने में और यमुने में और यह अनुमान वो जब करता है तो अंग्रेज सरकार क्या करती है कि इसकी तैयारी करती है वो क्या करती है कि वो टेलीग्राम की पूरी एक लाइन बिछाती है वो गौना से लेकर के और ऋषिकेश तक ताकि पर डे पानी कितना बढ़ रहा है कितना उसमें विस्तार हो रहा है इसकी सूचना वहां तक पहुंचे इसके लिए अलग से टेलीग्राफ की लाइन बिछाई जाती है। इसके अलावा उसकी  मॉनिटरिंग रोज हो रही है। उसके अलावा जो उस अंग्रेज ऑफिसर का उनका अनुमान था कि साल भर में यानी अगस्त 20-22 तारीख तक ये भर जाएगी गौना झील और एक फट जाएगी। उससे पहले वो रास्ते में जितने पुल हैं उनको डिस्मेंटल कर ले रहे हैं। वहां लोगों को खाली कर दे रहे हैं नदी किनारे से। उनके बचाव का इंतजाम कर रहे हैं और ठीक साल भर के बाद 1894 में बिल्कुल अंग्रेज अफसर का अनुमान सही निकलता है एक आध दिन आगे पीछे और अगस्त 20 19 20 तारीख को वो फटती है और झील फटती है और एक बाढ़ आती है जिसमें कि श्रीनगर जैसा एक शहर पूरा वो तबाह हो जाता है बह जाता है लेकिन उसमें एक भी आदमी की मृत्यु नहीं होती कोई नहीं मरता और केवल एक साधु की घटना घटना लोग कहते हैं कि एक साधु था वो उसके बाढ़ के बीच में आया कि गंगा मां में मतलब मुझे कैसे वो कर लेगी तो उसके अलावा किसी की मृत्यु नहीं होती |कोई पुल नहीं टूटता |कोई नुकसान नहीं होता| ये है अंग्रेजों के जमाने की बात 1894 में ये हो रहा है और अब जब हम रह रहे हैं जब हम तकनीक के तौर पर वैज्ञानिक अह ज्ञान के विज्ञान के ऐसे युग में हैं वहां ये हो रहा है कि 

2013 में 3 दिन, 4 दिन, पांच दिन पहले एक मौसम का अधिकारी वह बता दे रहा है कि 15, 16, 17 बहुत बारिश होगी। लोगों को वहां जाने से रोका जाए। लोगों को वहां ना भेजा जाए। उसके अलावा 

वाडिया जैसे संस्थान के वैज्ञानिक कह दे रहे हैं कि चोराबाड़ी में झील बन रही है और कभी भी फट सकती है। यह सूचना पहले से सरकारों के पास है। सरकार उन सूचनाओं को अनदेखा करती है और 5500 से ज्यादा लोगों की मृत्यु होती है। ये संकट का एक पहलू है और तेरह के बाद हाई पावर कमेटी बनती है और हाई पावर कमेटी जो  सिफारिशें करती है सरकार उसको नहीं ध्यान देती और फिर 2021 में वो आपदा आती है। और इसके बाद  क्रम है- ये क्योंकि बड़ी घटनाएं हैं जिन्होंने पूरा हमारा इसको देखने का परियोजनाओं को देखने का नजरिए को अलग से बदला लेकिन, उसके बाद से हम लगातार देख रहे हैं 2025 में मैं बैठा हुआ हूं हमने 2013 में जो दो लोग साढ़े पांच हजार लोग दफन हुए उनमें से उनको नहीं खोजा और अब मैं 2025 में यहां बैठकर के आपसे बात कर रहा हूं  \अगस्त के महीने में धराली में आपदा आती है वो लोग अभी वहीं दबे हुए हैं 2025 में उनको खोजने की सरकार ने कोई कोशिश नहीं की वो वहीं 60 से 70 लोग अनुमान है कि वहां दबे हुए हैं और उसके बाद तो अभी मैं जहां मैं गया था- इधर केदार घाटी में भी -उसके बाद आपदा आई ।17 18 को अगस्त में तो वहां भी नहीं 28 को तो वहां भी जो लोग दबे हुए थे वो वहीं दबे हुए हैं दफन है वहां छेनागाड़ में और ये लापरवाही है आपकी सरकारों की जो ये लापरवाही है आप लगातार इसको देख रहे हैं और ये लगातार हो रहा है ये एक पहलू है संकट का

अच्छा अब ये कोई मतलब कोई बहुत रॉकेट साइंस नहीं है यानी कोई बहुत ऐसे वो नहीं है। जहांजहां आपदा हमको दिखाई दे रही है वहां वहां हम विकास के जो चिन्ह है वो भी देख रहे हैं। बहुत दूर ना जाए अगर आप तो अभी ऋषिकेश से लेकर के और बद्रीनाथ तक  सरकार ने का एक ड्रीम प्रोजेक्ट है जिसमें कि उन्होंने कहा कि भाई हम ऑल वेदर सड़क बनाना चाहते हैं। उसका आईडिया यह था कि भाई यहां बरसात के मौसम में या विपरीत मौसम में सड़क खराब हो जाती है लोगों को परेशानी होती है तीर्थ यात्रा करने में तो हम ऑल वेदर ऐसी सड़क बनाएंगे जो हर मौसम में रहे बाद में उसका बहुत मजाक उड़ा तो फिर सरकार ने उस प्रोजेक्ट का नाम बदल करके चारधाम यात्रा मार्ग कर दिया- अभी इसी बरसात में। अगर आप अभी ऋषिकेश से चलें जबकि अभी कोई बारिश नहीं है कोई मौसम खराब नहीं है इस बरसात में वो जो सड़क जिस पर कि हजारों करोड़ रुपया खर्च किया सरकार ने उस पूरी सड़क पर मतलब व्यासी से लेकर के देवप्रयाग और देवप्रयाग से श्रीनगर तक हर 50 मीटर पर, हर 20 मीटर पर भूस्खलन के इतने सारे घाव वहां दिखाई दे रहे हैं कि जहां कभी भूस्खलन नहीं होता था- जहां कभी सड़क खराब नहीं होती थी वहां ऐसी स्थिति बन गई कि किसी भी बड़ी मौसम की ऐसी घटना होने पर यानी कि अतिवृष्टि होने पर वो पूरी सड़क हमेशा के लिए बंद हो सकती है। और ये न सिर्फ आप वहां देख रहे हैं -आप केदारनाथ वाली यात्रा मार्ग पर देख रहे हैं कि वहां भी यही स्थिति है कि पूरा एक गांव उसमें उसके उसमें जद में है और कभी भी वह सड़क हमेशा के लिए बंद हो सकती है और यह कोई मैं एक्सजेजरेट नहीं कर रहा हूं यानी कोई अतिशयोक्तिपूर्ण बात नहीं है कि कोई भी जाकर के देख सकता है। बल्कि कुछ दिन पहले एक पत्रकार साथी के साथ में आ रहा था वो एक उसमें काम करते हैं और पर्यावरण से लेकर के ही उनके पत्रकारिता उनकी होती है तो वो कहने लगे यार सती जी इसको ये साफ क्यों नहीं कर रही है सरकार !

मतलब ये मलवा आया हुआ है- बरसात में आ गया ,जुलाई अगस्त में आ गया तो इसको क्यों तो मैंने उनसे कहा कि देखिए जितना मलवा आया है जितनी जगह भूस्खलन हुआ है मतलब जहां पिछले से पिछले साल सर यही जो एनएचएआई वाले जो सड़क बनाने वाले जो लोग हैं उन्होंने कहा कि 40 से 45 जगहों पर भूस्खलन के नए क्षेत्र बने और इस बार वो 300 से ज्यादा जगह हो गई। 300 से ज्यादा जगह है जहां पे नए भूस्खलन के क्षेत्र बन गए। तो मैंने उनसे कहा अपने साथी से मैंने कहा कि अगर सरकार इसको साफ करने लगेगी इसको मेंटन करने लगेगी वहां दीवार बनाने लगेगी तो उनको फिर चारधाम यात्रा मार्ग जितना बड़ा पैसा चाहिए फिर 12000 करोड़ रुपया चाहिए उसको ठीक करने के लिए इसलिए नहीं कर रहे हैं और ये संकट सड़क के चौड़ीकरण की वजह से कि वो सड़क आप ज्यादा चाहते हैं कि मालय में भी थ्री लेन फोर लेन सड़क बने और हिमाचल में तो हमने देखा कि वही उसका का कारण बना- वहां की आपदा का बड़ा कारण वो जो सड़क का चौड़ीकरण है यानी कि उसको थ्री लेन फोर लेन हाईवे बनाना है और हम यहां तो ऋषिकेश से लेकर के कर्णप्रयाग तक रेलवे की लाइन बन रही है और 90% से ज्यादा वो सुरंग के अंदर है या जल विद्युत परियोजनाओं के लिए हम सुरंग आधारित परियोजनाएं बना रहे हैं। उसमें हम विस्फोट कर रहे हैं और उन विस्फोटकों से जो पहले से ही कमजोर हिमालय वह और कमजोर हो रहा है और वो बरसात के समय में ;और क्योंकि यह जैसा हम कह ही रहे हैं कि भाई वह ऐसे वेदर इवेंट जो कि अब बढ़ेंगे लगातार- तो उस समय में यह और खतरनाक हो जा रहे हैं और ज्यादा विस्तार विस्तार पा रहे हैं।

इसके अलावा हम क्योंकि मैंने जैसा आपने शुरू में ही इस बात को कहा कि वो ठेले पर हिमालय में वो कहते हैं पर्यटन के लिए वो आए और फिर लोगों ने संस्मरण उस पर लिखा कि हिमालय इतना सुंदर है इतना सौंदर्य और वो सौंदर्य हिमालय का उसको देखने पर्यटक पहले से आते रहे लेकिन पिछले हम 10 ,12, 15 साल का अगर आंकड़ा देखें तो अब उसमें बेतहाशा वृद्धि हो रही है।मतलब देहरादून में नवीन भाई रहते हैं तो उसके पास ही आप जाइए तो देखिए मसूरी में वो इतना ज्यादा पहुंच जा रहा है कि लोगों को इस बार कहना पड़ा कि भाई आप मत आइए क्योंकि इतना चक्का जाम उसमें लग रहा है। इतना जाम उसमें सड़क बंद हो जा रही है। घंटों घंटों लोग फंसे हुए हैं। यही आप केदारनाथ में देख रहे हैं। बद्रीनाथ में मसूरी में आप शिमला में आप जम्मू कश्मीर में अगर हुआ तो वहां भी लोग पहुंच गए। यहां नैनीताल में आप जाइए । नैनीताल में हम लोग एक गोष्ठी कर रहे थे। तो वहां बहुत सारे लोग गोष्ठी में जो बैठे हुए लोग वो कहने लगे कि साहब गर्मियों में तो हम नैनीताल छोड़ के चले जाते हैं। हम हद्वानी चले जाते हैं। क्यों चले जाते हैं? क्योंकि यहां बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। यहां रहना मुश्किल है। और ये हालत पूरे उसकी हुई तो वो जो क्षमता से ज्यादा लोगों का वहां पहुंचना है- केदारनाथ में जो केवल तीर्थ के लिए लोग आते थे कि भाई 55 60 साल की उम्र हो गई। अब चलो तीर्थटन के लिए जाते हैं। अब ये हो रहा है कि वो नौजवान लोगों का केंद्र हो गया है और वो रील्स और Facebook के उसकी वजह से तो वहां बहुत अधिक मात्रा में पर्यटन वहां पहुंच रहा है। वो बद्रीनाथ में आ रहा है। केदारनाथ में आ रहा है। बाकी जगह आ रहा है। और  वो है वो उसके जो संतुलन है हमारा उस संतुलन को बिगाड़ रहा है। वो जब बिगड़ रहा है तो फिर वो आपदाओं की शक्ल में आ रहा है क्योंकि हजारों गाड़ियां पहले गिनती की गाड़ियां थी, बसेस थी जिसमें लोग बैठकर के आते थे। अब प्राइवेट गाड़ियां है हजारों की संख्या में है और उनसे कितना पर्यटन से लोगों की आमदनी हो रही है वो तो दिखाई नहीं दे रहा है कि कितनी आमदनी हो रही है वो तो हम देख रहे हैं यहां बैठ कर के लेकिन उससे ज्यादा नुकसान वो यहां की प्रकृति का भी यहां की इकोलॉजी का भी यहां के पर्यावरण का भी और वो एक नए संकट का कारण बन रहा है।

     हम ये भी नहीं कह सकते कि हमको विकास नहीं चाहिए। अब बहुत सारे लोग जब हम लोग 2024 में यहां लड़ रहे थे -जोशीमठ में जो जल विद्युत परियोजना बनी बन रही है और उसमें सुरंग बननी थी और वह जोशीमठ के नीचे से जानी थी तब पूर्ण विष्णु घाट परियोजना एनटीपीसी की है। तो उससे पहले क्योंकि हमारे यहां एक और जल विद्युत परियोजना बन चुकी थी। विष्णु प्रयाग परियोजना जिसको कहते हैं और जय प्रकाश कंपनी उसमें वो कर रही थी तो शुरुआत हमने वहां से की और वहां देखा कि किस तरह से जब एक जल विद्युत परियोजना बनती है और उसमें सुरंग बनती है उसमें विस्फोट होते हैं तो कैसे गांव तबाह होते हैं। कैसे उनकी कृषि तबाह होती है। उनके जल स्रोत तबाह होते हैं। वो सब हम लोगों ने देखा और उसको हम समझते हुए जोशीमठ में लड़ना शुरू किया कि यहां भी अगर ऐसी जल विद्युत परियोजना बनेगी तो यहां नुकसान इसी तरह के नुकसान होंगे। तो तब लोगों ने  हमको कहना शुरू किया भाई आप तो विकास विरोधी लोग हैं। है ना? अब तो खैर नए-नए शब्दावलियां आ गई। अब तो आंदोलनजीवी  भी आ गया। अब तो अर्बन नक्सल भी आ गया। तो बहुत सारे नए शब्द गढ़ लिए गए हैं हम लोगों के लिए। लेकिन तब सरकारें  इतनी चालाक होशियार नहीं थी। इतनी ही उनके वो नहीं था। तो वो तब केवल हमको विकास विरोधी के तौर पर ही टैग किया जाता था। तो लेकिन तब हमारा तर्क है कि भाई हम लोग तो उत्तराखंड आंदोलन जब हो रहा था 1994 हम तो वहां से निकले हुए लोग हैं। हम उस आंदोलन के केंद्र में रहे। उस समय हम लिख रहे थे, पढ़ रहे थे, मैगजीन छाप रहे थे और इसीलिए लड़ रहे थे कि उत्तराखंड का विकास होना चाहिए।

कि यहां किस तरह का बल्कि उसी आंदोलन के दौर में एक बहस हम लोगों ने हमारे साथियों ने चलाई। हमने भी लिखा उसको कि भई हम राज्य तो मांग रहे हैं। एक नए राज्य की बात कर रहे हैं। परंतु हम ये नहीं बता रहे हैं। ये नहीं बोल रहे हैं कि कैसा राज्य हमको चाहिए। एक ऐसा राज्य होना चाहिए। तो वो बहस भी हम लोगों ने की| लिखा भी |उस पर कविताएं भी लिखी। बाकी लेख भी लिखे कि कैसे राज्य की हम कल्पना करते हैं। तो जो विकास का भी जो अवधारणा है। है ना। तो अब ये दो तरह की अवधारणाएं हैं। एक अवधारणा  यह है जो कि मैं आपसे कह रहा हूं कि जो सरकार के सपने हैं या हमारे महामानव के सपने हैं। अगर आप कहिए चारधाम यात्रा मार्ग जो बन रहा है आल वेदर रोड ये क्या चीज है? तो ये उनका सपना है। उनका ड्रीम प्रोजेक्ट है। केदारनाथ में इतनी बड़ी आपदा आने के बाद तमाम वैज्ञानिकों ने तमाम  पर्यावरणविदों ने इस बात को कहा कि अब वहां उस तरह का निर्माण नहीं होना चाहिए। जैसा कि पहले था और वो सब निर्माण बह गया था। तो लिहाजा वहां अब वैसा भारी निर्माण नहीं होना चाहिए। लेकिन हम देख रहे हैं कि वैसे ही निर्माण हो रहा है। वहां भी वो रिवर फ्रंट वहां भी कॉरिडोर बद्रीनाथ बहुत संवेदनशील  जगह है। मतलब 10,000 फीट पर एक जगह है जो वैसे ही सुंदर है। वैसे ही खूबसूरत है। उसमें कुछ नया करने की जरूरत नहीं है। लेकिन वहां भी वो रिवर फ्रंट बन रहा है। वहां भी कॉरिडोर बन रहा है और पूरी नदी को पाट दिया जा रहा है। तो यानी कि विकास का जो यह अवधारणा है कि जिसमें सब कुछ बड़ा होना है यानी कि बड़ी मूर्ति लगनी है। हजारों फीट ऊंची चौड़ी सड़क बननी है। बड़ी परियोजना बननी है। सब कुछ बड़ा-बड़ा होना है। और ये चंद लोगों के का विकास है।

     और विकास की दूसरी अवधारणा है जो हम लोग सोच रहे थे उत्तराखंड आंदोलन के समय से जिसके केंद्र में यहां का इंसान यहां के लोग उनकी शिक्षा उनका स्वास्थ्य उनका जीवन उनके रोजगार का सवाल यहां के संसाधनों का सीमित उपयोग जनता के लिए यहां के लोगों के लिए तो यह जो दो अवधारणा है जिसमें कि एक तरफ चंद लोगों का विकास और यह बड़ा वाला विकास जो कि यहां की इकोलॉजी को भी यहां के पर्यावरण को भी यहां के बाकी संसाधनों को भी पूरी तरह से तबाह कर दे रहा है|और वो यहां के जो हमारे मतलब इस तरह का विकास है कि जो वो हिमालय में रहने वाले लोग हैं जो हम लोग हैं उनके ही अस्तित्व पर उनके ही जीवन पर संकट पैदा कर दे रहा है। एक अवधारणा यह है और दूसरी अवधारणा यह थी कि भ यहां के लोगों के लिए विकास। अभी देखिए कि यहां एक आंदोलन चल रहा है जो स्वास्थ्य को लेकर के पिछले काफी दिनों से लोग बैठे हुए हैं और वो पूरे उत्तराखंड में जो भी पूरा पहाड़ी क्षेत्र है वो इस संकट का सामना कर रहा है कि यहां स्वास्थ्य सुविधाएं शून्य है। मतलब लगातार ये हमको तस्वीरें दिखाई देती हैं कि लोग कुर्सी पर डंडी में कंधे पर किसी तरह अपने मरीजों को सड़क तक लाते हैं और आते-आते रास्ते में दम तोड़ देते हैं। प्रसव वाली महिलाएं वह दम तोड़ दे रही है। स्वास्थ्य की सुविधा नहीं है। तो यह जो जनता को चाहिए विकास जो उसकी आकांक्षा थी जो उसका सोचना था कि हमको अच्छी शिक्षा अच्छा रोजगार यहां के संसाधनों का ऐसा उपयोग जो हमारे हित में हो। यहां के लिए यहां के जो संसाधन है या यहां जो हमारी उपज हो रही है या हमारी कृषि है- उस कृषि का वैज्ञानिक विकास हो| उसमें वह उत्पादक बने। 

लेकिन कृषि की हालत यह है कि वह हमारी जो कृषि है उस पर जंगली जानवरों का हमला है लगातार। मतलब मैं यहां बैठा हूं। अभी थोड़ी देर पहले मैं एक वीडियो यही देख रहा था कि जोशीमठ में लगातार वो भालू का हमला है। बंदर का है या केवल जोशीमठ में नहीं बाकी पूरे मतलब कुमाऊं में चले जाइए। आप गढ़भाल में चले जाइए। लगातार लोग इससे परेशान है। है ना? कृषि खत्म हो गई है। लोगों ने कृषि करना छोड़ दिया है। जो कि पहले बहुत सारे लोग हमारे यहां अभी इसी इलाके में तो पिछले 25- 30 साल पहले तक लोगों की कृषि पर बहुत सारी निर्भरता थी जो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है क्योंकि उस पर ये तो उस कृषि का हम लोग विकास नहीं या जो फल उत्पादन यहां का था उसका विकास नहीं है। उसके ढांचागत उसके लिए कैसा वो करना है वो नहीं है। तो विकास की एक अवधारणा ये है और दूसरी अवधारणा ये है जो कि जनता की आकांक्षा थी कि उनका जल, उनका जंगल ,उनका जमीन वो जमीन तो सब सरकारों ने बेच डाली है। तो यह एक दो अवधारणाएं हैं जो यह इस संकट को और बढ़ा देती है। हम लोग अभी मतलब बीच में अभी अह पिछले महीने अह हम लोगों ने यहां  जहां-जहां आपदा जैसे धराली में या केदारनाथ की घाटी में इसी साल बड़ी आपदा आई। नंदप्रयाग घाट में आई, थराली में आई। तो कुछ-कुछ जगहों पर अभी हम लोग घूम करके वहां देख कर के लोगों से मिलकर के आए। और फिर हम लोगों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी देहरादून में की और अपनी कुछ बातें भी सरकार के सामने रखी कि क्या-क्या किया जाना चाहिए। तो उसमें हमने देखा कि बहुत सारे लोग अभी भी ऐसी जगहों पर रह रहे हैं जहां अगर अगले साल बारिश आएगी तो पूरे लोग बह जाएंगे। मतलब वहां ही जहां छेनागाड में आठ नौ लोग दब गए इस बार केदारनाथ वाली घाटी में तो वहां अह कुछ लोग हैं, दलित बस्तियां है। वह ऐसी जगहों पर बसी हुई हैं कि जहां अगली बरसात में वो पूरी बस्ती बह जाने वाली है। या नंदप्रयाग में एक दलित बस्ती थी वहां आठ नौ परिवार रहते थे। वो उनका सब कुछ बह गया। उनके लिए कोई मुआवजा नहीं है। इनके लिए भी कोई मुआवजा नहीं। और जो ऐसी आपदाएं हैं जितनी भी चाहे वो जोशीमठ की आपदा हो धराली में हो, थराली में हो, वो आप नंदप्रयाग में चले जाइए केदार वहां जो भी वनरेबल मतलब आपदा का एक एक पहलू ये है कि इसमें सर्वाधिक प्रभावित होने वाले सबसे कमजोर तबके के लोग है। है ना, यह जोशीमठ में भी हमने देखा कि सर्वाधिक जो प्रभावित हो रहा है, वो कमजोर तबके का आदमी है और उसके पास पहले आर्थिक संसाधन कम है। और उसके लिए जैसे वहां नंदप्रयाग वाले क्षेत्र में मैं गया तो वहां उन्होंने कहा वो जो साथी लोग हैं हमारे दलित साथी तो उनका ये कहना था कि हमको तो मुआवजा भी नहीं दे रही है सरकार क्यों? क्योंकि उनके पास भूमि नहीं है। मकान उन्होंने बनाया लेकिन भूमि उनके नाम पर नहीं थी। तो जिनके नाम पर भूमि नहीं है तो उनको मुआवजा भी नहीं मिलेगा। तो ये संकट सिर्फ वो नंद प्रयाग का नहीं है वो यहां का भी है और बाकी जगहों का भी है। क्योंकि ज्यादातर जो कमजोर तबके के लोग हैं दलित लोग हैं एससी एसटी के लोग हैं उनके पास भूमि नहीं है। अब भूमि नहीं है तो सरकारी भूमि पर या सिविल भूमि पर किसी तरह से उन्होंने अगर घर बनाया हुआ है आपदा आने पर उनको उसका मुआवजा भी नहीं मिलेगा। यह इसका एक पहलू है। तो जब हम वहां से आए तो फिर हम लोगों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी दहशत की थी तो उसमें भी हमने कहा कि भाई आप 2013 में जो नहीं कर पाए, 21 में नहीं कर पाए और लगातार नहीं कर पाए। इसे सबक सीखने की जरूरत है क्योंकि उत्तराखंड कोई पहली बार यहां आपदा नहीं आ रही। ये पिछले 20 -22 सालों से लगातार है। मतलब वो भूकंप हो, वो बाढ़ हो वो ग्लेशियरों के झील का टूटने से आने वाली बाढ़ हो उसका हमारे पास लंबा अनुभव है। पिछले 50 -60 -100 साल का अनुभव है। मैं तो 1894 का आपको किस्सा सुनाया। उसके बाद 1970 की बाढ़ है। उसके बाद लगातार इस तरह की आपदाएं हैं। हमारे पास संभव उससे हमको सीखना चाहिए। तो हमने सरकार से कहा कि आप ऐसी जगहों को जो संवेदनशील जगह है इनको चिन्हित कीजिए और इनको चिन्हित करके उन जगहों को खाली कीजिए। क्योंकि आपदा का अर्थ क्या है? क्योंकि हिमालय में अगर कोई ऐसी परिघटना हो रही है, कोई झील टूट रही है या अतिवृष्टि हो रही है। वह बहकर के नदी में चला गया वो पानी। अगर वैसे ही चला गया तो वह आपदा नहीं है।

लेकिन वो आपदा कब बन जा रहा है? जब उसके रास्ते में कोई परियोजना आती है। उसके रास्ते में कोई घर आता है। उसके रास्ते में लोग आते हैं तब वो आपदा बनती है। तो हम उन लोगों को उन संपत्तियों को वहां से हटा दें। लेकिन वो उसको हम जबकि चिन्हित जगह मतलब खुद हम अगर एक बार जा रहे हैं तो हम देख के आ रहे हैं कि इन इन जगहों पर अगले साल आपदा आने की संभावना है। तो यह तैयारी हम लोग कर सकते थे। हमारी सरकारें कर सकती थी जो कि नहीं हो रही है वो इस संकट को और बढ़ा दे रही हैं। यानी कि और ज्यादा लोगों के यानी कि उतनी पर्यटन से या बाकी चीजों से हमारी आमदनी नहीं हो रही है जितने हजारों करोड़ रुपया लोगों को मुआवजा देने में या लोगों को घर बना के दोबारा जब वो बह जाएगा तो दोबारा में आपको उतना पैसा लग जा रहा है जितनी आपकी आमदनी नहीं हो रही है।

यह एक इसका पहलू है। जोशीमठ में क्योंकि उसका हमारा अनुभव है तो यहां असल में क्या हुआ कि एक तो हम पहले भी इसमें लड़े 2003 चार पांच से हम लोगों ने जब संघर्ष समिति बनाई और इस बात को चिन्हित किया इस बात को महसूस किया है कि  जलविुद्युत परियोजना अगर यहां बनेगी तो ऐसा-सा संकट आएगा उसके बाद 2010 में एक लंबी लड़ाई के बाद हमारा एक समझौता भी हमने किया तो लगातार क्योंकि यहां एक चेतना इस बात को लेकर के थी ये इन लोगों को पता था क्योंकि लगातार ये बात हम कर रहे थे पिछले 20 सालों से लड़ रहे थे तो इसलिए यहां ये हुआ कि जब वो संकट आया 2021-22 में तो लोग सड़क पर आ गए।

क्योंकि लोग पिछले 20-22 साल से हमको सुन रहे थे कि कह रहे हैं कि ऐसा होने वाला है। ऐसा हो के रहेगा। तो उसकी वजह से लोग सड़क पर आ गए और उसकी वजह से लोगों की एक वो बन गई। अभी तो अभी मैं ये सुन रहा था कल परसों आप लोगों ने भी सुना होगा कि धराली में जहां आपदा आई हम वहां गए थे |उस समय जब हम वहां गए सितंबर के महीने में तो हमने वहां लोगों से ये कहा अगस्त में कि देखिए अब कुछ दिन तो जब तक आप लोग खबरों में रहेंगे अखबारों में आपकी खबर आएगी टीवी के पर्दे पर कुछ दिन आप दिखाई  देंगे तब तक सरकारों का आप पर ध्यान होगा और उसके बाद फिर आपको भूल दिया जाएगा और फिर आपको अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी। और वो बात सच हो रही है। अभी वहां एक महिला ने आत्महत्या कर ली। वहां जो ट्रॉमा जो मेंटल ट्रॉमा है उससे लोग गुजर रहे हैं क्योंकि वो काफी समृद्ध वो इलाका था। वहां करोड़ों रुपए का तो सेब उन लोगों का बिक जाता था। वहां पर्यटन से उनकी आमदनी थी और पिछले उसमें वो सब कुछ उनका बह गया। उनके होटल, उनके घर, उनके सेब के बगीचे सब समाप्त हो गए। तो वो वहां पूरा वो जो दिमागी तौर पर वो लोग बहुत डिप्रेशन में है। ट्रॉमा से गुजर रहे हैं और लगातार वहां इस तरह की घटनाओं की खबर आ रही है। एक  तो आत्महत्या वहां हो चुकी है और बाकी लोग भी उस तरफ बढ़ रहे हैं। जोशीमठ में भी ये हो सकता था। यहां भी मेंटल ट्रॉमा से लोग गुजरते अगर ये लड़ाई ना होती। लेकिन हुआ ये कि एक बड़ा आंदोलन यहां हो गया। वहां हम लोग बैठे रहते। आपस में एक दूसरे का दुख दर्द वो करते तो उसकी वजह से यह वाली सिचुएशन यहां नहीं आई और दूसरा सरकारों पर दबाव पड़ा जिसकी वजह से लोगों को मुआवजा मिला और उससे कुछ चीजें हो गई।भले ही वो जो जैसी हमारी सरकारें करती हैं उसका मतलब सहमति बन जाने के बावजूद ये निश्चित हो जाने के बावजूद कि लोगों को क्या उनके साथ सहायता की जानी चाहिए वो अभी तक जमीन पर नहीं उतर रहा है। वो एक बात है। लेकिन उस लड़ाई का परिणाम ये जरूर हुआ कि लोगों को इस तरह से नहीं गुजरना पड़ा और बहुत सारे जो गरीब लोग थे उनको भी मुआवजा मिला। जो लोग अभी भी क्योंकि उनके भूमि नहीं मिली या भूमि का मूल्य नहीं मिला तो यहां रुके हुए हैं और एक नए संकट वो है उसमें कि अगर कभी अतिवृष्टि हुई और और ज्यादा अगर जमीन खिसकी तो फिर यहां बड़ी घटना होने की संभावना बनेगी। लेकिन उसने जोशीमठ के अनुभव ने ये जरूर किया कि उसने एक ट्रिगरिंग इफेक्ट उसका हुआ कि सारे हिमालय में इस बात को लेकर के एक चेतना हो गई। भले उस तरह का संघर्ष वहां नहीं हो रहा है। हम कोशिश कर रहे हैं कि भाई जम्मू कश्मीर में जहां रामवन में या डोडा में या बाकी जगहों पर जो जहां इस तरह की मतलब स्थिति बन रही है वहां लोगों में चेतना हो लोग लड़े उसके लिए या हिमाचल में जो हो रहा है। तो दूसरी बात यह है कि यहां जो  जोशीमठ के लिए एक प्लान बन गया। अभी आप देखेंगे कि भाई प्रधानमंत्री साहब जो हिमाचल गए वहां की आपदा में पंजाब गए और उत्तराखंड भी आए। हिमाचल में इतनी बड़ी आपदा के बाद सरकार ने वहां 1500 करोड़ दिया है। यहां पंजाब में इतनी बड़ी आपदा के बाद वही 12 14 15 1600 करोड़ है। उत्तराखंड में आपदा के बाद अभी 1200 करोड़ है। और जोशीमठ में जो आपदा है जोशीमठ एक शहर है 20 -22000 लोगों का यानी दो ढाई तीन हजार परिवार यहां है। यहां जो हम लोगों को पुनर्निर्माण के लिए या मुआवजे के लिए जो पैसा मिला वह कितना है? वह ₹1600 करोड़ है। तो यह जो डिस्पैरिटी है यानी कि   सरकार की दृष्टि में जो दृष्टि दोष है कि इतना बड़ा राज्य है जहां सैकड़ों 150 से 200 से ज्यादा लोग मर गए। कश्मीर में 100 से ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई है। पंजाब में इतनी बड़ी आपदा है, बाढ़ है। 1200 1500 करोड़ ₹1600 करोड़ एक शहर है जोशीमठ इसका ₹1600 करोड़ का बजट है। तो  मतलब उसको तो ये भी हम लोगों को इसके मैं अंत में थोड़ा सा बढ़ रहा हूं। अगर आप लोग बोर हो रहे होंगे क्योंकि बहुत टेक्निकल बातें मैंने कर दी। तो नहीं हो रहे। तो हां मैं केवल ये जरूर इसमें कहना चाह तो हम लोगों की वो थी कि एक तो एकरूपता नहीं है यानी आपदाओं को देखने में भी सरकार की जो दृष्टि है वो एक जैसी नहीं है जबकि एक समान दृष्टि होनी चाहिए थी वो नहीं है दूसरी बात है कि जब मैं सिक्किम का जिक्र आपसे किया तो वहां मुआवजा नहीं मिला लोगों को |ठीक है |जम्मू कश्मीर में अलग तरह की नीति है हिमाचल में अलग तरह की  है उत्तराखंड में अलग है और उत्तराखंड में भी केदारनाथ की आपदा में अलग नीति है जोशीमठ के लिए अलग है या धराली के लिए अलग है और बाकी जगहों के लिए अलग है। तो वो जो यूनिफोर्मिटी क्योंकि अब क्योंकि संकट बढ़ रहा है और ये दिन पर दिन बढ़ने वाला है। ये लगातार बढ़ेगा और जैसा कि मैंने आपसे कहा कि वो संकट के लक्षण जरूर उत्तराखंड में यह हिमालय में पहले प्रकट हो गए हो। लेकिन यह संकट पूरी धरती का संकट तो है ही है लेकिन हमारे ही देश का संकट बड़ा है क्योंकि अगर यहां ग्लेशियर्स पीछे जाते हैं और खत्म होते हैं तो वो हिमालय में तो संकट का कारण बनेंगे लेकिन वो नीचे भी जो उस नदियों पर गंगा यमुना का जो मैदान है उस पर जो निर्भरता लोगों की है। यहां के पानी पर जो निर्भरता है या यहां का जो जंगल है 62- 63% का जो जंगल है उस पर अगर संकट आता है जिसको कि लगातार सरकार पहले उसने चारधाम यात्रा मार्ग के लिए वो हजारों लाखों पेड़ काटे हैं और अभी जो धराली में जहां आपदा वहां तो मैं देख के आया हूं।वहां इतने बढ़िया आप देखिएगा कि वो देवदार का जंगल है शानदार बढ़िया और इतने पुराने पेड़ हैं 150- 200- 300 साल पुराने वृक्ष हैं उनके चिन्हित कर दिया गया है हजारों पेड़ों को उसके लिए केवल एक सड़क को चौड़ा करने के लिए जिससे क्या होगा उस सड़क के चौड़ा करने से आपकी जो यात्रा है गंगोत्री पहुंचने की वो 15 मिनट 20 मिनट कम हो जाएगी उसकी देरी या जो यही चारधाम में क्या हो रहा है उसे आपने सड़कें चौड़ी कर दी पार्किंग नहीं है यहां गाड़ी लगाने की जगह नहीं है और केवल इसलिए कि आप चाहते हैं कि लोगों का वहां पहुंचना थोड़ा जो बड़े लोग हैं उनके पास समय कम है तो जिनके पास समय कम है उनको हिमालय में नहीं आना चाहिए। तो केवल इसके लिए आप हजारों लाखों पेड़ों की बलि दे दे रहे हैं। तो मैं कह रहा हूं जो ये जंगल है जो कि केवल हमारी संपदा नहीं है हिमालय के वासियों की तो सारे धरती की सारे देश की संपदा थी। इससे जो हवा है जो ऑक्सीजन है वो तो सब सबको मिल रहा है। तो इस पर संकट आएगा तो यह संकट पूरे देश का संकट बनेगा। लेकिन उसके संकट के जो लक्षण मैं आपको बता रहा हूं इसलिए बता रहा हूं कि इससे बचने की जरूरत है। इसको हम कैसे कम कर सकते हैं। या आपदाओं से लोगों का बचाव कैसे हो सकता है। यह धरती पर या हमारे देश में जो संकट बढ़ रहा है। भले हमारे प्रधानमंत्री जी जब से की जी21 की बैठक यहां जब हो रही थी तो उसमें उन्होंने कहा कि भाई हमको ग्रीन कवर बढ़ाना चाहिए। यानी कि हरित क्षेत्र को हरित उसको बढ़ाना चाहिए। लेकिन कर क्या रहे हैं वो स्वयं ही अडानी साहब को एक पेड़ माग के नाम बाकी पेड़ अडानी के नाम तो  हो रहा है तो ये और खतरे की तरफ हम लोग बढ़ रहे हैं और हिमालय में तो और ज्यादा आपने कह दिया कि जो सीमा से लगे हुए जो इलाके हैं सीमा से 100 किलोमीटर के दायरे में पूरी छूट है विकास के लिए सारे उद्योगपतियों को पूंजीपतियों को कुछ भी कर देने की आप खुली छूट लूट की खुली छूट जो यह ये और इस संकट को बढ़ाएगी। तो इसका समाधान के तौर पर जो हम देखते हैं तो यही देखते हैं कि भाई उसमें तो जन चेतना लोगों को चेतनशील होने की जरूरत है और ज्यादा चिंतित इस पर होने की जरूरत है। इसीलिए जो मैं फोरम की बात कर रहा हूं जो हिमालय को लेकर के हम लोगों ने सिक्किम, अरुणाचल, जम्मू कश्मीर और तमाम जो लद्दाख या बाकी जो हिमालय के क्षेत्र हैं जितने भी राज्य हैं उनका हमने एक फोरम बनाया है। लेकिन वह जो सोनम वागचुक साहब की गिरफ्तारी है, हम उसको भी संकट के तौर पर लेते हैं। वह भी हिमालय का संकट है। वह भी मतलब इसी बात को तो कह रहे हैं कि वह लद्दाख का वो इलाका बहुत संवेदनशील क्षेत्र है। बचना चाहिए। उसको बचाया जाना चाहिए। इसी की लड़ाई वो है। इसीलिए उस लड़ाई में भी हम लोग उसके साथ हैं। और यह सिर्फ हमारी यानी कि जो धरती जमीन पर संघर्ष करने वाले या नारा लगाने वाले जो लोग हैं उनकी जिम्मेदारी नहीं है। ये तो सभी की जिम्मेदारी है। मैं तो आप नवीन भाई से आूहूजा जी हैं। बाकी जो साहित्यकार लोग हैं। उनसे भी मैं हम ये कहना चाहते हैं कि देखिए पुराने समय में हमने देखा है कि हमारा साहित्य में पर्यावरण दिखाई देता था। लेकिन आज के दिन पर पर्यावरण साहित्य से पर्यावरण पूरी तरह से गायब है। मतलब कोई ऐसी रचना कोई बड़ी रचना हमारी कहानियों में हमारे साहित्य में हमें अब कम दिखाई देती है। मतलब कुछ कवि हैं मतलब कुछ आदिवासी इलाकों से आने वाली कवियत्रियां हैं जेसिका हो या अन्य हो उनकी कविताओं में जरूर वो चिंता हमको गहरे से मतलब बहुत उसे उसकी पीड़ा हमको दिखाई देती है। छत्तीसगढ़ की या झारखंड की या वो झारखंड की कवियत्री है। की कविता हम देख रहे हैं। लेकिन बाकी जगहों पर ये पर्यावरण का जो बड़ा संकट है। मतलब हिमालय का संकट हो बाकी धरती का संकट हो वो संकट हमारे साहित्य का संकट नहीं बन रहा है। जबकि बनना चाहिए बीच में यहां एक और बड़े साहित्य के साथी यहां पहुंचे थे जोशीमठ तो वो जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष  भी रहे हैं। तो उनसे भी मैं जिक्र कर रहा था। तो मैंने कहा देखिए कि इस समय में जब संकट बड़ा है तो हमारी लड़ाई भी हमारी बड़ी चुनौती है। उस चुनौती से लड़ने के लिए हमको भी बड़े उस पर वो जाना चाहिए था। लेकिन हम देख रहे हैं कि वो खासतौर पर उसमें हमको दिखाई नहीं दे रही है। वो चिंता वो गंभीरता वो जो चिंता होनी चाहिए थी वो चिंता नहीं दिख रही। और जो साहित्य  में प्रकट होनी चाहिए थी। वहां भी हमको मतलब हो सकता है क्योंकि मैं इतना नहीं पढ़ता हूं। बहुत कम कम ही देख पाता हूं। लेकिन जितना हम देख रहे हैं उसमें वो बहुत कम एक अभी एक देवी प्रसाद जी की कविता लंबी कविता है तो उसमें भी मैं कहीं ढूंढ रहा था कहीं पर्यावरण का संकट उसमें थोड़ा सा उसमें एक जगह है बाकी तो नहीं काफी लंबी है कविता तो बाकी जगह भी वो संकट वो दिखाई नहीं दे रहा तो ये सब की सामूहिक जिम्मेदारी इसकी है तो जितना बड़ा संकट है क्योंकि ये तो अस्तित्व का संकट है अस्तित्व हमारा रहेगा सब रहेगा तो तब साहित्य भी होगी संस्कृति भी होगी बाकी सब भी होंगे तो ये कह कहते हुए कि इस संकट की गंभीरता को समझते हुए क्योंकि हम इसको संकट का हिमालय कह रहे हैं तो निश्चित तौर पर अगर ये शब्द अगर कहीं से आई है ये बात कहीं से आई है तो निश्चित तौर पर कहीं ना कहीं उसमें कोई वो है तो उसको सामूहिक जिम्मेदारी के तौर पर  कैसे इस संकट का हम मुकाबला करें और अपनी सरकारों में कैसे जिम्मेदार बनाएं क्योंकि मैं लगातार जो मैं आपको कह रहा हूं वो  लगातार हमारी सरकारों की जो लापरवाही है वो जो नीति नियंता है नीति बनाने वाले लोग हैं उनको कैसे जिम्मेदार बनाया जाए इस बात के लिए ये भी वो चिंता का विषय हमारा होना चाहिए और ये बढ़ने वाला है संकट और मैं बिल्कुल इसको बिल्कुल बहुत जोर देकर के इस बात को कह रहा हूं कि इस संकट का सामना इसको सबसे ज्यादा जो झेलता है पहले वो सबसे वरनरेबल सबसे कमजोर तबका चाहे उस समाज का सबसे कमजोर तबका उसको सबसे पहले वो उससे प्रभावित होता है और सबसे ज्यादा प्रभावित होता है तो इसलिए वह चाहे वह हमारे समुद्र के किनारे रहने वाले मछुआरे हो जो उस पर निर्भर है वहां यह संकट बढ़ने वाला है। जैसे ही यह हमारे ग्लेशियर पिघलेंगे वहां समुद्र तल समुद्र का जल उसका तल बढ़ेगा उन पर वो संकट आएगा या बाकी जगह भी तो वो मछुआरे पर होंगे या जो जंगलों में रहने वाले जो आदिवासी हैं या जो उस पर प्रकृति पर निर्भर जो समुदाय हैं उन समुदायों पर इसका असर होगा। तो इसलिए यह एक बड़ा व्यापक संकट है। इसकी गंभीरता को समझते हुए हमारी भी उसको कैसे हम लोग उसकी तैयारी कर सकते हैं। कैसे इस पर कर सकते हैं उसको एक व्यापक  बनाने की व्यापक जनमानस उसके लिए या चेतना उसके लिए बनाने की जरूरत है। यह कहते हुए मैं अपनी बात समाप्त करूंगा और फिर जो भी प्रश्न उत्तर इसमें होंगे, हम चर्चा परिचर्चा इसमें कर सकते हैं। क्योंकि बहुत सारी चीजें रह भी गई। तो उस पर फिर मेरे ख्याल से बाद में आ जाऊंगा धन्यवाद आप लोगों का सुनने के लिए इतनी देर बहुत-बहुत शुक्रिया। थैंक यू।

 


 

 


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Friday, February 27, 2026

मार्खेज़ और जॉनी बेल्च की कविता : कठपुतली

 

 


जॉनी बेल्च


 

 

1982 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दक्षिण अमेरिकी कथाकार गेब्रिएल गार्सिया मार्खेज को लंबी बीमारी के बाद 1999 में डॉक्टरों ने कैंसर से पीड़ित घोषित कर दिया था और 'जादुई यथार्थवाद' के इस अद्भुत चितेरे के स्वास्थ्य को लेकर पूरी दुनिया में फैले प्रशंसकों में चिंता उभरने लगी। अचानक एक दिन- 29 मई, 2000 को पेरू के लोकप्रिय दैनिक 'लॉ रिपब्लिक' में एक कविता छपी जिसका शीर्षक था 'कठपुतली (द पपेट)' और इसके रचयिता के तौर पर मार्खेज का नाम छपा। देखते ही देखते, पूरे दक्षिण अमेरिकी समाज में यह खबर जंगल के आग की तरह फैल गई- बहुत सारे अखबारों ने इसे उद्धृत किया, रेडियो और टेलीविजन पर इसका पाठ किया गया और यह कहा गया कि जीवन की आखिरी बेला में मार्खेज ने इस कविता के माध्यम से अपने मित्रों और प्रशंसकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।  जब इस बाबत मार्खेज से पूछा गया तो मुस्करा भर दिए, पर धीरे-धीरे यह राज खुल ही गया कि मार्खेज ने ऐसी कोई कविता नहीं लिखी। बाद में यह खबर भी सामने आई कि मैक्सिको में स्टेज पर मूकाभिनय करने वाले जॉनी बेल्च ने अपने एक कठपुतली शो के लिए यह कविता लिखी थी जो छपी तो पर इसमें रचयिता के तौर पर किसी गलती से मार्खेज का नाम छप गया। अपने एक इंटरव्यू में वेल्च ने कहा कि वे कोई बड़े कवि नहीं हैं, पर दुनियाभर में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी एक रचना को लिखने का श्रेय उन्हें नहीं मिला इसका उन्हें गहरा दुख है। आज इस कविता को दुनिया के बड़े 'होक्स' के रूप में यहां-वहां उद्धृत किया जाता है।- यादवेन्द्र




 
 जॉनी बेल्च की कविता 

कठपुतली

(अनुवाद: यादवेन्द्र)  

यदि पलभर को ईश्वर भूल जाए कि 
मैं रद्दी और कबाड़ से बना एक गुड्डा हूं 
और जीवन का एक कतरा और मुझे बख्श दे 
तो बहुत संभव है 
मैं वे सब बातें न कह पाऊंगा
जो सोचता रहा हूं 
पर इतना तय है कि 
उन तमाम बातों को सोचूंगा जरूर 
जो मुझे कहनी हैं।

मैं सभी चीजों को खूब सम्मान दूंगा 
पर उनकी चमक-दमक देखकर नहीं 
बल्कि इसलिए कि 
उनके मायने जीवन में क्या हैं।

अब से सोऊंगा कम
और स्वप्न ज्यादा देखूंगा 
मैं जानता हूं कि जब हम 
एक मिनट के लिए अपनी आंखें मूंदते हैं
तो रोशनी साठ सैकंड तक 
हमसे दूर चली जाती है।

लोगबाग चाहें तो यूं ही 
सड़कों की लंबाई मापते रहें 
मैं तो खूब सोच-समझकर 
एक-एक कदम आगे बढ़ाऊंगा।
दूसरे लोग चाहे सोते रहें, 
मुझे जागते रहना है 
खूब गौर से वह सब सुनते रहना है
जो दूसरे बोलेंगे 
और यह सीखने की कोशिश भी करूंगा कि अच्छी चॉकलेट आइसक्रीम खाते हुए इसका भरपूर आनंद कैसे लिया जाए।

यदि ईश्वर जीवन का 
एक कतरा और मुझे बख्श दे तो
मैं सादगी भरे मामूली लिबास पहन लूंगा और सूरज के सामने सीना तान कर खड़ा हो जाऊंगा 
जाहिर है मेरे शरीर को तो धूप मिलेगी ही अंदर तक आत्मा भी प्रकाशमान हो जाएगी।

हे ईश्वर, यदि मेरे हदय की धड़कन शेष है
 तो मैं अपनी तमाम घृणा उतारकर 
बरफ की सिल्लियों पर रख दूंगा 
और सूरज के चमकने का इंतजार करूंगा वॉनगाग का स्वांग धारण करूंगा
और 
फिर सितारों के बदन पर 
बेनेदेत्ती की कविता चित्रित कर दूंगा 
और तोहफे में चंद्रमा को
मेरेट का एक गीत प्रस्तुत करूंगा।

गुलाब की क्यारियां 
मैं अपने आंसुओं से सींचूंगा 
जिससे उनके कांटों की चुभन और
पंखुड़ियों के दैवी चुंबन महसूस कर सकूं...
यदि ईश्वर जीवन का एक कतरा और 
 मुझे बख्श दे।

मैं ऐसा एक दिन भी नहीं गंवाऊंगा जब सचमुच जिन सबसे प्रेम करता हूं
 उनसे यह न कह पाऊ 
कि में उन्हें कितना प्रेम करता हूं।

मैं हर किसी को यह भरोसा दिलाना चाहता हूं कि 
वे मेरे सबसे अजीज़ हैं 
दरअसल ऐसे में प्रेम के साथ 
मैं खूब प्रेम से रहूंगा।

मैं लोगों को साबित करके दिखाऊंगा कि उन्हें इस बात की गलतफहमी है 
कि बुढ़ापे में प्रेम के सागर में नहीं डूबा जा सकता 
उन्हें इल्म ही नहीं कि 
प्रेम के जीवन से तिरोहित होते ही 
बुढ़ापा अपने भारी पांव पसारने लगता है।

मैं' बच्चों के हाथ उड़ने वाले 
खूबसूरत तोहफे पकड़ा तो दूंगा 
पर कहूंगा कि अपने आप उड़ान भरना सीखो।

और बूढ़े हो चुके लोगों को बताऊंगा 
कि बुढ़ापे की वजह से नहीं 
बल्कि स्मृतियों के लोप से आती है मृत्यु।

साथियों, मैंने आपके साथ क्या कुछ नहीं सीखा
मैंने सीखा कि जिसे देखो वह 
पहाड़ के शिखर पर चढ़कर टिक जाना चाहता है 
पर यह सच्चाई उससे छूट जाती है कि वास्तविक आनंद पहाड़ के शिखर 
में नहीं 
पहाड़ पर चढ़ने के 
हमारे ढंग में निहित होता है।

मैंने यहीं सीखा कि जब एक नवजात शिशु अपने नन्हें हाथ में पिता की अंगुलियां भींचता है 
तो यह स्पर्श जीवन भर के लिए 
वहीं ठहर जाता है।

मैंने यह भी सीखा कि किसी को 
दूसरे आदमी को ओर आंखें उठाकर देखने का हक तभी मिलता है 
जब उसके हाथ साथी को सहारा देकर खड़े करने के लिए आगे बढ़े हुए हों।

मैंने लोगों से बहुत सारी बातें सीखीं समझीं पर अब जब जीवन के अंतिम छोर तक आ पहुंचा हूं
तो इनमें से अधिकांश चातों के अर्थ खो जाएंगे 
अब तो बस मुझे ताबूत में बंद किया जाना शेष है
जहां मृत्यु मेरी प्रतीक्षा कर रही है। 

 

(प्रस्तुति: यादवेन्द्र) 

Tuesday, February 24, 2026

सिडनी से कैनबरा    दिनेश चन्द्र जोशी

 (दिनेश चन्द्र जोशी ने साहित्य की बहुत सारी विधाओं को साधा है। आजकल वे आस्ट्रेलिया में हैं । ‘लिखो यहाँ वहाँ ’ के लिये उन्होंने यह यात्रा-वृतान्त भेजा है )

  गत वर्ष,दिसम्बर 2025 के आखिरी दिन हम लोग प्रात: सात बजे सिडनी के बाखम हिल क्षेत्र से आस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा के भ्रमण हेतु निकले।
कैनबरा नाम यहां के मूल निवासी आदिवासी समाज की भाषा से निकला है। जिसका अर्थ है, 'मिलने वाला स्थल'। यहां के 'नगाम्ब्री' व 'न्गुनवाल'
जनजाति के लोग जो यहां पर बीस हजार सालों से रहते आये थे तथा इस जगह पर आपस में किसी समारोह आदि के मौके पर मिलते थे,इसलिए इस स्थल का नाम कैनबरा है।
कुछ बुजुर्ग स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि यह नाम ब्लैक माउंट व ऐंन्सिले पहाड़ियों के बीच की घाटीनुमा जगह होने के कारण स्त्रियों के स्तनों के मध्य स्थल का पर्यायवाची नाम है।
बहरहाल कैनबरा नाम के पीछे जो भी मान्यता सत्य हो,इतना तय है कि यह ब्रिटिश औपनिवेशिक देश से जुड़ा नाम नहीं है, जैसे यहां की पूर्व में प्रस्तावित राजधानी 'ईडन' शहर के बारे में कहा जाता।

सिडनी शहर के उत्तर पश्चिम क्षेत्र से अपने वाहन से चल कर हमें शहर के बाहरी दक्षिण पश्चिम क्षेत्र लिवरपूल तक जाने में लगभग 45 मिनट  का समय लग गया,प्रात: के समय ट्रैफिक कम था। यूं जाम की स्थिति तो दिन के सामान्य समय में कभी नहीं लगती। लिवरपूल नाम इंग्लेंड के शिपयार्ड शहर के नाम से ही लिया गया होगा,क्योंकि यहां आस्ट्रेलिया में कई सड़कों शहरों के नाम मूल ब्रिटेन के नामों से ही लिये गये हैं। सिडनी के इस लिवरपूल में पुराने युरोपियन वास्तु के घरों के साथ नयी बहुमंजिला इमारतें भी हैं। लिवरपूल से 'ह्यूम हाई वे' प्रारंभ होता है जो सिडनी से मेलबोर्न जाने का इनलेंड (गैरतटीय) राजमार्ग है। क्योंकि यह समुद्र तट के समानांतर न जा कर अंदरूनी जमीनी भू भाग से होकर जाता है इसीलिए इसे इनलैंड हाई वे कहते हैं। मैलबोर्न जाने का दूसरा  लोकप्रिय राजमार्ग तटीय इलाकों से होकर जाता है,इसे प्रिंसेस हाई वे कहते हैं। 'प्रिंसेस हाई वे' सिडनी के किंग स्ट्रीट न्यू टाउन से प्रांरभ होकर वूलंगगौंग उपनगर होते हुए अनेक सुरम्य तटीय शहरों से गुजरता हुआ
न्यू साउथ वेल्स राज्य को पार कर विक्टोरिया प्रांत में पंहुचता है। मेलबोर्न विक्टोरिया प्रांत की राजधानी है।
हमें चूंकि कैनबरा जाना था,जो मेलबोर्न की दिशा में ही है,लेकिन समुद्र तट पर स्थित न होकर अंदरूनी भू भाग पर स्थित है,इसलिए 'इनलेंड रुट' से ही कैनबरा जाने वाला राजमार्ग हमने चुना।
लिवरपूल सिडनी शहर का बाहरी छोर है, इसके आगे आधे घंटे की दूरी पर कैंपबैल टाउन उपनगर है। इस उपनगर में से काफी लोग सिडनी में काम काज के वास्ते आते हैं। किराया कम होने के कारण यहां निवास करना आसान है।
कैंपबैल टाउन उपनगर से आगे वास्तविक रूप से 'हाई वे' का अह्सास होता है। यहां हर पांच सौ हजार मीटर की दूरी पर गोल वृत्त से घिरा वाहन का स्पीड इंडीकेटर अवश्य नजर आता है। कैमरे से वाहन स्पीड की निगरानी रखे जाने वाले अलार्म संदेश भी नजर आते हैं।
हाई वे पर अधिकतम गति व न्यूनतम गति प्रति घंटा के निर्देश बोर्ड नजर आये।
कैंपबैल टाउन से आगे,काफी दूर तक आठ लेन हाई वे चलता रहा,आगे चल कर वह चार लेन में परिवर्तित हो गया था। 
ऐतिहासिक बैरिमा टाउन होते हुए हम सूटन फोरेस्ट क्षेत्र को पार कर निर्धारित तेज गति से आगे बढ़ते जा रहे थे। 
बायें हाथ की दिशा में 'इंजर्ड वाइल्ड लाइफ' व  
'पुलिस रडार यूज्ड इन दिस एरिया' के नोटिस बोर्ड लगे नजर आये। 
यह क्षेत्र युक्लिप्टस के जंगलों से युक्त चट्टानों को काट कर बनायी हुई चौड़ी सड़क के इर्दगिर्द ऊंचे नीचे ढालू भू दृश्यों के बाद फिर दूर तक समतल होते चले जाने वाले कुदरती नजारे का लुत्फ प्रदान कर रहा था।राजमार्ग पर जगह जगह वाहनों हेतु रिवाइव,सर्वाइव रैस्ट सेन्टर व रुकने के स्थल भी बने थे। जो हमारे यहां के आधुनिक हाईवेज पर बड़ी मुश्किल से नजर आते हैं।
बांये हाथ पर 'मौस वेल' व 'वूलंगगौंग' की ओर फटने वाले रास्ते के लिए एक्जिट का बोर्ड लगा देख कर यह भान हुआ की तटीय क्षेत्रों को जाने के कई
सुविधाजनक विकल्प प्रदान कर रक्खे हैं।


इसी राजमार्ग पर आगे चल कर एक घंटे बाद गोलबर्न नाम का ऐतिहासिक शहर आया।
इस शहर को आस्ट्रेलिया के प्रथम इनलेंड (गैरतटीय) शहर होने होने का सौभाग्य प्राप्त है। 1830-33 में शिलान्यास किये गये इस शहर का एक छोटे से अभियुक्त कैंप से शुरु होकर बड़ी खुशहाल आबादी बनने का सफर बड़ा रोचक है। 
1863 में इस कस्बे को प्रथम गैरतटीय समृद्ध शहर के नाम  से दस्तावेजों में दर्ज किया गया। यहां पर विक्टोरियन वास्तु के प्राचीन भवन,गिरिजाघर व डाकघर बना है।
मैरिनो भेड़ के ऊन उत्पादन के लिए प्रसिद्ध इस क्षेत्र की खासियत के कारण शहर के मध्य में मैरिनो
भेड़ की पाषाण मूर्ति बनी है। किसी भेड़ की विश्व भर में इतनी ऊंची यह अकेली पत्थर की प्रतिमा है।
इसको देखने के लिए खास तौर पर पर्यटक, गोलबर्न में रुकते हैं। हमने भी थोड़ी देर रुक कर मैरिनो के दर्शन किये व उसकी तस्वीर कैमरे में कैद की।
गोलबर्न से कैनबरा की दूरी भी एक घंटे की यात्रा में तय होती है। इस क्षेत्र में ऊंची नीची घाटियां कम हैं,ज्यादातर सपाट समतल रेगिस्तानी झाड़ीनुमा परिदृश्य दिखाई देते हैं।
गोलबर्न से आगे बढ़ते जाने पर मैलबोर्न वाले 'ह्यूम हाई वे' को छोड़ कर कैनबरा की तरफ जाने वाले फेडरल हाइवे की ओर मुड़ना पड़ता है। यहीं से आस्ट्रेलियाई कैपिटल टैरिटरी क्षेत्र प्रारंभ  हो जाता है। थोड़ी देर तक चलने के बाद एक बड़ी जल राशि के दर्शन हुए। इस झील के किनारे किनारे का रमणीय पथ बड़ा दर्शनीय लग रहा था। यह झील 'लेक जार्ज' के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रिटेन के तत्कालीन सम्राट प्रतिनधि जार्ज तृतीत के नाम पर इस झील का नाम रक्खा गया है।
इसी इलाके में विंडमिलों की कतारें भी नजर आई जो बच्चों को बड़ी मनभावन लग रहीं थी।
लेक जार्ज से कैनबरा शहर बहुत पास है। आधे घंटे से भी कम दूरी पर। कैनबरा के पास आने पर हम लोग उत्सुकता से पुलकित हर्षित हुए जा रहे थे। आस्ट्रेलिया के बड़े तटीय शहरों से हट कर यह गैरतटीय राजधानी क्षेत्र था। इसे ए.सी.टी (आस्ट्रेलियाई कैपिटल टैरिटरी) कहते हैं,जैसे हमारे भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र  को एन.सी.आर कहा जाता है,ठीक वैसे ही।
कैनबरा को आस्ट्रेलिया की राजधानी बनाने से पहले अनेक अन्य विकल्प प्रस्तावित हुए,'ईडन टाउन' इनमें प्रमुख था।
बाद में मैलबोर्न और सिडनी दोनों के बीच राजधानी बनाने को लेकर जबरदस्त खींचतान हुई,अन्तत: इन दोनों बड़े शहरों को राजधानी न बना कर 1908 में कैनबरा को चुन लिया गया,जो इन दोनों बड़े शहरों के लगभग मध्य में स्थित है। एक कटोरेनुमा आकार के अत्यधिक क्षेत्रफल वाले खाली भू भाग,कैनबरा को राजधानी हेतु उपयुक्त पाया गया।
कैनबरा ठंडी जलवायु वाला शहर है। यहां जाड़ों में बर्फीली हवायें चलती हैं,तथा रात्रि में यदा कदा तापमान माइनस में चला जाता है।


हम लोग साढ़े दस बजे कैनबरा पंहुच  गये थे। वहां किंग्सटन एरिया में 'होली डे होम' बुक था, लेकिन आपस में यह तय हुआ कि पहले तीन घंटे बाहर घूम लिया जाय,फिर अपराह्न में वहां जाकर विश्राम करके सायं व रात्रि में बाजार आदि चहल पहल वाली जगहों पर चले जायेंगे।
कैनबरा शहर में प्रवेश करते ही एक खास परिवर्तन यह लगा कि यहां सिडनी के पुराने ढालू छतों वाले विक्टोरियन भवनों से हट कर नये वास्तु के बहुमंजिला अपार्टमेंट वाली आधुनिक इमारतों की भरमार है।
सुंदर कतारबद्ध पेड़ों से आच्छादित विस्तृत चौड़ी सड़कें,गोलाकार चौराहे,साफ सुथरे,पैदल पथ व साइकिल ट्रैक युक्त फुटपाथों से निर्मित इलाके को देख कर ही लगने लगा था कि यहां राजधानी की जरूरतों को मद्देनजर रखते हुए सरकारी इमारतों का निर्माण किया गया है।
पार्लियामेंट हाउस,नेशनल लाइब्रेरी,म्यूजियम,वार मैमोरियल,हाई कोर्ट,आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी जैसी महत्वपूर्ण जगहें पास पास में ही पैदल दूरी पर अवस्थित होने के कारण पर्यटकों को घूमने में आसानी प्रदान करने के साथ राजधानी की गरिमा का अह्सास कराती हैं।
यह सब,एक सर्वथा नये क्षेत्र को राजधानी हेतु छांटे जाने के पश्चात प्रख्यात वास्तुविदों द्वारा टाउन प्लानिंग व निर्माण का नतीजा था। कुछ कुछ वैसे ही,जैसे हमारे यहां चंडीगढ़ और लुटियन की नई दिल्ली।
शहर के मध्य में मुख्य क्षेत्र में ऊंचे खंबों पर कतारबद्ध सभी राष्ट्रमंडल देशों के रंग-बिरंगे झंडे फहरा रहे थे। बड़ी सी इमारत के दांयें और बायें भाग में विश्व के लगभग डेड़ सौ देशों के प्रतीक बड़े मनोरम लग रहे थे।
हमने कार पार्क की और उतर कर उस नजारे का लुत्फ लिया। इंडिया का झंडा देख कर हम हर्षित हुए। 'बताओ ऐसा किस देश का झंडा है,जो आयताकार नहीं है?' साथ चल रहे मेजबान सज्जन ने मुझसे पूछा। मुझे ऐसे किसी झंडे का ध्यान नहीं आ रहा। मैने असमर्थता जाहिर की।
फिर उन्हीं झंडों में से एक की ओर इशारा करते हुए,वह बोले,वो देखिये,नेपाल का झंडा बीच से कटा हुआ है। वास्तव में नेपाल का झंडा बीच से कटा था,धार्मिक ध्वजा जैसा।
'अमेरिका,इंग्लैंड,के झंडे के प्रतीक चिह्न याद रहते हैं हमें,ऐन अपने पढ़ोसी का याद नहीं,'मुझे थोड़ा झेंप हुई।
दाहिनी ओर आने पर एक लंबी वर्तुलाकार मनोरम झील के दर्शन हुए। शहर के बीचोबीच बनी यह झील कैनबरा को अद्भुत आकर्षण प्रदान कर रही थी। इसके समानांतर किनारे बने रेस्तराओं पर पर्यटकों की चहल पहल से माहौल गुलजार था।
कैनबरा शहर के बीचोबीच स्थित यह झील वास्तव में एक कृत्रिम झील है। इसका नाम 'लेक ग्रिफिन' है।अमेरिकी वास्तुविद वाल्टर बर्ली ग्रिफिन को कैनबरा के मूल नक्सानवीस व टाउन प्लानर का श्रेय दिया जाता है,जिन्होंने 1907 में अभिकल्पित अपने नक्से में पास में अवस्थित एक नदी पर बांध बनाकर उसके पानी से शहर के केंद्र में 11 किलोमीटर लंबी तथा  लगभग सवा किलोमीटर चौड़ी वर्तुलाकार झील का डिजाइन तैयार किया था। बाद में कतिपय विवादों शंकाओं,संशोधनों की पैरवी व विश्व युद्ध आदि के कारण झील का निर्माण कार्य स्थगित हो गया।
बीसवी शताब्दी के दूसरे तीसरे दशक में पुराना पार्लियामेंट हाउस,सचिवालय भवन,प्रधान डाकघर  बन गये थे लेकिन कैनबरा शहर के आधुनिकीकरण का निर्माण रुका रहा। सन 1960 के पश्चात नयी पार्लियामेंट व सरकारी भवनों  सहित इस झील के निर्माण ने गति पकड़ी।
सन 1964 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राबर्ट मैन्जींज ने निर्णायक कदम उठा कर द्रुत गति से झील का निर्माण पूरा कराया।
इस प्रकार 1907 में वास्तुविद वाल्टर बर्कले ग्रिफिन द्वारा तैयार किये गये मूल मानचित्र में कुछ संशोधनों के साथ अन्तत: यह झील बनी। लेकिन धरातल पर साकार होकर शहर के सौन्दर्य में चार चांद लगाने में इसे पांच दशक से ज्यादा का वक्त लग गया। 
कहा जाता है कि झील का नाम प्रधानमंत्री राबर्ट मैनजींज के नाम पर रखने की कुछ अधिकारियों ने सिफारिश की,लेकिन मैंनजीज ने अपना नाम न रख कर मूल वास्तुविद ग्रिफिन के नाम से ही झील का नामकरण किया। यह एक मिसाल है, मौलिक काम करने वालों को सम्मान अर्पित करने की इच्छा की।ऐसे जेनुइन व ईमानदार राजनेता हमारे देश में चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेंगे।
बहरहाल लेक ग्रिफिन आज कैनबरा शहर की शान है। इसमें नावें,याट,कियाकिंग चलती रहती है। साथ ही फिशिंग के प्वाइन्ट भी हैं।
लेक के समानांतर विस्तृत पार्क हैं,जिनमें  कलात्मक वास्तु के आकर्षण नजर आते हैं।
उस रोज दोपहर में हमने ओल्ड पार्लियामेंट भवन देखा जो अब दर्शकों हेतु म्यूजियम की तरह खोल दिया गया है। गाइड ने बताया कि जब 1907 में यह पार्लियामेंट बनी तब 75 एम.पी.थे,अब वर्तमान में 175 सदस्य हैं जो नये पार्लियामेंट भवन में बैठते हैं। पार्लियामेंट की गोलाकार खाली पड़ी सीटों पर बैठ कर हमें भी ऐतिहासिक गौरव का अह्सास हुआ। उसके पश्चात हम लोग पास में ही स्थित नेशनल लाइब्रेरी देखने गये। यह भव्य इमारत भी दर्शनीय है। भीतर कई मंजिलों में शांत विशाल हाल की रैकों में हजारों पुस्तकों को करीने से सजाया गया है। बैठ कर पढ़ने के लिए गोल मेजें व कुर्सियां रक्खी हैं। हर खंड के पास सहायता हेतु हैल्प काउंटर व डेस्कों में तत्पर विनम्र प्रतिनिधि बैठे मिले। बहुत बुजुर्ग प्रोफेसर नुमा विद्वानों सहित युवा शोधार्थी लाइब्रेरी के शांत वातावरण में ज्ञान पिपासा शांत करते नजर आये।


 

नेशनल लाइब्रेरी आफ आस्ट्रेलिया का भवन

 


दोपहर के बाद हम लोगों ने  किंग्सटन स्थित अपने 'होली डे होम में'  विश्राम किया। 'होली डे होम' की बालकनी से भी सुरम्य झील का एक हिस्सा इमारतों के बीच से आंख-मिचौली करता झांक रहा था।
दो ढाई घंटे आराम करने के बाद फिर कैनबरा की सांध्य व नाइट लाइफ देखने निकल पड़े। पैदल दूरी पर ही स्थित झील पर बने लकड़ी के पुल पार करते ही दाहिनी ओर की दिशा में  कतारबद्ध रेस्तराओं के खुले बरामदों में पर्यटकों व स्थानीय लोगों की पार्टियों का दौर परवान चढ़ाने लगा था। ऊंची ऊंची गोलाकार कुर्सी  मेजों में बैठ कर झील की ओर मुखातिब होते हुए वाइन के गिलास हाथ में लिये युवक युवति


यों सहित बुजुर्ग ही नहीं,अति बुजुर्ग महिला पुरुषों के समवेत स्वर गुंजायमान हो रहे थे। ऐसा लग रहा था,जिंदगी की सारी जद्दोजहद और चिंताओं को दूर झटक कर ये लोग सिर्फ व सिर्फ वर्तमान क्षणों का आनंद ले रहे हैं तथा अपने पसंदीदा पकवानों के साथ बीयर,वाइन आदि पेयों का दिव्यानंद प्राप्त कर अतंरग वार्तालाप में मशगूल हैं। अकेले दुकेले कम तीन चार के ग्रुप मे बैठै,  हंसते,मुस्कराते,ठहाकेदार वार्तालाप करते लोगों की शाम,अंधेरा घिरते घिरते पूरे शबाब पर पंहुच रही थी,झील के किनारे किनारे फुटपाथ पर चलते हुए मुख्तलिफ देशों के रेस्तराओं की कतार के बीच हमें इंडियन व गुरखा नेपाली रेस्तरां नजर आये। गोरखा रेस्तरां के वेटर-मैनेजर नेपाली टोपी पहने हुए अलग से पहचान में आ रहे थे।
कैनबरा में नेपाली समुदाय के काफी लोग दिखाई दिये। यूं तो पूरे आस्ट्रेलिया में नेपाली लोग अपने देश की आबादी के अनुपात में काफी हैं।  ब्रिटेन की रायल गोरखा बटालियन के कारण भी संभवत: इस देश में इनका अप्रवासन हुआ होगा।
हमने इंडियन रेस्तरां में ठेठ उत्तर भारतीय पंजाबी स्वाद का खाना खाया। मेक्सिकन ,थाई व चायनीज श्रीलंकन फूड के रेस्तरां भी हर जगह मौजूद रहते हैं। 
खाना खा कर हम लोग यहां के लकदक,भव्य बाजार यानी बूंडा स्ट्रीट गये। सेंटर में बड़े आधुनिक फैशन शो रूम, बुटीक मंहगे होटल,रेस्तरां,बार,पब आदि हैं।
रात में होली डे होम में आकर हमने आज छूट गयी जगहों की सूची बनायी और आज की सैर के नजारों से मुग्ध होते हुए आराम से सो गये।
सबसे अच्छी बात यह लगी कि बड़ा कैपिटल शहर होते हुए भी तीन चार किलोमीटर के दायरे में ही सारे स्थल मौजूद हैं। सरकारी कार्यालय,स्मारक,बाजार माल,पर्यटक केंद्र,पार्क व लेक। इतनी पास कि पैदल चलते हुए भी आराम से घूमा जा सके।
अगले दिन प्रात: 'होली डे होम' के अपार्टमेंट की बालकनी में बैठ कर बाहर का नजारा लिया तो सामने ग्राउंड में बने पार्क में सिर पर हैट पहने दो बुजुर्ग दिखे। वे पेवमेंट के इर्द गिर्द की सफाई के साथ सूखे पेड़ पौधों की सिचाई कर रहे थे। पार्क के एक छोर को,झील के बैक वाटर से मिला कर तालाब बना दिया गया था,उसमें बतखें अन्य पक्षी व जलीय वनस्पतियां मिल कर बड़ा सुंदर दृश्य रच रहीं थी। हाथ में ग्लव्स पहन कर बुजुर्ग महिला कूड़ा करकट उठा कर उसे एक पालीथीन में भर रही थी। बुजुर्ग 'जेट' से सिचाई कर रहे थे। आधा पौन घंटा उन्होने यह स्वैच्छिक सामाजिक कार्य किया,फिर एक छोटी सी ह्वील ट्राली में पाइप,पोर्टेबल पंप आदि लेकर अपने अपार्टमेंट की ओर चले गये।
उनका यह रोज का या साप्ताहिक रुटीन होगा।जीवन की सार्थकता के ऐसे प्रेरणादायी दृश्य देखकर मन तरल हो गया। ऐसे स्वैच्छिक काम करते अन्यत्र भी यहां लोग,खास तौर पर बुजुर्ग दिखाई जाते हैं। हमारे देश में ऐसा काम करने पर लोग उपहास करने लगते हैं।
'होली डे होम' के सुविधा सम्पन्न किचन में स्वयं नाश्ता तैयार कर हम लोगों ने नाश्ता किया और भ्रमण हेतु निकल पड़े।
आज के भ्रमण हेतु,नेशनल म्यूजियम,नेशनल गैलरी,वार मैमोरियल सहित अन्य आउटडोर जगहें भी प्रस्तावित थी।
म्यूजियम वास्तव में भव्य था। आदिवासी जनजीवन की झलकियों सहित नवनिर्माण की विरासत भी संजोई थी। नेशनल गैलरी,त्रिभुजाकार
ज्यामिति वास्तु पर आधारित विस्मित करने वाली इमारत है। इसके तलों में बनी सर्पिलाकार गैलरियों में स्थानीय व विश्व भर के कलाकारों की डेड़ लाख से अधिक कलाकृतियां प्रदर्शित की गयी हैं। 
वार मैमोरियल एक पहाड़ी की तलहटी में बना है।
उसको देखने भी पर्यटक आवश्यक रुप से आते हैं।
इसमें प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध सहित शांति सेना व सभी सैनिक अभियानों में प्राण गंवाने वाले योद्धाओं के नाम अंकित है। सैन्य अभियानों के कारण हताहत हुए आम नागरिकों का भी उल्लेख कर उन्हें भी श्रद्धांजलि दी गयी है। एनजैंक (आस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड आर्मी कार्र्पस) दिवस परेड भी यहां हर साल 25 अप्रैल को आयोजित की जाती है।
एक खास बात यहां यह भी देखी कि राजधानी के अतिरिक्त छोटे छोटे शहरों व कस्बों में भी आवश्यक  रुप से वार मैमोरियल बने हैं,जो  काउन्सिल क्षेत्र के अन्तर्गत विभिन्न युद्धों में शहीद हुए स्थानीय सैनिकों की स्मृति में बने हैं। उनका रखरखाव व स्वच्छता का ध्यान काउन्सिल सहित पर्यटक स्वयं भी रखते हैं।
वार मैमोरियल के दर्शन के पश्चात माउन्ट एन्सिली पहाड़ी की चोटी तक का ड्राइव वाला लुभावना सफर तय किया। ऐसा लग रहा था जैसे हम अपने यहां उत्तराखंड की हल्की चढ़ाई वाले स्थल पर आ गये हैं। 850 मीटर की उंचाई पर स्थित इस ऊंचे 'लुक आउट' से कैनबरा शहर का विहंगम दृश्य बड़ा मनोहारी लगता है। ग्रिफिन लेक,दोनों पार्लियामेंट हाउस,वार मैमोरियल सहित सभी भवन,चौराहे,सड़कें व हरियाली 
दिखाई देती है। इस दृश्य  को देख कर ऐसा आभास होता है,जैसे वास्तुविद ग्रिफिन के बनाये नक्शे की कागजी अनुकृति साक्षात मूर्तिमान हो उठी हो। यहां से हमने शहर के विहंगम  मनोरम दृश्यों को मोबाइल कैमरे में कैद किया तथा वीडियो बनाये।
खूबसूरत माउन्ट एन्सिली की सैर के बाद हम लोग नेशनल आर्बोरिटम देखने गये। बोनसाई प्रजाति के पेड़ों सहित विविध जलवायु के वृक्षों की नर्सरी, पैदावार, संरक्षण के आश्चर्यजनक कारनामे यहां देखने को मिले। शहर के केन्द्र से छह सात किलोमीटर की दूरी पर 250 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह ढालूदार वनस्पति उद्यान एक माया लोक सा अद्भुत नजारे का आनंद प्रदान करता है। 40000 से अधिक दुर्लभ वृक्ष प्रजातियां यहां मौजूद हैं।  उद्यान की सबसे ऊंची भूमि पर बने पौली हाउस में बोनसाई व पेन्जिंग प्रजाति के वृक्षों का म्युजियम, क्यूरेटरियम,विक्रय केन्द्र व गिफ्ट शाप है। बोनसाई प्रजाति के 70 से अधिक बृक्षों का आकर्षक संग्रह चकित करता है।
इस उद्यान का सबसे आकर्षक व मनोरंजन का केन्द्र है,यहां का भव्य कैफेटोरिया। शिखर पर स्थित इस कैफेटेरिया के 'सन रूफ' से झांकती रोशनी के तले,ग्लास वाल से अंदर बैठे बैठे उद्यान का विहंगम नजारा लिया जा सकता है। हमने भी वहां बैठ कर कौफी पी व स्नेक्स लिए और काफी देर तक खूबसूरत दृश्यों का आनंद लिया। केफेटेरिया के विशाल हाल में सकून से बैठै पर्यटक, प्रकृति का आनंद लेते हुए गपशप करते प्रफुल्लित नजर आये 
हमने फिर गाड़ी में बैठ कर समूचे उद्यान का भ्रमण किया। हिमालयन सीडार (देवदार) वृक्षों का जंगल बड़ा सम्मोहक लग रहा था। लेकिन अपने उत्तराखंड के घने और ऊंचे देवदारों के सामने वे कम ऊंचाई के दोयम ही नजर आ रहे थे।
एक और अचम्भित करने वाली बात  यह लगी कि इतने बड़े भ्रमण के दौरान सरकारी इमारतों,सार्वजनिक स्थलों,सड़कों चौराहों पर हमें कहीं भी वर्दीधारी पुलिस,दरबान या गार्ड नजर नहीं आये,यह रहस्य अनसुलझा ही रहा कि कैसे इतने शांतिपूर्ण व्यवस्थित तरीके से बिना सुरक्षा के शहर का संचालन होता है,संभवत: चुपचाप कैमरों से निगरानी हो रही होगी। कहीं भी पहचान-पत्र,पासपोर्ट दिखाने या नाम पता मोबाइल नम्बर आदि दर्ज कराने को नहीं कहा गया।
उस रोज का हमारा भ्रमण का कोटा समाप्त हो गया था।
हम लोग शारीरिक रुप से थक गये थे लेकिन मानसिक रूप से परम आनंदित पुलकित थे

 अगले दिन हमें सिडनी लौट जाना था। इसलिए नाश्ते के बाद अगले दिन पूर्वाह्न में हमने कार में बैठे बैठे चक्कर लगाते हुए बार पुन: कैनबरा शहर के सिविक सेंटर मार्केट की चहल पहल देखी।

सेंट्रल प्लाजा में आस्ट्रेलिया की प्रसिद्ध चिड़िया 'मैगपाई' की बड़ी सी ऊंची मूर्ति एक प्लेटफार्म के ऊपर बनी देखी। 'बिग स्वूप' के नाम से विख्यात यह वास्तु कला पर्यटकों को आकर्षित करने तथा पक्षियों के प्रति सम्मान व प्रेम को प्रकट करने का नायाब उदाहरण लगी। मैरिनो भेड़ की मूर्ति के बाद यह पक्षी की प्रतिमा। यहां महान व्यक्तियों,नेताओं  के स्टेच्यू,पार्क चौराहों आदि में नहीं दिखे जैसे हमारे देश में बहुतायत में मिल जाते हैं।
अब हमारे भ्रमण का आखिरी मकसद बचा था,एक बार यहां के भारतीय दूतावास व अन्य दूतावासों को बाहरी बाहर देखते हुए एम्बैसी एरिया का नजारा लेने के बाद सिडनी को जाने वाले हाई को पकड़ना ताकि अपराह्न में हम आराम से सिडनी स्थित निवास में पहुंच जायें।
बिना जाम की खूब खुली चौड़ी सड़कों में कार  चलाते हुए हम यारामूला क्षेत्र के 'डिकिन' में स्थित दूतावास वाले इलाके में पंहुच गये। यह शांत भव्य इलाका विभिन्न देशों के स्थानीय वास्तु प्रतीकों से सुसज्जित उच्चायुक्त भवनों की खूबी के लिए प्रसिद्ध है। भारतीय दूतावास, यू.एस.ए. दूतावास के बगल में था,लोग हम इस बात से हर्षित हुए। 
चीनी दूतावास तथा न्यू पापुआ गिनी के दूतावास अपनी विशिष्ट वास्तु छटा से सबसे ज्यादा आकर्षित कर रहे थे। अपने देश सहित,पास पास सटे लगभग पचास से अधिक देशों के दूतावास भवनों की छवि को निहार कर हम अपने गंतव्य की ओर चल निकले। राजधानी से बाहर निकलते ही हमने सिडनी की ओर जाने वाली सड़क पकड़ ली।
लेक जार्ज झील के तट से होकर लौटने के पश्चात गोलबर्न शहर के मध्य से गुजरते हुए,कैनबरा भ्रमण की संचित यादों से सम्मोहित,प्रफुल्लित हम चार घंटे का सफर तय कर शाम को सिडनी के बाखम हिल स्थित अपने निवास पर पंहुच गये।