Sunday, March 29, 2026

उपन्यास अंश: मरिचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी

 


 (आजादी के साथ विभाजन की त्रासदी पर  हिंदी में लिखे गये कथा साहित्य में बंगाल के ऊपर बहुत कम लिखा गया है। पिछली सदी के आठवें दशक के उत्तरार्ध में सुंदरबन के द्वीप मरिचझाँपि में हुई घटनाओं को केन्द्र में रखकर इधर दो महत्वपूर्ण उपन्यास सामने आये हैं।  विजय गौड़ के उपन्यास ‘आलोकुठी’  के बाद नीलकमल का उपन्यास ‘मरिचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी’ गत वर्ष ही प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास किसी बड़े प्रकाशन से प्रकाशित नहीं है। इसके वितरण के लिये किसी ऑन-लाइन  प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं किया  गया है।प्रकाशन के  एक वर्ष बाद  पहले  संस्करण के बिक जाने की खबर यह बात भी साबित करती है कि अच्छी किताबें  बिना शोर-शराबे के भी पाठकों तक पहुँच जाती हैं.। इस उपन्यास के कुछ अंश साभार प्रकाशित कर रहे हैं)



 (एक)

देवताओं की नींद वहाँ ज़रूर टूट गई है

दिन चढ़ रहा है। कोरानखाली के साँवले जल में मध्य आकाश का सूर्य अपनी स्वर्ण किरणें बिखेरता झिलमिल कर रहा है। कुमिरमारी के बुधवार बाज़ार वाले घाट की सीढ़ियों पर बैठा अमलेंदु उस पार के निर्जन द्वीप को निहार रहा है। मरिचझाँपि द्वीप, एक जनशून्य भूखण्ड जिसके एक छोर पर बशीरहाट फॉरेस्ट रेंज का निर्माणाधीन बीट ऑफिस ऐन बागना फॉरेस्ट ऑफिस के विपरीत है। देखने में कहीं से कुछ भी खास नहीं।

इसपार मध्यवय का एक आदमी जाल फेंकने की तैयारी कर रहा है। अभी वह अपने जाल को सुलझा रहा है। देखकर ऐसा लगता है कि जाल का वज़न कम नहीं है। यह मछलियाँ पकड़ने वाला जाल है। पेशेवर मछुआरों वाला जाल। आदमी ने कमर से लुंगी बाँधी हुई है। दोनों टांगों के बीच से लुंगी के छोर को पीछे की तरफ खींचकर उसने कमर के पीछे खोंस रखा है। जाल सुलझ जाने के बाद उसका कुछ भार कंधे पर लेते हुए और दोनों हाथों का इस्तेमाल करते हुए वह उसे घुमाकर नदी में फेंकता है। जाल हवा में लहराती हुई खुलती है और छल्ला बनाती हुई नदी की सतह पर गिरती है। हवा में जिस समय जाल लहराकर खुलती है उस समय दृश्य ऐसा उपस्थित होता है जैसे कोई अजाना फूल खिल उठा हो। जाल का फेंकना और उसका खुलना एक छंद में और लय में घटित होता है। जाल के निचले वृत्त में धातु के गुटके लगे हैं जिससे जाल क्रमशः जल में नीचे गहरे उतरने लगती है। अब आदमी धीरे धीरे जाल को समेट रहा है। कैसा अद्भुत कौशल है उसके जाल समेटने में। जाल समेटते हुए वह किसी जादूगर सा दिखता है। जाल के साथ अब वह थोड़ी सूखी जगह पर आ गया है और इस बात की तसदीक कर ले रहा है कि जाल में कोई मछली फँसी या नहीं। पहली बार में उसका प्रयास व्यर्थ हो गया है। लेकिन उसके उत्साह में तो कोई कमी नहीं है। वह नदी के उस हिस्से में है जहाँ से भाटा के बाद पानी उतर चुका है। यह दलदली ज़मीन है। उसके पाँव गहरे धँस रहे हैं। वह अपनी जगह बदल कर थोड़ा आगे जाता है। नई जगह से एक बार फिर वह उसी ढंग से जाल फेंकता है। उसी ढंग से इसबार भी जाल समेटता है। इस बार उसे कुछ मछलियाँ मिली हैं। बहुत ज़्यादा नहीं हैं मछलियाँ लेकिन उसके चेहरे पर ज़रा भी संताप नहीं है। असीम धैर्य चाहिए मछलियाँ पकड़ने के लिए। वह उसी उत्साह से अपने काम में एकबार फिर जुट जाता है। अमलेंदु उसे बड़े ध्यान से देख रहा है। उस आदमी ने मछलियों के लिए एक बड़ी सी देगची अपने साथ ली हुई है। उस बड़ी सी देगची में वह मछलियों को जिला कर रखेगा। खाने की ज़रूरत से ज़्यादा जो भी मछली उसे मिलेगी उसे वह बाज़ार में दे देगा। यह उसका रोज़ का संघर्ष है।

उसपार जो निर्जन द्वीप है, जिसे अमलेंदु बड़े ध्यान से निहार रहा है, इतिहास के पन्नों में वह देशच्युत शरणार्थियों के कभी न भुलाये जाने वाले संघर्ष की गाथा अपने भीतर छुपाये हुए है। कुल तेरह महीने का प्रवास रहा यहाँ छिन्नमूल अभागों का। मरिचझाँपि में फिर से जंगल उग आये हैं। लेकिन मरिचझाँपि के जंगलों में तेरह महीने अपना पसीना और खून बहाने वाले शरणार्थियों की आवाज़ें यहीं कहीं बिखरी हुई हैं। आज भी जब पूर्णिमा का चाँद आकाश पर खिलता है कुमिरमारी के बुजुर्गों के कानों में मरिचझाँपि के शरणार्थियों की चीखें सुनाई देती हैं। शिशुओं और स्त्रियों का करुण रुदन सुनाई देता है।

कथा बीसवीं सदी के आठवें दशक में घटित होती है। बीसवीं सदी के आठवें दशक का उत्तरार्द्ध। सन अठहत्तर का वैशाख मास है। दण्डकारण्य से हासनाबाद के रास्ते शरणार्थियों का मरिचझाँपि अभियान आरंभ हो गया है। वे पहले कुमिरमारी द्वीप आ पहुँचते हैं और वहाँ से कोरानखाली नदी पार करके मरिचझाँपि द्वीप पर कदम रखते हैं। वही कोरानखाली, जो मरिचझाँपि को छूकर बहती है। समवेत उलूध्वनि का स्वर आकाश में दूर तक गूँज रहा है। सातवाँ आसमान अगर कोई होता होगा तो स्त्रियों के कोमल कंठ से पृथ्वी के सबसे मधुर संगीत के उठान का यह स्वर वहाँ पहुँच रहा है और देवताओं की नींद वहाँ ज़रूर टूट गई है। सामने कोई दो सौ गज चैड़ी यह नदी है जिसे कोरानखाली कहते हैं। जैसे कोई सेना चढ़ाई के लिए तैयार खड़ी है और उसे इस नदी को पार करना है। यह किसी राम की सेना नहीं फिर भी चुनौती तो इसकी भी समुद्र पार करने जितनी ही है। इस सेना में हनुमान की कमी नहीं है, कमी है तो उसकी शक्ति के बारे में याद दिलाने वाले जाम्बवंत की जो इस कथा से कहीं फरार है। शंख बज रहे हैं। उलूध्वनि तीव्र से तीव्रतर हो रहा है। उसपार कोई सेना नहीं जिसपर विजय पाने की चुनौती आज सामने है। बल्कि सामने एक निर्जन वन प्रदेश है जहाँ सृष्टि के आदिम युग से लेकर आजतक किसी मानव के पाँव नहीं पड़े। कई हज़ार परिवार इस वन्य भूमि को अपना घर बनाने के इरादे से आज यहाँ जान की बाजी खेलने के लिए आ खड़े हुए हैं।

किराए पर नौका मिल गई है। पहला दल उस पार उतर रहा है। आह, यह कैसा ऐतिहासिक क्षण है। ईश्वर के बागान में आदम और हव्वा की संतानें पैर रख रही हैं। वे कृतज्ञ हैं इस माटी के और अपने कृतज्ञता ज्ञापन में कहीं से भी कृपण नहीं। वे नदीतट की माटी को माथे से लगा रहे हैं। एक अनिर्वचनीय सुख इस समय आँखों में नमी बनकर उन्हें सजल किये देता है। रोम रोम इनकी देह का इस समय कितना पुलकित है इसे सिर्फ वे ही बता सकते हैं। इस समय सूर्य अभी ऊपर चढ़ ही रहा है। आलोक से पृथ्वी का कण कण जगमग है। दूसरा दल इसी तरह नदी पार करता है और फिर तीसरा दल। दोपहर होने को आती है। जैसे कोई उत्सवलीला घटित हो रही है आँखों के सामने। कुमिरमारी के नागरिक इस उत्सवलीला के साक्षी बन रहे हैं।

इस पार जंगल है। कल तक बाघ, भालू, हिरण और न जाने कितने वन्य प्राणी इसमें विचरण करते थे। न जाने कितने प्रकार के पक्षियों का कलरव यहाँ गुंजरित होता रहता था। जिस नदीतट पर दोपहर की धूप सेंकने कभी घड़ियाल और मगरमच्छ आते थे वहाँ हमेशा हमेशा के लिए घर बाँधने के लिए असंख्य उद्बास्तुजन आये हैं। आज इस निर्जन प्रदेश में शिशु की हँसी की खिलखिल है। पाजेब की रुनझुन है, चूड़ियों की खनखन है यहाँ। यहाँ पुरूषों के कंठ से फूटते लोकगीत की स्वरलहरी है। आज प्रकृति का मातृरूप इतनी संततियों के आगमन से पुलकित है। नदी की लहरों में आने वाला बल आज पहले से ज्यादा है। यह वैशाख की एक चढ़ती हुई दोपहर है। दण्डकारण्य का दुख पीछे, बहुत पीछे छूट गया है। आज एक नई बस्ती का जन्म हो रहा है।

कहाँ से शुरू करें, यह एक बड़ा प्रश्न होता है जब आदमी को एक जंगल में उतार दिया जाये और कहा जाये कि अब उसे बाकी का जीवन यहीं बिताना है। यह सवाल तब दो चार दिन के साहसिक पर्यटन अभियान से भिन्न जीवन की एक बड़ी लड़ाई बन जाता है। समझदारी तो इसी में है कि सूर्यास्त से पूर्व कम से कम इतनी ज़मीन साफ कर ली जाए कि मानुषजन रात्रि विश्राम कर सकें। इसलिए तय होता है कि बनबीवी को प्रणाम करते हुए जंगल कटाई का काम सबसे पहले शुरू किया जाए। द्वीप के उत्तर दिशा में एक तरफ से काम शुरू होता है। दाँव, कुल्हाड़ी, साबल आदि लोहे के हथियार निकाले जा रहे हैं। शरीर से मज़बूत पुरुषों का एक दल इस काम में तैनात कर दिया जाता है। एक दल कटे हुए डाल, लकड़ी वगैरह को एक तरफ हटा रहा है। स्त्रियों का दल ज़मीन की सतह को समतल और साफ करने में लगाया गया है। एक दूसरा दल भोजन और पानी की व्यवस्था में लगा है। पहली बार इस भूमि पर आग जलाई जा रही है। यह पवित्र आग है जिसपर अन्न सींझ रहे हैं। धुआँ उठ रहा है। भाप निकल रही है। हाँड़ी में भात के खदबदाने का संगीत आज देवलोक के वाद्यों से होड़ ले रहा है।

कुमिरमारी, बुधवार बाज़ार के विपरीत मरिचझाँपि नदीतट पर जहाँ से शरणार्थी दल का प्रवेश हुआ है उसे अस्थायी घाट के रूप में तैयार किया जा रहा है। जगह को इस तरह से समतल किया जा रहा है कि नौका से उतर कर नदीतट पर जाने में दिक्कत न हो। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक है कि आने वालों में महिलाओं और वृद्धजन की अच्छी संख्या है। कई स्त्रियों की गोद में शिशु हैं जिनके साथ ही इन्हें नौका से उतरकर ऊपर चढ़ना है। समिति के पास मरिचझाँपि के भविष्य की इस कॉलोनी की योजनाएँ हैं और बहुत सारा काम कागज़ पर भी तैयार है। कहाँ समिति का कार्यालय होगा, कहाँ बनबीवी का थान (स्थान) होगा, कहाँ बाज़ार बनेगा, किस जगह पर स्कूल होगा, पोखर किस जगह पर काटा जाएगा, भेरी किस ओर बनाई जायेगी, घर किस माप के और किस क्रम में होंगे, घरों के बीच आने जाने का मार्ग कितना चैड़ा रहेगा, नौका निर्माण और बेकरी यूनिट के लिए जगह किस तरफ दी जाएगी इन सभी बातों की एक परिकल्पना समिति के पास तैयार है और उसी अनुरूप काम भी किया जा रहा है। काम की मज़दूरी किसी को नहीं दी जा रही है क्योंकि यह सबका साझा उपक्रम है।

वर्षा में अभी तीन चार महीने का समय है। उससे पहले रहने लायक तैयारी यदि न कर ली गई तो वर्षा के दिनों में रहना बहुत ही कष्टकर हो जाएगा इस बात का एहसास सभी को है। इसलिए काम में चपलता और तत्परता स्वतःस्फूर्त दिखाई देती है। आशा और आकांक्षा ने तात्कालिक दुखों को वैसे ही ढक लिया है जैसे आषाढ़ का मेघ सूर्य को ढक लेता है। हर तरफ एक अदम्य उत्साह है। भूख, प्यास, थकान, रोग-शोक सब अभी गौण हो गए हैं। सबसे ऊपर है बचने और बचाने का संघर्ष।

पहले दिन का सूर्य डूब गया। यह पहली रात है मरिचझाँपि की धरती पर। दिन भर कठोर परिश्रम के बाद देह पर वश नहीं रहा है। छोटे छोटे दल में परिवार के साथ विश्राम के लिए ज़मीन ही शय्या है। छत के नाम पर खुला आकाश है। पाश्र्व में है नदी की कलकल। तीन तरफ से नदियों से घिरे भूखण्ड के इस छोर के भीतर क्या ज़रा भी सिहरन नहीं हो रही होगी इतनी पीठों का स्पर्श पाकर ? कुछ लोगों को रात भर जागकर पहरा देना है। कहीं कहीं आग जल रही है जिससे कि वन्य पशु नज़दीक न आने पायें। समिति के नेताओं की आँखों में आज नींद नहीं है।

-एक अजाना भविष्य का पीछा करते हुए अंततः इतने मानुष आ गये (गहरी साँस छोड़ते हुए)।

-सच में सबकुछ एक स्वप्न के जैसा लगता है। कितनी आशा है सबके मन में (चेहरे पर सुख और संतोष की छाया स्पष्ट है)।

इनके संवादों में भविष्य की चिंता है और ढेरों आशंकाएँ भी हैं। बातचीत चल रही है। कहने सुनने का क्रम आगे बढ़ता है।

-सच कहता हूँ, दण्डकारण्य में कोई सुखी नहीं रह सकता था। वह भूमि कितनी अलग है। यहाँ कितनी शांति है। कैसी शीतलता है यहाँ की हवा में। मुझे भूखा रहना पड़े तब भी यहाँ से कहीं जाने का मन नहीं करेगा।

-यह तो सच है। नदी की गोद के लिए प्राण छटपट करता है हमारा (दृढ़ता है बात में, बोलने वाले के जबड़े सख्त हो जाते हैं)।

-नदी का कलकल स्वर सुन रहे हो, कान तरस गये थे। कितना

मधुर, कानों में जैसे मधु घुल रहा है। आहा, हृदय को कितनी ठंडक पहुँच रही है। तृप्ति का यह सुख अनिर्वचनीय है।

-कष्ट सहकर भी इस भूमि को स्वर्ग बनाना है। खून पसीना एक कर देंगे इसके लिए (बीड़ी सुलगाता है। दूसरे साथी को भी देता है। दोनों बीड़ी पीते हैं और नदी के किनारे टहलने लगते हैंै)। बच्चे के रोने की आवाज़ आती है। एक स्त्री उसे लोरी गाकर चुप कराने की कोशिश कर रही है। एक वृद्ध के खाँसने की आवाज़ आ रही है दूसरी ओर से। किसी को भरपेट खाना नहीं मिला है। कुछ तो खाली पेट पानी पीकर सो रहे हैं। उसपार बुधवार बाज़ार के पास एक झोपड़ी से क्षीण सी रोशनी आ रही है। शायद कोई जाग रहा है। उस पार इस जगह कुछ आदिवासी परिवार रहते हैं।

-कितने दिन में जंगल सफाई का काम हो जाने की आशा है ?

-मेरा मन कहता है एक महीना का समय लग जाएगा। वैसे उत्साह यदि ऐसा ही रहा तो कौन जानता है, बीस दिन में भी हो सकता है।

-उत्साह तो किसी भी तरह से कम नहीं था आज। उत्साह देते रहना होगा। कल कुछ राशन का इंतजाम करना होगा किसी भी प्रकार से। पेट में अन्न नहीं होगा तो उत्साह के जोर पर कहाँ तक शरीर चलेगा।

-काठ बेचकर कुछ टाका-पैसा का बंदोबस्त नहीं हो जाएगा ?

-काठ बाज़ार तक कैसे जाएगा, सब इतना आसान कहाँ है ? उसके लिए अपनी नौका चाहिए। अभी तो एक भी नौका नहीं है अपने पास। कुमिरमारी से सहायता मिल रही है अभी। जल्दी ही अपना कारखाना आरंभ करना होगा हमको।

-आज कितने परिवार हैं मरिचझाँपि में, कुछ अंदाज़ा है ?

-सौ से ऊपर परिवार हैं। अभी बहुत से परिवार उस पार कुमिरमारी में हैं जो आज आ नहीं पाये। बहुत से परिवार अभी रास्ते में हैं जो धीरे धीरे आयेंगे। हज़ार परिवार तो दंडक से साथ ही निकले थे, सभी आयेंगे आगे पीछे।

-कितना जम जमाट हो जायेगा जब सब आ जायेंगे।

-आज एक खाता में सबका नाम धाम लिखना शुरू हुआ है। कल से तुम खाता का दायित्व देखो। मैं एकबार पंचायत ऑफिस जाऊँगा। उन लोगों से सहायता की आशा है।

बातों में रात बीत रही है। नींद नाम की चिड़िया आज न जाने किस जंगल में गुम है। भोर होने को है। सारे लोग सो रहे हैं थोड़ी सी दूरी पर। दो जोड़ी आँखें इस भोर की प्रतीक्षा कितने वर्षों से करती रही हैं। आज वह भोर आई है। आकाश लाल है। धीरे धीरे उजाला बढ़ता है। रात की काली छाया पराजित योद्धा सी भागने की जल्दी में है। पक्षियों की डाक कानों को कितने दिन बाद सुनाई दे रही है। नदी का कलकल छलछल शब्द संगीत सा बजता है। क्या यही स्वाधीनता है ? क्या यह जो हृदय को इतना अच्छा लगता है वह स्वाधीनता का भाव है ? दण्डकारण्य के जंगल में यह सुख क्यों नहीं अनुभव हुआ कभी ? यह मरिचझाँपि की पहली सुबह है।

अलग अलग मार्ग से परिवारों के आने का क्रम इसी भाँति जारी है। यह क्रम अगले कई दिनों तक, कई सप्ताह तक चलता है। हज़ारों परिवार मरिचझाँपि पर अपने पैरों की छाप छोड़ रहे हैं। हज़ार बाहों वाली कोई शक्ति जैसे काम में जुट गई है। जंगल साफ हो रहे हैं। रास्ते तैयार हो रहे हैं। ज़मीन समतल की जा रही है। समिति के कार्यकर्ता दिन भर सबके हालचाल ले रहे हैं। खाता में सबके नाम धाम दर्ज हो रहे हैं। कितने स्त्री पुरुष, कितने शिशु, कितने वृद्ध सबकी गणना की जा रही है। समिति का दायित्व बढ़ता जा रहा है।

सबसे पहले बनबीवी का थान (स्थान) तैयार किया गया है। समिति का दफ्तर भी एक तरफ जैसे तैसे खड़ा हो गया है। कठिन संघर्ष का पहला महीना जैसे पंख लगा कर उड़ गया। बादल समिति से बार बार आग्रह कर रहा है कि स्कूल का काम जितना शीघ्र हो सके आरंभ कर देना चाहिए। बीस बाईस साल का उत्साही युवक बादल स्कूल के लिए कुर्सी, टेबल, बेंच आदि बनवाने में खुद नेतृत्व दे रहा है। उसने तो स्कूल का नाम भी सोच रखा है। समिति का अनुमोदन मिल जाए तो स्कूल का काम आरंभ किया जा सकता है। इस बीच वह घूम घूम कर लोगों से चंदा इकट्ठा करता रहा है। चार आना, आठ आना, रुपए दो रुपए भी जहाँ से मिले उसने हाथ फैला कर लिया है। बच्चों के लिए कुछ प्रारम्भिक शिक्षा की पुस्तकें खरीदनी होंगी।


(अगली पोस्ट में जारी)

Wednesday, March 25, 2026

य़ुद्ध : दिनेश चन्द्र जोशी की कविताएं

   

 

 


( दिनेश चन्द्र जोशी उन विरल लेखकों में हैं जिन्होंने एक साथ बहुत सारी विधाओं को साधा है -  कहानी, कविता, निबन्ध,रिपोर्ताज , संस्मरण और व्यंग्य - सभी में उनकी कलम एक जैसी रवानी के साथ चली है.  कविताओं में विशेष रूप से वे अपने समय  की चिन्ताओं को स्वर देते रहे हैं. प्रस्तुत हैं  उनकी ताजा कविताएँ  )

 
               (एक)

 हथियारों के जखीरे 
तैयार हैं करतब दिखाने को
बारूद का विस्फोटक
रसायन क्रियाशील होने को बेताब है
उनके निर्माता गदगद हैं
सौदागर गौरवान्वित 
राष्ट्राध्यक्ष पगलाये हैं 
युद्धोन्माद से।
  


         (दो)

उन्नत होती बहुमंजिला इमारतें
आधुनिक शहर लकदक बाजार 
शानो-शौकत के हजार साधनों
से चिढ़ते हैं हथियार 
वे घात लगाकर बैठे रहते हैं
किसी विक्षिप्त तानाशाह का
आदेश जारी हो और निकल पड़ें
विध्वंस को
लाशों के ढेर लगा दें
शहरों को कर दें नेस्तनाबूद, 
आग,राख,कालिख,धुआं धुआं।
         

 

        (तीन)

हो सभी मुल्कों में अपनी 
मर्जी की सरकार
उनके खनिज संसाधनों 
पर बना रहे अपना अधिकार 
कठपुतली की तरह नाचें 
हमारे इशारों पर
बार-बार 
युद्ध की जड़ है फकत
ताकतवर मुल्क के 
सनकी शासकों का 
अत्याचारी अहंकार। 
  


       (चार)

युद्ध के मैदान में
झुकता नहीं कोई 
हार मानने  को 
होता नहीं तैयार
हार को स्वीकार न कर
मर मिटने की जिद को 
महिमामंडित करता है
हथियारों का कारोबार। 
   

       (पांच)

तबाही के दृश्यों से भी उत्पन्न
होती है हलचल,उत्सुकता,
सनसनी,उत्तेजना,जोश
संहार की दमित आकांक्षा
मनोरंजन व्यवसाय के
मुनाफे की प्रेरणा पुंज है
सटीक निशाने पर प्रहार 
करती मिसाइलों 
के दृश्यों से चकित होते 
दर्शक,चाहते हैं,चलता रहे ये तांडव
हमारे उबाऊ नीरस जीवन का 
कुछ समय ऐसे ही कटे 
हिंसा के रोमांच से।
        


       (छह)

सबसे खतरनाक महाविनाशक गुप्त
शस्त्रागारों के तहखाने खोल दिये गये हैं
टूट रहे जालों से मकड़ियां भाग रही
हैं,चीटियों की कतार बेचैन है,
बांबियों से निकल कर भाग रहे हैं,
कृमि,सरीसृप।
खतरनाक शस्त्रों को अपने रहवास से 
बाधित किये हुए कीट पतिंगो को हो 
गया है अपसगुन का पूर्वाभास 
मानव सभ्यता के अंत का समय 
आ चुका है निकट।
             

     


Wednesday, March 18, 2026

कार्टून से कौन डरता है -अरविंद शेखर

 

  


(अरविंद शेखर ने पत्रकारिता की शुरुआत फ्रीलांस जनपक्षधर कार्टूनिस्ट व पत्रकार के रूप में की। बीते ढाई दशक वह अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा में विभिन्न पदों पर रहे हैं। खुद को मूल रूप से कार्टूनिस्ट मानने वाले अरविंद शेखर ने कुछ अरसा हिमाचल टाइम्स, बद्री विशाल,  युगवाणी को भी सहयोग दिया। हालांकि वह अधिकांश वक्त रिपोर्टिंग में व्यस्त रहे हैं मगर बीच-बीच में कार्टून के जरिए राजनीतिक-सामाजिक विद्रूपताओं पर निशाना भी साधते रहे हैं )

 
         कुछ साल हुए, एक निजी टीवी चैनल ने अपने कार्टूनिस्ट मंजुल को नौकरी से हटा दिया। मंजुल ने कोरोना की दूसरी लहर में केंद्र सरकार की नाकामी पर ऐसे तीखे कार्टून बनाए कि उनके कार्टूनों से खफा केंद्र सरकार ने उनके सोशल मीडिया प्रोफाइल को ही देश के कानूनों के खिलाफ बताते हुए उन पर कार्रवाई के लिए ट्विटर को पत्र लिखा । हैरत इस बात की है कि सरकार ने यह नहीं बताया कि मंजुल का कौन सा कार्टून देश के कानून के खिलाफ है। ट्विटर ने मंजुल को नोटिस भेजा मगर किया कुछ नहीं। पर चैनल ने मंजुल को नौकरी से ही हटा दिया। हाल में सुप्रीम कोर्ट के वकील और जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण द्वारा बैंकों की सरकारी लूट पर सतीश आचार्य का कार्टून ट्विटर पर साझा करना केंद्र सरकार को इतना नागवार गुजरा कि उसने ट्विटर पर दबाल डाल कर उन्हें नोटिस भिजवा दिया।

ये हमारे समय के ही कार्टून होते जाने की ताजा मिसाल हैं।

देश में कार्टून से खौफ खाने वाले सत्ताधारी बीते कुछ दशकों में बहुत बढ़ गए हैं। पर पहले भी ऐसे सत्ताधारियों की कमी नहीं रही है। हालांकि तब वे उंगलियों पर गिने जाने लायक होते थे। अटल सरकार के समय 1999 में आउटलुक के कार्टूनिस्ट इरफान हुसैन की अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी। वह भी तीखे राजनीतिक कार्टून बनाते थे। उन्हें राजनीतिक लोगो से धमकियां भी मिलीं थीं। कार्टूनिस्ट अपनी तरह से इतिहास को दर्ज करता है और इतिहास में खलनायक के रूप मे दर्ज हो जाने के डर से सत्ता पर बैठे छोटे दिल के नेता उसकी कूची को तोड़ देना चाहते हैं। हालांकि इसके पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे अपवाद भी हैं। कार्टूनिस्ट शंकर ने जब पंडित नेहरू को गधे के रूप मे दर्शाया तो पंडित नेहरू ने उन्हें फोन कर कहा-“क्या आप एक गधे के साथ शाम की चाय पीना पसंद करेंगे।” शंकर वहां गए। चाय पी और हल्के माहौल में खूब गप-शप हुई। शंकर की पत्रिका शंकर्स वीकली के लोकार्पण के मौके पर पंडित नेहरू ने उनसे कहा था –“मुझे भी अपने निशाने पर रखना शंकर।” क्या आप आजकल के किसी नेता से ऐसी उम्मीद कर सकते हैं।



कार्टून से तो शायद अंग्रेज भी इतना नहीं डरते थे जितना कि आज के काले अंग्रेज। शंकर ने कई वायसरायों पर भी कार्टून बनाए। उन्हें हिंदुस्तान टाइम्स में नौकरी शुरू किए चार महीने ही हुए थे कि उनका उस समय के वायसरॉय लॉर्ड विलिंगटन पर बनाया एक कार्टून पहले पेज पर प्रकाशित हुआ। शाम को वायसरॉय का बुलावा आ गया। शंकर घबरा गए। सारी रात उन्हें नींद नहीं आई। अगले दिन सुबह जब शंकर उनसे मिलने पहुंचे तो वायसरॉय ने उन्हें गले लगा लिया। उनके साथ चाय पीते हुए कहा- “आई एन्जॉय योर कार्टून, माय ब्वॉय ।”

शंकर ने लॉर्ड लिनलिथगो का भी एक कार्टून बनाया था जिसमें उन्हें श्मशान में शव पर खड़ी देवी भद्रकाली के रूप में दिखाया था। शंकर को भी बाद में लगा कि उन्हें यह कार्टून नहीं बनाना चाहिए था। अगले दिन 11 बजे वायसरॉय के मिलिट्री सेक्रेटरी का फोन आ गया। वायसरॉन ने उन्हें बुलाया था। शंकर ने समझा कि उनके करियर का बस अंत हो गया। डरे- सहमे हुए शंकर वायसरॉय के पास पहुंचे। उम्मीद थी झाड़ पड़ेगी, धमकी मिलेगी। पर मुस्कराते हुए लॉर्ड लिनलिथगो ने उनसे कहा- “शंकर माय ब्वॉय यू हैव ड्रॉन ए वंडरफुल कार्टून, आई वांट यू टू सेंड मी द ऑरिजनरल इमिडिएटली।” आजादी से पहले द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने वायसराय कौंसिल के सदस्य सर मोहम्मद उस्मान पर एक कार्टून बनाया। कार्टून में एक बहुत बड़ा सा गुब्बारा गवनर्मेंट हाउस के ऊपर रखा हुआ था। कार्टून के नीचे लिखा था- भारत सुरक्षित है। हम दिल्ली में सुरक्षित हैं, हमारे पास समुचित रक्षा का प्रबंध है। कार्टून देख गुस्से में पागल उस्मान वायसराय के पास भागे-भागे गए और चिल्ला कर बोले-शंकर को कैद कर लेना चाहिए। इसी तरह वायसराय की एक्जीक्यूयिव कौंसिल के सदस्य ज्योति स्वरूप श्रीवास्तव भी शंकर से खफा होकर उन पर कार्रवाई कराना चाहते थे पर वायसरॉय ने कोई कार्रवाई नहीं की। हिंदुस्तान टाइम्स में छपने वाले इन तीखे कार्टूनों के कारण शंकर को दिल्ली का शैतान कहा जाता था।

भारत में राजनैतिक कार्टून बनाने की परंपरा 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के काफी समय बाद शुरू हुई। बीसवीं सदी के पहले दशक में मुबंई के हिंदी पंच के नवरोज जी के अलावा एक और कार्टूनिस्ट एचए तलचेरकर थे जिन्होंने लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में कई प्रमुख व्यक्तियों के कैरीकैचर और कार्टून बनाकर काफी मकबूलियत पाई थी। पहले विश्वयुद्ध से पहले एमए शर्मा शर्माज पोर्टफोलियो ऑफ ड्राइंग नाम से हास्य व्यंग्य चित्रों की पत्रिका निकालते थे। मॉन्टेग्यू चेम्स फोर्ड सुधारों पर शर्मा के कार्टूनों ने ऐसा तहलका मचाया कि रवींद्र नाथ टैगोर ने उन्हें बधाई देते हुए लिखा-“आपने जो विषय चुने हैं वे बड़े वैविध्यपूर्ण और दिलचस्प हैं।”

सत्तर के दशक में जब देश में कांग्रेस का निष्कंटक राज था तब सुधीर दर ने कांग्रेसी दिग्गज विद्याचरण शुक्ला पर एक तीखा कार्टून बनाया तो उन्हें फोन पर धमकी दी गई पर बात आगे नहीं बढ़ी।

अस्सी के दशक में यानी 29 मार्च 1987 को तमिल पत्रिका आनंद विगलन में एक कार्टून छपा। इस कार्टून में एक व्यक्ति दो नेताओं की ओर इशारा करते हुए कह रहा है-वो जो जेबकतरा सा दिखता है, विधायक है और जो चोर सा दिखता है मंत्री है। इस कार्टून को लेकर तमिलनाडु विधानसभा में ही नहीं देश भर में बवाल हुआ। मामला संसद तक पहुंचा। कार्टूनिस्ट पर विधायिका का अपमान करने का इलजाम लगाया गया। एक तरफ पूरी प्रेस थी तो दूसरी तरफ संसदीय संस्थाएं। बाद में कुछ अक्लमंद नेताओं के दखल के बाद मामला शांत हुआ।
दुनिया भर में सच दिखाने की कीमत कार्टूनिस्टों ने देश निकाला और अपनी जान देकर चुकाई है।
ब्रिटिश कलाकार 'विलियम-होगार्थ' (1697-1764) को यूरोप में सामान्यतः पहला व्यंग्य-चित्रकार माना जाता है। ब्रिटेन में होगार्थ ने ही व्यक्तियों के कैरीकेचर से आगे बढ़कर राजनीति को चित्रित करना शुरू किया। जबकि पहले कार्टून के नाम पर केवल व्यक्तियों के विरूपित चित्र बनाए जाते थे, जो इटली में शुरू हुए थे। इस तरह होगार्थ ही वह पहला ज्ञात कार्टूनिस्ट था जिसने कार्टून को राजनैतिक रंग दिया था।

दरअसल, व्यंग्य चित्र कला अपने मूल में ही प्रतिरोध की संस्कृति को समोए हुए है। पंद्रहवीं सदी में जब यूरोप कैथोलिक चर्च की जकड़न में फँसा था। राजनीति धार्मिक कठमुल्लाओं की दासी थी। समाज की कोई भी गतिविधि बिना चर्च की अनुमति के सम्पन्न नहीं हो सकती थी। इसी वक्त में यूरोप में चर्च ने सम्पत्तिशाली वर्ग को धन के बदले पापमोचन पत्र बेचकर पापमुक्त करना शुरू कर दिया था, यहाँ तक कि लोगों को ऊँचे दामों पर स्वर्ग का टिकट भी बेचना शुरू कर दिया था। तब जर्मनी में पाप मोचन पत्रों की बिक्री के खिलाफ पादरी मार्टिन लूथर के आंदोलन की खबर चार हफ्ते में ही सारे ईसाई जगत में फैल गई, जर्मनी के पीछे-पीछे दूसरे यूरोपीय देशों में भी धर्मसुधार आंदोलन शुरू हो गया। सभी जगह कैथोलिक चर्च का प्रभाव घटने लगा। लोग कैथोलिक पादरियों और धर्माधिकारियों की खिल्ली उड़ाने लगे। पोप और धर्माधिकारियों को लेकर व्यंग्यचित्र बनने और सामने आने लगे। गधे के रूप में पोप नामक एक कार्टून सामने आया जिसके नीचे लिखा गया- "पोप बाइबिल की उससे बेहतर व्याख्या नहीं करता, जैसा गधा बांसुरी बजाता है या संगीत की स्वरलिपि को समझता है। विरोध की इससे बेहतर कलात्मक अभिव्यक्ति और क्या हो सकती है। इसी तरह स्पेन में गोया (1746-1828) ने खुद को एक प्रखर व्यंग्य-चित्रकार के रूप में स्थापित किया था। उसने तत्कालीन स्पेन नरेश फर्नेण्डो VII के कुछ ऐसे चित्र बनाए कि राजा उसका दुश्मन हो गया राजा के बार-बार उत्पीड़न के चलते वह स्पेन छोड़कर फ्रांस चला गया। जहाँ निर्वासन में उसकी मृत्यु हो गई।

फ्रांस में ही एक कार्टूनिस्ट को लुई चौदहवें को उसकी रखैल के साथ चित्रित करने के कारण जिन्दा जला दिया गया था।

फ्रांस में 'ओनोर दौमिया' ने व्यंग्य चित्रकला को ललित कला की ऊँचाई दी थी, उसके द्वारा फ्रांस के राजा लुईस फिलिप को खून से सना एक नर-पशु चित्रित करने से राजा उससे नाखुश हो गया और दौमिया को जेल जाना पड़ा। जेल की सजा होने के बाद भी दौमिया लगातार अपने राजनैतिक व सामाजिक कार्टूनों के जरिए व्यवस्था पर प्रहार करते रहे। सख्त सेंसरशिप भी दौमिया को अपने समय की सच्चाई को तीखे कार्टूनों के रुप में पेश करने से रोक नहीं पाई। आज 'दौमिया' को राजनैतिक व्यंग्यचित्र कला का 'संरक्षक-संत' माना जाता है। समय बहुत आगे बढ़ गया है पर कार्टूनों से अपनी पोल खुल जाने से खौफजदा सत्ताएं उन्हें डराने के नए-नए तरीके इजाद कर रही हैं। पर कार्टूनिस्ट डरा नहीं है। कार्टून के तंज को बर्दाश्त न कर सकने वाली नेताओं की पीढ़ी भी शायद आज एक वजह है कि अखबारों, खासकर हिंदी अखबारों से कार्टून गायब हो रहा है। अब जब सोशल मीडिया और वेबसाइटें कार्टून को वैकल्पिक मंच दे रही हैं तो वे भी सत्ता शक्तियों के निशाने पर हैं। कार्टून एक ऐसा चित्र है जिसे देखते ही हर व्यक्ति समझ जाता है कि उसमें क्या अभिव्यक्त किया गया है। फिर चाहे देखने वाला पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़। सत्ताएं हमेशा कलाओं और कलाकारों को अपना चारण-भाट बना देना चाहती है जो केवल उनका गुणगान करें। लेकिन जिस कार्टून कला का जन्म ही प्रतिरोध के एक औजार के रूप में हुआ हो वह सत्ता का वंदन तो नहीं कर सकती। अपने समय को दिल में उतर जाने वाले व्यंग्य चित्र के रुप में अभिव्यक्त करना ही तो कार्टून कला की आत्मा है। भला अपनी आत्मा को मारकर कार्टून कैसे जिंदा रह सकता है।

क्या प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक बाल्जाक की यह बात फिर से मौजूं नहीं हो गई है- "हमसे सुंदर चित्रों की माँग की जाती है, किन्तु उनके प्रेरणा इस समाज में है कहाँ? आपके घिनौने वस्त्र, आपकी अपरिपक्व क्रांतियाँ, आपका बातूनी बुर्जुआ, आपका मृत धर्म, आपकी निकृष्ट शक्ति, बिना सिंहासन के आपके बादशाह, ये क्या इतने काव्यात्मक हैं कि इनका चित्रण किया जाए? हम अधिक से अधिक इसका मखौल उड़ा सकते हैं।"