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| विष्णु खरे |
पिछले कुछ वर्षों से ‘युवा’ और ‘युवा कविता' शब्द हिन्दी में सिर्फ युवकों और युवकों द्वारा लिखी जा रही कविता के पर्याय नहीं रहे। कभी वे नयी कविता के बाद वाली पीढ़ी के लिए इस्तेमाल किए गए और कभी वामपंथी तेवर वाली कविता के लिए या सामान्यतः आदमी से लगाव रखने वाली कविता के लिए, किंतु ‘युवा' शब्द कभी भी केवल उन लोगों का परिचायक नहीं रहा जिन पर यौवन आ चुका हो। देखा जाए तो आजादी के बाद जो दो पीढ़ियां जवान हुई है उनमें से सौभाग्यशाली कुछ को छोड़कर युवा होना क्या होता है. यह किसी ने जाना ही नहीं। युवा होने का अर्थ यदि स्वस्थ, चंचल, जोखिमपसंद, आत्मनिर्भर, निश्चिंत,स्वतंत्र होता है तो कहा जा सकता है कि पिछले तीस वर्षों में भारत में बहुत कम लोग ही युवा हो पाए होंगे। भारतीय हालात- सामाजिक, आर्थिक. राजनैतिक -किशोरों को सीधा अधेड़ बना देते हैं। पुचा होता इस देश के महान परिवारों का ही हिस्सा है।
किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि हमारे बीस से तीस वर्ष के लोगों ने यौवन- उसके सारे या कुछ अर्थों में- देखा और पाया ही नहीं? हिन्दी कविता पर लगातार सैकड़ों वर्षों तक यौवन का राज्य रहा। बूढ़े कवि कुश्ते खाते और खिलाते रहे- किन्तु छठे दशक से युवावस्था का लोप कैसे हुआ? हालात बद से बदतर होते गए हैं इसमें कोई संदेह नहीं और युवकों का चन्द बरस भी जवान रह पाना मुश्किल होता जा रहा है। देश और संसार की हालात कवियों से बहुत पेचीदा मांग कर रही है। लेकिन सारी भयावहता, संकट और लड़ाई के बावजू क्या यह मान लिया जाए कि गांभीर्य और जुझारु बुजुर्गियत ओढ़ने के सिवा युवकों के लिए हिन्दी कविता में कुछ बचा ही नहीं ?
आश्चर्य यह है कि जब आप हिन्दी के अधिकांश युवा कवियों से मिलेंगे तो आप पाएंगे कि वे बेहद जीवंत, खुश, पुरमज़ाक, हल्लेबाज, जीवन की अच्छी चीजों के पारखी, सौंदर्य में गहरी रुचि रखने वाले,शरारती और नितांत 'अस्वप्निल', 'अगंभीर' है। किंतु कवि-कर्म की कुछ ऐसी दहशत उनमें से अधिकांश पर है कि उनकी कविताएं अधिकतर बेहद रस्मी और नकली और सेल्फ-कॉन्शस हो जाती हैं और जब वे 'निजी' होते हैं तो उनमें एक खासा लिरिकल तत्समी घटाटोप होता है ताकि कोई शक न रह जाए कि हमारा विद्रोही कवि प्रेमी होना भी जानता है। आक्रोश से आलिंगन के बीच के सारे पायदान गायव हैं।
इसीलिए अवधेश कुमार की इन कविताओं को जब मैंने पढ़ा तो मुझे एक खुशी हुई कि उनके लिरिकल लगावों में परिश्रम या सायासता बिलकुल नहीं है। पाठक देखेंगे कि उनके इस संकलन का शीर्षक और उस शीर्षक खंड की कविताएं उनके अलग तरह के कवि होने की सूचना देती हैं। 'जिप्सी' शब्द पर कुछ लोगों को एतराज हो सकता है लेकिन 'ईरानी', 'चाकू-छुरी वाली' या 'घुमन्तू' आदि पर्यायों से काम न चलता। 'जिप्सी' शब्द के अंग्रेजी में अनेक प्रतीकार्थ भी होते है- वह उन्मुक्तता, स्वच्छंदता, बेफ़िक्री, रूढ़िमुक्तता का भी पर्याय है। अवधेश कुमार देहरादून में जन्मे और प्रकृति के बहुत नजदीक रहे। इसलिए इसमें कुछ अजब नहीं है कि उनकी कुछ कविताओं में एक ऐसी जीवंतता, स्पंदन, खुलापन, ऐन्द्रिकता है- यहां तक कि कभी-कभी भावुकता भी- जो उनके समवयस्क अनेक कवियों में कम ही है। इधर की प्रेम कविताओं में आप पाएंगे कि कवि सबकुछ के बावजूद भी संयत है- उसने स्वयं को बह जाने नहीं दिया है, जब कि अवधेश कुमार की कविता में कवि कुछ दूर तक तो दिखता है किन्तु जब गति और लय तेज होते हैं तो वह खो जाता है- जिस तरह तेज नाचते हुए लोक-नर्तक एक हो जाते हैं या मेलों में झूलने वाले लोग रंगों और आह्लादित चीत्कारों की एक फिरकनी ही नजर आते हैं और उनमें अपने प्रियजनों को ढूंढना मुश्किल होता है। अपने युवा होने की इस अंतरंग दुनिया को अवधेश कुमार ने कभी बहुत कोमलता से छुआ है जैसे 'मुक्ति एक आद्योपांत' में या 'फड़फड़ाते हुए डूबना' में और कभी बहुत ऐन्द्रिकता से जैसे 'चीते का प्यार' में। 'वर्षा में एक प्रलाप' में और उससे कहीं ज्यादा 'दर्द इतना हल्का और चुपचाप में वे खतरनाक ढंग से भावुकता के नजदीक आ जाते है लेकिन आवेग की तीव्रता शब्दों और शिल्प के जागरूक चुनाव के साथ मिलकर कविता को कविता बनाए रहने में सहायक सिद्ध होती है।
पाठकों का ध्यान विशेष रूप से मैं अवधेश कुमार की कविता 'जिप्सी लड़की : दो' की ओर खींचना चाहूंगा। अव्वल तो किसी उत्सव का, किसी मेले का ऐसा स्पंदित चित्र हिन्दी में कभी देखा हो ऐसा याद नहीं आता। लेकिन यह सिर्फ एक नयनाभिराम चित्र नहीं है, इसमें अभावग्रस्त पूरा गांव भी खड़ा हुआ है। अत्याचार और दमन पहाड़ की ऊंचाइयों तक भी पहुंच गया है, नशे में धुत्त हवलदार के रूप में। पर्यटकों के लिबास में शहरी संस्कृति भी वहां पहुंच गयी है। वहां खलील जिब्रान भी है- जिब्रान का वहां होना जिस कॉमेडी-गांभीर्य ट्रेजडी का प्रतीक है यदि उस पर ही लिखने लगें तो बहुत हो जाएगा। बहरहाल, 'सांप', ‘डफली’ ,'खून' आदि के प्रयोग से कविता में खासी ऐन्द्रिकता और हिंसा का प्रवेश होता है किंतु अंत में खलील जिब्रान के साथ बर्फ़ में दबी जिप्सी लड़की आपको एक विरेचन-भाव में छोड़ती है। इस एक कविता में इतने अलग-अलग और लगभग विरोधी-से तत्व काम कर रहे हैं कि इसे लिखने जाना अवधेश कुमार की संभावनाओं के प्रति आश्वस्त और उत्सुक करता है।
अवधेश कुमार यदि जीवन के शुद्ध 'सेलेब्रेशन' के ही कवि होते तो अपर्याप्त नथा क्योंकि अपनी ऐसी कविताओं में यह अपनी पूरी शक्ति में मौजूद हैं और वह सर्जनात्मक ऊर्जा किसी भी तरह की कविता को सार्थक बना ही देती है किन्तु उन्होंने लिखा है: ‘ मेरी कविता एक साथ बहुत सारी चीजों से प्रभावित है और एक संपूर्ण शब्द में वह जीवन है। शायद जीवन के प्रति मेरा गहरा जगाव व आस्था ही है. जिसे मैं अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।’ और चूंकि जीवन एक वैविध्यपूर्ण, संघर्षमय, पेचीदा और परिवर्तनशील विराट है इसलिए स्पष्ट है कि अवधेश कुमार की कविता जहां एक ओर शरीर, अभिलाषा, जय और पराजय के स्तर पर युवा होने की कविता है वहाँ वह एक छोटे रमणीय स्थान और घर को सुरक्षा-वह जैसी भी रही हो- से निकलकर एक दमनकारी, डरावनी, मानव-विरोधी दुनिया के सामने स्वयं को पाने की कविता भी है।
उनकी कविता का यह स्वरूप हमें उनकी ‘चिरे हुए आदमी की गंध' ‘चिंता को जमुहाई', 'रीढ़', 'जीवन की शुरुआत, 'भूख की सीमा से बाहर', 'छत पर धरी लालटेन', 'मां की याद', 'बाप रे इस इतने बड़े देश में’ आदि रचनाओं में मिलेगा। इसमें कोई शक नहीं कि अवधेश कुमार की कविताओं में सीधा संघर्ष, आह्वान, बलवा, क्रांति आदि नहीं हैं। उनके यहां प्रतिबद्धता की आत्ममुग्ध शैली नहीं है। किन्तु 'साइकिल की घंटियों का यही मतलब होता था कि/ उन पर बैठा हुआ हर बाबू जिन्दगी भर अपने बीवी-बच्चों को/ अपने दिनभर के तहखानों के भय से /बचाए रखने का संकल्प लेते हुए लौटता था हर शाम ’(क्लर्क), 'चौतरफा खुली एक आँख / चीजों में खोजबीन करती हुई बारीक / दिमाग़ को जगाए रखने के लिए लगाती हुई हांक / बेहद जागी हुई चुनौतियों में होती शरीक' (चिता की जमुहाई); 'हमने आग जलायी थी सोयी हुई चीजों को जगाया था/और धीरे-धीरे महसूस किया था अपने जीवन की शुरुआत को' (जीवन की शुरुआत); 'वह मणिहीन सांप गर्वित है खुद पर अधिनायक की तरह / कि चिड़िया को मारता भी नहीं और उसे भयमुक्त भी नहीं करता' (छत पर घरी लालटेन); 'मिलो दोस्त, जल्दी मिलो/ मैं ग्ररीब, तुम गरीब / पर हमारे इरादे गरम' (मिलो दोस्त, जल्दी मिलो); 'संबिधान की दुनिया में बचाये रखना है अपने आप को / और एक श्रेष्ठ नागरिक कहलाते रहना है; जब तक / पूरे नहीं होते अद्भुत स्वप्न मुझ गरीब आदमी के' (बाप रे इस इतने बड़े देश में) आदि कविताओं में यह बिलकुल साफ़ है कि अवधेश कुमार कहां से आते हैं और उनकी सहानुभूतियां किस तरफ हैं। और ऐसा नहीं है कि इनमें एक श्रेष्ठतर व्यक्ति की उदारता भरी सहानुभूति है बल्कि आज के जमाने में जो भी कमजोर लोगों पर हो रहा है वह इनके लिखने वाले पर भी या तो हो रहा है या कभी भी हो सकता है।
यदि मुझसे पूछा जाए कि आज की कविता में क्या देखा जाना चाहिए तो मैं कहूंगा कि आदमी के अस्तित्व और उसके सामने खड़े सारे संकटों को लेकर चिंता और प्रतिबद्धता, मानव होने के रोमांचक मामले में गहरी दिलचस्पी, जीवन और रिश्तों के अनंत वैविध्य के प्रति उत्सुकता और इस सब को अपनी भाषा और शैली में कह पाने की क्षमता। अवधेश कुमार की ये कविताएं इन सारी शर्तों को पूरा-पूरा निभाती हों यह न तो जरूरी है और न संभव- किन्तु इसमें संदेह नहीं कि इन कविताओं में इन शर्तों का पूरा-पूरा अहसास है। यह नहीं भूलना है कि अवधेश कुमार एक युवा कवि है और उनके सामने देने के लिए एक पूरा काव्य-जीवन पड़ा हुआ है। उनकी प्रारंभिक कविताएं एक ऐसे संकलन में प्रकाशित हुई जिसके संपादक की चयन-शक्ति में हिन्दी साहित्य का भरोसा बहुत पहले उठ चुका था इसलिए उसका कोई नामलेवा न रहा। यह अवधेश कुमार की जीवंतता का ही प्रमाण है कि वह उस प्रारंभिक सदमे को न केवल पचा गए बल्कि उससे मुक्त होकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उनमें अपनी मौलिक प्रतिभा है जो इस तरह की घातक दुर्घटना से भी बचकर उभर सकती है। अवधेश कुमार में इस जीवंतता के कई स्तर हैं। उनकी कविताओं को अपना घर, परिवार, मां, कस्बा, जंगल, शहर, दोस्त सब याद ही नहीं है, उनकी ओर वह बार-बार लौटते हैं और कुछ समृद्ध ही होते हैं। दोस्तों पर लिखी गयी उनकी दो कविताएं इस संग्रह में हैं- एक तो ऐसा मित्र है जो कई मंजिला इमारत में बैठा हुआ है और उनसे फोन कर लेने को कहता है। और दूसरा ऐसा है जो कवि की तरह ही है जिससे कवि तुरन्त मिलना चाहता है। कहने को ये बहुत सामान्य विषय लग सकते हैं लेकिन जो दोस्त और दोस्त में इतना प्रकं कर सकता है वह एक की प्रासदी और कामदी के रूप में मृत्यु भी जान सकता है और दूसरे की इंसानदोस्ती और दोस्तपरस्ती के जीवन को भी। चीजों और व्यक्तियों का यह अहसास अवधेश कुमार को कई कविताओं में मिलेगा- उनकी कविता की दुनिया एक धड़कती, बदलती, विकसती दुनिया है।
आज हिन्दी में जो भी युवा कवि और युवा कविताएं हैं उनमें से वही बचेंगे जिनके पास ऐसी दुनिया, ऐसे लोग और ऐसे अहसास हैं।जाहिर है कि वे युवा कवि अवधेश कुमार के उन्हीं दोस्तों में से होंगे जिनसे वह मिलना चाहते हैं- जिनमें वह मिल चुके हैं।

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