Tuesday, May 19, 2026

‘डोडी, मोनी और भीतर की सच्चाइयाँ’ (हिन्दी साहित्य की उपेक्षितायेँ) : रश्मि रावत

 

 

 

 

 


 

 

(सुप्रसिद्ध आलोचक रश्मि रावत के लेखन में समता-मूलक समाज की स्थापना में बाधक जेंडर-आधारित विषमता के सवालों से टकराने की बेचैनी निरन्तर दिखायी देती हैं. हाल ही में हिन्दवी के आयोजन ‘अनंता’ में बोलते हुए उन्होंने हिंदी साहित्य में मौजूद जेंडर चेतना के सवालों पर कुछ महत्वपूर्ण बातें की हैं. यहाँ हम उनके वक्तव्य को लिपिबद्ध रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. )

 

 

डोडी, मोनी और भीतर की सच्चाइयाँ

(हिन्दी साहित्य की उपेक्षितायेँ)

धन्यवाद, शोभा जी। हिंदवी-रेख्ता की पूरी टीम, अनुराधा जी और अविनाश जी का भी आभार - हमें इस विषय पर बोलने का अवसर देने के लिए, और साथ ही इस बात के लिए भी कि इस बातचीत के विषय में ‘उपेक्षिता’ और ‘अनंता’ को एक साथ लिखा हुआ है।

मुझे तो ‘अनंता’ ही दिख रहा है, क्योंकि ‘उपेक्षिता’ तो उपेक्षा से गढ़ी जाती है। आज उपेक्षा की उपेक्षा ही की जाए। तय यह हुआ था कि मैं कथा-साहित्य पर दूसरे दौर में बात करूँगी और शुरुआत में कुछ ओपन रिमार्क्स दूँगी। लेकिन यहाँ कथा-साहित्य का ज़िक्र आ गया है, तो मैं उसे बस हल्के से छूते हुए आगे बढ़ना चाहूँगी। क्योंकि इस विषय को लेकर मेरी जो समझ है, उससे जो एक दायरा बनता है, उसका फ़ायदा मैं अपने कथा-साहित्य संबंधी विचारों को भी देना चाहती हूँ।

पहली बात तो यह है कि इस वक्त हम एक बहुत गहरे संकट के दौर से गुजर रहे हैं। पूरी दुनिया में हिंसा की एक ऐसी लहर फैली हुई है, जिसका कोई साफ हल हमें दिखाई नहीं देता। सभ्यता के सामने जो सवाल और मुश्किलें खड़ी हैं, उनका कोई ठोस जवाब अभी हमारे पास नहीं है। ऐसे युग संकट के समय अगर मैं ‘उपेक्षिताओं’ को पहचानने की कोशिश करूँ, तो... अगर हम मानते हैं कि जेंडर विषमता मौजूद है, और एक जेंडर को विशेष अधिकार मिले हुए हैं जबकि दूसरे को कमतर समझा जाता है - तो यह कहा जा सकता है कि सारी स्त्रियाँ किसी न किसी रूप में उपेक्षिता हैं।

हमारा अनुपात बोध ऐसा बिगड़ चुका है कि हम बहुत अजीब तरह से तुलना करने लगते हैं। किसी एक असाधारण स्त्री (या पुरुष) को बहुत ऊँचा स्थान देकर उसकी तुलना किसी साधारण पुरुष (या स्त्री) से करने लगते हैं। मैं अभी उस विस्तार में नहीं जाना चाहूँगी। अहम बात यह है कि अगर हम आज यहाँ तक पहुँचे हैं, तो इसका मतलब है कि उपेक्षिताओं के जिस बड़े परिदृश्य की बात थी, उसका काफी हिस्सा अब पार किया जा चुका है। कभी साहित्य के इतिहास में स्त्री एक छोटी-सी कोठरी में सिमटी हुई थी। फिर सुमन राजे का ‘आधा इतिहास’ आया, स्फुरणा देवी की लेखनी से विधवाओं की दुर्दशा सामने आईं........इतिहास के बहुत से गड्ढे इस बीच पार किए जा चुके हैं। जिन रास्तों पर चल कर वर्तमान में रोहिणी अग्रवाल, सुधा सिंह, गरिमा श्रीवास्तव, नीरजा माधव आदि अनेक लेखिकाएँ साहित्य और इतिहास को स्त्री-दृष्टि से खँगाल रही हैं, रच रही हैं। इन कोशिशों से मध्यकाल और नवजागरण के जो अँधेरे कोने, यानी ‘डार्क स्पॉट्स’, थे, उन पर काफी हद तक रोशनी पड़ी। वसुधा डालमिया के काम से हम यह समझ सके कि मल्लिका हिंदी की पहली उपन्यासकार थीं।

मैं चाहूँगी कि हम ज़रा कल्पना करें कि तथ्यों को खुली आँखों से देखने पर हमारे सामने कितना व्यापक परिदृश्य उभर सकता था। मगर हिंदी की संवेदना लंबे समय तक बहुत संकुचित रही। चाहे अल्पसंख्यक समुदाय हों, स्त्रियाँ हों, इतरलिंगी हों या हाशिये के अन्य समूह - हिंदी संवेदना का दायरा उनके लिए बहुत देर से खुला। जेंडर स्टडीज़ के केंद्र खुलने के बाद नई संवेदनाएँ सामने आई हैं। यह 80-90 के दशक के बाद का परिदृश्य है जब जेंडर की उपेक्षा असंभव हो गई। रेखा सेठी ने भी कहा कि हम महादेवी वर्मा को बस ‘नीर भरी दुख की बदली’ तक सीमित करते रहे। ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ पर ध्यान तब गया, जब जेंडर से जुड़े सवालों पर गंभीरता से सोचना अपरिहार्य हो गया। अब इस परिदृश्य में असली सवाल यह है कि उपेक्षिता आखिर है क्या? किन लेखकों-कवियों की उपेक्षा हुई। उनका नाम गिनाना तो वर्तमान के संकटग्रस्त दौर में बेमानी ही होगा, उसे जाने दीजिए। सबसे बड़ी उपेक्षा तो सत्य अर्थात यथार्थ की हुई। हमने आधी आबादी के सत्य को अपने भीतर शामिल ही नहीं किया। स्त्रियाँ आज़ादी के आंदोलन से लेकर समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय थीं - घर के भीतर भी और बाहर भी। वे नागरिकों को जन्म दे रही थीं, उनका निर्माण कर रही थीं, समाज को गढ़ रही थीं, और गांधी जी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका भी निभा रही थीं। इसके बावजूद उन्हें इतिहास और समाज में वह जगह नहीं मिली, जिसकी वे हकदार थीं। इस उपेक्षा की वजह से हमारा पूरा सामाजिक और सांस्कृतिक नक्शा इतना कुरूप, अधूरा और दृष्टिहीन बना। सबसे पहले अगर किसी चीज़ की हत्या हुई, तो वह सच्चाई थी। इसलिए मैं मानती हूँ कि सबसे बड़ी उपेक्षिता खुद ‘सच्चाई’ है। अगर हिंदी की रचनाशीलता में उन आवाज़ों को बराबर जगह मिली होती, तो हमारी संवेदना का दायरा कितना बड़ा हो सकता था। शायद हम सचमुच एक गहरा यथार्थ-बोध और इतिहास-बोध हासिल कर चुके होते। हिन्दी की समूची रचनाशीलता ही इससे कमतर हुई । तो दूसरी उपेक्षिता यह है ।

अगली ‘उपेक्षिता’ वह पूँजी या अनुभव-संपदा है जिसके बल पर क्लासिक रचे जाते हैं। इतनी सीमित पूँजी के सहारे हम विशाल साहित्य कैसे रच सकते थे? रैल्फ फॉक्स के अनुसार उपन्यास लिखने के लिए ऐतिहासिक दृष्टि, मानव-दर्शन और विश्व-दृष्टि - इन तीनों का होना ज़रूरी है। हालाँकि स्त्रियों ने काफी उपन्यास लिखे, और अब उनकी खोज भी हो चुकी है, लेकिन पहले ऐसा नहीं था। सिर्फ राजकमल प्रकाशन से ही एक साल में नौ उपन्यास प्रकाशित हुए । इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि कुल मिलाकर यह संख्या कितनी अधिक होगी। स्त्रियाँ उस मुक़ाम तक तो पहुँचीं, जहाँ उनकी आवाज़ सुनी जाने लगी; मगर उनके विश्व-दर्शन का पूरा आसमान अब भी खुलना बाक़ी है। यह वैसा ही है जैसे किसी नदी ने समुद्र की झलक पा ली हो, पर अभी उसकी समूची गहराई में उतरना अभी शेष हो। स्त्रियों को जहाँ तक पहुँचना था, वहाँ तक वे अभी पूरी तरह नहीं पहुँच सकी हैं। आख़िर उनकी सभी संभावनाओं का पूरा विकास क्यों नहीं हो सका? इसलिए कि हिंदी के ज्ञान-विज्ञान और उसके पूरे साहित्यिक संसार की पूँजी ही बहुत सीमित रही। यह संभाव्यता भी तो उपेक्षिता है।

हमें उस इतिहास की विरासत बहुत कम मिली है, जिसे हमारी माँओं और पिछली पीढ़ियों की स्त्रियों ने रचा था। मैं खुद हिंदी साहित्य में ‘स्त्री-लेखन’ तक पहुँचते-पहुँचते अपनी ज़िंदगी के दो-तीन दशक पार कर चुकी थी। घर में तो चार भाइयों की अकेली बहन थी ही। अकादमिक-बौद्धिक माहौल भी पुरुष-निर्मित रहा। उन्हें किसी स्त्री-रचना पर गंभीरता से बात करते देखना मेरे अनुभव का हिस्सा नहीं रहा। लिहाजा मैंने भी ज़्यादातर पुरुष लेखकों को ही पढ़ा, और चेतना के स्तर पर मैं खुद लगभग पुरुष जैसी हो गई थी। स्त्री-चेतना तक पहुँचने में मुझे बहुत लंबा समय लगा। इसलिए मैं कहती हूँ कि जेंडर-चेतना उपेक्षित रही, स्त्री-अनुभव उपेक्षित रहे, और हिंदी की आधी रचनाशीलता भी उपेक्षित रही। बाकी की आधी को इससे क्या क्षति पहुँची, उसकी मुँह दिखाई होना अभी बाकी है। इसके लिए आत्मालोचना की जरूरत है।

आज सबसे बड़ा अभाव जिस चीज़ का है, वह है आलोचनात्मक विवेक। सबसे ज़्यादा उपेक्षा ‘आत्मालोचना’ की हो रही है। आत्मालोचना के बिना न कोई अच्छा लेखक बन सकता है, न एक जागरूक और जिम्मेदार इंसान। मेरा मानना है कि हमारे ‘स्व’ की जो पहचान है, उसमें बहुसंख्यक आबादी की अभी तक ठीक से मौजूदगी ही नहीं हुई। उसकी पहचान अभी भी अधूरी है। क्योंकि जब तक हम अपने भीतर और बाहर की दुनिया से नए तरह के रिश्ते नहीं बनाएँगे, अंतरंगता के नए दायरे नहीं रचेंगे, तब तक व्यक्ति और समाज तथा स्त्री और पुरुष के संबंधों की भीतरी दुनिया का रसायन नहीं बदलेगा। और जब तक यह रसायन नहीं बदलेगा, तब तक हम नई चेतना और बनती हुई नई दुनिया से कैसे जुड़ पाएँगे?

अगर स्त्री की आवाज़ और उसकी अभिव्यक्ति को ‘रिडक्शनिज़्म’ में न ढाला गया होता - जैसा प्रियंका जी की मुख्य शिकायत है कि हमें बहुत सीमित और संकुचित तरीके से पढ़ा जाता है - तो शायद तस्वीर कुछ और होती। हमें अक्सर सिर्फ़ ‘बॉक्स टिक’ करके पढ़ा जाता है। अगर ऐसा न होता, तो शायद ये शिकायतें भी पैदा न होतीं। स्त्रियाँ अपने साथ जो अनूठी आवाज़ें और अनुभव लेकर आई हैं, उनसे एक अलग और विशिष्ट दुनिया बनती दिखाई देती है। अगर वह दुनिया पहले बन पाती, तो शायद हमारे पास युद्धों और विषमताओं से निपटने के लिए भी कुछ बेहतर समाधान होते।

मैं यहाँ एक और बात जोड़ना चाहूँगी। हिंदी की बड़ी दुनिया में ‘मानवीय दृष्टि’ - मुक्तिबोध की भाषा में कहें तो ‘अंतःकरण का आयतन’ - बहुत सीमित रहा है। उसकी संवेदना के दायरे में स्त्री, आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक पूरी तरह शामिल ही नहीं हो पाए। जब वे स्पेस पाते भी हैं तो तो अक्सर वर्चस्व संपन्न वर्ग के भाव इस तरह के होतो हैं जैसे कोई मसीहा अपने अनुग्रह का एहसास दिला रहा हो; या फिर जैसे वह महज एक किस्म की ‘रिप्रेसिव टॉलरेंस’ – एक दबाव से भरी हुई मेहरबानी – भर हो। दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों ने जब अपनी आवाज़ खुद उठाई, तभी वे मजबूती से सामने आ सके। अगर जेंडर-संवेदना के सवाल शुरू से इतने उलझे हुए न होते, तो दलित स्त्रियों को उपेक्षा का एक और चक्र लंबे समय तक झेलकर ‘दलित-स्त्रीवाद’ के लिए अतिरिक्त संघर्ष कर के अपनी जगह बनाने की ज़रूरत न पड़ती।

मुझे लगता है कि हाशियाकरण के बाद लगातार नया हाशियाकरण होता गया, क्योंकि शुरू से ही स्त्रियों को सिर्फ़ ‘उपेक्षिता’ मानकर देखा गया; उनके भीतर छिपी अनंत संभावनाओं को पहचाना ही नहीं गया। स्त्री-लेखन की भी उपेक्षा हुई और स्त्रियों की भी। लेकिन क्या कथा-साहित्य में स्त्रियों से जुड़े कथानकों, विषय-वस्तु और स्त्री-पात्रों के साथ भी वही व्यवहार नहीं हुआ? क्या उन्हें भी उपेक्षा और विस्मरण के कुएँ में लगातार नहीं धकेला जाता रहा?

मैं प्रियंका जी की बात में एक चीज़ और जोड़ना चाहूँगी। अगर गीतांजलि श्री के लिए पूरी तरह प्रशंसा का माहौल भी होता, तब भी शायद सिर्फ़ बधाइयाँ और तारीफ़ें ही होतीं। आलोचना के सही औज़ार और स्त्री को संजीदगी से सुनने की मंशा तब भी हमारे पास न होते। हम सिर्फ़ बुराई से ही नहीं, बल्कि लगातार की जाने वाली खोखली तारीफ़ से भी ऊबते हैं, क्योंकि तारीफ़ करने वाले भी अक्सर यह नहीं बताते कि कोई रचना अच्छी क्यों है। यह एक तरह का गहरा बौद्धिक आलस्य भी है।

एक समय था जब लिखना बहुत कठिन और श्रमसाध्य माना जाता था। अच्छा लिखना आज भी उतना ही मुश्किल है, और सही तरीके से पढ़ना भी। लेकिन आज अगर सिर्फ़ ‘कुछ लिख भर देना’ हो, तो वह बहुत मुश्किल नहीं रह गया है। लोग अपेक्षाकृत आसानी से लिख लेते हैं। मगर पढ़ना अब भी मेहनत माँगता है, भीतर की ताकत और धैर्य माँगता है।

कथा-साहित्य में आप कोई भी उदाहरण ले लीजिए। जिन कथाकारों को ‘ओवररेटेड’ माना जाता है, मेरे हिसाब से वे भी कई बार ‘अंडररेटेड’ हैं - यानी उन्हें भी ठीक तरह से पढ़ा नहीं गया। बाद में कहीं नाम छूट न जाए, इसलिए मुझे एक-दो नाम लेने हों, तो मैं मेहरून्निसा परवेज का नाम लेना चाहूँगी। वे इतने वर्षों तक लिखती रहीं, लेकिन उनकी रचनाशीलता को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वे सचमुच हकदार थीं। अगर अल्पसंख्यकों के भीतर बेहद अल्पसंख्यक स्वर की बात करूँ, तो मैं शीला रोहेकर का नाम लेना चाहूँगी। उनकी कृति मिस सेमुअलसन : एक यहूदी गाथा में उन्होंने न सिर्फ़ हिंदी साहित्य में एक ऐसे अनुभव को दर्ज किया, जो लगभग अनुपस्थित था, बल्कि संवेदना का एक नया आयाम भी जोड़ा। उसमें पहचान और विस्थापन के ऐसे सवाल हैं, जो वैश्विक स्तर तक पहुँचते हैं। फिर भी उन्हें बहुत कम पढ़ा गया।

केवल स्त्री कथाकार ही नहीं, बहुत-से पुरुष कथाकार भी ठीक तरह से नहीं पढ़े गए। यहाँ तक कि सर्वाधिक लोकप्रिय प्रेमचंद की भी वे कहानियाँ कम चर्चा में रहीं, जो शायद रशीद जहाँ जैसी जागृत और विलक्षण स्त्रियों के संपर्क में आने के बाद लिखी गई थीं। ऐसी स्त्रियों को जानने और समझने के बाद ही वे यह देख सके कि स्त्री के भीतर कितनी संभावनाएँ हैं, वह क्या-क्या सोच और रच सकती है। वे एक ईमानदार लेखक थे; जैसे-जैसे उनकी संवेदना का दायरा बढ़ता गया, उनकी जेंडर-चेतना विकसित होती गई। उस दौर की उनकी कई कहानियाँ बेहद प्रखर हैं। लेकिन हम उन कहानियों तक भी तब पहुँच सके, जब डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान की दुनिया को कुछ हद तक लोकतांत्रिक बनाया। रास्ते की कई रुकावटें हटाईं। ज्ञान पर कब्जा जमाने और नियंत्रित करने वाले ‘प्रहरियों’ का असर कम हुआ, तब जाकर हम उन कहानियों तक पहुँच पाए। हिंदी की दुनिया में जेंडर चेतना सबसे उपेक्षित चीज रही चली आई है।

इसलिए स्त्रियों की उपेक्षा केवल समाज में ही नहीं, साहित्य में भी हुई है। मैं रांगेय राघव की कहानी गदल के बहाने एक बात कहना चाहती हूँ। इस कहानी में गदल अपने देवर डोडी से प्रेम करती है। डोडी भी उससे प्रेम करता है, लेकिन वह कभी अपने प्रेम को खुलकर व्यक्त नहीं करता, कोई संकेत तक नहीं देता। लंबे इंतज़ार के बाद गदल मोनी नाम के एक लुहार से शादी कर लेती है। लेकिन डोडी के मरते ही वह लौट आती है और ऐसा कुछ कहती है कि मैंने तो उससे शादी सिर्फ़ डोडी को महसूस कराने के लिए की थी। जब वह ही नहीं रहा तो अब मैं किसी पराए के घर क्यों रहूँ।  मैं कहना चाहती हूँ कि आज भले ही लिखने वाली स्त्रियों की संख्या बहुत बढ़ गई हो, लेकिन हमारी सबसे बड़ी शिकायत अब भी यही है कि हमें समग्रता में नहीं पढ़ा जाता। गीतांजलि श्री के उपन्यास तिरोहित में एक पंक्ति आती है कि एक औरत को एक तयशुदा आकार दे दिया गया है, और जैसे ही वह उस आकार से बाहर निकलती है, लोगों को समझ में नहीं आता कि उससे प्रेम कैसे करें, उसके साथ हँसें कैसे, रोएँ कैसे, या उसके साथ कोई संबंध कैसे बनाएँ।

हम उस तयशुदा ‘औरत के आकार’ से अब बाहर आ चुके हैं। हिंदी पट्टी के पास जो बना-बनाया साँचा है, उसमें अब हमें समेटा नहीं जा सकता। अब ज़रूरत इस बात की है कि मिलकर एक नया आकार बनाया जाए। जब तक यह समग्रता-बोध नहीं आएगा, जब तक हम हिंदी साहित्य और उसकी आलोचना के इतिहास को उसकी पूरी जटिलता और व्यापकता में नहीं देखेंगे, तब तक हम सचमुच आगे नहीं बढ़ पाएँगे।

मैं फिर रांगेय राघव की कहानी के हवाले से कहना चाहती हूँ कि हिंदी का अकादमिक संसार आज भी लोकतांत्रिक या आधुनिक नहीं बन पाया है। यहाँ लंबे समय तक  सामंती मिजाज कायम रहा। इसी वजह से पूरे जेंडर का एक विशाल परिदृश्य उपेक्षित रहा और उसकी संभावनाएँ कुचल दी गई। बाद में जब स्त्रियों ने लिखना शुरू भी किया, तब भी उन्हें उस स्तर तक पहुँचने में बहुत समय लगा। उनकी कतार बहुत बाद में शुरू हुई। हिंदी पट्टी के सामूहिक बौद्धिक मन को जिन लोगों ने लंबे समय तक नियंत्रित किया, उनके मुताबिक़ खुद को ढालने का दबाव स्त्रियों पर भी बना रहा। उससे आज भी वह मुक्त नहीं हैं।

कृष्णा सोबती की इतनी महत्वपूर्ण रचनाओं के साथ भी यही हुआ। उनके उपन्यास सूरजमुखी अँधेरे के की रतिका को राजेंद्र यादव ने ‘काम-कुंठित’ कहा और विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘आत्मकेंद्रित’। चूँकि आलोचना के भीतर गहरा बौद्धिक आलस्य था और जेंडर अंधता है, इसलिए स्त्रियाँ भी अपने शोध और लेखन में वही बातें दोहराती रहीं। लेकिन जब तक रेखा कस्तवार, निर्मला जैन और हमारे जैसी अनेक स्त्रियाँ सामने नहीं आईं, तब तक रतिका की उस assertive शक्ति को ठीक से पढ़ा ही नहीं गया। किस तरह वह नहीं की अपनी टेक पूरी मजबूती से बनाए रखती है जब तक प्रेम की पात्रता धारण करने वाला कोई न मिले। इसमें काम-कुंठा कहाँ है? अगर सामने वाला प्रेम की कोमलता, समझ और शऊर से ही अनजान है, तो किसी लड़की का ‘न’ कहना स्वाभाविक ही है।

पहले के दौर में उपेक्षा का मतलब था - मिट्टी के नीचे दबा दिया जाना, जैसे हमारा कोई अस्तित्व ही न हो। लेकिन आज उपेक्षा का अर्थ बदल गया है। अब इतनी चकाचौंध और शोर है कि उस रोशनी के पीछे वास्तविक लेखक उपेक्षित हो जाते हैं। चयन की एक बड़ी समस्या पैदा हो गई है। इतना अधिक साहित्य लगातार प्रवाह में डाला जा रहा है कि जो सच्चा लेखक शोर-शराबे से दूर चुपचाप और एकाग्र होकर काम कर रहा है, कई बार हम उसकी ओर पहुँच ही नहीं पाते। हालाँकि जिसे मैं ‘चकाचौंध’ कह रही हूँ, यह भी हो सकता है कि उसके भीतर कहीं कोई सच्चा अंतःकरण मौजूद हो, जिसे हम अभी ठीक से पढ़ नहीं पा रहे। इसी वजह से मैंने गदल का उदाहरण दिया था। पितृसत्ता अब बहुत सूक्ष्म और गहरे रूपों में काम करती है। संभव है कि उसके अनुकूलन में खुद को ढालने में बाध्य स्त्रियाँ ऊपर से ‘मोनी’ लिख रही हों, लेकिन उनके भीतर कहीं ‘डोडी’ छिपा हो। ‘डोडी’ अर्थात वास्तविकता।

आज अगर हमें मंच और स्वीकृति मिल भी रही है, तो कई बार हम अपनी अभिव्यक्ति को ‘सर्वानुमति’ के साँचे में ढाल लेते हैं। लेकिन शब्दों की भीतरी तहों में कहीं न कहीं राजी सेठ की की कहानी जैसे ‘खाली लिफाफे’ भी मौजूद होंगे, जिनमें असली आशय छिपे हुए हैं। जब हम आज के साहित्य को उसकी समग्रता में पढ़ेंगे और आलोचना के नए औज़ार विकसित करेंगे, तभी वह वास्तविक यथार्थ हमारे सामने आएगा। और जब राजी सेठ का नाम आया है, तो मैं यह भी जोड़ना चाहूँगी कि इतनी स्मृति-सभाओं और चर्चाओं के बावजूद उनका नाम अक्सर या तो भुला दिया जाता रहा, या कम महत्व के साथ लिया जाता रहा। यह भी उपेक्षा का ही एक रूप है।

अब मैं समझ पा रही हूँ कि इस परिचर्चा का नाम ‘अनंता’ क्यों रखा गया - क्योंकि उपेक्षाओं के सिलसिले भी अनंत रहे हैं, एक पर्त हटती है, तो उसके नीचे एक और ख़ामोशी दबी हुई मिलती है – इसलिए इन पर शायद अनंत समय तक बात करने की ज़रूरत है। 

 


Saturday, May 16, 2026

विजय गौड़ की वैचारिकी -अरविंद शेखर

(  विजय गौड़ की सामाजिक/ सांस्कृतिक गतिविधियों का क्षेत्र बहुत व्यापक है। विजय गौड़ के जन्म दिवस के अवसर पर उनके लेखन की वैचारिकी पर आधारित अरविन्द शेखर का आलेख प्रस्तुत है)
 

  

मुक्तिबोध अक्सर पूछते थे- “पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? ”

 जब हम विचारधारा की बात करते हैं तो क्या हमें व्यक्ति के रचनाकर्म और उसके सार्वजनिक व निजी जीवन के अंतर्द्वंद्व पर एक नजर नहीं डालनी चाहिए।

अक्सर हमने देखा है कि कोई रचनाकार अपनी रचना में जिन मूल्यों का पैरोकार होता है अपने जीवन में उसके ठीक उलट। ऐसे में उसकी रचनाएं अपना ताप ही खो देती हैं और रचनाकार सम्मान। मगर विजय गौड़ ऐसे नहीं थे। उन्होंने जिन मूल्यों को ठीक माना ठीक जाना। जीवन और रचनाओं उन्हीं मूल्यों की दृष्टि से देखा।

करीब तीन दशक के व्यक्तिगत संबंधो के कारण जीवन पर बोलने को बहुत है। मगर यहां मैं उनके रचना कर्म पर ही बात रखूंगा। उनके रचना कर्म में उनकी कविताएं हैं। कहानियां हैं। उपन्यास हैं, आलोचनात्मक लेख हैं और रंगकर्म भी। यह सब उनके गैर-बराबरी की दुनिया को देखने और उसे बदल डालने की उनकी बेचैनी जानने का जरिया है। उनके पहले कविता संग्रह का नाम है। ‘सबसे ठीक नदी का रास्ता’। उसमें एक कविता है –‘नीचे साहब की गाड़ी खड़ी है ’। यह कविता साफ करती है कि कैसे ताकतवर लोगों का वर्चस्व कायम है। वह कहते हैं-

मत हिलाओ हवा में

इस तरह अपने को पेड़

कि तुम्हारे पत्ते

साहब की गाड़ी पर गिरें

पेड़ यदि रहना चाहते हो जीवित

तो ध्यान रखो नीचे साहब की गाड़ी खड़ी है।

विजय गौड़ ट्रेड यूनियन आंदोलन में भी बहुत सक्रिय रहे। 90 के दशक में नई आर्थिक नीतियों की सरपरस्ती में कॉर्पोरेट पूंजी ने स्थानीय छोटे उद्योगों और मजदूरों पर जो कहर ढाया। उसी ने उन्हें अपना पहला उपन्यास ‘फांस’ लिखने को प्रेरित किया।

मध्यम वर्ग के साफ स्टैंड न ले पाने के ढुलमुलपन से उन्हें सख्त चिढ़ थी । यह खिन्नता उनकी रचनाओं में खासी तादाद में व्यक्त हुई है। मध्य वर्गीय कर्मचारी आंदोलनों की लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन की न बन पाने और महज निजी फायदों की लड़ाई बन जाने से खिन्न वह ‘कर्मचारी‘ कविता में तल्ख टिप्पणी करते हैं-

बस बची रहे मेरी पेंशन

ग्रेच्युटी

मेरा प्रोविडेंट फंड

फिर चाहे घर बेचो, दुकान बेचो, खेत बेचो,

खदान बेचो बांसुरी की तान बेचो

बेचो बेचो निकम्मे हिंदुस्तान को बेचो

बस बची रहे मेरी पेंशन

ग्रेच्युटी

मेरा प्रोविडेंट फंड

उनकी दृष्टि स्थानीय ही पर नहीं वैश्विक बदलावों पर भी थी। उसके देश में होते बदलावों से अंतरसंबंधो पर भी। -‘डॉलर’ कहानी में वह मदारी से कहलाते हैं- रुपया डॉलर में कनवर्ट हो गया तो बुश महाराज के पास पहुंच जाएंगे। और बुश महाराज दौड़ते चले आएंगे कि मदारी नहीं सद्दाम है। ...खतरनाक हथियारों का जखीरा है इसके पास। सोच जमूरे क्या हाल होगा तब। अगर बुश महाराज न आए तो भी विश्व समुदाय की अपील पर अपने प्रधानमंत्री तो सेना भेज देंगे ।

इसी दौर में देश में सांप्रदायिकता और पोंगापंथ का उठान शुरु हुआ तो उसके प्रतिरोध में उन्होंने ‘दिसंबर-1992’ कविता लिखी ।

आस्थाओं का जनेऊ

कान पर लटका

चौराहे पर मूतने का वर्ष

 बीत रहा है

बीत रहा है

प्रतिभूति घोटालों का वर्ष

सरकारों के गिरने

और प्रतीकों के ढहने का वर्ष

अपनी अविराम गति के साथ

बीत रहा है

सोमालिया की भीषण त्रासदी का वर्ष

हड़ताल, चक्काजाम

और गृह युद्धों का वर्ष

अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का वर्ष

हर बार जीतने की उम्मीद के साथ

हारने का वर्ष

साप्रदांयिकता की विषबेल के प्रतिवाद में उनकी कहानी ‘डॉ. जेड़ ए अंसारी होम्योपैथ’ है।  इसी तरह ‘देशद्रोही’ कहानी समाज में सांप्रदायिकता की बच्चों के मन में पैठा देने की कुछ संगठनों की निरंतर कोशिशों पर उनकी पैनी निगाह की बानगी है । 

समाज में गहरे पैठे हुए ब्राह्मणवाद के सांप्रदायिकता, परंपरा और संस्कृति का चोला पहनकर वैधता हासिल करने की कोशिशों के प्रति वह बहुत सतर्क थे। इसीलिए इसके नाम पर पाखंड के प्रश्रय के घनघोर विरोधी थे। कवि व लेखक बोधिसत्व की कविता ‘अब जबकि जान गया हूं’  की उन्होंने ‘आदत हो चुके ढकोसले’ शीर्षक से लेख लिख तीखी आलोचना की । वह कहते हैं- “रचनाकार का भौतिक जीवन और सांस्कृतिक जीवन क्यों एक नहीं होना चाहिए ? रचनाकार के जीवन की संपूर्ण पदचाप क्यों उसकी रचनाओं में सुनाई नहीं देनी चाहिए ? व्यवहार ज्ञान से बढ़कर है ।”

परिवार संस्था में पितृसत्ता किस तरह वर्चस्व बनाए रखती है और समानता पर आधारित समाज चाहने वाले भी किस तरह उसके जाल में फंसे होते हैं। इसी छटपटाहट पर उनकी कविता है-

संग-साथ इक्कीस साल

सबसे ज्यादा गुस्साया सिर्फ पत्नी पर

डरते-डरते काट दिए उसने इक्कीस साल

चाहा नहीं कभी मैंने पर, डरे वह

हरदम गुस्साया यूँ , आज तक जितना

काश, गुस्सा पाया होता, एक हिस्सा भी

गोली, लाठी और बौछारों से बेदम कर देने वाले

समाजद्रोहियों पर

अहंकार की मुँह चिढ़ाती मुस्कान पर

बना रहा शांत, कहलाया -भला

डराने भर को भी

गुस्सा न पाया हरामियों पर

इन इक्कीस सालों में ।

 

वह बहुत सारे मामलों में मध्यवर्गीय झिझक छोड़ जरूरी हस्तक्षेप करते थे। जैसे जब सुनील कैंथोला के नाटक ‘मुखजात्रा’ के मंचन में सरकार के कोपभाजन से बचने के लिए वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के राजनैतिक विचारों की बेदखली की गई तो विजय गौड़ ने विरोध जताते हुए, पूरे आग्रह के साथ रंगमंच के लिजलिजेपन पर तल्ख टिप्पणी की ।

विजय गौड़ की रंगकर्म की यात्रा बचपन में रामलीला से शुरू हुई तो उनके रंगकर्म ने 1994 में दृष्टि समूह के साथ ‘केन्द्र से छुड़ाना है उत्तराखंड लाना है’ जैसे नुक्कड़ नाटकों के जरिए उत्तराखंड आंदोलन में सांस्कृतिक दखल दिया। इसी दौर ने उन्हें उत्पीड़तों के साथ खड़े होने की अपनी विचारदृष्टि दी। 

ट्रैकिंग भी उनका प्यार था । तमाम दुरुह ट्रैक के बाद उन्होंने यात्रा संस्मरण भी लिखे। मगर उनमें केवल वहां का दुरुह भूगोल नहीं था। वहां के लोग थे उनका जीवन था और जीवन के द्वंद्व । शतरंज का भी उन्हें बहुत घना शौक था इसीलिए उनकी रचनाएं शतरंज के मोहरों की तरह व्यवस्था को चेकमेट करने की कोशिश करती हैं।

यह विडंबना है कि आज उन्हें उस दून लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर में याद किया जा रहा है, जिससे उन्होंने किनारा कर लिया था। यह बात और है कि दून लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर की ही मदद से उन्होने दयानंद अनंत की कहानी ‘कनाट सर्कस के कव्वे’ का एकल मंचन किया था मगर बाद में दून लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर में होने वाले कार्यक्रमों से इस तर्क के साथ किनारा कर लिया कि उसे स्थानीय संस्कृति कर्मियों के लिए निशुल्क उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उनका विरोध इस पर भी था कि दून लाइब्रेरी आंदोलनकारियों के धरनास्थल को बेदखल कर पाई गई जमीन पर खड़ा है। यह उनकी सच कहने की हिम्मत ही थी। ऐसे टकराव लेना और अपनी बात पर अड़ना उनकी फितरत में था। कई बार बहुत से राजनीतिक आंदोलन व्यवहारिकता तो देखते हुए अपने तौर तरीके बदलते हैं। सच कहने से होने वाले तात्कालिक असर से बचते हैं। वह बहस के दौरान पूरी मजबूती से लड़ते मतभिन्नता को स्वीकर करते लेकिन अपनी निश्चल हंसी के साथ लंबे समय तक मनभेद नहीं होने देते थे।

विजय गौड़ जो सच जानते थे कह देते थे। एक बार संभवतः रमेश बेदी ने अंग्रेजों और गोरखा सेना के बीच हुए खलंगा युद्ध पर एक नाटक लिखा था जिसमें किले में बंदी बनाकर रखे गए गढ़वालियों को गोरखा सेना के साथ अंग्रेजी साम्राज्यवाद से टक्कर लेते दिखाया गया था तो विजय गौड़ ने इसका इसलिए विरोध किया कि यह गोर्ख्याणी या गोर्ख्योल के आंतककारी सत्य से परे अवधारणा थी। सत्य के प्रति इसी आग्रह ने उन्हें आलोकुठि उपन्यास रचने को प्रेरित किया होगा। इस उपन्यास की कथावस्तु सुनने के बाद मुझे लगा था कि इसका कथ्य वर्तमान हालात में यह सर्वसत्तावादी सांप्रदायिक ताकतों को ही ताकत देगा। हालांकि जब उपन्यास आया तो वह इस तरह लिखा गया कि गलत हाथों का औजार न बन सके।  

आलोचनात्मक लेखन करते हुए उन्होंने ‘गंवई आधुनिकता’ का एक पद भी आविष्कृत किया। जो यह पड़ताल करता है कि समाज चाहे आधुनिक दिखता हो मगर उसमें सामंती अवशेष भरपूर बचे हैं।

नए -नए युवा होते विजय गौड़ ने शुरुआती दिनों में एक साहित्यिक फोल्डर ‘फिलहाल’ भी निकाला। इसी में आज के बहुत से नामचीन लेखकों की शुरुआती रचनाएं आईं। 1989 में ओमप्रकाश वाल्मीकि की पहली कविता पुस्तिका ‘सदियों का संताप’ विजय गौड़ के प्रयासों से ही प्रकाशित हुई थी।

संभवतःइसी दौरान उनमें दलित प्रश्न को समानुभूति से समझने की दृष्टि भी विकसित हुई। बंगाल के धर्म के नाम पर विभाजन, नमोशूद्रों का सुंदरबन तक विस्थापन, सवर्ण वर्चस्व मारीचझांपा के नरसंहार उनके उपन्यास ‘आलोकुठि’ का समर्पण ओमप्रकाश वाल्मीकि को भी इसीलिए है।

वर्ष 2008 से विजय गौड़ ने अपना साहित्यिक ब्लॉग ‘ लिखो यहां वहां ’ शुरू किया और उसके जरिए साहित्यिक जगत में सक्रिय हस्तक्षेप किया। उनके लेखन व व्यवहार में उत्तराखण्ड में मौजूद जातीय विभेद व सवर्ण वर्चस्व , ब्राह्मणवादी रूढ़ियों का विरोध स्पष्ट था। इसीलिए उन्होंने पहले खुद अपना विवाह और फिर अपनी बेटी पवि का विवाह बिना ढकोसले के किया।

यह एक विडंबना है कि जब उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद उसकी बेटी और पत्नी सदमें में थे तो उनके भाइयों और भतीजों को विरोध के बावजूद ब्राह्मणी कर्मकांड को थोपने का अवसर मिल गया। तो उनके दूसरे उपन्यास ‘भेटकी’ याद आ गया। भेटकी उन्होंने ‘फांस’ उपन्यास के बाद रचा था। यह नई आर्थिक नीतियों से उपज रहे ,समाज के हर क्षेत्र पर कब्जा कर रहे एक दलाल वर्ग और मनुष्य की बेहतर जिंदगी का सपना देखते, हालात बदलने के आंदोलनों के कमजोर पड़ने के क्षोभ की कथा है। उन पुरानी और नई बेड़ियों की पड़ताल है जो मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देती।

जब विजय गौड़ का देहांत हुआ तो लगा कि क्या भेटकी के उस पात्र की कथा दोहराई जाने वाली है। जिसने जीवनपर्यंत कर्मकांड पाखंड का विरोध किया मगर मृत्यु होते ही वह फिर हावी हो जाता है। लेकिन अगले दिन ही विजय गौड़ की बेटी पवि और पत्नी पूर्ति ने विजय गौड़ को सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए परिवार की झूठी धमकियों से विचलित हुए बगैर किसी भी किस्म का अनुष्ठान नहीं करने का ऐलान कर दिया। यह विजय गौड़ के विचारों की जीत ही थी और इस बात का भरोसा कि उनकी देह न रही हो मगर उनके विचारों को तिलांजलि नहीं दी गई है। 

हर व्यक्ति की तरह अपनी जड़ों से लगाव स्वाभाविक है। मौजूदा समय में पहाड़ में जिस तरह की सांप्रदायिक नफरत की राजनीति परवान चढ़ रही है। उससे वह उद्वेलित थे। पहाड़ से उनका लगाव पहाड़ के भूगोल से ज्यादा लोगों से था। वह इसी जमीन पर एक उपन्यास भी रच रहे थे जो अधूरा रह गया है। वह देवभूमि के आवरण में पहाड़ी जीवन की मुश्किलों को ढांपने की कोशिशों को बेपरदा करते हुए अपनी ‘भेड़ चरवाहे’ कविता में कहते हैं-

ऊंचे पहाड़ पर देवता नहीं

चरवाहे रहते हैं

-ये जानते हुए भी कि रुतबेदार लोग

उन्हें वहां से बेदखल करने पर आमादा हैं

वे नए से नए रास्ते बनाते

चले जाते हैं वहां तक

जहां जिंदगी की उम्मीद जगाती घास है

और है फूलों का जंगल

वह खराब हो चुकी चीजों को पैबंद लगाकर ठीक करने के हामी नहीं थे। उन्हें मुकम्मल तौर पर बदल देने की इंकलाबी सोच रखते थे- तभी उनके कविता संग्रह का नाम है ‘मरम्मत से काम नहीं बनता’

उसी की चंद पंक्तियां देखिए-

मैं तो एक साधारण दस्तकार हूँ

आप चाहेंगे जैसा, कर दूँगा

 

पर तजुर्बे की बात है यह,

पुरानी-धुरानी, जो

बेहद बेकार हो जाती हैं चीजें

मरम्मत भर से भी,

कुछ काम बनता नहीं।

 

वह नियतिवाद पर भरोसा नहीं करते। बुरे हालात से उदास नहीं होते। मनुष्य के बेहतर दुनिया बनाने के सपने और उसके आत्मबल पर भरोसा रखते थे। उम्मीद रखते थे कि अन्यायी व्यवस्था बदलेगी

वह ‘मेरी बच्ची ’ कविता में कहते हैं-

घट चुकी घटना

भाग्य का लेखा जोखा है।

ऐसा समझने वाले बेवकूफों की पांत में बैठकर

हताश और निराश नहीं होना

मेरी बच्ची

कुल मिलाकर विजय गौड़ ने अपने आस-पास अपने समय़ की पड़ताल करते हुए उससे टकराते हुए अपनी दृष्टि विकसित की। इसी दृष्टि से नई पीढ़ी से न्यायपूर्ण समाज की उम्मीद बनाए रखते हैं-

इसी लिए अपनी ‘बच्चों के लिए’ कविता में कहते हैं-

1-

बच्चों की खुशी में ही छुपा है

 बच्चों का दुख

 बच्चों के समर्पण में ही छुपा है

बच्चों का विरोध

बच्चे ही कर सकते हैं

जुल्म के खिलाफ जंग

बच्चे ही करेंगे विश्व में अमन

बच्चे ही चाहेंगे

बच्चों के लिए जीने की सही व्यवस्था

2-

बच्चे ही चुराएंगे समय

बच्चों की जिन्दगी से इस सबके लिए ।

3-

बच्चे चाहते हैं समता,

 न्याय देश में उचित व्यवस्था हो जाए

-आढ़ती का कहीं काम न हो

जमींदार की जमींदारी छिन जाए

और इस देश के नक्शे में

छब्बीस तरह के जूते बनाने वाली

एक भी फैक्ट्री न रह पाए।

 

Sunday, May 10, 2026

अवधेश कुमार की लघुकथाएं

 

 

अवधेश कुमार ( 1951-1999)

 ( अवधेश कुमार को एक कवि और कलाकार के रूप में जाना जाता है। चौथा सप्तक में लिखे आत्मलेख में उन्होंने बड़े गर्व के साथ यह कहा था कि वे एक ही स्थिति पर कविता, कहानियाँ और लघुकथाएं लिख सकते हैं।‘ उसकी भूमिका’ नाम से उनका कहानी संकलन भी प्रकाशित हुआ है।यहाँ उनकी कुछ लघुकथाएं दी जा रही हैं)

 

 

 

 दिल्ली

उबले हुए अंडे की तरह ठोस और मृत, गदराया हुआ और मूल्यवान यह शहर मिर्च और नमकदानियों के साथ हर किसी मेज पर सजा हुआ, हर समय उपलब्ध ।

यह शहर अपने से थोड़ा अलग खिसका हुआ शहर है-झनझनाता हुआ एक शहर से चिपका दूसरा से चिपका तीसरा से चिपका चौथा। कैमरा हिल जाने से जैसे तस्वीर में कई एक जैसी तस्वीरें पैदा हो जाएँ ।

यह शहर हमारे चारों तरफ छिलके के खोल की तरह शामिल हमारी परछाइयों को हमारे शरीरों से नोंचकर उतार फेंकने की कोशिश में तिलमिलाता है और निराशा और भय से इसके चेहरे की जर्दी काली पड़ जाती है।

पूरे देश पर छाने की कोशिश में निरन्तर मग्न और पीड़ित यह शहर फूटे हुए अंडों के मलबे के ढेर में धँसा हुआ करवट तक लेने में अस-मर्थ है।

आमीन ।

 

 

 

भूख की सीमा से बाहर

उन्होंने मुझे पहले तीन बातें बताईं -

एक : जब तक लोहा काम करता रहता है, उस पर जंग नहीं लगता। दो : जब तक मछली पानी में है, उसे कोई नहीं खरीद सकता। तीन : दिल टेबिल क्लॉथ की तरह नहीं है कि उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो ।

यह कहते हुए मेरे दुनियादार और अनुभवी मेजबान ने खाने की मेज पर छुरी के साथ एक बहुत बड़ी भुनी हुई मछली लाकर रख दी और बोले, "आओ यार अब इसे खाते हैं और थोड़ी देर के लिए भूल जाओ वे बातें जो भूख की सीमा के अन्दर नहीं आतीं।" 

 

 

अधूरा नशा

एक अधूरे नशे में बौखलाए हुए आदमी की तरह असहज, वह बहुत अनर्गल सोच में अधभीगा, ठिठुरते हुए अपने दोनों हाथ बाँध लेता है।

एक खास तरह की ऊब और जकड़न में कसा उसके नशे का अधूरा चेहरा बड़बड़ाता है उसकी आँखों से, शब्दों से, उसकी चाल और उसके हाथ हिलाने के ढंग से। और इस तरह वह असंदिग्धरूप से कायर मनुष्य कर्म और नियति के दो अधूरे नशों के बीच अपनी असली औकात पहचानने की कोशिश करता है।

पता है उसे कि बहुत सारे विचार, निर्णय और परिकल्पनाएँ ठूंस-ठूंसकर भर दी गई हैं उसकी जेबों में। कोई-कोई तो बहुत गैरजरूरी और कोई बहुत कारगर उसके लिए ठीक उसी वक़्त में। पर वह चुनाव नहीं कर सकता, क्योंकि साथ में उसे जो एक अधूरा नशा भी दे दिया गया है।

वह यह भी नहीं जानता कि उसे अब कैसी शराब चाहिए या कि कैसा नशा सही रहेगा उसके लिए, जबकि एक कबाड़घर में प्रवेश करने के लिए साहस जुटाना है उसे और जिसके जुटाए जाने को अव और स्थगित नहीं किया जा सकता।

रात के इस तीसरे पहर में जबकि नींद में वह जहाँ होता अब नहीं है वहाँ- उसके पास हल्की-सी उम्मीद के सिवा तलब, और उसके सिवा सुबह का इंतजार बचा है।

और एक जवाबदेही जो उसने जितनी अपनी देह को देनी है, उतनी ही अगली सुबह सामने पड़नेवाले काम को भी ।

फिर उसने अपनी जेब में पड़े पैसे टटोले और उसे वे सबके सब नेक और जरूरी काम याद आने लगे, जिनमें उन्हें खर्च करना था। और इस प्रकार और इस कदर अधूरे नशे की जद से बाहर निकलते हुए वह-सुबह के दरवाजे के रास्ते एक दूसरी दुनिया के भीतर निडर धड़बड़ाते हुए घुस पड़ा। 

 

 

कौवा

चिड़िया की लघुकथा में मेरी ऊब से पैदा हुई यह कौवे की लघुकथा। लेकिन चिड़िया मुझसे ऊबकर कहाँ गई होगी ? कौन-से आकाश में ? मुझे नहीं मालूम ।

मैं यही जानता हूँ कि जब मैंने कौवे की लघुकथा लिखने का निश्चय किया, तो नहीं पता था कि वह समस्यापूति की तरह कठिन था। मगर कौवा हंस की चाल के साथ फड़फड़ाता हुआ उतरा इस कागज पर, स्याही के धब्बे में आकर बैठ गया और अपनी कानी आँख से मुझे देखने लगा ।

मुझे उसका इस तरह देखना अच्छा नहीं लगा और उससे बचाने के लिए मैं कागज पर यूंही आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींचने लगा। कौवे पर लिखने को कुछ था ही नहीं।

तब उसने स्याही के धब्बे में से अपनी चोंच बाहर निकाली और बोला- "मैं बताता हूँ, लिखो-'आज एक लेखक एक कौवे से डर गया'।" 

Monday, May 4, 2026

170 साल पहले जर्मन आंखों से हिमालय

 

 

 

   

 

   जर्मनी के श्लागिंटवाईट बन्धुओं (हर्मन, रॉबर्ट और एडोल्फ) का हिमालय खोज अभियान

 

   आज हिमालय को हम जैसे जानते, देखते हैं। क्या वह 170 साल पहले वैसा ही था ? डेढ़ सदी से ज्यादा के वक्त में हिंदूकुश से लेकर सिक्किम तक उसमें क्या बदलाव आए ? भारत में म्यूनिख के 'अल्पाइन्स म्यूजियम' की दुर्लभ पेंटिंग्स यही कह रही हैं। जब कैमरा नहीं था, तब जर्मनी के श्लागिंटवाईट बन्धुओं (हर्मन, रॉबर्ट और एडोल्फ) ने हिमालय की अपने यात्रा अभियान के दौरान उसे कैसे रंगों में उतारा? 
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट के सुझाव पर, इन भाइयों को भारत और मध्य एशिया के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए भेजा गया था। उन्होंने हिमालय, काराकोरम और कुनलुन पर्वत श्रृंखलाओं का व्यापक दौरा किया।



इनका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करना और ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों का नक्शा तैयार करना था। अभियान के दौरान एडोल्फ श्लागिंटवाईट अकेले काशगर (वर्तमान चीन) चले गए थे। वहां के स्थानीय शासक 'वली खान' ने उन पर जासूसी का संदेह किया और अगस्त 1857 में उनकी हत्या कर दी गई। काफी समय बाद उनके अवशेष और डायरी बरामद हुई थी। ये वैज्ञानिक होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार भी थे। उनके द्वारा बनाए गए वाटरकलर पेंटिंग्स आज भी 19वीं सदी के हिमालय और तिब्बत के सबसे सटीक दृश्य दस्तावेजों में से एक माने जाते हैं।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में शुक्रवार, 1 मई, 2026 से शुरू प्रदर्शनी उनके इसी काम के दौरान बनाए हिमालय पर्वत,पहाड़ों,पुल,रास्तों व मंदिरों के चित्रों को दिखाती है।  दून पुस्तकालय के तृतीय तल की दीर्घा में यह चित्र प्रदर्शनी 8 मई शाम साढ़े छह बजे तक चलेगी।  
करीब पौने दो सौ साल पहले के तीनों जर्मन भाईयों के ये चित्र जम्मू कश्मीर से लेकर बदरीनाथ, केदार नाथ ,मिलम,सुन्दरढूंगा, नैनीताल और पूरब में दार्जिलिंग तक के तत्कालीन इतिहास से सीधे साक्षात्कार कराते हैं । हर्मन और रॉबर्ट को कुनलुन पर्वतमाला को पार करने वाले पहले यूरोपीय खोजकर्ता माना जाता है।





इसके पहले इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में इनका प्रदर्शन हो चुका है।  दूसरे चरण में 1-8 मई, 2026 तक दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर, देहरादून के बाद यह प्रदर्शनी सीआरएसटी कॉलेज व उत्तराखंड एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के सहयोग से नैनीताल में लगेगी। प्रो. शेखर पाठक की खास पहल से हिमालय के यह चित्र जर्मनी के म्यूनिख संग्रहालय से निकल कर आम लोगों के बीच अवलोकन के लिए पहुंचे हैं। इसमें इसे म्यूनिख संग्रहालय सहित श्लांगिटवाइट के पारिवारिक सदस्यों के साथ-साथ प्रो. हरमन क्रुत्जमैन , मैडम स्टेफनी क्लेइट, स्टीफन रिट्टर आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा
हिमालय के इन दुर्लभ चित्रों की प्रदर्शनी की विचार पहाड़ संस्था के प्रो. शेखर पाठक को सितंबर 2015 में तब आया जब उन्होंने म्यूनिख में पहली बार कला इतिहासकार स्टेफ़नी क्लेइट के सौजन्य से म्यूनिख स्थित 'स्टैटलिचे ग्राफ़िशे सैम्लुंग' में उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य के नैनीताल और कुमाऊं के आसपास के क्षेत्रों के उच्च गुणवत्ता और विस्तृत रेखाचित्र देखे। ये चित्र श्लागिंटवेट परिवार के वारिसों ने म्यूनिख के अल्पाइन संग्रहालय को दान किए थे। प्रो. पाठक एक सेमिनार के वास्ते म्यूनिख पहुंचे थे। सेमिनार में श्लागिंटवेट के अभियानों के दौरान उनके द्वारा एकत्रित कलाकृतियों, मुखौटों, नृवंशविज्ञान संबंधी वस्तुओं, मानचित्रों, मापों और अभिलेखों की एक बड़ी प्रदर्शनी भी शामिल थी। 
दून लाइब्रेरी में इस मौके पर प्रो. हरमन क्रुत्जमैन ने इन चित्रों से जुड़ी पूरी कहानी बताई और बताया कि किस तरह ये चित्र आज के जलवायु परिवर्तन, भू विज्ञान व समाज के अध्ययन के काम आ सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत से लौटने के बाद, हर्मन और रॉबर्ट ने अपने शोध को "रिजल्ट्स ऑफ एक साइंटिफिक मिशन टू इंडिया एंड हाई एशिया " नामक विशाल ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया। इस कार्य में एटलस, पैनोरमिक चित्र और विभिन्न जनजातियों के शारीरिक माप (नृवंशीय डाटा) शामिल थे।

 



कार्यक्रम में प्रो. शेखर पाठक ने यूरोपीय़ देशों के तिब्बत व हिमालय से जुड़े अभियानों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हालांकि ये खोज अभियान जासूसी अभियान भी थे पर श्लागिंटवाईट भाइयों ने उस दौर में वैज्ञानिक खोज की नींव रखी जब संचार और यात्रा के साधन बेहद सीमित और खतरनाक थे। उनके द्वारा किया गया कार्य आज भी दक्षिण एशियाई भूगोल और नृविज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ है
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के संस्थापक प्रो.बी.के जोशी ने कार्यक्रम में अतिथि वक्ताओं और उपस्थित लोगों का स्वागत किया। कार्यक्रम के पूर्व में केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने प्रदर्शनी के चित्रों पर  संक्षिप्त प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन सामाजिक व सांस्कृतिक अध्येता डॉ. लोकेश ओहरी ने किया। प्रदर्शनी के शुभारंभ में लोक कलाकार रामचरण जुयाल ने मोंछंग बजाकर किया। 

 



 

इस अवसर पर पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखण्ड,  नृप सिंह नपलच्याल, सुरेन्द्र सिंह पांगती, सर्वे ऑफ इण्डिया के एडिशनल सर्वैयर संदीप श्रीवास्तव, डॉ.पंकज नैथानी, डॉ. डीके पांडे , डॉ. लालता प्रसाद, राजेश, सकलानी, सुंदर सिंह बिष्ट, चन्दन सिंह डांगी, उषा नौडियाल जयदीप रावत, अर्पणा वर्धन, डॉ. मालविका चौहान, डॉ.बीपी मैठाणी, डॉ. कुसुम नौटियाल, डॉ.संजय चोपड़ा, डॉ. रवि चोपड़ा. निकोलस हॉफलैण्ड, योगेश धस्माना, चन्द्रशेखर तिवारी, नवीन नैथानी, बसन्ती पाठक, जेपी मैठाणी साहित कई, सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक,इतिहास विद, संस्कृतिकर्मी, लेखक,साहित्यकार सहित कई प्रबुद्घ जन शामिल रहे।
(अरविंद शेखर की रपट)